Thursday, January 20, 2022

कौन जात हो भाई?



दलित पीड़ा और विक्षोभ को स्वर देने वाली कविता किस तरह दबाई जाती है, प्रियदर्शन जी की एक टिप्पणी जो  ndtv.in पर प्रकाशित हुई है. 

इसलिए ज़रूरी है इस कविता पर पाबंदी!
 
कौन जात हो भाई?
“दलित हैं साब!”
नहीं मतलब किसमें आते हो? /
आपकी गाली में आते हैं
गन्दी नाली में आते हैं
और अलग की हुई थाली में आते हैं साब!
मुझे लगा हिन्दू में आते हो!
आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
 
जब कोई जान जाता है कि वह हमारी गाली, नाली और अलग की हुई थाली में आता है और इसे बड़ी सहजता से कह देता है तो क्या होता है? हमारे भीतर हमारी सोई हुई शर्म कुछ देर के लिए जाग जाती है। अपने-आप से आंख मिलाते हुए कुछ देर के लिए असुविधा होती है। एक दलित पीड़ा जैसे सवर्ण अहंकार या विनम्रता दोनों से अपना हिसाब मांगने लगती है, दोनों को कठघरे में खड़ा कर डालती है। लेकिन जिन पंक्तियों से यह टिप्पणी शुरू हुई है, उनका इस चुनावी दौर में एक राजनीतिक आशय भी निकल आता है- कि हिंदू हितों की बात करने वाले लोग दलितों को तभी हिंदू मानते हैं जब चुनाव आते हैं।
 
यहीं से यह सच ख़तरनाक हो उठता है। इस पर कुछ लोगों को पाबंदी ज़रूरी लगती है। इस कविता को रोकने का काम शुरू हो जाता है। दरअसल इस कविता का उल्लेख करने की ज़रूरत इसलिए है कि इसे इंस्टाग्राम पेज पर डाला गया था और फिर आधे घंटे के भीतर इसे हटा लिया गया। किसी ने इसकी शिकायत कर डाली। यह जानकारी देते हुए हमारे प्रबुद्ध मित्र महेश मिश्र ने यह पूरी कविता भेजी।

ये पंक्तियां एक नामालूम से युवा दलित कवि बच्चा लाल 'उन्मेष' की हैं। पूरी कविता का नाम है 'छिछले प्रश्न गहरे उत्तर'। बच्चा लाल 'उन्मेष' इतने नामालूम हैं कि पहले यह जानने की ज़रूरत महसूस हुई कि यह कवि है कौन। इसके लिए मैंने बाक़ायदा अनिता भारती और रजनी अनुरागी जैसी सुख्यात लेखिकाओं से संपर्क किया।
कविता निस्संदेह हमें छीलती है। समाज में जिस अमानवाीय अन्याय का हम सदियों से पोषण कर रहे हैं, उसे यह कविता बिल्कुल सामने ला देती है। कविता की अगली पंक्तियां हैं-

क्या खाते हो भाई?
“जो एक दलित खाता है साब!”
नहीं मतलब क्या-क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कर्ज़ का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है। कविता शब्दों का खेल होती भी नहीं। इसमें सदियों की हूक है, उपेक्षा का अनुभव है, शोषण की स्मृति है और कमाल यह है कि यह सब कुछ इस तरह कहा गया है जैसे कवि इस पूरी पीड़ा से निकल कर एक आईना खोज लाया है जिसमें हमारी सभ्यता का बेडौल-विरूप चेहरा दिखाई पड़ रहा है। यह वर्चस्ववाद के ख़िलाफ़ एक कार्रवाई है और इस लिहाज से जुर्म है। इसे निषिद्ध किया जाना है। यह लोकतंत्र के उस चुनावी खेल पर भी चोट करती है जिसमें दमन के सामाजिक यथार्थ पर प्रलोभन का राजनीतिक लेप चढ़ाया जाता है। कविता आगे कहती है-

क्या पीते हो भाई?
“जो एक दलित पीता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या पीते हो?
छुआ-छूत का गम
टूटे अरमानों का दम
और नंगी आँखों से देखा गया सारा भरम साब!
मुझे लगा शराब पीते हो!
पीता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

