Sunday, August 11, 2024

घड़ी दो घड़ी- बसंत त्रिपाठी


जैसे बरसकर थमी शाम में झींगुरों की आवाज़ उगती है, जैसे हवा से हिलती हैं पत्तियाँ और अपनी हथेलियों पर अकोरी बूंदों को छिड़क देती हैं आहिस्ता से, जैसे रातरानी की ख़ुशबू इकसार हो जाती है रात में और अंधेरे को महका देती है, जैसे भीगा हुआ पंक्षी अपनी पांखे खुजलाता है और आसमान में उड़ जाता है, जैसे किसी की याद आती है और पल भर को नब्ज़ तनिक थम जाती है, जैसे किसी को देखकर पलकें झपकना भूल जाती हैं और 'घड़ी दो घड़ी' जीने की आकांक्षा से मन भर उठता है। बसंत त्रिपाठी का नया कविता संग्रह 'घड़ी दो घड़ी' ऐसी ही निर्मल अनुभूतियों का कोलाज है। सघन अभिव्यक्तियों का ऐसा जादू जिसके कभी न टूटने की दुआ बरबस जन्म ले।

बसंत समय और संवेदना का ताना-बाना रचते हैं लेकिन बिना किसी अतिरेक के। उनकी कविताओं में  बिना किसी शोरगुल के जीवन के हर रंग मौजूद हैं। सरलता उनकी कविताओं का ऐसा गुण है कि ये किसी को भी अपना बना लें। कविताओं को ऐसा ही तो होना चाहिए कि किसी शाम जब आप तन्हा हों, चाय पीते हुए किसी की याद में गुम हों वे आयें और बिना तन्हाई को तोड़े करीब बैठ जाएँ।

इन कविताओं में प्रकृति प्रतीक के तौर पर आती है और विराट अर्थ ध्वनित करती है। हर पंक्ति के भीतर एक बड़ा संसार है। एक संसार जो शब्द के अर्थ में ध्वनित होता है और दूसरा संसार जो उसके भीतर है, जो लंबी यात्रा करके यहाँ तक पहुंचा है। जिसमें एक सुंदर कल का सपना है, यथार्थ पर नज़र है और प्रेम पर भरोसा है। संग्रह की पहली कविता भूमिका की ये लाइनें 'मैं संभावनाएं लिखता हूँ/जो बुद्धि के दुर्ग में/लहू के सिक्त/दिल के राग छेड़ती है।' इसी कविता में 'मैं वो स्वप्न लिखता हूँ/जो सचमुच की नींद में/सायास उभरते हैं/मैं दुस्वप्न लिखता हूँ/जो कच्ची नींद में कुलबुलाते हैं/' 

कविता भाषा का खेल नहीं विचार और संवेदना का साम्य है। पुश्किन की बात को अगर अपने ढंग से कहूँ तो भाषाई कौशल को साधना आसान है लेकिन जीवन के पथरीले, जटिल यथार्थ को कविता में साधना आसान नहीं। यह तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब कवि दुनिया को बेहतर बनाने के सपने का हाथ नहीं छोड़ता। यथार्थ की लहूलुहान हथेलियों पर उम्मीद के फाहे रखती कवितायें जीवन में भरोसा बचाए रखती हैं। यही बसंत की कवितायें करती हैं। उनकी कविता मैं पानी हूँ की एक लाइन देखिये,'मैं पानी हूँ/मैं तुम्हारी प्यास ढूँढता हूँ।' 
एक तरफ प्यास की तलाश में निकला पानी है दूसरी तरफ बादलों में गुम एक मन, 'भीगा मन लिए/बादलों के भीतर उड़ रहा हूँ/'। ऐसी पंक्तियाँ पढ़े मानो जमाना बीत गया। एक और कविता में छाया के रंग की बात सुनिए तो, 'छाया का रंग/लेकिन अब भी वही/वही जरा सुस्ताने के आमंत्रण का रंग।' कितनी बड़ी रेंज है इन पंक्तियों की,कि छाया ने कभी अपना रंग नहीं बदला, कितना कुछ बीता, फिर भी। और हम?  

