Sunday, July 2, 2017

शहर सिसकते न हों कहीं...



जीवन ने जो बहुत सारी बातें सिखाई हैं उनमें से एक यह भी है कि जिस तरह व्यक्ति से मिलना व्यक्ति से मिलना नहीं होता, उसी तरह शहर में जाना शहर में होना नहीं होता. आप एक हाथ में टिकट और पीठ पर बैग लेकर किसी शहर में उतरेंगे और वो शहर आपके लिए अपने दरवाजे खोल देगा इसमें संदेह है. शहर पहले आपको टटोलता है. वो आपकी घुम्म्क्कड़ी की नब्ज़ की टोह लेता है. आपके कदम जब शहर की सडको पर रखे जा रहे होते हैं, तब आप नहीं जानते कि शहर की सड़कें आपके भीतर के कोलाहल को, शहर से दोस्ती करने की आपकी इच्छा को तलाश रहे होते हैं. शहर की हवाएं आपके जिस्म को नहीं छूतीं वो आपके भीतर टटोलती हैं वो आवेग जिसमें शहर के प्रति प्रेम है, शहर से इकसार हो जाने की इच्छा है, यात्रा के जोखिम उठाने का साहस है, जिसमें कोई हड़बड़ी नहीं है...

शहर अपने प्रेमियों की तरफ पूरी मोहब्बत से हाथ बढ़ाते हैं बाकी बचे लोग टूरिस्टों की भीड़ बनकर शहर की सड़कों को रौंदते हुए, शहर के मिजाज़ को लांघते हुए, शहर की आत्मा को चोटिल करते हुए सेल्फीस्टिक के सहारे मोबाईल कैमरों में कैद होते रहते हैं, सोशल मीडिया पर अपलोड होते रहते है. शहर गाड़ियों के कोलाहल, सामर्थ्य से ज्यादा पर्यटकों का बोझ वहन करते हुए और बेहिसाब फैलाये गए कचरे को उठाते-उठाते सिसक रहे होते हैं. शहरों की सिसकियां किसी को सुनाई नहीं देती. गाड़ियों के हॉर्न सुनाई देते हैं. भीड़ की लिस्ट में एक शहर और जुड़ जाता है लेकिन शहर की तासीर नहीं जुडती, मौसम नहीं जुड़ते. जाने वो लौटने के बाद अपने भीतर जरा भी परिमार्जन महसूस करते हैं या नहीं? जाने  यात्रा उनके भीतर की गांठों को खोल भी पायी या नहीं, जाने वो बादल का टुकड़ा जिसे लपककर कैमरे में कैद किया था वो आँखों की कोर से बरसा भी या नहीं? उनमें से किसी के पास कहाँ था वक्त जो शहर के सीने से लगकर शहर के किस्से सुनता. 

सिनेमा देखने, मॉल जाने, नए फैशन के कपडे पहनने, जन्मदिन पर केक काटने, न्यू ईयर पर जबरिया उल्लास का लिबास पहनने की तरह ही टिक मार्क वाली यात्राएँ भी जीवन में  शामिल होने लगी हैं. इसका नतीजा है शहरों की लगातार होती ऐसी-तैसी. एक तो यूँ ही पर्यटन स्थलों खासकर पहाड़ों पर विकास के नाम पर सीम्नेट और कंक्रीट का जंगल खूबसूरत हरे जंगलों को काटकर उगाया जा रहा है तिस पर ये नए किस्म का उपभोक्तावाद जो यात्रा को भी चपेट मे ले रहा है. हमारे शहर सिसक रहे हैं, कोई सुनता नहीं. खूबसूरत झील के किनारे कचरे का ढेर हो रहे हैं. किसी भी सुन्दर जगह से गुजरिये कचरे का ढेर, प्लास्टिक की बोतलें, पौलिथिन, चिप्स के पैकेट, दारू की बोतलें दांत चियारे मिल जायेंगी. हमारे सभ्य होने का उपहास उड़ाते...

पिछले बरस इन दिनों मैं अपनी पहली और अब तक की इकलौती विदेश यात्रा पर थी. स्कॉटलैंड के खूबसूरत पहाड़ों को देखते हुए पहला ख्याल अपने उत्तराखंड के पहाड़ों का आया था कि कहीं से कम खूबसूरत तो नहीं हैं हमारे देश के पहाड़, यहाँ के मौसम बस कि हम उनका ख्याल रख पाने में बुरी तरह से चूक जाते हैं. हमने अपने खूबसूरत शहरों को रौंद कर रख दिया है. हमने फेसबुक पर अपडेट करने के लिए या दोस्तों पर रौब झाड़ने के लिए पर्यटन के नाम पर शहरों की ओर दौड़ लगाना तो सीख लिया, तस्वीरें खींचकर अपलोड करना तो सीख लिया लेकिन शहरों से पेश आने का सलीका नहीं सीखा. 