असल पेच यहां खुलता है। नंगी आंखें अब भरम देखने में सक्षम हैं। होने-खाने-पीने के बेहद मामूली लगते सवालों के ये गैरमामूली लगते जवाब फिर से हमारा और हमारी तथाकथित सभ्यता का मज़ाक उड़ाते हैं- हमारे राजनीतिक पाखंड का भी। कविता चुनाव पर भी चोट करती है। फिर इस पर रोक तो लगेगी ही। अब आगे देखिए- कविता के 

अगले सवाल-जवाब-
क्या मिला है भाई
“जो दलितों को मिलता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या मिला है?
ज़िल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में।

यहां से हमला तीखा होता जाता है। उनकी जिल्लत भरी ज़िंदगी में हमारे हिस्से की गंदगी भी शामिल है और हमारी परजीविता भी। चाहें तो आप इसे एक समाजशास्त्रीय सच्चाई की तरह पढ़ सकते हैं। याद कर सकते हैं कि इस देश के जो सबसे ज़रूरी काम हैं- बिल्कुल बुनियादी स्तर के- हर तरह की साफ-सफ़ाई के- वे अब तक उनके भरोसे चल रहे हैं। और उनके सामने ये हक़ीक़त खुली हुई है। कविता का अंतिम हिस्सा इसी काम पर है-

क्या किया है भाई?
“जो दलित करता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या किया है?
सौ दिन तालाब में काम किया
पसीने से तर सुबह को शाम किया
और आते जाते ठाकुरों को सलाम किया साब!
मुझे लगा कोई बड़ा काम किया!
किया है न साब! आपके चुनाव का प्रचार..।

फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या इस कविता पर पाबंदी लगनी चाहिए? और यह जानने की ज़रूरत महसूस होती है कि इस कविता की शिकायत किन लोगों ने की होगी? क्या सोशल मीडिया की भी कथित लोकतांत्रिकता पर उन्हीं वर्चस्ववादी ताक़तों ने क़ब्ज़ा कर लिया है जिनकी ठकुरसुहाती को कभी हर शाम सलाम चाहिए होता था?
यह वह राजनीतिक समय है जब हर कोई अंबेडकर का नाम लेता है- वे भाजपाई भी जिन्हें पता नहीं है कि अंबेडकर ने हिंदुओं को बहुत सख़्ती से बीमार समुदाय की संज्ञा दी थी और कहा था कि उनकी बीमारी देश के दूसरे समुदायों की भी सेहत और खुशहाली पर असर डाल रही है। यह वह सामाजिक समय है जो सदियों के पाखंड को अब भी ढोता है। इस समय में अपनी राजनीतिक मजबूरियों का मारा कोई रविकिशन दलितों के घर खाना खाने जाता है और बाद में उनके पसीने को याद कर भन्नाता है। इसका भी वीडियो इन्हीं दिनों वायरल है।
बच्चालाल 'उन्मेष' की कविता पर पाबंदी ज़रूरी है। यह हमारे शिष्ट आस्वाद पर चोट करती है। यह उस लोकतांत्रिक सहमति को ख़ारिज करती है जिसके नाम पर पिछड़ों और दलितों की राजनीति की जाती है। और सबसे ख़तरनाक बात- यह दलितों को याद दिलाती है कि उन्होंने क्या-क्या झेला है और किनके हाथों झेला है। जिस समय इस देश की अदालत सुझाव देती है कि दलित शब्द का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, उस समय यह दलित संज्ञा एक चुनौती की तरह हमारे सामने आती है। सोशल मीडिया ऐसी चुनौतियों से निबटने का तरीक़ा जानता है। लेकिन वह यह नहीं जानता कि पाबंदियां रचनाओं को अतिरिक्त शोहरत दे देती हैं, कि सच्चाइयां फिर भी बाहर निकलने का रास्ता तलाश लेती हैं।

Sunday, January 16, 2022

नागरिक समाज- बसंत त्रिपाठी का कविता संग्रह



इस इतवार की तैयारी कल शाम ही हो गयी थी. तीन नयी किताबें सिरहाने रखकर सोई जो थी. इन्हें पढ़ने का मोह इस कदर था कि सुबह नींद जल्दी खुल गयी. पहली चाय के साथ अख़बार को पांच मिनट में उलट-पुलट कर रखकर सैर पर चली गयी. लेकिन कुछ था घर में जो पुकार रहा था. सैर से लौटते ही एक चाय और चढ़ाई और ‘नागरिक समाज’ उठा ली. सच कहती हूँ, अरसे बाद लगा कि कुछ मन का पढ़ा है. कुछ ऐसा जो मुझे झकझोर रहा है. कविताओं के सैलाब से गुजरते हुए शायद खो गया था ये स्वाद. मित्र कवि बसंत त्रिपाठी का यह संग्रह ज़ेहन की भूख मिटाता भी है और बढ़ाता भी है. ये कवितायें आईना हैं देश का, समाज का और हमारा. मुझे मालूम नहीं कि जैसा मैं महसूस कर रही हूँ उसे कैसे लिखूं, शायद नहीं लिख पाऊंगी, अभी सीखना बाकी है जस का तस अभिव्यक्त कर पाना.

