Wednesday, May 27, 2026

कौन जात हो भाई- बच्चा लाल उन्मेष


एक लम्बी गहरी चुप, सदियों से दबी हुई सिसकी, शोषण की लम्बी और लगभग सामान्य मान ली गई परिपाटी को तोड़ने की कोशिश में लहूलुहान होती कवितायें हैं बच्चा लाल उन्मेष के संग्रह 'कौन जात हो भाई' में। ये कवितायें आपके सुख चैन में सुराख करेंगी, बेचैन करेंगी। जिस जीवन को हमने सामान्य मान कर स्वीकार कर लिया है उस स्वीकार्यता को खंडित करेंगी। ये कवितायें शोषण की लम्बी दास्तान का वह दस्तावेज़ है, जिसे झुठलाने में पूरा समाज और सरकार न जाने कबसे लगी है।

बच्चा लाल के पास कहन की जो बेबाकी है वह इन कविताओं की ताक़त है। वो दलित शोषण की बात को पूरी ताक़त से कहते हैं लेकिन इसमें कोई बेचारगी नहीं है। एक झुंझलाहट है, पीड़ा है जिसने अब गुस्से का, प्रतिकार का रूप ले लिया है।

कविताओं को पढ़ते हुए दोतरफा युद्ध नज़र आता है। एक दलितों के भीतर का संघर्ष। उन्हें यह समझना कि उनका पीड़ित होना नॉर्मल नहीं है, वे भी मनुष्य हैं और उन्हें भी जीवन जीने के समस्त अधिकार मिलने चाहिए। और दूसरा युद्ध है इसी बात को बाकी समाज को बताने का। इस बताने पर मिलने वाले उपहास, प्रताड़ना और अपमान के बावजूद अपने हक़ के लिए लड़ने का। इस लड़ाई में जो ज़ख्म मिलें, चाहे देह पर या मन पर उनसे टूटने की बजाय उसे अपनी ताक़त बनाने का काम बच्चा लाल ने अपनी कविताओं के ज़रिये किया है।

ये कवितायें पढ़ते वक़्त कुछ मांग करती हैं। मांग करती हैं कि आप जातिगत उच्चता की आलीशान पोशाक उतार कर इन्हें पढ़ें। इन्हें पढ़ते समय महसूस करें इसमें दर्ज शोषण की उस दास्तान को जो कविता कहानी में दर्ज होने भर से काफी ज्यादा गहरी है लम्बी है। और बात सिर्फ जातीय भेदभाव की भी नहीं है, बात है हर उस वजह की जो शोषण की बुनियाद बनती है।

इस समय में जब कुछ भी बोलना एक खास किस्म के राजनैतिक, सामाजिक खांचे में धकेल दिए जाने का जोखिम हो, इन कविताओं की सच्चाई, बेबाकी सहेजे जाने वाली वह आवाज है जिसमें से मद्ध्म सी उम्मीद झाँकती है।

कुछ टुकड़े जो मैंने अपनी किताब में अंडरलाइन किए-

रईसों ने बख़्श दी है जान, इतना काफी नहीं?
दे रहा आश्वासन है निज़ाम, इतना काफी नहीं?
('आश्वासन' से)

ईश्वर वह कर्जा है
जिसे गरीब आजीवन भरता है
सत्ता की तरह।
('सत्ता का ईश्वर' से)

तुम पूज्य नहीं हो हमारे ग्रन्थों में
तब भी नहीं थे और अब भी नहीं हो
तुम शूद्र थे, शूद्र हो और शूद्र ही रहोगे।
कुछ आएंगे तुम्हारे अपने, बुनियाद उठाने तुम्हें पढ़ाने
पर तुम हरक़त नहीं करोगे
क्योंकि तुम्हारा समाज
मंदिरों में जा-जाकर मूढ़ हो चुका है।
('क्योंकि तुम्हारी लत्त चलती है, बुद्धि नहीं' से )

तुम्हारे इंसान बनने की प्रक्रिया में जाति आड़े आ रही है
मर रही हैं संवेदनाएं और तमाम मानवीय संभावनाएं
इन्हें जगाने के लिए जाति का दंभ छोड़ना पड़ेगा
पर तुम नहीं छोड़ोगे दोस्त! दलित थोड़ी न हो।
('तुम क्यों झुकोगे दोस्त' से)

मनुष्य हो तो आगे आओ, जाति-धरम का भेद मिटाओ
संविधान में सबके लिए, बनी एक ही खाट है।
होगा तेरी लिए अफवाह, मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
('भोगा हुआ यथार्थ' से )

जिसने वहशी दरिंदों को एक बार भी नहीं टोका
वो मेरा भी खुदा हो, ये मुझे मंजूर नहीं।
('मुझे मंजूर नहीं' से)

हम अब भी अन्न उगाते हैं
वे अब भी अंग चबाते हैं
हैं गज़ब के भूखे लोग यहाँ
मेरा टूटा हल भी खाते हैं।
('हम तब भी अन्न उगाते हैं' से)
बच्चा लाल उन्मेष को उनकी कविताओं के लिए बधाई देते हुए मैं कामना करती हूँ कि उनकी सच कहने की, हालत से टकराने की ताक़त बची रहे।

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