पिछले दिनों जब एक कार्यशाला के दौरान नैनीताल में थी एक बार फिर यही सब आँखों के सामने था. समूचा शहर गाड़ियों के जाम, लोगों के हुजूम और गंदगी के ढेर के बीच बिलख रहा था. एक तरफ ऊंची पहाड़ियों पर बादलों का खेल चल रहा था दूसरी तरफ नकली मुस्कुराहटों से बजबजाती तस्वीरों के उद्योग में बदल चुका एक पूरा हुजूम...नैनी झील के सीने में छुपे दर्द को सुनने की फुर्सत और फ़िक्र किसी के पास नहीं थी.

वो सुन नहीं पा रहे थे कि असल में शहर को आपके जाने का इंतजार था...बारिशों के पहाड़, समंदर, जंगल, खेत, सड़कें बेहद मोहक होते हैं...पहाड़ों पर बादलों का अप्रतिम खेल चलता है जिसमें सूरज की मनमर्जियां अलग ही रंग भरती हैं...शहर अपने मेहमानों से प्यार करते हैं लेकिन मेहमानों को भी सलीकेमंदी से  पेश आना तो सीखना होगा न? जिन शहरों की खूबसूरती से खिंचकर हम वहाँ जाते हैं उसे ही नष्ट करके चले आते हैं ये कहाँ का सलीका है, ये कैसी यात्रा है? 

Thursday, June 15, 2017

इतनी भी अकेली नहीं होतीं 'अकेली औरतें'


जिम्मेदारियों से घिरी दौड़ती-भागती
खुद गिरती, खुद ही उठती
खुद रोती और खुद अपने आंसू पोछकर मुस्कुराती
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं

उनके आसपास होती हैं
सहकर्मियों की कसी गयीं फब्तियां
मोहल्ले में होने वाली चर्चाओं में उनका जिक्र
बेवक्त, बेवजह पूछे जाने वाले बेहूदा सवाल
और हर वक्त मदद के बहाने
नजदीकी तलाशती निगाहें
अकेली औरतों को
कहाँ अकेला रहने देता है संसार

अकेली औरतों के गले में मंगलसूत्र की जगह
लोगों को लटका नजर आता है 'अवेलेबल' का बोर्ड
उनके आसपास बिछ रहा होता है
अश्लील बातों का जाल

वो लाइन में लगकर खा रही होती हैं धक्के
पंचर स्कूटर को घसीट रही होती हैं खड़ी दोपहर में
मदद को यूँ तो बिछा होता है एक साजिश का संसार
लेकिन वे अपनी खुद्दारी को करती हैं सलाम
और सीखती हैं एक नया सबक हर रोज
होती हैं थोड़ी सी और मजबूत
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं
अकेली औरतें पिच्च से थूक देती हैं
जमाने भर का कसैलापन
ताकि भीतर की मिठास बची रहे
वो बेफिक्र गुनगुनाती हैं
जीती हैं अपने अकेलेपन को
चाहे अकेलापन उनका चुनाव हो या न हो
वो खड़ी होती हैं जिन्दगी के सामने पूरी ताकत से
अकेलेपन का उत्सव मनाती हैं
उनका हँसना और खुश रहना
चुनौती लगता है समाज को
वो हर रोज़ खड़ी करता है नई मुश्किलें उनके लिए

विवाहितायें, विवाहित होने की गौरव गाथाएं
उन्हें सुनाते हुए इतराती हैं बार-बार
लेकिन अनायास उभर आई अपनी अकेलेपन की
पीड़ा छुपाने में नाकामयाब भी होती हैं
अकेली औरतें मुस्कुराकर देखती हैं
पित्रसत्तता की लम्बी उम्र की कामनाओं
में डूबी स्त्रियों के मासूम अहंकार को
अपने अकेलेपन को अपनी शामों को घोलते हुए
वो जीती हैं कुछ मुक्कमल लम्हे
सहेजती हैं अपना कीमती अकेलापन
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं...

Saturday, June 10, 2017

जन्मदिन मुबारक ज्योति !



भरी दोपहर में न अमिया चुराईं, न गुट्टे या सिकड़ी के खेल खेले, न रस्सी कूदे न साथ में पापड़ बड़ियाँ बनायीं... नोट्स जरूर लिए एक-दूसरे से, इम्तिहान में पास बैठने का फायदा उठाया एक दुसरे से पूछापाछी की, कैसेटों की अदला बदली की, सिनेमा हॉल के दौड़ लगायी, कभी घर में बताकर कभी बिन बताये, पॉकेटमनी के पैसों से हिसाब लगाकर सस्ते शो को तलाशते हुए देखीं तमाम फ़िल्में भी...हज़रतगंज की सड़कों पर अपने मन के कितने कोने खोले, कितने सवालों की गिरहें खोलीं।

बरसों में गिनने बैठूं तो उम्र कम पड़ जाएगी हमारी दोस्ती के साल कितने हुए यह गिनने में क्योंकि हमने लम्हों में बरसों को जिया है, कभी-कभी तो सदियों में भी जिया है. वक़्त का हर रंग हमने साथ देखा है, वक़्त की हर करवट के साक्षी बने हैं.

