Monday, August 10, 2026

मसूरी घुमक्कड़ी : इस बारिश में


उदास आँखों को उस रोज़ धुंध से भरी एक सड़क पर रख दिया था। वही सड़क जिसे दूर से टुकुर-टुकुर देखा करती थी। वही सड़क जो अक्सर ख़्वाबों में आती थी और हाथ पकड़कर उठाकर ले जाती थी।

आखिर एक रोज़ धुंध से भरी उस सड़क पर पाँव रख दिये। ख़्वाब में दिखने वाली सड़क पर जब हक़ीक़त में पाँव रखे तो जैसे दिल के सीले कोनों को तनिक रोशनी मिली हो।

उम्र का कुछ न कहिए ये न जाने कितने परतों में रूप बदल बदल कर रहती है। अचानक से मैंने खुद को किसी नन्ही बच्ची में तब्दील होते देखा, फिर कुछ देर में एक किशोरी वय में पर असल उम्र वाली मैं तो असल में कहीं नहीं थी। या शायद यही असल है कि जो जीवन हमसे जीने से छूट जाता है, वह फिर फिर लौटकर आता जरूर है। जैसे मुझसे बिना जिये बचपन छूट गया, जवानी भी छूट गई और अब इस अधेड़ सी उम्र में वह सारा कुछ क़रीब आकर बैठ जाता है।

सोचती हूँ, हमें इन गिरहों से आज़ाद कौन करता है, हम खुद ही तो।

उस रोज़ भी ऐसे ही एक बैकपैक लिया, जूते के तस्मे कसे और धुंध भरी सड़क का सदका उतारने चल पड़ी। हथेलियों में कोई प्लान नहीं था बस वीकेंड की छोटी सी फुर्सत थी । सामने दिखती पहाड़ों की रानी मसूरी और ढेर सारे डर, ट्रैफिक जाम में अटक जाने के, लैंडस्लाइड होने के और सबसे बड़ा डर मसूरी की आपाधापी में, भीड़ में खोने का। 14 बरस हो गए देहरादून में रहते, न जाने कितनी ही बार गई भी हूँ लेकिन मालरोड की भीड़ में खोई खोई मसूरी न मुझसे मिली, न मैं उससे मिल पाई।

पहाड़ों का असल सुख बारिशों में है, लेकिन खतरे भी हैं। तो इस बार जोखिम लिया। जोख़िम से याद आया, ज़िंदगी के सब सुख इस जोख़िम का दरवाजा खटखटाने के बाद ही हिस्से आए हैं। 2011 का अगस्त ही तो था जब ज़ीरो आत्मविश्वास और ढेर सारी डिप्रेशन की दवाइयों की पोटली लिए देहरादून आई थी। बिना घर पर किसी को बताए कितने ही चक्कर मसूरी के लगाये। कभी यूं भी हुआ कि चाय पीने निकले और मसूरी जाकर चाय पी। तब मसूरी पर पर्यटकों का इतना दबाव नहीं था। यहाँ आने पर कितनी बार ऐसा भी होता किघास की किनारियों पर अटकी बूंदें सूरज की किरणों को गला लगाए बैठी होतीं और अपनी ऊष्मा जड़ित बूंदों से अप्रतिम आभा बिखेर रही होतीं थीं। और मैं अपलक देखती जाती। ऐसे मासूम से दृश्य ज़ेहन अपने रंगों और ख़ुशबू समेत बसते हैं, देखिये न 2011 की उस स्मृति की ख़ुशबू कैसी बिखरी हुई है।

ओह, भटक जाने की ये आदत भी न, मैं तो जोख़िम की बात कर रही थी न। तो शुभचिंतकों की तमाम सलाहों को बैकपैक की बाहर वाले हिस्से में संभाल के रखा और चल पड़ी।

देहरादून से मसूरी मात्र एक घंटे की दूरी पर है, पहुँचने की कोई जल्दी नहीं थी क्योंकि इस बार रास्तों से ही मिलना था मंज़िल का ऐसा था कि वो कहीं भी हो सकती थी, जहां मन कहे रुक जाओ, वहीं रुककर मंज़िल बना लें । मसूरी जाना है या लैंडोर यह भी तो तय नहीं था, तय था तो बस इतना कि रास्ते में उड़ते बादलों से रुक-रुक कर गपियाना है। बारिश होते हुए भी देखना है और बारिश के बाद रूई से उड़ते बादलों को पलकों पर सहेजना भी है।


सुबह की चाय के लिए पहुंचे झड़ीपानी फॉल वाले रास्ते पर मिलने वाले नर्सरी कैफे में। खूबसूरत सी नर्सरी के बीच में बैठने के सुंदर ठिकाने थे। कैफे अभी अंगड़ाई ही ले रहा था। बढ़िया बन मक्खन और चाय से दिन की शुरूआत हुई। जाने क्यों मन में यह वहम सा है कि अगर सुबह की पहली चाय अच्छी और सुकून से पीने को मिल जाये तो दिन का अच्छा शगुन होता है। सो शगुन तो हो गया था।