इन कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि कवि होना कितनी पीड़ा, कितनी बेचैनी में होना है. और यह पीड़ा यह बेचैनी उस समय और समाज को लेकर है जिससे असल में निज की निर्मिति होती है. बिना सतर्क नज़र और साफ़ नज़रिये के आप कुछ भी हो सकते हैं कवि नहीं. इन कविताओं को पढ़ते हुए अपने उस निज की पड़ताल होती है जो सुविधाभोगी घेरे में मतलब भर की वैचारिकी (जिसमें जोखिम न हो) के साथ बहस, आन्दोलन कर लेता है. ये कवितायेँ आपका हाथ पकड़कर समाज के उन स्याह कोनों, वहां के लोगों के जीवन तक ले जाती हैं जिनकी बात किये बगैर नहीं है अर्थ किसी बात का. ये कवितायेँ बार-बार पढ़े जाने वाली कवितायेँ हैं. सेतु प्रकाशन से प्रकाशित यह कविता संग्रह बसंत त्रिपाठी का चौथा कविता संग्रह है.

इन्हें पढ़ते हुए आपको सुख नहीं होगा, बल्कि आपके कम्फर्ट में खलल पड़ेगा फिर भी मैं कहूँगी कि इन कविताओं को पढ़ा जाना जरूरी है. इसी संग्रह की अलग-अलग कविताओं से कुछ पंक्तियाँ-

केवल विकास दर के बढ़ते ग्राफ से नहीं
अपहरण बलात्कार और आत्महत्याओं के तरीकों से भी
यह सदी दर्ज हो रही है इतिहास में
इतिहास के अंत के भाष्यकारों से नहीं
इतिहास में शामिल होने
और उसे बदल डालने की इच्छा से भी
आप जान सकते हैं इस सदी को....

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लड़ना तो दूर
कहीं जगह ही नहीं थी मेरी
क्यों न खुद को खत्म कर लूं
बस इस ख्याल का आना था
कि यमदूतों ने अपने भालों की नोक चुभोयी-
‘तुम्हारा समय अभी नहीं आया है मि बसंत
तुम्हें इस देश में अपने हिस्से की जिल्लत
पूरी-पूरी झेलनी है.’

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बोलना जरूरी है
कभी-कभी चीखना और झुंझलाना भी
लेकिन सिर्फ बोलने और चीखने और झुंझलाने से
ईमानदार नहीं हो जाता हर कोई
ढोल संगत देने के लिये ही नहीं
अपनी पोल छुपाने के लिए भी
बजता है कई बार
ढडंग... ढडंग...

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देशभक्त आजकल देश से गिरकर
भक्त पर अटके हुए हैं
और बाबाओं की तो अब रहने दें
वे जब तब धर्म की गंधाती व्यापारिक नाली में
गिरते ही रहते हैं
अब तो क्रांतिकारिता भी फेसबुक पर लाइक की आस में
हर सुबह गिर पड़ती है
गिरने का कारोबार उठान पर है अब
जो जितना गिरता है
उसकी आभा उतनी ही निखरती है.

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मुख्यमंत्री के चरित्र के गिरने का ग्राफ
प्रधानमंत्री जैसा नहीं होता
न उनके सचिव एक जैसे गिरते हैं
और मंत्रियों का तो कहना ही क्या
उनका चेहरा क़दमों पर इतना गिरा होता
कि मंत्रित्व काल में
कभी ठीक से दिखाई नहीं पड़ता पूरा...