कविता घड़ी दो घड़ी में प्रेम के रंग देखिये,'तुम बैठो/थोड़ी देर और/पेड़ की परछाई को/पूरब की ओर।थोड़ा और बढ़ने दो/बच्चों को शिक्षा की जेल से/शोर मचाकर निकलने दो।' एक कविता के एक ही हिस्से में प्रेम, सामाजिक सरोकार, चिंता और और उस चिंता की कारागार को तोड़ने का स्वप्न सब एक साथ बुन पाना सरल तो नहीं, यह जीवन के प्रति एक प्रेमपूर्ण दृष्टि, राजनैतिक, सामाजिक समझ और लंबी अनुभव यात्रा से ही संभव है।  

एक कविता है युद्ध के बाद का जीवन उसकी कुछ पंक्तियों को देखिये, 'टैंक और बमवर्षक विमान/जब ध्वस्त हो जाएँगे लड़ते-लड़ते/ठीक उसके बाद/मैं तुम्हें लिखूंगा पोस्टकार्ड/और ख़ुशबू से भरी हवा की पत्र पेटी में डाल आऊंगा।' 'मैं अंधड़ से भरे तुम्हारे दिल में/रख दूंगा दुनिया में अभी ही जन्मी/एक कत्थई कोमल पत्ती/युद्ध के बाद/घायल पसलियों, टूटी हड्डियों/और अपराजेय सपनों से/ऐसे हो तो बाहर आता है जीवन।' कविता आत्मनाश की पंक्तियाँ, 'मैं वह भूख/जो हर बार पानी से ही मिटाई जाती रही/मैं इस महान लोकतन्त्र में/नागरिक अधिकारों का वह उपेक्षित अध्याय/जिसे आठवीं के बच्चे/केवल परीक्षा पास होने के लिए पढ़ते हैं/वह भी अपनी नैसर्गिक खीझ के साथ।'

इस संग्रह की कुछ कविताओं की कुछ पंक्तियों के साथ मैं सिर्फ यह कह सकती हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण संग्रह है, इसे पढ़ा जाना चाहिए, कविताओं को अपने भीतर उतरने देना चाहिए और कुछ देर उन कविताओं के साथ चुप रहकर वक़्त बिताना चाहिए। 

संग्रह का सुंदर कवर निकिता ने बनाया है और भीतर कुछ रेखांकन भी हैं जो कविताओं को थोड़ा विस्तार देते हैं। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह को पढ़िये और अपने पास संभालकर रखिए, ठीक उसी तरह जैसे बुरे से बुरे वक़्त में संभालकर रखते हैं उम्मीद।  

Tuesday, August 6, 2024

जाओ दफा हो जाओ...स्मृतियों



'घास को घुटन हो रही होगी, तुम्हें बगीचे की सफ़ाई करा लेनी चाहिए।' यह पंक्ति पढ़ी और बादल फटने की आवाज़ कानों में आई...

काफी दिनों से बारिश का इंतज़ार था। अटके हुए भरे-भरे बादल खिड़की पर टंगे-टंगे ऊँघ रहे थे। 'मैंने मांडू नहीं देखा...' मेरे साथ रात दिन चल रही है कई दिनों से। जब शुरू की थी तो यही लगा कि कैसी अहमक़ हूँ कि इतनी देर से पढ़ रही हूँ। लेकिन अब किताब खत्म हो चुकी है और मैं दो दिन से लगभग अवसन्न अवस्था में डोल रही हूँ। शब्दातीत।

