जा रहा है सितम्बर
कंधे झुके हुए हैं उसके
आँखें मायूस
30 दिन का यह सफर
किसी साल सा बीतता है
जाने कितनी सदियों का दुख
सितम्बर के सीने में दफ्न है
नब्ज़ रुक रुक कर चलती रही
बात बनते बनते बिगड़ती रही
मुस्कुराहटों में
अतीत की उदासियों की सीलन झलकती रही
फूल खिलते रहे बेहिसाब फिर भी
मन का खिलना छूटता ही गया
हर बार बीतता है सितम्बर
लगता है बीत जाएगा दुख भी
दिल बुदबुदाता है 'हाँ, बीत जाएगा दुख
जैसे बीत जाता है सितम्बर...'

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