Friday, November 27, 2015

विवाह संस्था पर सवाल तो हैं



'शादी जब पुरानी हो जाती है तो वो सड़ने लगती है। उसमें से बदबू आने लगती है।' फिल्म इज़ाजत का यह संवाद अक्सर दूसरे अल्फाजों में दूसरे हालात में कानों से टकराते रहते हैं। जिस प्रेमी का हाथ थामकर दुनिया हसीन हो उठती है, जिसकी एक मुस्कुराहट पर जां निसार करने को जी चाहता है, जिसके एक आंसू पर विकल हो उठते हैं जिसके बिना एक पल भी जीना दुश्वार होता है उसी प्रेमी के साथ विवाह करने के बाद ऐसा क्या हो जाता है कि दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता रिसने लगता है। न भी हो प्रेम विवाह, अरेंज्ड मैरिज में भी तो लगभग ऐसा ही होता है न? शादी जैसे भी हुई हो शुरुआती दौर में जोर से लहलहाती है, खिलखिलाती है, चहचहाती है। दो मासूम लोग, विपरीत लिंग का आकर्षण, ढेर सारी आजादी। मानो पंख लग जाते हैं। फिर धीरे-धीरे कपूर सा उड़ने लगता है प्यार। दो जन खुशबू पकड़ने को बेताब हो उठते हैं। सारी ताकत लगा देते हैं। खुशबू उड़ती ही जाती है। बेचैनी बढ़ती जाती है। एक दूसरे पर आरोप, शिकायतें, नाराजगी, जो किया जो नहीे किया उसका हिसाब-किताब और अंत में एक सूखी टहनियों वाले पेड सा रिश्ता जिसकी टहनियों पर रस्मो-रिवाज, जिम्मेदारियां, चिड़चिड़ाहटें टंगे हुए उसे बदसूरत बनाते नज़र आते हैं।

जो जरा भी जिंदगी में, रिश्तों में डेमोक्रेटिक होने पर यकीन करता है, जो सोचता है कि रिश्तों की खुशबू कपूर सी उड़ जाने वाली नहीं ठहर जाने वाली होने चाहिए वो शादी के नाम पर घबराने लगता है। लड़कियां हों या लड़के दोनों ही। शायद ऐसे ही सवालों, घबराहटों के बीच से लिव इन रिलेशनशिप की राह निकालने की कोशिश की गई होगी। मतलब साफ है, साथ रहने में दिक्कत नहीं लेकिन शादी में है। क्यों है ऐसी शादी जो है भी जरूरी और जिसमें सुकून भी नहीं। 

क्यों शादी होते ही दो लोग एक दूसरे पर औंधे मुंह गिर पड़ते हैं। पूरी तरह अपने वजूद समेत ढह जाते हैं। दूसरे के वजूद को निगल जाने को आतुर हो उठते हैं। क्यों स्त्रियां चाहे वो कितनी ही पढ़ी-लिखी या नौकरीपेशा हों एक पारंपरिक सांचे में ढलते हुए देखी जाने लगती हैं और वे स्वयं ढलने भी लगती हैं। क्यों पुरुष भी एक मर्दवादी सोच से अनचाहे ही सिंचित होने लगते हैं और बच नहीं पाते और पत्नी को सुरक्षा देने और उन पर अपना अधिकार समझने के कन्फ्यूजन में।

आज जब विवाह संस्था पर सवाल उठने लगे हैं तो जरा यह समझने की भी जरूरत है कि वो क्या चीज है जो शादी जैसे रिश्ते को सवालिया कठघरे में खड़ी कर रही है। कितने बरसों का साथ से ज्यादा जरूरी है समझना कि वो साथ कितना सुंदर और मीठा था। शादी की 50वीं सालगिरह मनाना, सामाजिक उत्सवों में ग्रुप फोटों में मुस्कुराते हुए नजर आना, फेसबुक पर अपने प्रेम के इजहार वाली तस्वीरें चिपकाना अलग बात है और एक खुशनुमा, भरोसे से भरा, सम्मान से भरपूर, एक-दूसरे को समझने वाला रिश्ता जीना और ही बात है। क्यों शादी ऐसा रिश्ता अक्सर बनते-बनते रह जाती हैं जिसमें दो लोग एक साथ उग रहे हों, बढ़ रहे हों और एक साथ महक रहे हों। 

आखिर शादियों में स्पेस क्यों नहीं होता। क्यों दो लोग एक-दूसरे पर शुरुआत में प्यार के नाम पर टूट पड़ते हैं और बाद में एक-दूसरे से असहनीय तरह से चिढ़ने लगते हैं। पति और पत्नी अनजाने ही किस तरह एक-दूसरे के प्रति प्यार में आकंठ डूबे होते हुए ही आक्रामक होने लगते हैं उन्हें पता नहीं चलता। उन्हें यह पक्का यकीन हो चुका होता है कि उनके साथी की खुशी की सारी वजहें सिर्फ और सिर्फ उससे ही होनी चाहिए। अगर उसके पास दुखी होने या खुशी होने की कुछ अपनी निजी वजह हैं तो यह बात बेहद बेचैन करती है उन्हें। ”तुम खुश हो लेकिन तुम्हारी खुशी की वजह मैं तो नहीं हूं ना। यह बात मुझे चैन से रहने नहीं देती।” ऐसी पीड़ाएं उभरती हैं। 
यह रिश्ता अगर समाज, परंपराओं और रीति रिवाजों की भेंट न चढ़ा होता, अगर दो व्यक्तित्व सामाजिक परवरिश के चलते एक समर्पण और दूसरा अधिकार की चाह लिए न बढ़े होते, अगर दो लोगों के रिश्तों में, उनके जीने के ढंग में हर वक्त कोई अपनी नाक न घुसा रहा होता तो शायद विवाह संस्था का रूप कुछ और ही होता। समानता और सम्मान की भावभूमि पर खड़ा रिश्ता तां उम्र महकता रहता। समाज ने विवाह संस्था की नकेल अपने हाथ में ले रखी है वो दो लोगों के बेहद निजी पलों को निजी भावनाओं को भी नियंत्रित करता रहता है। वो नकेल विवाह संस्था को तो बचा लेती है लेकिन उसमें होने वाले प्रेम को खा जाती है। 