मैंने इस किताब को तो नहीं ही पढ़ा था इसके बारे में भी कुछ नहीं पढ़ा था। कुछ भी नहीं। बस ये सोचती रही किताब के बारे में नहीं सिर्फ किताब पढ़ूँगी। और अब लग रहा है कि अच्छा हुआ पहले नहीं पढ़ी। कई बार जीवन हमें चुनता है, जबकि हमें लगता है हमने जीवन को चुना है। ठीक ऐसा ही किताबों के साथ है वो न सिर्फ अपना पढ़ा जाना चुनती हैं, समय भी चुनती हैं। मेरे साथ ऐसा कई किताबों के साथ हुआ। इसलिए मैं पढ़ने को लेकर कभी भी मशक्कत नहीं करती बस पन्ने पलटती हूँ और इंतज़ार करती हूँ कि किताब मेरा हाथ थामे और आगे की यात्रा पर ले जाये।
मांडू ने हाथ लिया....

मेरी पढ़ने की गति तेज़ है। लेकिन कुछ किताबें अपनी गति भी तय करती हैं। मैंने हर दिन इस किताब के कुछ पन्ने पढ़े और पूरे वक़्त पढ़े हुए के साथ रही. क्या कभी भी इस पढ़े हुए से मुक्त हो सकूँगी। पढ़ते हुए बीच-बीच में संज्ञा से बात करती रही किताब के बारे में।

क्या यह सिर्फ किताब है...बिलकुल नहीं। क्या इसे सिर्फ पढ़कर परे रखकर आसानी से दूसरी दुनिया में जाया जा सकता है? गीता, सुकान्त, पारुल, विकास राय, डॉ चारी, डॉ प्रताप और मायाविनी...क्या कभी मुक्त हो पाएंगे।

जाओ दफा हो जाओ...स्मृतियों से कहना आसान होता काश।

मैं सच में सोच रही हूँ मैंने बिलकुल ठीक समय पर इस किताब को पढ़ा, पहले पढ़ती तो शायद संभाल न पाती. जिस दिन किताब का अंतिम हिस्सा पढ़ा. देर तक आसमान देखती रही। कुछ ही देर में बारिश उतर आई। मैंने हमेशा की तरह हथेली बढ़ा दी। वही हथेली जिसमें मैंने मांडू नहीं देखा लगातार रहती है। संज्ञा को बस इतना लिखा, पूरी हो गयी किताब...अनकहे शब्दों को पढ़ने में माहिर संज्ञा ने अपनी चुप की हथेली मेरी चुप पलकों पर रख दी।

आज शाम उसने एक लिंक भेजा...यह उस किताब के आगे की कथा है। सुकान्त दीपक का लिखा। ये आज ही हिंदवी पर आया है। क्या यह महज संयोग है?
 
मैंने दफ्तर से लौटते हुए लिंक खोला...बारिश ने रफ्तार पकड़ ली...जैसे कोई बादल फटा हो कहीं...

(https://hindwi.org/bela/sukant-deepak-memoir-papa-elsewhere-translation-nishiith?fbclid=IwZXh0bgNhZW0CMTEAAR1nUjwzPtaXGMTstOpSV3MqnuEDxvpUv7XMaFtrwLY_tOa8KSxxMBjOV98_aem_CRwgUVR7M5bABwMODxqNJg)

Thursday, August 1, 2024

तारिक का सूरज


तारिक का सूरज एक ऐसी कहानी है जो कल्पना के कैनवास पर अपने मन की दुनिया का एक कोना गढ़ती है। ऐसा कोना जहां रोशनी तनिक अधिक है। तारिक का सूरज दुनिया को थोड़ा ज़्यादा रोशन करती है।

कहानी कुछ यूं है कि तारिक को भी बाकी बच्चों की तरह खेलना बहुत पसंद है और उसका खेलना निर्भर है दिन पर। सूरज डूबा, रात हुई और खेल बंद। शाम होते ही अम्मी की पुकार कि तारिक शाम हो गयी आ जाओ, पढ़ाई करो, खाना खाओ सो जाओ के अनकहे निर्देश कहानी में हैं जो तारिक को खास पसंद नहीं। वो तो रात में भी खेलना चाहता है। इसलिए उसे रात में सूरज की कमी खलती है। अब तारिक कर भी क्या सकता है। एक रोज यूं ही वो कागज पर गोचागाची करते हुए सोचने लगा कि काश रात में भी सूरज उगता तो उसे खेलने को और समय मिलता। सोचते-सोचते तारिक कागज पर सूरज बना देता है और वो सूरज रात को चमकने लगता है। यही है इस कहानी की दुनिया।

