Tuesday, September 8, 2026

जीवन से बनती नहीं इन दिनों



कई दिनों से दिनों का कुछ पता नहीं। कई रातों से रातें भी लापता सी हैं। जीवन है कि अलसाए बच्चा सा ऊँघता हुआ पीठ पर बड़ा सा बस्ता लादे बिना मन के चला जा रहा है। मैंने खूब तलाशी ली अपनी पिछले दिनों और कुछ न मिला। न खुश होने की वजह कोई, न उदास होने की। न शिकायत किसी से। यूं यह अच्छा ही तो है कि बिना किसी तरह की खरोंच दिये कोई दिन गुज़र जाए, बिना आँखें नम किए कोई शब गुज़र जाए।

यूं खुश होने को कई बातों पर खुश हुआ जा सकता था। और न जाने कितनी ही वजहें थीं फफक फफक के रो लेने की। पर ऐसा कुछ न हुआ। ये किस कदर मुफ़लिसी के दिन हैं, कि साथ चलने को कोई उदासी भी नहीं, छूटने को कोई साथ भी नहीं। किसी ख़्वाब के टूट जाने का डर भी नहीं।

सामने खड़ा हरसिंगार खिलने की तैयारी में है। रातरानी अब भी वैसे ही महकती है। बस कि जीवन में चाय नहीं रही, आसमान से करने को कोई शिकायत नहीं, बारिशों में बहक जाने वाला मन नहीं रहा।  

ऐसा लगता है कोई मर गया है भीतर। वो जो लड़की थी जो खुश होने को मरी जाती थी। वो लड़की जो सड़कों पर नाचती फिरती थी, दरख्तों से लिपटकर गाया करती थी, जो नदियों और झरनों से बतियाया करती थी। वो लड़की अब भी उन सारी जगहों से गुजरती है, लेकिन अब वो खिलखिलाती नहीं। 

जीवन में कुछ न हो तो भी थोड़ी उदासी तो होनी ही चाहिए। ऐसी मुफ़लिसी का क्या करूँ कि जिसमें रोने की एक मुक्कमल वजह भी नहीं। 

यूं यह कमी पूरी करने में सियासतदान पूरे ज़ोरों से लगे हुए हैं, और सियासी हालात मुंह चिढ़ाते हुए कहते हैं, 'किस किस को रोओगी ...।'  

तकिये के नीचे से सूखे हुए मोगरे हटाती हूँ, उन सूखे हुए मोगरों से चिपके कुछ मुरझा चुके ख़्वाबों को भी।