Tuesday, June 16, 2026

पहली मुलाक़ात का तिलिस्म

गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तसवीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी। 

छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। वेलकम टू मेघालय का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ। 

उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है। 


हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है। 

मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई। 



उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। हमारा बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने कोने में मौसम की जगह हो। 


हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है। 

बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी। 

फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था। 

(जारी...)

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