तारिक का सूरज पढ़ते हुए हम कल्पना की ऐसी दुनिया में जा पहुँचते हैं जहां दुनिया के सारे बड़े और समझदार लोगों को पहुँच ही जाना चाहिए। क्योंकि असल में तो हम सब के भीतर भी एक तारिक है, जो कहीं खो गया है।

कल्पना, तर्क और संवेदनशीलता के बीच का समन्वय बनाती यह बाल कहानी बच्चों के लिए कल्पना के नए द्वार खोलती है। संवेदना के ऐसे महीन रेशे हैं इस कहानी में कि सूरज रात को उगे तो किसी को परेशानी भी न हो। तो कैसे सब संभाल लिया जाय सब यहाँ काम आती है तारिक की तरकीब।

किसी भी मनःस्थिति में पाठक इस कहानी के पन्ने पलटें कहानी से गुजरते हुए एक खामोशी से भर उठेंगे। ऐसी खामोशी जो दुनियादारी की तमाम पेचीदीगियों से दूर ले जाती है।

इस छोटी सी कहानी में बड़ी से दुनिया के तमाम बड़े-बड़े सवालों के जवाब मिलते दिखते हैं। जितनी बार इस कहानी को पढ़ते हैं एक संवरी हुई दुनिया का ख़्वाब मुस्कुराता नज़र आता है।

नन्हा तारिक रात में भी खेलने की ललक में अपने कागज पर बनाए सूरज को सेम की बेल पर टांग देता है। बेल चढ़ जाती है आम के पेड़ पर और उसका सूरज दिप दिप करने लगता है। तारिक की दुनिया में अब रात में भी सूरज उगने लगता है।

तर्क कहता है कि भला रात को भी कहीं सूरज उगता है? लेकिन कल्पना के आकाश पर क्या नहीं हो सकता। पिछले दिनों आई फिल्म ‘स्काई इज़ पिंक’ का एक संवाद याद आता है जिसमें माँ अपने बच्चे से कहती है, ‘अगर तुम्हारा स्काई पिंक है तो स्काई का कलर पिंक ही है। तुम्हें किसी के भी कहने से अपने स्काई का रंग बदलने की जरूरत नहीं है।‘

शिक्षक जब बच्चों को कल्पना और सृजनात्मक होने के अवसर देते हैं तब भी उसमें काफी दीवारें खड़ी होती हैं जो सामाजिक संरचना के तमाम कारणों ने मिलकर बनाई हैं जो खुलेपन को भी खुलने नहीं दे पाती। ऐसे में यह कहानी बताती है कि इस कहानी और ऐसी तमाम कहानियाँ, कक्षा में मौजूद बच्चों के जीवन के अनुभवों को किस तरह पिरोना है, किस तरह उनका हाथ थामकर आगे बढ़ना है।

बात सिर्फ तारिक के सूरज के रात में भी उगने तक सीमित नहीं रहती है बल्कि उल्लू की उस परेशानी तक जा पहुँचती है जब रात में उगे सूरज के कारण उल्लू जो रात में खाने की तलाश में निकलता है परेशान होकर तारिक की खिड़की पर जा बैठता है।

मासूम तारिक खुद के खेलने के लिए रात में सूरज तो चाहता है लेकिन वो यह भी नहीं चाहता कि उल्लू भूखा रहे। वह उसे खाने के लिए दूध रोटी देता है। अब यहाँ ठहरकर सोचने की बात यह है कि क्या यह सिर्फ उल्लू की बात है, उसकी भूख की बात है। तारिक का उसे दूध रोटी देना कितनी बड़ी रेंज खोलता है मासूमियत का हाथ थामे इस दुनिया को संवार देने की।

