Monday, March 24, 2025

जिद्दी हवाओं के गीत



झील में डुबकी लगाकर आई हवाओं में 
कोई बेफिक्री तारी थी 

देर रात की जाग 
हवाओं की आँखों की चमक थी 

उन्हें न सूरज से निस्बत 
न पहाड़ से, न जंगल से 
उन्हें बस हमारे करीब आना था 
हम दोनों के बीच ही बैठना था 
हम दोनों का हाथ थामना था 
उन्हें हमारी सुबह की चाय में 
किसी जादू सा घुल जाना था 

वो जिद्दी हवाएँ थीं 
सुबह बीत जाने के बाद भी 
अपनी पूरी धज से इतरा रही हैं 

उन जिद्दी हवाओं की खुशबू 
रोज एक गीत लिखती है 
कि दुनिया एक रोज 
सबके जीने के लायक होगी 
न कोई हिंसा होगी, न कोई नफरत 

उन गीतों को 
एक ख़्वाबिदा सी लड़की 
रोज गुनगुनाती है 
सूरज की किरणें उन गीतों को 
लाड़ करती हैं 

तुम मेरा माथा चूमते हो 
और धरती आश्वस्ति की धुन पर 
झूम उठती है। 

Sunday, March 23, 2025

पंछी घर देर ले लौटे थे उस रोज...



दुनियादारी और जिम्मेदारियों के बोझ से
बस झुकने को थे कांधे 
कि तुम्हारे स्पर्श के फाहे 
राहत बन उतर आए थे उन पर
 
आँखों के नीचे सदियों के रतजगे 
अपनी स्थाई पैठ बनाने ही वाले थे 
कि तुम्हारी पोरों की छुअन ने 
उन्हें गुलाबी पंखुड़ियों में बदल दिया था 

भागते-दौड़ते पैरों में उग आए छालों तले 
तुमने अपनी हथेलियाँ रख दी थीं 
और पीड़ा का सुर 
प्रेम के सुर में ढलने लगा था 

तुम जानते हो कि 
स्त्री के दुख का उपाय सिर्फ प्रकृति के पास है 
इसलिए हमेशा 
तुम तोहफे में कभी नदी, कभी जंगल 
कभी समंदर तो कभी तारों भरा आसमान भेजा करते 

कोई दुख कैसे टिकता भला जब 
सामने प्यार से भरा सागर हो 
और साथ हो तुम्हारा प्रेम...

सूरज ने थोड़ा ओवरटाइम किया था उस रोज 
और पंछी भी घर देर से लौटे थे। 

Saturday, March 22, 2025

हम मिलेंगे


 हम मिलेंगे 
जब सूरज डूबा नहीं होगा 
और साँझ 
नदी में झिलमिलाते दिन की परछाईं 
एकटक देख रही होगी 

हम मिलेंगे जब नफ़रतें 
अपना सामान समेटकर जाने को होंगी 
और दुनिया के सारे रास्ते 
इश्क़ गली की ओर मुड़ रहे होंगे 

हम मिलेंगे 
जब शाखें उम्मीदों से भर उठेंगी 
तारों भरा आसमान 
हथेली पर उतर आएगा 
और तुम सप्तऋषि मण्डल को 
मेरे माथे पर सजाते हुए कहोगे 
कि देखो पल भर को ही सही 
हमारे प्यार ने 
दुनिया को सुंदर बना तो दिया है। 

गुजराती अनुवाद- 
|| આપણે મળીશું ||
આપણે મળીશું
જ્યારે
સૂર્ય હજુ ડૂબ્યો નહીં હોય
અને સાંજ
નદીમાં ઝબકતા દિવસના ઓળા
એકીટશે નિહાળતી હશે
આપણે મળીશું
જ્યારે નફરત પોતાનો સામાન સંકેલીને જવામાં હશે
અને દુનિયાના બધાં રસ્તા
પ્રેમ - ગલી તરફ વળતાં હશે
આપણે મળીશું
જ્યારે શાખાઓ આશાઓથી લચી પડી હશે
તારા - ખચિત આકાશ
હથેળીમાં ઉતરી આવ્યું હશે
અને તું
સપ્તર્ષિ - મંડળને મારી સેંથીમાં પૂરીને કહીશ
' જો, ભલે પળવાર માટે હો
પણ આપણા પ્રેમથી
દુનિયા સુંદર બની તો ખરી ને ! '
- પ્રતિભા કટિયાર
- હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી

Saturday, March 8, 2025

बबल को तोड़ता उपन्यास - मेघना तारे



- मेघना

दो दिन हुये उपन्यास को आये पर कुछ था जो कह रहा था कि अभी नहीं, बाद में पढ़ना, क्योंकि इसके बाद शायद काफी कुछ सोचना पड़ेगा. अपनी छोटी सी नौकरी और उसके साथ वाली रिसर्च के छोटे से दायरे में सिमटा मेरा छोटा सा विश्व (जिसे मैं अक्सर "बबल" कहती हूँ, क्योंकि इसके बाहर क्या होता है, कभी-कभार ही पता चलता है) भी "आजकल कहाँ होता है ऐसा" वाली मान्यता के हैं। देर सबेर खुद को लिबरल भी कहला ही लेती हूँ। पर यह उपन्यास दिमाग के दरवाज़े ही नहीं खोलता, पर हथौड़े के माफिक वार कर सच्चाई के सामने खड़ा करता है... 

