Monday, August 31, 2020

रौशनी



दूधिया रौशनी के झरने ने
भर लिया आलिंगन में

पीपल की पत्तियों सा
घना होता गया मौन

हरियाली के मैदान में
कुलांचे भरने लगा हृदय

कैक्टस फूलों से भर उठे
मुस्कुराने लगे बबूल के फूल

रात अमावस की थी लेकिन
एक जरा थामना भर था अपना हाथ
रौशनी ही रौशनी बिखरने लगी.


Sunday, August 30, 2020

कि तुम गए ही कहाँ...


विदा के वक़्त
जिस दरवाजे को पकड़ देर तक खड़े रहे थे
उस दरवाजे पर दर्ज हैं
तुम्हारी स्मृति के निशान

जिस कप में पी थी तुमने चाय
वो कप हर रोज लजाता है
मेरे होठों को छूने से पहले

सूर्यास्त की बेला में
लेकर हाथों में हाथ
जिन सड़कों पर चली थी तुम्हारे संग
वो सड़क अब भी गुनगुनाती है प्रेम गीत

सिगरेट पीने के वक्त ढूंढना माचिस
अब भी भटकता है हर माचिस के पास
तुम्हारे पास रहने की अपनी इच्छा को
सहेजती है माचिस मेरी तरह
जैसे बिना जले आग सहेजे रहती है
वो अपने मुहाने पर

तुम्हारी छूटी हुई घड़ी का वक्त
अब समूचा मेरा होकर मुस्कुराता है
और घड़ी मुस्कुराती है मेरी कलाई पर

चंपा के जिस पेड़ के नीचे
देर तक चूमा था तुमने
वो पेड़ भरा रहता है फूलों से

रात की सांवली कलाई पर
रातरानी की खुशबू यूँ लिपटी है
जैसे तुम्हारी बांह में लिपटी हो
मेरी बांह

वो जो देखते हुए सबसे चमकीला तारा
देखा था ख्वाब दूर कहीं संग जाने का
वो ख्वाब उस तारे के संग आकर
रोज टंक जाता है खिड़की पर

वो जो गया था उठकर उदास क़दमों से
वो कोई और ही था
कि तुम तो पूरे छूट गए हो.

Saturday, August 15, 2020

सर चढ़कर बोले इश्क़

इश्क़ वो शय है जो मांगे मिले न और मिल जाए तो बिना बीच धार में ले जाकर डुबोये इसे चैन आये न. जबसे मोरपंख के पेड़ में गुलाब को चढ़ते देखा है यही महसूस हुआ कि यह इनके रिश्ते की शुरुआत है. फिर मोरपंख ने गुलाब को अपने भीतर पूरी तरह समेट लिया. एक नन्हा सा गुलाब खिला था जिस रोज खूब बारिश हो रही थी. मोरपंख और गुलाब दोनों इतरा इतरा कर झूम रहे थे. देखते देखते दोनों के अस्तित्व एक दूसरे में विलीन होते गए. लेकिन बिना खुद को खोये हुए. मोरपंख और हरा हुआ और लहराया, गुलाब फैलता गया उसके भीतर और खिलने लगा. यह जो सह अस्तित्व और खुद को खोये बिना एक दूसरे को अपनाना है न यह भी प्रकृति सिखा रही है...बस हम सीख नहीं रहे.

रिश्तों में अपनों को खुद से आज़ाद रखना बिना कोई गुमान किये. यह भी तो सीखना बाकी है.
आज़ादी मुबारक!

 

Monday, August 10, 2020

बरसे तो बरसे सुख हर आंगन



आज फिर बारिश लगातार हो रही है. बारिश लोरी सी लगती है. नींद के भीतर जो एक नींद होती है न जिसमें सोने का सुख छुपा होता है, जो कभी-कभी ही मिलता है वो रात की नींद में दाखिल हुआ. जिसने नींद में होने वाली तमाम क्रियाएँ जैसे स्वप्न, करवटें, बीच -बीच में जागना सब चुरा लिया. मृत्यु की जैसी नींद. जागो तो जैसे नया जन्म. जागते ही बारिश के करीब चली गयी देर तक देखती रही...

पक्की नींद के बाद आँखों को अगर भीगते हुए हरे का सुख मिल जाय तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है. यह संभव हो पा रहा है क्योंकि यथार्थ से मुंह मोड़ने का अभ्यास कर रही हूँ. चेतन दिखते हुए चेतना को सुषुप्त रखने का अभ्यास कर रही हूँ. खुद को ठीक रखने के लिए देखो तो क्या क्या करना पडता है. यह ठीक होना नहीं विमुख होना है...यह अभ्यास ज्यादा दिन चल न सकेगा. चाहती हूँ यह अभ्यास व्यर्थ साबित हो लेकिन यह नींद बची रहे...ऐसा कैसे होगा...हो सकेगा क्या? 

चेतना विहीन हुए बगैर सुकून की नींद आना कितना दुष्कर है इन दिनों किसी से छुपा है क्या. अख़बार छुपा देने से, न्यूज़ चैनल न देखने से सोशल मीडिया से दूर रहने से भी क्या होगा. यह तो आँख बंद करना है. बस इतना ही कि जब चीज़ें असहनीय होने लगे तो बीच बीच में आँखें मूँद लेनी चाहिए इससे सामना करने की शक्ति बढ़ती है शायद....

बात करने से हालात नहीं बदलते वो बदलते हैं उन्हें बदलने के प्रयासों से. आँखें मूंदना उपाय नहीं लेकिन कभी कभी आँखें मूंदने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचता. यह आँखें मूंदना खुद को बचाये रखने के लिए  है ऐसा कहकर खुद को बहलाती हूँ. फिर से बूंदों के आगे हथेलियाँ पसारे खड़ी हूँ...

Friday, August 7, 2020

इल्तिजा


आओ सबसे पहले वार करो
मेरी रीढ़ पर
फिर निकाल लो मेरी आँखे 
कोई काम नहीं इन्हें 
बस कि ताकती रहती हैं 
तुम्हारी राह 

उँगलियाँ जो बेसाख्ता लिखती रहती हैं
तुम्हारा नाम
उन्हें अलग कर दो काटकर

पाँव जो न धूप देखते हैं न छाँव
बढ़ते रहते हैं तुम्हारी ही ओर
इन्हें भी अलग किया जाना चाहिए
शरीर से काटकर

कान इन्हें भी कुछ सुनाई नहीं देता 
सिवा तुम्हारे नाम के
इन्हें भी क्यों बख्शा जाना चाहिए

जिह्वा जो रटती रहती है
तुम्हारा ही नाम
उसे तो सबसे पहले 
अलग किया जाना चाहिए  

दिल जो धड़कता ही रहता है 
तुम्हारे नाम पर
उस पर करना सबसे अंत में वार
कि सांस की आखिरी बूँद तक
जानना चाहती हूँ
कितनी पीड़ा दे सकते हो तुम

ओ प्रेम छिन्न भिन्न करके 
जब हो जाना थक के चूर
तब सुस्ता लेना थोड़ा 
और मत बताना किसी को
कि तुम्हें मुझसे प्रेम था कभी
कि प्रेम के नाम पर पहले ही
कम नहीं हो रही है हिंसा

प्रेम के भीतर प्रेम को सांस लेने देना
उसे बख्श देना तुम
इतनी सी इल्तिजा है तुमसे.