उल्लू का या कहना कि ‘लेकिन मैं तो कीड़े खाता हूँ’ तारिक को सोचने पर मजबूर कर देता है। खुद के लिए कुछ चाहना क्या सिर्फ खुद के लिए कुछ चाहना भर होना चाहिए। सवाल और जवाब दोनों इस नन्ही कहानी के बड़े से फ़लक में समाये हैं।

रात को भी तो परेशानी है न सूरज के रात में उगने से। वो हवा से शिकायत करती है। हवा समझती है उसकी बात।

ये जो एक-दूसरे को समझना, अलग होना स्वभाव में फिर भी सहगामी होना अलग-अलग होकर भी साथ मिलकर सुंदर दुनिया को बनाने में, बचाने में अपनी भूमिकाओं को निभाना कितना जरूरी है इसकी कहन है कहानी।

यह कहानी शिक्षकों को ढेर सारे अवसर उपलब्ध कराती है। वे इस कहानी के बहाने बच्चों के मन की दुनिया में क्या-क्या चलता है, कैसे वो सोचते हैं, क्या हो अगर जब वो सोचते हैं वो हो जाए तो जैसे बिन्दुओं पर चर्चा कर सकते हैं, उन्हें सोचने, तर्क करने, कल्पना के आसमान में ऊंची उड़ान लेने को मुक्त कर सकते हैं।

‘इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है...’ जैसे नीरस हो चुके वाक्य से दूर अगर इस कहानी के बारे में एक लाइन में कहें तो यह कहानी बच्चों को मजेदार लगने वाली और अपनी सी लगने वाली कहानी है।

दिन के सूरज में तारिक के सूरज की भी रोशनी है यह पंक्ति हम सबके हिस्से की पंक्ति है। हम सबका होना कहाँ-कहाँ शामिल है, कहाँ-कहाँ खिल रहा है। हमारे होने ने क्या इस दुनिया को जरा भी बेहतर बनाने में कोई भूमिका निभाई है। अगर नहीं तो सोचने की ओर इशारा करता है तारिक का सूरज।

लेखिका शशि सबलोक ने क्या ही तरल और सरल गद्य का प्रयोग इस कहानी में किया है। कम शब्दों के उपयोग के साथ कैसी एक बड़ी दुनिया में गोता लगाया जाता है यह इस कहानी में देखने को मिलता है।

तविशा सिंह ने सुंदर चित्र बनाए हैं। उन्होंने कहानी के मर्म को जस का तस पकड़ा है और कहानी के चित्र वैसे ही बनाए हैं जैसे तारिक ने बनाए हों। नन्हे मासूम हाथों की लकीरों की छुअन महसूस होती है इसमें। अनगढ़पन का भी एक रंग होता है उसकी भी एक खुशबू होती है लेकिन उसका उपयोग कम ही लोग कर पाते हैं। तविशा इन चित्रों को बनाते हुए सीधे तारिक के मन की दुनिया में प्रवेश करती हैं और धीरे से उनकी उँगलियाँ तारिक की उँगलियाँ होने लगती हैं। कहानी के चित्र कहानी का विस्तार हैं। रंगों और लकीरों का लिखी गयी कहानी से अच्छा सामंजस्य है।

तक्षशिला के अंतर्गत जुगनू प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है।

शिक्षकों को इस कहानी के जरिये कक्षा में काम करने के तमाम अवसर नज़र आएंगे। इस कहानी को बार-बार पढ़ने की जरूरत है। हर बार कुछ नयी समझ नए एहसास की परतें खुलती हैं। पढ़ते हुए हमें महसूस होगा कि आसमान में जो सूरज है उसमें तारिक के सूरज की रोशनी तो शामिल है ही थोड़ी सी हमारे मन के रोशन कोनों की खुशबू और चमक भी शामिल है।

