फ़िल्म का पहला दृश्य देखकर ही मुझे सिहरन हुई, जब एक लड़की फ़िल्म की जया आईवीएफ के लिए डॉक्टर से बात कर रही है। पति को भी बिना बताए वो पति के ही वीर्य से गर्भ धारण करना चाहती है। ठीक उसी वक़्त उसके ससुर का फोन आता है, चाय पीने के लिए बहू का इंतज़ार करते ससुर उसे कहते हैं वो किसी और के हाथ की चाय नहीं पीते।
उफ़्फ़...यह तुम्हारे हाथ का खाना, तुम्हारे हाथ की चाय....ज़िंदगी निगल रखी है इसने। वो रोटी बनाती है। बनाती जाती है, बनाती जाती है। उस घर की घड़ी में समय के पीछे से रोटी झाँकती है। कुछ दृश्यों को जान बूझकर नाटकीय बनाया गया है लेकिन वह नाटकीयता मारक है, चुभती है। हंसी नहीं आती, कुछ कचोटता है।
दूसरा दृश्य, माधुरी दीक्षित यानि रेखा के पाँव के नीचे एक कागज आता है जिस पर लिखा है, 'क्या आप अकेले हैं?' यह अकेलेपन को मसालेदार नज़रिये से देखने और भरने वाला विज्ञापन है, जिसे वह रौंदकर आगे बढ़ जाती है। फ़िल्म की कहानी का मर्म क्या होने वाला है, यहीं से समझ आने लगा था।
फ़िल्म एक डार्क ह्यूमर है जो हँसाएगा कम परेशान ज़्यादा करेगा। अन्यथा यह आपको इरिटेट करेगा। यह बात सही है कि कथानक के घनत्व को फ़िल्म का ट्रीटमेंट ठीक से डिफ़ाइन करने में कई जगह चूकता है फिर भी मुझे लगता है उस चूक के बावजूद काफी कुछ कह जाता है।
फ़िल्म के तीन मुख्य पात्र, जया सुषमा और रेखा हैं, बाद में इसमें हेमा भी जुड़ती है। सबके जीवन की व्यथा, अकेलापन, कुंठा, संघर्ष उनके हंसी ठिठोली वाले किरदारों में समाहित है। रेखा का गुनाह है उसके कपड़े, उसका बिंदास होना और सबसे ऊपर उसका स्त्री होना, जिसका आगे चलकर सिंगल हो जाना।
समाज के तमाम संस्कारी और चरित्रवान पुरुषों का लड़खड़ाना और फिर बनाना कई नई कहानियाँ जिसमें मसाला ही मसाला है।
स्त्री अगर अकेली है, कमजोर है तो उसे समाज रोता हुआ, असहाय और दीन हीन ही देखना चाहता है। ऐसी स्त्री जिसे तमाम कंधों की ज़रूरत हो। ताकि तमाम बेरोजगार कंधों को रोजगार मिले। लेकिन जैसे ही स्त्री कमजोर होने के बजाय लड़ना और रोने बिसूरने के बजाय खुश रहना चुनती है वह किरकिरी हो जाती है, जिसे डायन से लेकर न जाने कितने नाम दिये जाते हैं। ज़ाहिर है उसका चरित्रहीन होना तो सबसे पहले है ही।
इन्हीं कुछ मुद्दों की तरफ ले जाती है फ़िल्म। बेटियों की मेकिंग में भी माँ की जर्नी का कसैलापन शामिल है ही।
वह तमाम कोशिश करती है सम्मान से अपनी बेटियों को पालने के लेकिन हर बार संस्कारी और चरित्रवान समाज उसे मजा चखाता है।
घर, दुकान तोड़े जा रहे हैं और एक अकेली माँ अपनी दो छोटी बेटियों के साथ साँप सीढ़ी खेलते हुए बच्चों का ध्यान हटाने की कोशिश करती है। यह एक मेटाफर है जो काफी असर करता है।
फ़िल्म के अंत में गुप्ता जी की पत्नी सब कुछ जानने के बाद पति को लेकर चुपचाप चली जाती है, यह खटक सकता है लेकिन मुझे खटकता नहीं, सच लगता है, यही हक़ीक़त है। स्त्रियों के पास न तो ज़्यादा च्वाइस है, न हिम्मत। बस उनकी गृहस्थी बनी रहे, बच्चों की ठीक से शादी हो जाये, सब ढंका मुंदा रहे।
फ़िल्म तमाम पहलुओं को सामने लाती है, हालांकि यह बात सही है कि फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी। लेकिन यह संभावना तो हमेशा रहती ही है। मास्टरपीस नहीं है फ़िल्म लेकिन देखी चाहिए और ठीक से देखी जानी चाहिए।
फ़िल्म का गाना 'खोल पिंजरा' फ़िल्म का एसेंस है।

No comments:
Post a Comment