Friday, June 12, 2026

मैंने सपने में तुम्हें देखा था


मेघालय....मेघों का घर। कब बादलों से प्यार हुआ, कब बारिशों के लिए दीवानगी पैदा हुआ कुछ याद नहीं। याद है तो बस इतना ही ज़िंदगी शुरू ही काफी देर से हुई। आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद ज़िंदगी का एक सिरा हाथ आया और तब खुद से दोस्ती होनी शुरू हुई। अपना अच्छा बुरा दिखना शुरू हुआ। 

बचपन कोई कमाल का नहीं था, लेकिन शायद था भी। कि बचपन के खेल, सखा सहेलियों के नाम पर किताबें ही याद हैं। ओ हेनरी, चेखव, प्रेमचंद शुरुआती लेखक थे जिनसे दोस्ती हुई फिर ये लिस्ट बढ़ती गई। कुछ लेखकों के प्रति दीवानगी बढ़ती गई। इन सबके बीच कॉलेज के किस्से, ज़िंदगी के वो हिस्से जहां उम्र की अठखेलियाँ सांस लेती हैं वो सब गायब रहीं। 

पिछले एक दशक से ज़िंदगी का सिरा थामा और पाया कि ज़िंदगी तो किताबों के बाहर भी बहुत सुंदर है। लेकिन यह सुंदरता लोगों के करीब जाने पर टूटती है और प्र्कृति के क़रीब जाने पर निखरती है।  


देहरादून के मौसम ने मुझे बताया कि मेरे भीतर दीवानगी किन चीजों के लिए है, मेरी तलाश क्या है आख़िर। इस तलाश में मौसम क़रीब आता गया और लोग कम होते गए। अब जो सुख था आँखें डबडबाने के लिए काफी थे। घंटों चुपचाप आसमान देखते हुए महसूस हुआ यह ख़ामोशी मेरी तलाश थी, मुझे पता ही नहीं था। याद आया बचपन में मेहमान घर आने पर कैसी घबराहट होती थी। किसी शादी या दूसरे फङ्क्शन में जाने के नाम पर क्यों आँसू ही आ जाते थे। घर के काम करने, घंटों खाना बनाने ने मुझे लोगों से बात करने से थोड़ा तो बचाया था। 

जगजीत सिंह की गज़लें सुनते हुए पूरे घर का पोछा लगाना फेवरेट काम हुआ करता था। वह शायद मेरे बनने के दिन थे, जो ठीक से बन न सके। वरना भला मुझे कैसे पता न चला कि मुझे मौसम चाहिए, ढेर सारे मौसम। ठंड का कोहरा, बारिशों की बौछारें और तपती गरमियाँ। खुद को पहली बार तलाशा अपनी ही कहानियों में। 
प्रेम और प्रकृति की उन कहानियों में मुझे जिस कदर सुख मिलता था बताना मुश्किल है। हालांकि उन कहानियों का उपहास भी कम नहीं उड़ाया गया। लेकिन मैं कैसे बताती वो कहानियाँ मेरा जीवन हैं। न लगें किसी को अच्छी न सही, मैं जीना तो नहीं छोड़ सकती न। 

ऐसे ही उलझते बिखरते दिनों में मैंने एक रोज ट्रैवल ब्लॉग देखते हुए मेघालय का ब्लॉग देखा, कनिष्क गुप्ता का। मैं जैसे सुध बुध बिसराने लगी थी। जब भी मन उदास होता मैं उस ब्लॉग को खोल लेती और देखने लगती। देखते देखते ही याद आया कि मेघालय और चेरापूंजी के बारे में जनरल नॉलेज के सवाल के लिए पढ़ाते हुए माँ ने कितनी डांट लगाई थी। सही जवाब न देना डांट खाने कभी कभी मार खाने के लिए भी पर्याप्त वजह होती थी उन दिनों। 


इम्तिहान में शायद मैंने एक नंबर का जवाब गलत किया हो लेकिन ज़िंदगी में चेरापूंजी ठहर चुका था। जैसे अनजाने प्रेमी से प्यार होता है वैसा ही कुछ मेरा रिश्ता चेरापूंजी से बनने लगा। मुझे सपने में बादल आते, मैं उन्हें पकड़ने को हाथ बढ़ाती और ऑफिस जाने का टाइम हो गया है कहकर घड़ी आँखें दिखाती। 

क़रीब 5 बरस मैंने मेघालय जाने के सपने को अपनी पलकों में सहेजा है। 
और आख़िर 2026 का जून महीना उस ख्वाब की ताबीर लेकर आया। यह यात्रा कई लिहाज से अलहदा थी। यह हम माँ बेटी की पहली यात्रा थी साथ में। इसके पहले हम दोनों लंदन गए थे लेकिन तब सिर्फ जाना और आना ही अकेले था। इस यात्रा की पूरी ज़िम्मेदारी बिटिया रानी ने उठाई थी। मैं एकदम बेफिक्र थी। 

और यह कोई छोटा सुख नहीं था।
(जारी....)

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