चीखो दोस्त
जितनी तेजी से तुम चीख सकते हो
इतनी तेज की गले की नसें
फटकर बहार निकल आयें
और तुम्हारी आवाज
दुनिया का हर कोना हिला दे.
बांध लो अपनी मुठ्ठियाँ
और भीन्चो अपना जबड़ा
इस कदर कि
पूरी दुनिया दहल जाये तुम्हारी
बंद मुठ्ठियों को देख
पीछे हट जाएँ हमलावर
भय से.
आँखों में गुस्से का बारूद भर लो
और देखो जब किसी को
लाल आँखों से
तो समझ में आ जाएँ उसे
अपनी कमजोरियां बिना कुछ कहे.
समेटो अपनी समूची ताक़त
टटोलो अपनी बाजुओं का दम
उठाओ अपना गिरा हुआ
छलनी हुआ वजूद
और डटकर खड़े हो जाओ
कमजर्फ लोगों के खिलाफ.
तोड़ दो मायूसी की कारा
निकल जाओ असहायता की जेल से
मत सहो अपना ही जीवन
अपने ही ऊपर
'अपनी मर्जी' से
क्योंकि सबको अपना बुध्ध
खुद ही बनना पड़ता है...
(संजीव भट्ट के लिए)



