सितम्बर महीने से जाने कैसा रिश्ता है। थोड़ा ख़ुश ख़ुश, थोड़ा उखड़ा-उखड़ा सा। ऐसा लगता है जीवन के सुख का स्वाद सबसे पहले सितम्बर में ही चखा और फिर उन सुखों से विरत होने का अभ्यास भी सितम्बर से ही शुरू हुआ। फिर भी कभी शिकायत वाला रिश्ता नहीं रहा।
सितम्बर के इस तीसरे इतवार की सुबह है। देहरादून के मौसम में सर्दियों के आने का सुर लगना शुरू हो चुका है। हथेलियां एक साथ नरम धूप और हरसिंगार के फूलों से भर उठती हैं।
खुद से नाराज़ रहती हूँ इन दिनों। उलझी रहती हूँ। जीवन का सुर साधने की कोशिश में बार-बार भटक जाती हूँ। आज सुबह उठी तो बरसों बाद सितार उठाया। सिर्फ उठाने भर के सुख ने दिल को थोड़ी राहत दी। मैंने प्यार से उसे देखा, छुआ, तार मिलाए और मालकोश बजाने की कोशिश की...सिर्फ कोशिश। उस कोशिश भर ने मुझमें थोड़ी ऊर्जा भरी। फिर मैंने अरुंधति रॉय की किताब को उठाया और उसे देर तक देखती रही। इन दिनों पढ़ने का सुर भी बिखरा हुआ है इसलिए हिम्मत नहीं हुई कि एक और किताब शुरू करूँ और अधूरी छोड़ दूँ।
हाथ में किताब लिए सामने खड़े हरसिंगार को देखती रही। ठहरी हुई सुबह में एक एक-कर झरते हरसिंगार देखना मेरी सुबहों का हासिल होता है। हर हल्के से हवा के झोंके के साथ कुछ फूल शाख से उतरते हैं और ज़मीन चूमने को व्याकुल हो उठते हैं। हवा के झोंके से पास रखी किताब के पन्ने उड़ने लगे। जिस लाइन पर नज़र पड़ी, वो थी...She chose September, that most excellent month, to make her move...
मैं इस किताब को अङ्ग्रेज़ी में पढ़ रही हूँ। और यह इस इतवार की मेहरबानी है कि एक सांस में 4 चैप्टर पढ़ चुकी हूँ। पहले भी इस किताब को शुरू किया था लेकिन तब बीच में अटक गयी थी। उम्मीद है इस बार ऐसा नहीं होगा और इस किताब के बहाने कम से कम पढ़ने की आदत का छूटा हुआ सुर तो लग ही जाएगा।

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