अकसर जो चीज़ें अच्छी नहीं लगतीं उनके बारे में बात नहीं करती। देखने में टाइम वेस्ट करने के बाद उसके बारे में बात करके और टाइम क्यों वेस्ट करूँ आखिर। लेकिन हमारी फिल्मची दोस्त ज्योति नन्दा ने कहा, कुछ तो लिखो तो लिख रही हूँ।
ज्योति की ही पिछली पोस्ट से बात शुरू करती हूँ। नीयत। जिसे समझ और अप्रोच भी कह सकती हूँ। फिल्म बनाने के पीछे की नीयत क्या है, और देखने वाले की नीयत क्या है। यहीं से सारी बात शुरू होती है। किसे क्या और कैसा लगता है।
कॉकटेल 2, से ज्यादा उम्मीद तो थी नहीं क्योंकि लव रंजन का अप्रोच पहले ही काफी निराश करता रहा है। कॉकटेल वन में भी उसका खासा असर था। यहाँ भी अप्रोच वही है। लव रंजन को लड़कियों से कोई खास दिक्कत लगती है। उन्हें लड़कियों को डीमीन करने के तमाम रचनात्मक तरीके आते हैं। और उनके हीरो बेचारे, पाक दामन, संस्कारी टाइप होते हैं। कोई दिक्कत नहीं कि आपका हीरो कैसा है लेकिन हीरो को आपके जैसा आदर्श हीरो होने के लिए लड़कियों को क्यों डीमीन करना है भाई।
फिल्म खूब सजा धजा, रंगा पुता कचरा है। दो लड़कियां हैं, एक लड़के पर मरती हैं। बिलो द बेल्ट तरीके आज़माती हैं लड़के को परखने को। फिर आपस में बिल्लियों की तरह लड़ती हैं। और लड़का अंत में चमचमाता हुआ संस्कारी बालक शादी शादी खेलने लगता है। वही लड़का जो शादी में विश्वास नहीं करता है।
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।
महंगे सेट, दमकते शूट, गाने, सब मिलकर भी कुछ नहीं कर पाते। कृति सेनन कमाल लगी हैं लेकिन उनका रोल थोड़ा डिग्निटी से लिखा जाना था।
इतना ही टाइम इस पर खर्च कर सकती हूँ। टाटा।
(नोट- फिल्म एक्स्पर्ट नहीं हूँ। यह समीक्षा भी नहीं है। बस मेरी भड़ास है।)
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