अन्त आते आते अवसाद हुआ, रुलाई नहीं फूटी!! दो‌ या तीन मिनटों बाद आँसू रिसे, जो मुश्किल‌ से ज़ब्त‌ हुये, एक नयी तैयारी के लिये।

फिलहाल जिस मन:स्थिति में हूँ, हर दिन एक नया दिन‌ है! ये उपन्यास् एक शाम में पढ़ लेने वाला तो है, पर शायद एक बार‌ में समझ आने वाला नहीं है!! मेरी; शायद हम सभी की कंडिशनिंग ऐसी ही है... 

ज़्यादा कुछ रिवील नहीं करना चाहती, (चूँकि चाहती हूँ कि प्रतिभा जी ने जिस तरह से एक thought process को गूंथा है, आप सभी भी उससे लाभान्वित हों) पर हां प्रतिभा जी ने अपने काफी सारे निशान इसमें चिन्हित किये हैं, सुबह, फूल, खुशबू, चाय और नदी... और क्या चाहिये?

प्रतिभा जी, मेरे जैसे लोगों के लिये हो चुके एक आम विषय (जो सिर्फ खबर‌ हो गया है) को सतह पर लाने के लिये, हम सबको sensitize करने के लिये आपको साधुवाद!

(मेघना बिट्स पिलानी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

Friday, February 14, 2025

कबिरा सोई पीर है



मूलतः एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली प्रतिभा कटियार का यह पहला उपन्यास अपनी पठनीयता और अपने सरोकार दोनों वजहों से लगभग चकित करता है। खास बात यह है कि यह उपन्यास बड़ी सहजता से लिखा गया है। सरोकार और संवेदना के नाम पर हिंदी में जिस भारी-भरकम और लगभग समाजशास्त्रीय रूखेपन को छूते लेखन की उम्मीद की जाती है, उससे अलग यह उपन्यास अपने छोटे कलेवर में एक बड़ा वृत्तांत रचता है।

उपन्यास की कहानी एक कोचिंग सेंटर से शुरू होती है जहां अलग-अलग वर्गों के छात्र एक सी महत्वाकांक्षा के साथ पहुंचते हैं। मगर वहां भी छात्रों की पसंद-नापसंद, उनकी मैत्री और उनके संबंधों में एक स्पष्ट भेदभाव चला आता है। उपन्यास में ऐसे किरदार हैं जो इस भेदभाव को तोड़कर आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि दुनिया इन खानों से बड़ी है। जाहिर है, यह प्रेम और आपसी समझ के रसायन से बनी मनुष्यता है जो सामाजिक चाल-चलन पर भारी पड़ रही है। लेकिन दरअसल उपन्यास अगर इसी दिशा में बढ़ कर एक सुखांत पर खत्म हो जाता तो तो शायद वह बराबरी की कामना का एक रूमानी बयान होकर रह जाता। यहां लेखिका साबित करती हैं कि उनके लहजे में चाहे जितनी रूमानियत हो, यथार्थ की उनकी समझ बहुत खरी है। वे घर परिवार और समाज के सारे पूर्वग्रह और पाखंड जैसे तार-तार कर देने पर तुली हैं। वे एक पल के लिए भी इस बात को ओझल नहीं होने देतीं कि यह समाज बहुधा कुछ लोगों के प्रति बहुत अमानुषिक व्यवहार करता है और अगर यह भी न हो तो अपनी उदारता के चरम लम्हों में भी वह उनके अवसर छीनने में कोई कोताही नहीं करता, कोई हिचक नहीं दिखाता।

उपन्यास की नायिका दलित समाज से आती है और बचपन से ही देखती है कि उसकी प्रतिभा दूसरों की आंख का कांटा बनी हुई है। उसकी सफलता भी उसका अभिशाप है। जब उसे कोचिंग सेंटर में ऐसा दोस्त मिलता है जो बराबरी पर भरोसा करता है और उससे प्रेम करने लगता है तब वह कुछ बदलती दिखती है। लेकिन अंत में क्या होता है? क्या वह जीवन के इम्तिहानों और अपनी प्रतियोगिता परीक्षाओं में एक साथ पास कर पाती है? क्या वह अपने लक्ष्य और अपना प्रेम हासिल कर पाती है? इन सवालों के जवाब के लिए उपन्यास पढ़ना होगा।

इसमें संदेह नहीं कि यह उपन्यास एक सांस में पढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके बाद जिस गहरी और लंबी सांस की ज़रूरत पड़ती है, वह कहीं हलक में अटकी रह जाती है। कई किरदारों और स्थितियों के बीच रचा गया यह उपन्यास हमारे समय की एक बड़ी विडंबना पर उंगली रखता है।

- प्रियदर्शन
 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार