Monday, September 28, 2026

मुख़्तर सी बात है...

जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था। तमाम पहरेदारी, तमाम बाड़ेबंदी के बाद भी। जाने कैसे। जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाब से मुख़्तर होता है। नींद में कोई बुरा ख़्वाब देखो तो आँख खुलने पर राहत होती है कि चलो ख़्वाब था, बीत गया। अगर अच्छा ख़्वाब देखो तो जागने पर अच्छा महसूस होता है, चेहरे पर मुस्कुराहट खेलती रहती है। 

जागी आँखों के ख़्वाब अगर चुभने लगें तो वो अपना रंग नहीं बदलते, न तासीर बदलते हैं। फिर वो चुभते ही रहते हैं, सोते जागते। 

सितम्बर महीना जाने कैसी सी फितरत लिए आता है। कुछ जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाबों से टकराते फिरते हैं। धरती से लेकर आसमान तक फूलों ही फूल खिले हैं और दिल है कि जाने कैसे वसवसों में गुम है। 

दिल की दिमाग से कभी बनी ही नहीं। इन दिनों दिल, दिमाग और देह की आपस में बनती नहीं। सब अपनी अपनी धुन में हैं। कोई मेरी नहीं सुनता। मैं भी किसी की नहीं सुनती। यूं भी तो चल ही जाता है दुनिया का कारोबार। 

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