Sunday, June 21, 2026

स्वाद एक कारा है


                                                        तस्वीर इन्टरनेट से साभार

 यह इतवार की सुबह है। जाने कहाँ से इतना सारा तनाव आ गया है। लंबे समय से एक चिड़चिड़ाहट तारी है जिसे फुल इगनोर करने पर लगी हूँ। यह चिड़चिड़ाहट रसोई से है, घर के कामों से है। 


बचपन से रोज सुबह आँख खुलते ही किचन में काम करते हुए माँ को ही देखा था। मैं ठीक से जग भी नहीं पाती थी कि आधा खाना बन चुका होता था। चूंकि मेरी माँ भी वर्किंग रही हैं, उनकी घड़ी और उनकी गति के बीच समायोजन के बीच ही मेरे बचपन की शुरुआत हुई। जब वो डेली पैसेंजर थीं और सुबह की ट्रेन से दफ्तर जाती थीं तो सुबह 6 बजे सारे घर का काम निपटाकर, खाना बनाकर, गमलों में पानी डालकर रेडी होकर स्टेशन को निकल जाती थीं। 

फिर लखनऊ में उन्हें उसी शहर में जाना होता था तब यह राहत सुबह के 6 बजे से खिसक कर 8.30 बजे पर आ गई। लेकिन तब तक काम भी काफी बढ़ चुका था। और इन दिनों कोई हाउस हेल्प नहीं हुआ करती थी। तो जैसे जैसे मैं बड़ी हुई खुद को माँ कि हेल्प के लिए हाथ बँटाना शुरू किया। धीरे-धीरे माँ के हाथ के काम अपने हाथ में लेते गई। कॉलेज, पढ़ाई, घर के काम...यह सब सामान्य है। 

घर के काम कभी बोझ नहीं लगे, खाना बनाने में मजा आता था। नई चीज़ें बनाना खिलाना और तारीफ़ें बटोरना। माँ को देखकर हुआ या जीवन की गति ही ऐसी मिली कि काम करने की गति काफी तेज़ रही। फटाफट खाना बनाना, फटाफट पोछा लगा लेना। सब कुछ फटाफट। बाद मुद्दत समझ आया कि मैं तो एक ट्रैप में हूँ।  

सलाद और होता तो मजा आ जाता है, पकौड़े बन जाएँ तो मजा आ जाय। तुम पालक पनीर बहुत अच्छा बनाती हो, और पाव भाजी, और... चाय तो तुम्हारे ही हाथ की पिएंगे जैसे जुमलों वाला ट्रैप। और अपनी खुशी से एक पैर पर नाचते हुए लोगों के स्वाद पर खुद को निछावर करने की खुशी महसूस करने वाला ट्रैप। 

कोई साथ की लड़की जब यह कहे कि उसे खाना बनाना नहीं आता, या बनाने में ऊब लगती है तो उसे जज करने या उसे नसीहत देने वाला ट्रैप, असल में उस बात को न समझ पाने वाला ट्रैप। 

बाद मुद्दत यह समझ आया कि यह जो रसोई है, यह स्त्रियों की नियति नहीं है, बना दी गई है। स्वाद एक जेल है, स्त्रियों की जेल। जिस जेल में तारीफ़ों की सलाखें सख्त हैं, जो अपनी ही जेल में बाखुशी कैद रखने की तैयारी है। तारीफ़ें न भी हों तो भी। 

मुझे याद नहीं पिता ने कब माँ से कहा कि, 'तुम ये चीज़ बहुत अच्छी बनाती हो' माँ की शिकायत यही रही कि कभी जो तारीफ कर दी हो। तारीफ समझने का एक तरीका माँ को यह मिला कि अगर ठीक से खा लिया या सब खत्म कर दिया बिना यह सोचे कि बाकियों के लिए कुछ बचा भी है नहीं, तो खुश हो जाओ कि अच्छा बना है, अगर छोड़ दिया थाली में तो समझो मन का नहीं बना। 

परेशानी खाना न बनाना पड़े की भी हो सकती थी समझ ही नहीं पाये, परेशानी यह हुई कि कम से कम तारीफ तो कर दिया करो। 

पहली बार जब कुक लगने की बात हुई तो घर में घोर संग्राम हुआ। हालांकि कुक लगने की बात माँ ने की भी नहीं, क्योंकि एक समय में वो भी इसके खिलाफ थीं, जाने कैसा बनाएगी, स्वाद नहीं होगा उसके हाथ में आदि आदि। पिता ने हड़ताल कर दी उसके हाथ का नहीं खाएँगे। फिर जैसे तैसे कुक लगी, तो रोज शिकायत कि उसके हाथ में स्वाद नहीं है। 

यानि जिस स्वाद पर जीवन भर चुप्पी रही, वह अब समझ आया कि, था। 

ऐसी लड़ाई शादी के बाद मैंने भी झेली, पति और सास का अबोला सहा और आखिर उन्हें कुक के लिए नहीं मना पाई। 

कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 

मैं अपनी सुबह चाय और पंछियों की आवाज़ के साथ चाहती हूँ लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है....क्यों कम हो पाता है, यह सवाल खुद से पूछती हूँ...

जो पुरुष मैं तो बना लेता हूँ, की हुंकार भरते हैं और महीने में एक दिन या हफ्ते में एक दिन अपनी मर्जी से अपने मूड के मुताबिक कभी कुकिंग कर देते हैं यह उनके लिए नहीं है। मैं उनकी कुकिंग को गिनती ही नहीं। और जो महिलाएं यह कहकर खुश हैं, कि मेरे ये तो कभी कभी चाय बना देते हैं, या मुझे अच्छा लगता है उनके लिए बनाना तो उनसे यही कहना है कि बहन, अभी तुम जेल में आनंद ले रही हो, अच्छा हो तुम्हारा भ्रम न टूटे। 

आग लगे ऐसे स्वाद को जिसने एक स्त्री को जीवन भर की रसोई की कैद में डाल रखा है।  

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