Friday, January 14, 2022

कहानी- छुट्टी


- प्रतिभा कटियार
‘मम्मा, आज ऑफिस न जाओ. प्लीज़ मम्मा.’ बिस्तर में कुनमुनाते हुए विशु ने मंदिरा का हाथ पकड़ लिया. तेज़ी से घर के काम निपटाती मंदिरा एक पल को भरभरा के गिरने हुई जैसे. यार अब ये लास्ट मूमेंट इमोशनल क्राईसिस कैसे मैनेज करेगी वो. अभी और भी काम पड़े हैं घर के. विशु के लिए फ्रूट्स काटकर रखने हैं, अपना नाश्ता पैक करना है और हाँ बाल भी बनाने हैं अभी तो. उसने मन ही मन सोचा बालों को लपेटकर जूड़ा बना लेगी फिर ऑफिस के वाशरूम में ठीक से बना लेगी. नाश्ता भी चलो पैक कर लेगी टी ब्रेक में खा लेगी लेकिन अब विशु का वो क्या करे. अपनी तमाम अधीरता को समेटते हुए, ढेर सारा लाड़ आवाज़ में घोलते हुए उसने विशु के माथे को चूमना चाहा तो उसे उसका माथा तपता हुआ लगा. छूकर देखा तो उसे बुखार था.

मंदिरा वहीँ बैठ गयी. सब कुछ संभालने की जद्दोजहद ऐसे मौकों पर एकदम से ढह जाती है. ऑफिस की मीटिंग, उसका प्रेजेंटेशन सब फ्रीज़ हो गया एकदम से. नौ बरस के बच्चे को बुखार में छोड़कर कैसे जा सकती है वो. लेकिन एन वक्त पर ऑफिस से छुट्टी भी कैसे ले सकती है. दोनों ‘कैसे’ के बीच घड़ी की सुई मुंह चिढ़ाते हुए टिक टिक कर रही थी.

महेश को फोन मिलाया हालाँकि वो जानती है कि उसे फोन मिलाने से कोई फायदा नहीं होगा फिर भी उसने महेश का नम्बर डायल कर दिया. पहली कॉल महेश ने उठायी नहीं, दूसरी कॉल पर वो झल्ला पड़ा ‘यार सुबह से ही तुम क्यों परेशान करने लगती हो अभी ऑफिस पहुंचा हूँ, काम शुरू हुआ है. बाद में कॉल करना.’ कहकर महेश ने फोन काट दिया.

मंदिरा को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन अभी गुस्से का समय नहीं था क्राइसिस मैनेजमेंट का समय था. उसने फिर से फोन मिलाया, ‘विशु को बुखार है महेश उसे बुखार में मेड के सहारे छोड़कर नहीं जा सकती. तुम आज छुट्टी ले लो प्लीज़’ इस बार मंदिरा ने महेश को बोलने का कोई भी मौका दिए बिना अपनी बात कह दी.

‘अरे तो तुम छुट्टी ले लो न, मुझे क्यों कह रही हो’ महेश अब भी उसी चिढ़ी हुई आवाज़ में बात कर रहा था. ‘अगर ले सकती तो तुम्हें फोन नहीं करती. नहीं ले सकती छुट्टी मैं आज. मीटिंग है ऑफिस में. मेरा प्रेजेंटेशन है.’

‘तुम कहना क्या चाहती हो, तुम्हारी मीटिंग, तुम्हारा ऑफिस इम्पोर्टेंट है और मेरा नहीं.’ महेश की आवाज़ की तेजी और रूखापन बढ़ता जा रहा था.

‘मैंने ऐसा नहीं कहा, आज मेरे ऑफिस में ऐसी स्थिति नहीं है कि मैं छुट्टी ले सकूं. मेरा होना जरूरी है वहां. हमेशा तो लेती ही हूँ.’ मंदिरा ने घर के बचे हुए कामों को तेज़ी से समेटते हुए कहा.

‘ओह हमेशा तुम छुट्टी लेती हो? यानी तुम ही सब करती हो. मैं कुछ नहीं करता? यार तुमको न ये हीरोइन बनने का कुछ ज्यादा ही शौक नहीं है. देखो मैं छुट्टी नहीं ले सकता. तुम मैनेज करो. और अब फोन मत करना.’ महेश ने फोन काट दिया लेकिन मंदिरा के पास महेश की बातों का बुरा मानने का वक्त ही नहीं था. उसने ऑफिस के ग्रुप में मैसेज किया कि बच्चे की तबियत ठीक नहीं थोड़ी देर से पहुंचेगी.

मुखर्जी आंटी को फोन लगाया, ‘आंटी आज मैं विशु को आपके यहाँ छोड़ सकती हूँ क्या? असल में उसे थोड़ा बुखार है और मैं छुट्टी नहीं ले सकती आज.’

