Monday, August 5, 2013

तुम हो, न हो...




जो वादा दिया था तुमने 
चाय की आखिरी चुस्की के साथ 
वो चाय के प्यालों की तलहटी में
जा गिरा था, 

तुम हो, न हो 
हर शाम  दो प्याले होते हैं चाय के 

एक आसमान 
होता है सर पे 

और एक तलाश होती है 
चाय की प्यालियों की तलहटी में…

Wednesday, July 24, 2013

नींद में इन दिनों ख्वाब नहीं आते...


ख्वाब आजकल आते नहीं आँखों में
कि नींद बहुत आती है

कोई ख्वाब दरवाजे से सर टिकाकर
बैठा है, 
एकदम सटकर
बीती रात के ख्वाब से

कोई ख्वाब बालकनी में जमुहाई ले रहा है
कि तुम आओ,
तुम्हारी हथेलियों में सुबह लिखूं

कोई ख्वाब सिरहाने बैठा है
ये सोचकर कि नींद के किसी हिस्से में तो
उसका भी हिस्सा होगा

सुबह की चाय बनाते वक़्त जो ख्वाब
छोड़ गए थे तुम गैस चूल्हे के पास
और जाकर धंस गए थे बीन बैग के अन्दर
वो ख्वाब एक पानी की बोतल में रख दिया था,
उसमें कल्ले फूटे हैं

कुछ ख्वाब यूँ ही टहलते फिरते हैं घर भर में
कभी भी, कहीं भी टकरा जाते हैं
जैसे तुम टकराते थे, जानबूझकर
बदमाश…कहते-कहते होंठ ठहर जाते हैं 
कोई किताब उठाओ तो उसमें से झरते हैं कुछ ख्वाब
अरे… अरे… गिरते ही जाते हैं ये तो

कमबख्त, कहीं चैन से रहने नहीं देते
कि चलो सो जाती हूँ
नींद में इन दिनों ख्वाब नहीं, 
तुम आते हो… सचमुच।

Tuesday, July 23, 2013

हौले से रखना कदम ओ सावन...


पूरनमाशी के रोज आषाढ़ ने सावन से कुछ शर्त लगा ली. आषाढ़ की बारिश का गुरूर ही कुछ और होता है और कैलेण्डर तो बस याद के पन्ने पलटता है. मगरूर आषाढ़  बोला कि वो तब  तक न बीतेगा जब तक उनकी आमद न होगी। कैलेण्डर ने ख़ामोशी से सर झुका लिया जिसके अगले पन्ने पर आमद का वादा दर्ज था. 

पूरण की रात एक पन्ना कैलेण्डर से उतरा और आसमान पर लिख आया सावन---

सुबह सिरहाने कुछ आहटें रखी थीं. सुबह की प्याली में आसमान से टपकी एक बूँद। चारों तरफ छाई हरियाली में और निखार आ गया.

बिटिया ने प्यार से निकाला हरे रंग का दुपट्टा।

मुस्कुराकर टुकुर-टुकुर देख रहे हैं बादल। उन्हें ताकीद है कि हौले से रखना इस बार कदम कि आषाढ़ ने काफी उत्पात मचाया है…

Tuesday, June 18, 2013

वो लोगों से दुःख मांगता था...


वो कोई दरवेश था शायद. उसके कंधे पर कोई पोटली नहीं थी. लेकिन कुछ था तो पोटलीनुमा. अदश्य. वो कहता था कि उसके पास दुनिया के हर सवाल का जवाब है. हर समस्या का समाधान है. पलक झपकते ही वो बारिश ला सकता था, पलक झपकते ही आपको फूलों से भरे बागीचे में ले जाकर छोड़ सकता था. एक ही पल में आप खुद को राजा समझ सकते थे और अगले ही पल तितली की तरह उड़ते या फूल की तरह खिलते महसूस कर सकते थे.

