ये जो सारे दरवाजे खिड़की भेदकर
चली आती है रातरानी की ख़ुशबू
ये अप्रैल का दीवानापन है
ये जो आँखों से निकल भागे हैं ख़्वाब
मटरगश्ती करते फिर रहे हैं यहाँ से वहाँ
ये अप्रैल की शरारत है
ये जो समन्दर की लहरों को
अंजुरियों में समेट लेने को व्याकुल है एक लड़की
ये अप्रैल पर भरोसा है
ये उड़ते हुए सेमल के फाहे
आ बैठे हैं काँधों पर
ये अप्रैल से उम्मीद है
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