मुखर्जी आंटी पापा के ऑफिस में काम करती थीं. अब रिटायर हो गयी हैं और अकेली रहती हैं. इस तरह के हालात में पहले भी कई बार वो काम आ चुकी हैं. मुखर्जी आंटी को उस रोज कहीं जाना था लेकिन उन्होंने मंदिरा की इमरजेंसी को देखते हुए अपना जाना स्थगित किया.

मंदिरा ने विशु को जल्दी से कपड़े बदलवाए, सामान के साथ विशु और मीना को गाड़ी में बिठाया और मुखर्जी आंटी के घर की ओर चल पड़ी. विशु को मुखर्जी आंटी के घर जाना पसंद नहीं है जानती है मंदिरा लेकिन अभी उसके पास कोई दूसरा ऑप्शन नहीं था. उधर विशु लगातार रोये जा रहा था, शिकायत किये जा रहा था, ‘मम्मा आप बहुत गंदी हो. मैंने आपको बोला आप घर पर ही रुक जाओ और आप मुझे ही घर से बाहर लेकर जा रहे हो. मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगा.’

मंदिरा के पास विशु की बात का बुरा मानने या उसे समझाने का न समय था, न ताकत.

मुखर्जी आंटी गेट पर ही मिल गयीं. सामान की तरह मंदिरा ने विशु का हाथ मुखर्जी आंटी के हाथ में थमाया और मीना से बोला आंटी को परेशान न करना. ध्यान रखना बेबी का. विशु आंटी को तंग नहीं करना. कहकर मंदिरा ने गाड़ी मोड़ी ऑफिस की तरफ.

पूरे एक घंटे देर से पहुंची वो ऑफिस. सबकी नजरों में उसे एक अजीब सा तंज़ दिखा जिसे उसने इग्नोर किया. ‘क्या हुआ विशु को’ भावना ने फुसफुसा कर पूछा. ‘बुखार है’ मंदिरा ने भी फुसफुसा कर ही जवाब दिया और प्रेजेंटेशन के लिए लैपटॉप खोलने लगी.

व्यस्तताओं के तूफ़ान में घिरी मंदिरा को पहली फुर्सत तब मिली जब उसे वाशरूम जाने की जरूरत महसूस हुई. वाशरूम में पहुँचते ही उसे जोर से रोना आया. आईने में उसने अपनी शक्ल देखी तो याद आया कि उसने तो ठीक से बाल भी नहीं बनाये थे जूड़ा कसा था कि ऑफिस में ठीक से बनाएगी. तभी पेट में ऐंठन महसूस हुई. उसे ध्यान आया कि उसने ब्रेकफास्ट भी नहीं किया है. फोन देखा तो विशु के ढेर सारे कॉल पड़े थे. मुखर्जी आंटी के कॉल भी थे. उसने मुखर्जी आंटी को उसने फोन किया तो उन्होंने गुस्से में कहा, ‘बहुत लापरवाह हो मंदिरा तुम. तुमने विशु को खाली पेट ही दवा खिला दी थी. उसे उल्टियाँ हो रही हैं. कितना रो रहा है वो. और तुम फोन भी नहीं उठा रही.’ उन्होंने गुस्से में फोन काट दिया.

मंदिरा को समझ नहीं आ रहा था कि कैसे संभाले सब कुछ. काश महेश छुट्टी ले लेता आज सोचते हुए उसे रोना आ गया. जब वो बच्चा प्लान कर रहे थे तो महेश हमेशा यही कहता था, ‘तुम चिंता मत करो एकदम. मैं पालूंगा बच्चे को. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. देखना कैसे सब सम्भाल लूँगा.’

मीटिंग का लंच ब्रेक होने को था उसने सोचा बोल देगी बॉस को कि बेटा बीमार है आज हाफ डे लेगी वो. हाफ डे का सोचते ही उसे जैसे सांस आई. सांस आते ही विशु के चेहरा घूम गया आँखों के सामने, ‘मम्मा आज ऑफिस मत जाओ’ की उसकी गुहार कानों में तैर गयी. उसकी गिल्ट गहरी होने लगी.

