Wednesday, June 10, 2020

जन्मदिन मुबारक वरयाम जी


जब मारीना को पहली बार पढ़ा था तब दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि वो मुझे एक अलग दुनिया में ले जायेगी और मिलवाएगी वरयाम सिंह जी से. हालाँकि हकीकत ये है कि वरयाम जी ने मिलवाया था मारीना से लेकिन बाद में मारीना हाथ पकड़कर वरयाम जी तक ले गयी. वरयाम जी बहुत से लोगों के लिए बहुत विद्वान व्यक्ति हैं, मेरे लिए वो विद्वता से  काफीअधिक हैं, बहुत कुछ हैं. एक सादा, सरल और प्रेमिल व्यक्तित्व अक्सर महानताओं और विद्वाताओं के बीच कहीं खो जाता है लेकिन वरयाम जी बिलकुल नहीं खोये. उनके आसपास होना हमेशा एहसास कराता है कि मैं सुरक्षित घेरे में हूँ. मारीना पर काम करने की कच्ची इच्छा लिए उनसे मिलने गयी थी और कितना अपनापन और भरोसा लेकर लौटी थी कि उस अपनेपन और भरोसे के भरोसे खुद को छोड़ पाना आसान हो गया.

मैंने उनके संग गप्पें लगायीं, पैदल चलते हुए रूस के किस्से सुने, देश दुनिया के सामयिक हालात पर बातें की और हमेशा जिस बात का सबसे ज्यादा असर लेकर लौटती वो थी उनका स्नेह. बेहद कीमती स्नेह. मुझे उनके बारे में बहुत सी बातें करनी हैं, बहुत सारा उनके संग जिया मुझे गढ़ता रहा है लेकिन उसने मेरे भीतर की अनगढ़ता को भी दुलराया. मैंने महसूस किया कि मैं उनके संग कोई छोटी सी बच्ची हो जाती थी, हो जाती हूँ.

मैं वरयाम जी से या तो जेएनयू में मिली या साहित्य अकादमी में. मंडी हाउस के आसपास पीठ पर लैपटॉप बैग टाँगे हुए घूमते फिरना, पलाश बटोरना, चाय पीना, साहित्यिक बहसें सुनना और मारीना पर अपने किये हुए काम को उनसे दुरुस्त करवाना. मकसद था मारीना की आत्मा को खरोंच आये दिए बगैर कुछ कह सकूं उसके बारे में.

एक किस्सा जो मुझे बहुत ही मजेदार लगता है वो बताती हूँ. दिल्ली में मारीना पर काम करते हुए स्क्रिप्ट चेक करते, करेक्शन करते हुए 5 दिन हो चुके थे. और छठा दिन आखिरी दिन था. उस दिन मेरा वीजा का इन्टरव्यू भी था. काम अभी काफी बाकी था और इन्टरव्यू का टाइम भागभाग के करीब आ रहा था. मैं वरयाम जी के हाथों में अपना काम सौंपकर बेफिक्र हो जाती थी. हम काम कर रहे थे तभी मेरी नजर किसी महान कवि पर पड़ी, मैंने उनसे कहा, ये तो फलां कवि हैं न, उन्होंने हूँ कहा और स्क्रिप्ट देखने लगे, फिर कुछ देर में मेरी नजर एक बच्चे पर पड़ी वो देर से अपनी खाई जा चुकी आइसक्रीम के खोखे में जूझ रहा था. मैं लापरवाह और शरारती हो चुकी थी. वरयाम जी ने मुझे डांट लगाई, 'इधर उधर देखना बंद करो, काम करो जल्दी से. वीजा के इन्टरव्यू का टाइम हो रहा है.' मुझे लगा ऐसे तो माँ डांटती हैं. मुझे इतना सुख हुआ उनकी उस मीठी डांट का क्या कहूँ.

वो जब भी मिलते हैं मैं एकदम छोटी बच्ची जैसा महसूस करती हूँ.

उन्होंने रूस को जिया है, जीते हैं वो. मुझे वो रूसी ही लगने लगते हैं कभी-कभी. कभी यूँ भी सोचा था जेएनयू में साथ चलते हुए कि हम कभी काश मास्को की सड़कों पर भी इस तरह घूमें. मेरे लिए उनका सानिध्य बेहद खूबसूरत और खूब सिखाने वाला रहा है. आज वरयाम जी का जन्मदिन है. यह दिन मेरे लिए बहुत ख़ास है. बहुत सारी शुभकामनाएं वरयाम जी.

2 comments:

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11.6.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3729 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
धन्यवाद
दिलबागसिंह विर्क

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज गुरुवार (11-06-2020) को     "बाँटो कुछ उपहार"      पर भी है।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
--
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'