-प्रतिभा कटियार

Tuesday, July 23, 2024

मौसम बने हैं डाकिया



एक रोज लड़की ने रेगिस्तान में बोयी
इश्क़ की बारिश
पीले कनेर भर उठे बूंदों से
और धरती को लग गए पंख

एक रोज नदियों ने गुनगुनाए
कश्तियों के गीत
और मुसाफिरों ने जानबूझकर
गुमा दिये रास्ते

एक रोज दुनिया भर की सेनाओं ने
गुमा दिये सारे हथियार
और सरहदों पर उगाये
सफ़ेद फूल

एक रोज लड़के ने
लड़की के माथे पर टाँक दिया चुंबन
दुनिया सुनहरी ख्वाबों की आश्वस्ति से
भर उठी

एक रोज दुनिया भर की किताबें
प्रेम पत्रों में बदल गईं
और सारे मौसम बन गये डाकिये

इस दुनिया को ख़्वाब सा हसीन होना चाहिए....



Monday, July 1, 2024

शहर का मौसम जैसे रुबाई कोई...



देर रात बैंगलौर की सड़कों से गुजरते हुए स्मृतियों के तमाम पन्ने उलटने-पलटने लगे। मानो कल की ही तो बात है जब मैंने डरते-सहमते इस शहर में कदम रखा था। वह मेरी पहली यात्रा थी बिना किसी बड़े का हाथ थामे खुद निकलने की। छुटकी सी बिटिया का हाथ थामे तमाम असहमतियों और नाराजगियों को निकलते वक़्त के किसी नेग की तरह आँचल में बांधे बस निकल पड़ी थी। थोड़े से पैसे जमा किए थे इसलिए पैसों के लिए किसी पर निर्भर नहीं थी वरना किसी तरह यह संभव नहीं होता। थोड़ी सी हिम्मत भी बचाकर रखी थी ऐसे मौकों के लिए। हिम्मत और आर्थिक निर्भरता ने कंधे थपथपाये और हम माँ बेटी निकल पड़े थे।


 हम दोस्त ज्योति के घर आए थे। न शादी था, न ब्याह न मुंडन न जनेऊ और न ही कोई रिश्तेदार थी ज्योति। कोई कैसे समझे इस जरूरत को, इस यात्रा की जरूरत को। ऊंहू यात्रा नहीं, दहलीज़ के बाहर पहला कदम। अजीब सा लग रहा है न सुनने में। बिलकुल। मुझे कहने में भी लग रहा है। जीने में भी लग रहा था। कि मैं नौकरी में थी, लिबरल फैमिली की परवरिश में पली बढ़ी फिर भी यूं कभी न सोचा निकलने के बारे में, न घरवालों को इसकी आदत पड़ी।

कभी-कभी सोचती हूँ कितना आसान है हर बात का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना। हालात, आस-पास के लोग, सामाजिक बेड़ियाँ, अलां, फलां। ये सब होते हैं मुश्किल का सबब निसंदेह लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल है हमारी खुद की इच्छा, हिम्मत। हम खुद कहाँ आँख भर सपने देखते हैं। हम कहाँ सांस लेने से आगे का जीवन जीना चाहते हैं। जैसा कहा गया वैसा जीने लगना, जैसा कहा गया वैसे ही सोचने लगना, जो तय किया गया उस रास्ते पर चलना कितनी तो सुविधा है इस सबमें।

मैंने खुद कहाँ आँख भर सपने देखे कभी। सपने जिसमें मैं थी।

कल रात जब बैंगलोर की सड़कों पर अकेले थी, कोई डर नहीं था। अब मुझे किसी शहर, किसी देश में किसी भी वक़्त डर नहीं लगता। झिझक नहीं होती। इस निडर प्रतिभा में उस लम्हे का जब अकेले निकलने का निर्णय लिया था, उस पहले सफर का बड़ा योगदान है।

 