‘सर, मैं लंच के बाद मीटिंग में नहीं रह पाऊंगी. बेटे की तबियत ठीक नहीं जाना होगा मुझे.’ मंदिरा ने अश्विनी को बोला तो अश्विनी की त्योरियां चढ़ गयीं. ‘मंदिरा ऐसे कैसे चलेगा. तुम्हारे प्रेजेंटेशन पर बात होगी लंच के बाद और तुम ही नहीं होगी. बी प्रोफेशनल.’ अश्विनी का स्वर एकदम सख्त था.

सर, जाना पड़ेगा.’ मंदिरा ने दो टूक कहा और निकल गयी. रास्ते से ही उसने मुखर्जी आंटी को फोन किया तो उन्होंने बताया कि उलटी होने के बाद थोड़ा हल्का महसूस कर रहा है विशु. अभी नाश्ता कराकर सुला दिया है उसे. मंदिरा सोचने लगी, जब विशु ने कहा, मम्मा आज ऑफिस मत जाओ तो उसके पास महसूस करने का वक़्त भी नहीं था. बुखार के कारण उपजी चिंताओं पर ध्यान ज्यादा था बुखार पर सबसे कम. कैसी हो गयी है वो. विशु करवट भी बदलता था तो भागकर पहुँचती थी वो उसके पास. क्या उसे नौकरी छोड़ देनी चाहिए? क्या वो एक करियर वुमन हो गयी है और लापरवाह माँ? उसके भीतर अपराधबोध बढ़ता जा रहा था तभी फोन घनघनाया. मीनल का फोन था.

‘यार, सिंगल पैरेंटिंग बहुत मुश्किल काम है. आज रिया के स्कूल में एक्सिबिशन थी और मैं वहां जा ही नहीं पायी. बड़ा बुरा लग रहा है.’ मीनल ने छूटते ही कहा. मंदिरा ने कहना चाहा कि सिंगल पैरेंटिंग से भी बुरे हालात हैं उसके. सिंगल हो तो कम से कम पता होता है कि सब आपको ही करना है कोई आपको तानों की बौछार से भिगोता नहीं है. लेकिन मंदिरा चुप रही. मीनल और मंदिरा बचपन के दोस्त हैं हर सुख दुःख के साथी. उसने मीनल से इतना ही कहा, ‘हो सके तो टाइम निकालकर हो लेना एग्जिबिशन में वरना गिल्ट से मर जाओगी.’

‘हाँ यार हर वक्त गिल्ट ही तो रहती है साथ. कभी यह भी लगता है कि शुभम से अलग न होती तो ठीक होता शायद.’ मंदिरा ने धीमे से बस इतना कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है.’

गाड़ी मुखर्जी आंटी के घर के सामने आ गयी थी उसने मीनल से कहा, ‘यार बाद में बात करती हूँ’

विशु का बुखार उतर चुका था. वो सो रहा था. मंदिरा ने उसके माथे पर हाथ फेरा तो उसने आँखें खोल दीं, ‘मम्मा, अब आप नहीं जाओगी न?’ मंदिरा ने कहा ‘हाँ बेटा अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी. तुम आराम से सो जाओ, मम्मा यहीं है. थोड़ी देर में हम घर चलेंगे फिर.’ दवा का असर माँ के स्पर्श के साथ मिलकर अच्छी नींद में बदल गया और विशु फिर से सो गया लेकिन इस बार उसकी नन्ही हथेलियों ने माँ की हथेलियों को थामा हुआ था.

मुखर्जी आंटी ने मंदिरा को उसे इशारे से बुलाया और कॉफ़ी दी.

शाम के तीन बजे दिन की पहली कॉफ़ी पीते हुए मंदिरा का शरीर बिखरने को हुआ हो जैसे. आंटी कुछ खाने को दीजिये साथ में सुबह से कुछ खाया नहीं है. शायद मीना ने सुन लिया था मंदिरा को कहते हुए वो टिफिन में रखे पराठे गर्म करके ले आई थी.

‘सोच रही हूँ नौकरी छोड़ दूं?’ पराठे का पहला टुकड़ा मुंह में धकेलते हुए मंदिरा ने कहा.

‘नहीं, ऐसा हरगिज मत करना’ मुखर्जी आंटी ने उसे कहा तो मीना भी बोल पड़ी, ‘दीदी आप मुझे समझाती हो कि औरतों को काम जरूर करना चाहिए और खुद ऐसी बात कर ही हो.’ कभी कभी होता है न ऐसा तो, मैं और आंटी जी संभाल लेंगे. लेकिन आप नौकरी मत छोड़ना वरना बड़े होकर यही बच्चे कहेंगे कि तुमने कुछ किया क्यों नहीं.’ मुखर्जी आंटी मीना को प्रशंसा भरी नज़रों से देख रही थीं.