इन दिनों ‘मुसाफिर कैफे’ के चलते झड़ीपनी कैसल की भी काफी हाइप हो गई है तो सोचा जरा दर्शन करते चलते हैं। लेकिन इतराये शरमाये मियां कैसल अपने रौब में थे, किसी की इंट्री नहीं, सिर्फ रहने वालों के लिए। सोचा, चलो देख लेते हैं, ठीक लगा तो एक रात यहीं सही। सुंदर तो है यह जगह कोई शक नहीं लेकिन उफ़्फ़ कीमतें...हमने मुस्कुराकर टाटा किया और 19th सेंचुरी कैफे का रुख किया। यह एक खूबसूरत ठीहा है। बारिश हो रही थी इसलिए इनका आउटडोर बंद था और यही मेरे लिए ईनाम था। कुछ देर में बारिश रुकी और बादलों ने हमला ही बोल दिया। जैसे कह रहे हों, लो कितने बादल चाहिए तुम्हें। मैंने हँसकर कहा, बहुत सारे...और बादलों का गुच्छा मेरे सर से होकर गुज़र गया। मेघालय की याद ताज़ा हो गई।

ऐसा सुंदर एहसास कि खुद को खुद की ही ख़बर न रहे।

बादलों से गुफ़्तगू का दौर चलता रहा, चलता रहा...दूर से मसूरी को देख मुस्कुरा कर कहा, आ रही हूँ, जरा ठहरो तो सही।

पहाड़ों की रानी से मिलना :

हाथों की लकीरों में कुछ नहीं रखा। उन्हें तो न जाने कितनी नदियों, झरनों और समंदरों में एक एक कर गिरा आई हूँ। अब जो हथेलियों में दिखती हैं वो बस उन बहाई जा चुकी लकीरों की परछाईंया हैं। उस रोज बरसते मौसम में जब हथेलियों को बूंदों के आगे किया तो मन के भीतर कोई ख़ुशबू सी दाखिल हुई। यह कुछ नया उगने की आहट थी। क्या मेरी हथेलियों में कोई नई लकीर उग रही है, मैंने ध्यान से देखा, वहाँ कुछ भी नहीं था, बरसती बूंदों में एक बूंद और जा मिली, पलकों में अटकी बदलियों की रिहाई का वक़्त था शायद।

‘ओ मसूरी, तुम तो इतने करीब थी फिर भी इतनी देर क्यों लगाई गले से लगाने में।’ मैंने गिरती हुई बारिश की लड़ियों से लाड़ लड़ाते हुए पूछा। उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ‘मैंने तो तुम्हें कई बरस पहले ही गले लगा लिया था, याद करो...बस तुम्हें स्पर्श के उस लम्स को महसूस करने में इतना वक़्त लग गया।’

मैं चुप की गलियों में गुम चुकी थी। सच ही तो है, मेरे सबसे गाढ़े मुश्किल वक़्त में कितनी बार सर पर हाथ फिराया तो था मसूरी ने, बस मैं ही समझी नहीं। शायद टूरिस्ट की भीड़, लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम और रास्ते में होने वाले लैंड स्लाइड के चलते मैंने एक दूरी बना ली थी।
 
दिल चाहा मसूरी को आगे बढ़कर गले लगा लूँ।

बहरहाल, हम दोनों गले मिले। मैंने पूछा, ‘चाय पियोगी?’ अपनी बौछार मुंह पर फेंकते हुए उसने कहा ‘हाँ जरूर।’ बाल्कनी में बैठकर चाय पीते हुए देह पर सुकून और आलस को फिसलते महसूस किया। नींद की चादर ओढ़ी और नरम बिस्तर में लुढ़क गई।

नींद खुली तो वादियों में बादलों की मटरगश्ती चल रही थी। धुंध से कोई मीठी सी धुन उठ रही थी और मैं निर्मल वर्मा को याद करके मुस्कुरा दी। शहर की तमाम हलचल से दूर हमारे इस ठिकाने पर सिर्फ चिड़ियों की आवाज़ें सुनाई देती थीं, या पत्तों के सरसराने की। खुद का सिरा गुमाकर आई एक लड़की के लिए यह सब ऐसा था जैसे किसी की मेरे लिए मांगी गई कोई दुआ कुबूल हो गई हो।

शाम की चाय के बाद एक लंबी सैर के लिए निकली तो बारिश के बाद वाले मौसम की खुनक तारी थी। हरे के इतने शेड्स बिखरे पड़े थे कि कुदरत के चित्रकार के सजदे में झुकने को जी चाहा। पहाड़ियाँ जंगली फूलों से खिली हुई थीं। अपनी बालकनी में खिले एक छोटे से फूल को देखकर चिहुँकने वाले हम लोग कितने गरीब हैं कुदरत के इन नज़रों के सामने।