शहर का मौसम सच में सुंदर है। हवा गालों को छू रही थी, मानो दुलार रही हो।

एक रोज किसी ने कहा था, ‘तुम्हारी आँखें कितनी सुंदर हैं’ और मैंने यूं ही लापरवाह सी अल्हड़ हंसी में डूबे हुए कह दिया था, ‘सपनों से भरी हैं न, इसलिए’ कहने वाले को क्या समझ आया क्या नहीं, नहीं जानती लेकिन कहने के बाद मेरे भीतर एक छोटी सी रुलाई फूटी थी। कब देखे मैंने सपने, काश देखे होते। मैंने सपने क्यों नहीं देखे। कौन सा डर मुझे रोके रहा। सपनों के टूटने का डर या कुछ और। पता नहीं।

इसके बाद जब भी आईना देखा अपनी आँखों को सूना ही पाया।

एक रोज एक दोस्त ने पूछा था, ‘तुम क्या चाहती हो अपने जीवन से’ और मेरे पास कोई जवाब ही नहीं था। फिर कुछ देर सोचने के बाद मैंने कहा, ‘मैं खूब सारी बारिश में भीगना चाहती हूँ। नदी के किनारे की बारिश में, समंदर के किनारे की बारिश में, जंगल की बारिश में, सड़क पर भीगते हुए भागना चाहती हूँ....मैं बहुत भीगना चाहती हूँ।‘ ‘बस...बस...इतना भीगोगी तो बुखार आ जाएगा।‘उसने हँसकर कहा था।

मैंने अपनी मुट्ठी की ओर इशारा करते हुए कहा,’तो पैरासीटामाल खा लूँगी...’ हम दोनों हंस दिये थे।

हाँ, सच में इतनी सी ही तो हैं मेरी ख़्वाहिशें...कि दुनिया में बेहिसाब मोहब्बत हो इतनी कि किसी को किसी से झगड़ने का वक़्त ही न मिले। और बेहिसाब बारिश हो कि धरती का कोई कोना सूखा न रहे, हाँ, बाढ़ भी न आए ख़्वाहिशों में समझ का यह पुच्छल्ला अपने आप आकर चिपक गया था।

जिस कमरे में ठहरी हूँ वो चौदहवीं मंजिल पर है। रात कमरे में जब दाखिल हुई तो जाने कब लिखकर भूल गयी ख़्वाहिश की एक पर्ची टेबल पर रखी मिली जिस पर लिखा था, ‘तुम्हारा एक नन्हा ख्वाब’। ये ख़्वाब मैंने देखा था याद नहीं। हाँ, शायद यूं ही कोई इच्छा उछाल दी थी हवा में कि ऐसे कमरे में होने का ख़्वाब जहां से शहर, आसमान, बादल सब एकदम करीब नज़र आयें। बस पर्दा हटाओ और बादलों को छू लो। ये क़ायनात भी न, सुन तो लेती है।

देर रात में अपने कमरे से, अपने बिस्तर से टिमटिमाते शहर को देखती रही। सुबह उठी तो आसमान एकदम उजला था। शहर शायद अभी काम पर निकलने की तैयारी में है। मैंने मुस्कुराकर आसमान की ओर हाथ बढ़ाया और उससे पूछा, ‘तुम देहरादून के आसमान से मिले हो कभी? बहुत सुंदर है वो भी?’ ये बैंगलोर का आसमान है, इसने कोई जवाब नहीं दिया शायद काम पर निकलने की जल्दी में होगा। न सही, मुझे क्या। मैं तो दो कप चाय पीकर आराम से वक़्त के करतब देख रही हूँ। और बीता हुआ कल स्मृतियों के झरोखे में बैठे हुए मुस्कुराते हुए मुझे देख रहा है।

सोचा था, नए शहर में उसकी याद जरा कम आएगी...पर देख रही हूँ सबसे पहला धावा याद ने ही बोला है और चाय पर मुझे अकेला नहीं छोड़ा है।