‘लेकिन आंटी बहुत गिल्ट होता है, बच्चे के पास होना चाहिए था मुझे और मैं कहाँ थी.’

‘बच्चे के पास तो महेश को भी होना चाहिए था, वो कहाँ है. उसे गिल्ट है क्या?’ मुखर्जी आंटी ने कहा तो मंदिरा चुप हो गयी.

घर आकर मंदिरा ने अगले दिन की भी छुट्टी लगाईं और विशु के बगल में आकर लेट गयी.
‘मम्मा, आप जॉब मत छोड़ना. मैं आपको परेशान नहीं करूँगा’ विशु ने मंदिरा के सीने में दुबकते हुए कहा तो दिन भर के भरे हुए उदास बादल मंदिरा की आँखों से छलक पड़े.

(14 जनवरी को नवजीवन में प्रकाशित)

Thursday, January 13, 2022

ज़िन्दगी के सुरों का रियाज़


- प्रतिभा कटियार

सरगम का ‘स’ साधने जैसा ही होता है जीवन साधना. जीवन में मिठास को सहेजने के लिए जो सिर्फ एक ‘स’ भर ही ठीक से लग जाये एक जीवन में तो वह भी कम नहीं. सारा जीवन बस उस एक सुर के ठीक से लग जाने का रियाज़ ही तो है. ये पत्र जिंदगी का वही रियाज़ हैं. कभी छलकी कभी, रुकी हुई उदासी, कभी कोई मीठा लम्हा जो कसैली ज़िंदगी की हथेली पर आ गिरा हो, कभी कोई गुनगुनाती धुन कभी कोई सुबह गुमसुम.

मार्च 2020 को हुई कुछ घोषणाओं के साथ पूरी दुनिया विषाद में घिर गयी. पूरी दुनिया घरबंदी में घेर दी गयी. कोरोना नामक वायरस जाने कैसा था कि इसने एक-दूसरे से मिलने पर ही रोक लगा दी. इस दौरान उन सबको याद किया जिनकी याद व्यस्तता की आड़ से छुपकर फुर्सत मिलने की इंतजार तक रही थी. अब तमाम यादें, बातें, स्मृतियां बाकायदा पाँव पसारे बैठी थीं. एक तरफ भीतर की दुनिया खुल रही थी. दूसरी तरफ बाहर की दुनिया जूझ रही थी.

एक वायरस जिसने खांचों में लड़ी जा रही तमाम लड़ाइयों को एक कर दिया था जीवन जीने की जीवन को बचाने की लड़ाई. यह वायरस हिन्दू मुलसमान, अमीर गरीब, स्त्री पुरुष का भेद नहीं कर रहा था. एक डर जिसने समूचे विश्व को एक सूत्र में बाँधा. अवसर था ज्यादा मनुष्य होने का. लेकिन क्या हम हो पाए?

शुक्रगुजार हूँ कुदरत की कि इस मुश्किल वक्त में यह राह खुली. जब बाहर की यात्राएँ बंद हुईं तब भीतर की यात्रा की टिकट हाथ में थमाकर मानो प्रकृति ने कहा हो, ‘जाओ घूम आओ कुछ दिन.’ यह लिखते हुए मेरी आँखे नम हैं कि इन बुरे दिनों ने मुझे बहुत मांजा है भीतर से. मन-जेहन की जमीन पर उग आये खर-पतवार बीनने का समय मिला कुछ.

इस दौरान खिले फूलों की खुशबू है इन खतों में, पंछियों का गान है, उनसे की गयी बाते हैं, देश के बड़े वर्ग के पाँव की बिवाईयों का दर्द है. इंतजार के आगे सजदा किये रहने की चाहत है, देखी हुई फिल्मों, पढ़ी गयी किताबों की बाबत कुछ बातें हैं जो प्रेम पत्र में ढलकर अपने गंतव्य तक पहुँचने की इच्छा रखती हैं. ये पत्र लेटर बौक्स में पोस्ट ही नहीं किये गये तो जिसके लिए लिखे गये उसके द्वारा पढ़ी कैसे जाते. और जो किसी एक के न हुए वो सबके हुए. आप सबके. जिसके भी हाथ में यह पुस्तक है उसके ही लिए लिखे गए हैं ये खत. माया मृग जी ने इन खतों को एक जगह समेटकर तरतीब दी और अब ये बुरे समय के प्रेम पत्र आपके हवाले हैं. प्रेम पत्रों को बुकशेल्फ में सजाये जाने की नहीं दिल में रखे जाने की चाह होती है, उम्मीद है ये आपके दिल में थोड़ी सी जगह बनायेंगे.