वो लैंडलाइन के ज़माने में घंटों फोन पर बात करने वाले दिन थे, जब फ़ोन का बिल आने पर हम घरवालों से मुंह चुराते फिराते थे...और कभी किसी को समझा ही नहीं पाये कि दिन भर कॉलेज में साथ रहने के बाद, घंटों फोन पर बात करने के बाद भी आखिर ऐसा क्या बचा रह जाता है कि हमारी टीवीएस चैम्प (मेरी नीली, तुम्हारी ग्रे) एक दूसरे के घर की तरफ भागती थीं...कभी-कभी हम एक दूसरे को क्रॉस भी कर जाते थे. तुम मेरे घर पहुँच जाती थीं और मैं तुम्हारे.

हम अपने भीतर के भटकावों में से निकलने के लिए शहर की सड़कों पर भटकने लगे...कितनी बारिशों ने हमें साथ में भिगोया, फिर धूप और हवा ने ब्लोअर बनकर सुखाया भी. सच कहूँ, मैंने हमेशा तुमसे सीखा ही. इस रिश्ते में मैंने ही हमेशा तुमसे लिया, बहुत कुछ.

सबसे बड़ा था वो भरोसा कि अगर तुमने कुछ कहा तो उस पर दोबारा सोचने की ज़रूरत लगी ही नहीं. हालाँकि पसंद के मामले से लेकर वैचारिक मामलों तक में हमारी दिशाएं हमेशा विपरीत रहीं। हाँ, पिछले कुछ बरसों में हमारे विचारों में कुछ साम्यता बनने सी लगी है फिर भी हमारे स्वभाव के कंट्रास्ट मुसलसल जारी हैं और हमारा उन कंट्रास्ट को जीने का ढंग अब भी वही है...

याद है अभी हाल ही में तुमने कहा था, 'हिसाब-किताब के मामले में तुम पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता...बेकूफ ही हो एकदम...' कितना हंसी थी उस रोज़.

हमें एक-दूसरे को कभी बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि मन का मौसम कैसा है...हमें कभी एक दूसरे को जताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि कितनी ज्यादा वैल्यू है एक-दूसरे की. कभी लम्बी खामोशी में भी पढ़ा तुमने मुझे और कभी खूब बक-बक में भी सुनी मेरी ख़ामोशी...

मुझे याद नहीं तुमने कभी मेरी तारीफ में या मेरे किसी काम (किसी लिखे पढ़े ) की तारीफ में कोई कसीदे कभी काढ़े हों, हमेशा कुछ जो कम था वो बताया....या तुम्हारा यह कहना कि 'कुछ मजा नहीं आया...' या बस 'उन्हू' कहना...कितना सार्थक है वो सब...

जिन्दगी के सबसे काले दिनों में तुम्हारा साथ रौशनी सा रहा, और जिन्दगी के उजले दिनों में काला टीका बनकर रहीं तुम. ‘अच्छा ज्यादा बनो मत’ तुम्हारा कहना हो या मेरा पूछना कि ‘कहीं मुझमें भी अहंकार तो नहीं आ गया, क्योंकि अहंकार न होने का भी अहंकार कितने धीमे से उतरता है नसों में पता नहीं चलता है’ और तब तुम कहती कि ‘जब आएगा तो सबसे पहले मैं ही बताऊंगी...चिंता मत करो...’ कितनी बड़ी आश्वस्ति है इसमें.

तुम 'हाँ 'कह देती हो तो लगता है कुछ ठीक हो ही जायेगा...तुम नहीं जानती कि तुम्हारा होना कितना मायने रखता है मेरी जिन्दगी में...मेरी शादी के वक़्त हर पल तुम्हें ही तलाशती मेरी नज़रें हों या तुम्हारी विदाई के वक़्त निशांत को गुस्से से घूरती नज़रें...सबमें तुम ही तो थीं...