निकोलाई चेर्नीस्कोवेस्की के उपन्यास की वेरा याद आती है जो विवाह को एक खुले स्पेस और पूरी आजादी सम्मान और प्रेम के साथ जीना जानती है। जबरन एक साथ होने या सोने की जिद, जुनून या दबाव से बहुत दूर...हंसता मुस्कुराता रिश्ता जिसका आधार सिर्फ एक-दूसरे का सम्मान और प्यार है। एक-दूसरे पर अटूट भरोसा है। 

प्रकाशित 

Sunday, November 15, 2015

जो छूट जाता है वही हासिल है...


जाने कब किससे सुना था कि दीवारों से घर नहीं होता, उसमें रहने वाले लोगों से होता है...अच्छा लगा था सुनना। लेकिन सच्चा नही। क्योंकि दीवारों, खिड़कियों, रास्तों का अपनापन भी बहुत महसूस किया है। लौटकर आने पर ताला खोलते वक्त ऐसा नहीं लगता कि यहां किसी को मेरा इंतजार नहीं था। मानो इस घर के कोने-कोने को मेरा इंतजार रहता है। घर के पर्दे, दीवारें, खिड़कियां, सोफे पर आधी पढ़कर छूटी हुई किताब, दरवाजे के बाहर लगा अखबारों का ढेर...पानी के लिए पड़ोसी की छत पर पहुंचाये गये पौधे...सुबह दाना खाने आने वाली चिड़िया, कबूतर, तोते...सब तो बाहें पसारे इंतजार करते मिलते हैं। अपने कमरे की महक, सिरहाने लटका चार्जर, जल्दबाजी में आधा उलटा रह गया डोरमैट, ठीक से न बंद हुई तेल की शीशी, छूटा रह गया एक छोटा सा जाला सब जैसे किसी लाड़ से देखते हों। जाते वक्त की हड़बड़ी में भी जाने के ठीक पहले दो पल को ठहरना और सांस भर घर को जीना जैसे आदत हो...।

इस कदर जज्ब करने की इतनी सी मोहलत कभी जिंदगी ने नहीं दी, इश्क ने भी नही...।

मालूम होता है दीवारें सांस लेती हैं मेरे साथ, कभी तेज कभी मध्धम। इन दीवारों ने मुझे उस तरह संभाला है जिस तरह कोई आत्मीय दोस्त संभालता है, बिना सवाल किये, बगैर तर्क किए, बिना कठघरे में घेरे। मुठ्ठियों के प्रहार और गुस्से के भीतर छुपे प्यार को सहेजते हुए।

कितना गुस्सा उतरा इन दीवारों पर...कितनी रातों को इनसे बातें करते हुए रातें गुजारीं...खिड़की से बाहर झांकते कभी तो कभी छत पे टंगे पंखे पर अपनी आंखें टांगकर भी। कितनी बार अपनी खुशियां भी उछालीं इन दीवारों के भीतर...तब धीमे से मुस्कुराते हुए भी देखा इन दीवारों को...लोगों से गले लगकर प्यार जताते हुए कभी खुद को पूरी तरह सौंप दिया हो याद नहीं। कभी-कभार मां के कंधे पर समूचा लुढ़क जाने को जी चाहा जरूर लेकिन वो इच्छा भी समेट ही ली। लोगों को मिलते वक्त, बिछड़ते वक्त रोते हुए देखना सहज लगता है, शायद उनकी मुलाकातें, या बिछोह हल्के हो जाते हांेगे, तरल होकर उनका भारीपन बह जाता होगा... मैं ऐसा कभी कर नहीं पाई। मेरा कुछ भी शिद्दत से महसूसना एकांत मांगता है। उस वक्त दीवारें ही होती हैं आसपास।

इन दीवारों के पास वो सब है जो व्यक्ति के पास नहीं, रिश्तों के पास नहीं। छूटते लम्हों और लोगों से बिछड़ते वक्त जो नमी बचा लाये थे न हम वो इन दीवारों के साये में महफूज है। जो छूट जाता है असल में वही हासिल है...


Thursday, October 29, 2015

मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं


गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारों, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

जो हमपे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरे आक़बत सँवार चले

कभी तो सुबह तेरे कुंज-ए-लब्ज़ हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-ए-बार चले

मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले.

- फैज़ अहमद फैज़

Tuesday, October 27, 2015

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमें न मौका सिसकी का



वो काम भला क्या काम हुआ जिसका बोझा सर पे हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसका चर्चा घर पे हो

वो काम भला क्या काम हुआ जिसमे साला दिल रो जाये
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जो आसानी से हो जाये

वो काम भला क्या काम हुआ जो मजा नहीं दे विह्स्की का
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमें न मौका सिसकी का

वो काम भला क्या काम हुआ जिसकी न शक्ल इबादत हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसकी दरकार इज़ाज़त हो

वो काम भला क्या काम हुआ जो कड़वी घूँट सरीखा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमे सब कुछ मीठा हो

- पियूष मिश्र


Thursday, October 22, 2015

हिज्र की शब और ऐसा चांद

पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चांद

मेरी करवट पर जाग उठे
नींद का कितना कच्चा चांद

सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद

रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चांद...

- परवीन शाकिर