Monday, September 14, 2026

प्रतिरोध का उजला स्वर है श्रुति कुशवाहा की कविताओं में


यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्होंने मेरे अनकहे को कहा, बेचैन रातों में साथ बैठकर बातें कीं, उजले दिनों में संग मुस्कुराईं और सवाल पूछने के वक़्त पर सबसे आगे खड़ी नज़र आईं। यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्हें मैंने रसोई में खाना बनाते वक़्त पढ़ा, यात्राओं के दौरान कभी एयरपोर्ट के लाउंज में तो कभी फ्लाइट में और कभी आधी रात को नींद खुलने पर पढ़ा। यह बात उस कविता संग्रह के बारे में है जो न जाने कितने शहरों की यात्राओं में साथ रहा। और देखिये न फिर भी लगभग बरस बीतने को है और मैंने इसके बाबत कुछ लिखा नहीं। ऐसा नहीं कि लिखना चाहा नहीं बस कि लिख सकी नहीं। हमेशा लिखकर लगा कि ठीक से नहीं लिखा, न्याय नहीं कर पा रही हूँ, संग्रह के साथ। अब भी वैसा ही है। सोचती हूँ कि यह मेरी सामर्थ्य का मामला भी तो हो सकता है। अच्छी रचनाएँ आपको ऐसी चुनौती देती हैं। अकसर अच्छी कविता स्तब्ध करती है कि उसे सुनने के बाद आप ताली बजाना भूल जाते हैं। इस संग्रह की कविताएं ऐसी ही हैं, वे पन्नों पर ख़त्म हो जाती हैं लेकिन भीतर चल पड़ती हैं।  वैसे भी कविताओं के प्रभाव को तालियों की गूंज से नहीं, आँखों में उतर आए बादलों से या भिंची हुई मुट्ठियों से ही समझा जा सकता है।

यह सारी बात है श्रुति कुशवाहा के नए कविता संग्रह 'सुख को भी दुख होता है' के बारे में।

इन दिनों लगकर पढ़ना काफी कम हुआ है। मन की स्थिति का दोष है, व्यस्तताओं का दोष है या उन रचनाओं का जिन्हें मैंने पढ़ने के लिए चुना, कहना मुश्किल है। मैं रचनाओं को दोषमुक्त करते हुए अपने मन का ही दोष मानती हूँ क्योंकि घोर व्यस्तताओं में भी खूब पढ़ा ही है। लेकिन इस पूरे विचलन वाले समय में जब पढ़ने का सुर बिखरा हुआ है मैं श्रुति की कविताओं के पास लौटती रही। हर बार इन कविताओं ने अपने भीतर आने दिया।

यह कवि की उस समर्थता की बात है जो अपने पाठक के बिखरे भटके मन को भी सहेज ले, और कहे कि तुम अकेली नहीं हो, मैं भी हूँ तुम्हारे साथ। यही बात कवि अपने समर्पण में लिखती हैं, 'कविता शब्दविलास नहीं, जीवन में उतारने वाली बात है।' जीवन जितना विकट है उसकी तफ़्तीश इन कविताओं में मिलती है। वह साहस मिलता है जहां आवाज़ को रोके जाना असंभव है। प्रतिरोध का स्वर किसी सुर की तरह साधा है कवि ने।

कविता लिखने की तैयारी के लिए स्पष्ट नज़रिया, किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्ति और साहस प्राथमिक तैयारी है। यह तैयारी संग्रह भरपूर दिखती है। कवि जीवन और समाज के उन हिस्सों को चिन्हित करती हैं जहां स्याह घेरा  जमा होने लगा है, जहां शब्दों की जुगाली के खेल चले रहे हैं और सामाजिक, राजनैतिक दोगलेपन का पाखंड  फलफूल रहा है। जहां मुखौटे बड़े और मजबूत होते जा रहे हैं।

मुझे इस संग्रह की कविताओं ने इसलिए ज्यादा मोहित किया क्योंकि इसमें शैलीगत कोई सनसनाहट की बजाय सादगी की ऐसी तुरपाई दिखती है जो उधड़े मन को सहेज दे।

