खाली हथेलियों में इन दिनों हरकत होने लगी है। जैसे कुछ रेंगता फिरता हो। देखती हूँ तो कुछ भी नहीं। वहम होगा शायद, हाँ वहम ही होगा। वरना इन लकीरों से खाली हथेलियों का तकदीर से कोई रिश्ता कबका ही टूट चुका है। तकदीर का तो पता नहीं, न जानती हूँ, न मानती ही हूँ लेकिन इन दिनों पैरों की हरकत अच्छी लगती है। बस कि चल पड़ने को बेताब। कोई उदासी, कोई मुश्किल, कोई दुविधा कि बस चल पड़ो, चलते रहो। पैदल चलना खूब बढ़ा है इन दिनों। शायद इसका असर मन पर भी पड़ा है।
मुझे सुधा जी और हरि जी मिले जीवन में। बड़े प्यारे लोग। सवाल न करने वाले लोग, देह की हरारत का पूछ मन का इलाज कर देने वाले लोग। इलाज न भी हो, सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक ही है का भरोसा देने वाले लोग। बाज़ार के इस शोर में कोई आपको सुने यह बहुत है, फिर कोई समझ भी ले, और अनकहा भी समझ ले तो यह ख़ास ही तो है। छोटी सी मुलाक़ात हुई थी उनसे, पर असर साथ ही रहता है।
जीवन अपना ही है, मन भी। बस कि कहीं कोई फूल खिलता है और खिल उठती हूँ । कहीं कोई पत्ता झरता है और हथेलियाँ बढ़ा देती हूँ। एक पूरा जीवन जी चुके और शान से शाख़ से झरते उस पत्ते के आगे सजदा करती हूँ। सीखना चाहती हूँ, हालात कैसे भी हों, खिलना ही है का सबक़। सलीके से झरने का सबक़।
मुझे सुधा जी और हरि जी मिले जीवन में। बड़े प्यारे लोग। सवाल न करने वाले लोग, देह की हरारत का पूछ मन का इलाज कर देने वाले लोग। इलाज न भी हो, सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक ही है का भरोसा देने वाले लोग। बाज़ार के इस शोर में कोई आपको सुने यह बहुत है, फिर कोई समझ भी ले, और अनकहा भी समझ ले तो यह ख़ास ही तो है। छोटी सी मुलाक़ात हुई थी उनसे, पर असर साथ ही रहता है।
जीवन अपना ही है, मन भी। बस कि कहीं कोई फूल खिलता है और खिल उठती हूँ । कहीं कोई पत्ता झरता है और हथेलियाँ बढ़ा देती हूँ। एक पूरा जीवन जी चुके और शान से शाख़ से झरते उस पत्ते के आगे सजदा करती हूँ। सीखना चाहती हूँ, हालात कैसे भी हों, खिलना ही है का सबक़। सलीके से झरने का सबक़।
एक रोज़ चलते-चलते बीच रास्ते में दूब के जंगल के बीच छुपा सा एक नन्हा पौधा दिखा। और उस पर मुस्कुराता प्यारा सा फूल। वो ऐसे खिला था जैसे अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खिलने की हुड़क हो उसमें। मैं देर तक वहीं बैठी रही। उसे देखती रही, उसे प्यार करती रही। यही है जीवन। प्यार। खिलना, खिलखिलाना, झरना वो भी शान से।
खबरों से बचती फिरती हूँ अकसर। हाँ, सच कहा तुमने, कमजोर हूँ मैं। बहुत कमजोर। दुनिया के किसी भी कोने की उदास आँखें भीतर धंस जाती हैं, उनकी उदासी सोने नहीं देती। शायद हथेलियों में वह उदासी ही रेंग रही होगी, कि कुछ ख़बरें गुजर ही जाती हैं नज़रों के सामने से। आँखें मूँदने से हक़ीक़त तो नहीं बदलती।
रात भर नींद में कोई शोर बरपा रहा। कितनी कमजोर है वो इच्छा जो दुनिया के तमाम दुख सोख लेने से महरूम रह जाती है हर बार और अपने डेली रूटीन में उलझ जाती है। सोचती हूँ, मैं अगर इतनी कमजोर हूँ तो ईश्वर कितना कमजोर होगा। उसका तो फुलटाइम काम ही यही है, अन्याय से लोगों को बचाना और वो बेचारा खुद को नहीं बचा पा रहा।
सुबह में रात की उदासियाँ शामिल ही थीं लेकिन खिड़की खोली तो मौसम बदल चुका था। मौसम का पहला हरसिंगार खिला था...नज़र भर देख चुकने के बाद मैंने हरसिंगार के साथ दुआ की सबका दुख झरे, सबकी उम्मीद खिले...आमीन !


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