किताब मंगवाने का लिंक- https://www.amazon.in/gp/product/B09PJB1PR2/ref=ox_sc_act_title_1?smid=A1GRCEHOR5E0TF&psc=1

Tuesday, January 11, 2022

जीवन बहुत कीमती है

देवयानी भारद्वाज ने बहुत प्रेम से यह ख़त पढ़ा है- 

अरसे बाद सुबहों को सुन पा रही हूँ. शामों में जो एक धुन होती है न शांत सी, मीठी सी उसे गुनगुना पा रही हूँ. चाय की मिठास में पंछियों की चहचहाहट घुल रही है. वक़्त के पीछे भागते-भागते शायद हम वक्त को जीना भूलने लगे थे. आज वक्त मिला है खुद को समझने का. अपने आप से बात करने का. सोचने का कि मशीन की तरह यह जो हम भागते जा रहे थे, उसके मानी क्या थे आखिर.

जीवन बहुत कीमती है. इसे प्यार करना, लम्हों को युगों की तरह जीना, लोगों को अपने होने से बेहतर महसूस करवा सकना और क्या? यह मुश्किल वक़्त हमसे कुछ कहने आया है. इतना विनाशकारी वायरस भी हमें कुछ सिखा रहा है कि वो हमें सिर्फ मनुष्य के तौर पर पहचानता है. उसके लिए इस बात के कोई मायने नहीं कि आप किस देश के, किस राज्य के, धर्म के, जाति हैं. कौन से ओहदे पर हैं और क्या सामाजिक, आर्थिक हैसियत है आपकी? उसके लिए हमारा मनुष्य होना ही काफी है. और हम न जाने कितने खांचों में बंटे हैं. एक पिघलन सी महसूस हो रही है भीतर. जी चाहता है अपने सब जानने वालों से जोर-जोर से बोलूं कि उनसे प्यार है. सबसे माफी मांगूं कि कभी दिल दुखाया हो शायद मैंने. कहूँ कि देखो न आज गले भी नहीं मिल सकते और गले मिलने के वो सारे लम्हे जब पास थे, हमने उन लम्हों को झगड़ों में गँवा दिया.

यह वक़्त हमें वो सिखाने आया है जो सीखने को लोग न जाने कितने पुस्तकालयों की ख़ाक छानते रहे, कितने वृक्षों के नीचे धूनी जमाने को भटकते रहे. मनुष्यता का पाठ. अभी कुछ ही दिन पहले हमने दंगों की आग देखी है, बर्बर हिंसा देखी है. हिंसा बाहर बाद में आती है पहले वो भीतर जन्म लेती है. वो किसी भी बहाने बाहर फूट पड़ने को व्याकुल होती है. यह समय अपने भीतर की उस हिंसा को समझने का है, उसे खत्म करने का है. यह वक़्त गुज़र जाएगा. यक़ीनन हम वापस अपनी ज़िन्दगियों में लौट आयेंगे. सब पहले जैसा हो जायेगा. लेकिन क्या हमें सब पहले जैसा ही चाहिए? क्या हमें पहले से बेहतर दुनिया नहीं चाहिए. बाबुषा कहती है आपदा का यह समय बीत जाने के बाद यदि हम बचे रह जाएँ, और हम एक बदले हुए मनुष्य न हों तो मरना बेहतर है. सच ही तो कहती है वह. यह वक़्त अपने भीतर नमी को सहेज लेने का है, उन सबके प्रति प्रेम से भर उठने का जिनके प्रति कभी भी जरा भी रोष रहा हो. क्या होगा इस हिसाब-किताब का कि किसने क्या कहा, किसने क्या किया. अपने भीतर के विनम्रता के पौधे को, मनुष्यता के पौधे को खूब खाद पानी देने का समय है. जी भर कर रो लेने का, प्यार से भर उठने का समय है. यक़ीनन इस बार हम पहले से बेहतर मनुष्य होकर मिलेंगे. है न?