शहर बदले, जिन्दगी बदली, जिन्दगी में नए रिश्ते शामिल हुए...नए हालात बने...कितने उतार, कितने चढ़ाव...लेकिन तुम्हारा साथ...हमेशा ताकत बनकर खड़ा रहा...
आज अपनी बेटियों की दोस्ती को देखती हूँ तो आँखें ख़ुशी से छलक पड़ती हैं...हमारे प्यार को, हमारी दोस्ती को हमारी बेटियों ने सुभीते से संभाला है...दीत्या का मुझे 'मौसी' कहना...पहली बार ‘मौसी’ शब्द को महसूस करना था...तुम कहती थीं वो तुम्हारे बिना किसी के साथ कहीं नहीं जाती और वो बिना झिझक मेरे साथ चल पड़ी थी...याद है बैंगलोर की वो शाम? और मैं कहती थी कि शिवी मेरे बिना किसी पास रुकती नहीं और फिर उसका तुम्हारे घर दो दिन मजे से रुकना, एक दिन और रुक जाने का इसरार करना।

शिवी जब यह कहती है कि अगर ज्योति मौसी का फोन है तो कोई बात नहीं वरना किसी से बात करना अलाउड नहीं है तो कितना सुख होता है. जानती हो, घर आने के बाद जो बेटू का वक़्त होता है न, उसमें सिर्फ नानी और ज्योति मौसी से ही बात करने की परमीशन है मुझे...

जब ज़माने के तमाम रिश्तों की कलई उतर रही हो, तमाम लोग हालात के चलते बदल गए हों एक हमारा रिश्ता ही है जिसकी चमक लगातार बढती जा रही है...

सच जिन्दगी में एक ऐसा दोस्त कितना कीमती होता है जिसके आगे कुछ भी कभी भी कैसे भी कहा जा सके जिसकी सहमती ज़रूरी न हो जिसे कैसा लगेगा यह सुनकर का डर न हो...आज तुम्हारे जन्मदिन पर इससे बेहतर तोहफा मुझे नज़र ही नहीं आता...इन बच्चियों में अपने दोस्ती को रूपांतरित होते देखना....इससे बेहतर क्या होगा...

जानती हूँ तुमको इस तरह कहा जाना पसंद नहीं है फिर भी मैंने कब तुम्हारी हर बात मानी है....नाराज़ न होना, हो भी गयी तो क्या जरा डांट ही लोगी न, एक बार और सही...

जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...हमें साथ साथ बूढा होना है...बच्चों से बहुत सारी डांट खानी है और बहुत सारा साथ में जीना है...लड़ना है...बढ़ना है....जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...बहुत से बहुत ज्यादा प्यार....

Friday, June 2, 2017

यह कोई हीरा नहीं

न न मत मांगो
यह कोई हीरा नहीं
तुम्हारे बाज़ार में
कोई कीमत नहीं इसकी
मेरा गम है ये
मेरी तन्हाई है
मैं अपने गम से जिंदा हूँ...

Thursday, June 1, 2017

आई एम नॉट अ गुड गर्ल....ओके?


अठारह बरस पहले जब शादी के वक़्त विदा हुई थी तो रो-रोकर धरती हिला दी थी...कई महीनों तक उदासी साथ लिए घूमती रही...हालाँकि माँ उसी शहर में थीं जिसमें मैं, यानी लखनऊ ही. फिर भी यह कहना या सुनना ही अजीब लगता था कि 'माँ के घर जा रही हूँ' या 'आई हुई हूँ...' क्योंकि शादी के पहले घर का एक ही अर्थ होता था...माँ का एक ही अर्थ होता था...

माँ से बिछुड़ना हमेशा विदाई की याद दिला देता है...'इत्ती बड़ी हो गयी हो अब भी रोती हो' अब बेटी कहती है...विदाई के वक़्त यही बात मुझसे दस बरस छोटे भाई ने कही थी...लगता है मैं कभी बड़ी नहीं होउंगी...कम से कम माँ को लेकर तो कभी नहीं...


माँ मजबूत हैं, वो रोती नहीं...रोने पर फटकारती हैं, गले नहीं लगातीं...वो मुझे मजबूत बनाना चाहती होंगी...लेकिन मैं रही रुतड ही...आज माँ को फिर से स्टेशन के लिए रवाना करते हुए एक हुडक कलेजे में उभरी जो कई दिनों से भीतर ही भीतर घुमड़ रही थी शायद...

माँ मेरे पास रह सकें इसलिए पापा ने अकेले रहना सीखा वो भी इस उम्र में...परिवार की यही ताकत है...दूर रहकर भी एक दूसरे के साथ खड़े रहने की ताकत. माँ आज लखनऊ गयी हैं पापा के पास...फिर लंदन जाएँगी भाई भाभी के पास....फिर लौट आएँगी मेरे पास....सब कुछ अच्छा है फिर भी माँ के बिना घर अच्छा नहीं लगता...

बिना डांट खाए दिन बीतेगा अब...ये भी कोई बात हुई....ओके ओके, कोई मत समझाओ...आई एम नॉट अ गुड गर्ल....लव यू माँ...