ये कविताएं आत्मा के उस हिस्से से मुठभेड़ करती हैं जिसे दुनिया समाज और राजनीति के डर से हम सबने थोड़ा चाहे अनचाहे छुपा दिया है या। कविताएं झिंझोड़ती हैं कि उठो और सामना करो। इन कविताओं में सीला मन है, प्रतिरोध है और उजास की लालसा भी है।

चाहूँ तो कितनी ही कविताओं पर कितना कुछ लिख सकती हूँ लेकिन फिलवक़्त कुछ कविताओं का जिक्र भर कर रही हूँ यह समझते हुए भी कि जैसे लिखने वाले की एक यात्रा होती है वैसे ही पढ़ने वाले की भी एक यात्रा होती है। तो यह मेरी पाठकीय यात्रा की बात है।

अक्षरज्ञान से पहले मैंने माँ की ख़ुशबू पहचानी
और पिता की गोद में सुनी
संसार की सबसे सुंदर प्रेम कवितायें
मेरी तुतलाहट के प्रत्यत्तर में उनकी मुस्कान
आज भी मेरी भाषा की सबसे विश्वसनीय कवितायें हैं।
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एक दिन
रात बंद ताले सी न होगी स्त्री के लिए
उसी के पास होगी उसकी सारी चाबियाँ

एक दिन हम मनुष्य होना सीख जाएँगे। 
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सब सुख में पगा था
सब सुख में डूबा
मैंने इस सुख को मोड़कर सहेज लिया
कि अचानक सुख ने उचककर बाहर झाँका
फिर जाने क्या हुआ
मैंने बहुत कोशिश की
लेकिन सुख तब से लगातार रो रहा है

मैं एक बात जान पाई हूँ
सुख को भी दुख होता है।

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छूटना अगर कोई नियम है तो
मैं चाहती हूँ मुझसे ये नियम छूट जाए।
नींद इतनी जरूरी है कि
इसके लिए ईज़ाद हुई दवा
ग्यारह दिन न सोएँ तो हो सकती है मौत
यहाँ आप ‘दिन’ को रात ही समझिएगा
बिलकुल उसी तरह
जैसे कई लोग सरकार को राष्ट्र समझते हैं

सरकार अब नींद को लेकर काफ़ी सजग है
वो सुनिश्चित करती है कि सोई रहे जनता
सोए हुए लोग ख़तरा नहीं होते
इसलिए जगह-जगह खोल दिये हैं लोरी सेंटर
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अब वहाँ दिन का नाम रात है
कोयले का नाम फ़ूल
चीख का नाम संगीत
भूख का नाम रोटी
भय का नाम भक्ति
और तानाशाही का नाम लोकतन्त्र

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इस व्यवस्था में हथियार खिलौने बन गए
दुष्कर्म में तब्दील हुआ प्रेम
घुट्टी में पिलाई जाने लगी अफ़ीम
चीख को अब संगीत का दर्ज़ा मिला
और सबसे खतरनाक अपराधियों को राजनीति में संरक्षण
किसी की मदद करने पर तय हुआ जुर्माना
प्यासे को पानी पिलाना 'रेयर ऑफ द रेयरेस्ट' क्राइम माना गया।
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जितनी एलर्जी मुझे हिन्दू मुसलमान करने वालों से है
उतनी ही स्त्रीद्वेषी लोगों से भी
स्त्री को देवी और स्त्री को जूती समान मानने वाले समान हैं
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आत्महत्याओं की ख़बरों के बीच
तानाशाह सुना रहा है जीवन के उपदेश
लोग तालियाँ बजा रहे हैं।
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उसने प्रेम को हृदय में रखा
मान को ललाट पर
स्त्री का हृदय हमेशा घायल रहा
और जीवन भर दुखता रहा माथा

मानिनी स्त्री को राई भर प्रेम मिला...

ये कुछ कविताओं के अंश भर हैं। पूरे संग्रह की हर कविता कई-कई बार पढ़ने का मन करता है। पूरा संग्रह पढ़ा जाना चाहिए। संग्रह 2025 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

एक ही गुजारिश है कृपया किताबें खरीदकर पढ़ें।

1 comment:

Anonymous said...

आपका लिखा शब्द शब्द सुख का अनुवाद है 🩷🩷