जगह-जगह उगी फर्न की पत्तियाँ पत्तियाँ अपने हुनर में माहिर थीं। पेड़ों पर झूमती जंगली लताएँ, उनके तनों पर उगे फर्न जैसे पेड़ों को सजाने की जादूगरी सीखी हो। कई जगहों पर तो काई भी ऐसे उगी थी मानो कह रही हो, जो हिस्सा रह जायेगा उसे मैं सजाऊँगी, दीवारें हों, रास्ते हों या पेड़। शॉल को देह पर कसते हुए मैंने सोचा ऐसे ही मौसम को तो कहते हैं न मौसम का गुलाबी होना। भला हुआ किसी राजनीति से नहीं जुड़ा यह गुलाबी। वैसे कुछ भी हो हरे की दीवानी मैं आज गुलाबी ही पहनकर घूमने निकली थी। मौसम का जादू मेरे बालों में अटके बिना कैसे रहता।

जिस जगह जाने से हमेशा डरती हूँ, वह है माल रोड। कारण है भीड़। लेकिन आज इस बिना योजना वाली छोटी सी ट्रिप का सिरा मेरे हाथ में था ही नहीं और मैंने कुछ ही देर में खुद को माल रोड पर चलते हुए पाया। सिर्फ एक चाय पीने की इच्छा लिए हम माल रोड पर लंबी वॉक पर चलते गए चलते गए।

चाय की प्यालियों में खुशगवारी की मिठास काफी थी।

बादलों में मानो कोई होड़ थी एक-दूसरे से आगे निकलने की । मंत्रमुग्ध सी मैं उनके खेल को देख रही थी। जिस मसूरी को देहरादून से दूर से देखती रहती हूँ आज वहीं से देहरादून को जगमग करते हुए देख रही थी। कुदरत के इश्क़ का इत्र चारों तरह बिखरा पड़ा था।

यह रात कभी न बीतने वाली रात में तब्दील हो चुकी थी। याद की अंगूठी में जड़े चमचमाते नगीने सी रात। हम चलते, सांस लेते, बैठते, फिर गहरी सांस लेते फिर चलते। इस रात को घूंट घूंट पी रहे थे। रात की इतराहट देखते ही बन रही थी। हम चाय से पहले वॉक करते, चाय के बाद करते, वॉक के बाद चाय पीते और फिर वॉक करते। डिनर से पहले वॉक फिर डिनर के बाद वॉक। असल में ये सारी वॉक और कुछ नहीं थीं ये थी रात के जादू को समेटने का लालच। जब वॉक करते हुए थक गए तो बालकनी से मसूरी को ताकने लगी, फिर अपने कमरे से घाटी में चल रहे जादुई खेल को देखती रही। रात और नींद का रिश्ता टूट चुका था। नींद का इंतज़ार भी नहीं था।

जाग के इस खेल में मसूरी लगातार जीत रही थी और उसकी जीत पर मैं खिलखिला रही थी। पगली, जानती ही नहीं मैं उससे जीतने नहीं, हारने ही तो आई हूँ। इस बीच देर रात या सुबह शायद थोड़ी सी नींद आई। वादी में बादल किसी अकड़ू बच्चे से पीछे हाथ बांधे टहल रहे थे। कभी धूप का कोई कतरा दिखता जिसे बादल झट से ढँक लेता। बारिश आस पास थी लेकिन अभी आई नहीं थी।

सुबह की चाय के साथ निर्मल वर्मा और मैं मुस्कुरा रहे थे। ‘हर बारिश में’ उनकी किताब हाथ में थी। न जाने कितनी बार की पढ़ी हुई किताब। सामने बारिश का इंतज़ार था और हाथ में बारिश थी।एक पोस्टबॉक्स ने अपने आसपास तमाम फूल खिला लिए थे। वो गाढ़े लाल रंग का पोस्टबॉक्स फूलों के साये में कितने सारे संदेशों को सहेजे होगा, या उन यादों को सहेजे होगा शायद जब लोग चिट्ठियाँ लिखते थे, अपनी बातें लिखकर भेजा करते थे।
 खुद को समेटकर चलने का समय हो चला था। समान पैक करने में सबसे पहले मैंने हरा समेटा, फिर समेटा इस हरे से उगा गुलाबी। फिर मैंने समेटा अपना वो बिना जिया बचपन जो ऐसे मौकों पर निकल भागता है। फिर समेटीं एक किशोर युवती की डरी सहमी आँखें जिन्होंने डर से कभी ख्वाब नहीं देखे। चलते-चलते मेरी हथेलियों को मौसम की एक शोख डाल ने थाम लिया था, मानो पूछ रही हो, ‘फिर कब आओगी?’ मैंने अपनी पलकों में अटकी बदलियों को आज़ाद करते हुए कहा, ‘अरे जरा सा तो दूर है देहरादून, कभी भी आ जाऊँगी।’ जबकि जानती हूँ मुझे आने में पूरे पंद्रह बरस का समय लगा है। चलते वक़्त की विदाई का नेग देने हमेशा की तरह बारिश आ चुकी थी...

गुलाम अली साहब सुर लगा चुके थे, ‘दिल के लुटने का सबब, पूछो न सबके सामने...’ बादलों से भरी सड़क में हम गुम होने लगे थे।