वो लोगों से दुःख मांगता था. बड़ी सी हथेली थी उसकी. बहुत बड़ी सी. उसकी हथेली पर जाते ही बड़े से बड़ा दुःख नन्हा सा हो जाता था. वो दरवेश धरती की तरह गोल-गोल घूमता था. उसके साथ पूरी सष्टि घूमती थी. एक रोज बहुत सारे बच्चों ने उसे घेर लिया, हमें जलेबियां खानी हैं...पूरे कमरे में जलेबियां ही जलेबियां. बच्चे खाते जा रहे थे...खाते जा रहे थे...खाते ही जा रहे थे....न जाने कबसे भूखी पड़ी अंतड़ियों और सपनों से खाली आंखों में उस रोज तृप्ति की बारिश हुई. चारों ओर जलेबियों की खुशबू फैली हुई थी.

एक रोज दरवेश ने बच्चों से पूछा, क्या तुम चाहते हो कि ये बादल तुम्हारे पैरों के नीचे बिछ जाएं....? बच्चे चुप...ऐसा भी कहीं होता है क्या? दरवेश ने पूछा कि क्या तुम चाहते हो कि इस तेज गर्मी वाले मौसम में बारिश हो जाए...बच्चों की आंखों में चमक तो आ गई पर वो खामोश ही रहे....ऐसा भी कहीं होता है क्या?

फिर धीरे से एक गुमसुम सी, खामोश सी सिलबिल ने हाथ उठाया...हां...बारिश....
क्या?
दरवेश ने पूछा.
बारिश हो जाए सिलबिल ने पलकें झपकाते हुए कहा...धीरे धीरे और बच्चों के भी हाथ उठे और दरवेश ने गोल-गोल घूमना शुरू किया...बच्चों ने भी घूमना शुरू किया. गोल...गोल...गोल....गोल....और कुछ ही देर में बादल के कुछ टुकड़े कमरे के भीतर झांकने को बेकल हो उठे.

कुछ ही देर में हल्की फुहार गिरने लगी. किसी की नाक पर एक बूंद गिरी, किसी के सर पर..कोई बोला...देखो बारिश आ गई....दूसरा बोला...कहां? तीसरी बोली...यहां मेरी नाक पर...कोई बोला मेरे सर पर और अचानक पूरा कमरा बारिश की बूंदों की आवाज में डूब गया. सारे बच्चे तर-ब-तर.

कमरे के बाहर भी बारिश थी, कमरे के भीतर भी. कमरा...शरीर का भी, ईंट पत्थर का भी.

दरवेश की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी. लोग अपनी-अपनी समस्याएं लेकर आते और दरवेश आंखें बंदकर गोल-गोल घूमते और थोड़ी ही देर में समस्या गायब...लोग खुशी-खुशी वापस लौट जाते. रागिनी के पास कोई दुःख नहीं था, कोई परेशानी नहीं या वो किसी से कुछ कहना ही नहीं चाहती थी.

दरवेश ने उसके करीब जाकर पूछा, तुम्हें कुछ नहीं चाहिए...वो चुप रही.

दरवेश ने उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लिया...उसके सर पर हाथ पर फिरा दिया. दोनों चुप बैठे रहे...रागिनी ने कहा, आप सचमुच कुछ भी कर सकते हो?

दरवेश चुप रहा.
रागिनी ने फिर कहा, आप मेरी मां को वापस ला सकते हो? वो भगवान के पास चली गई है. कहते हुए रागिनी ने अपनी आंख का एक आंसू दरवेश की हथेली पर रख दिया.

आप सब बच्चों से झूठ क्यों बोलते हैं?
दरवेश चुप.

मैं जानती हूं उस रोज कोई बारिश नहीं हुई थी. कोई बादल बच्चों की बात नहीं मानता. कोई जलेबियां नहीं खाई थीं हमने...
ऐसा क्यों करते हो आप....बोलो...

दरवेश बोला, बेटा, जादू मेरे पास नहीं तुम सबके पास है. तुम सब हो दरवेश. मैं तो तुम सबके बीच आकर अपना दुख, अपनी परेशानी कम करता हूं. हां, एक बात है कि मैं झूठ नहीं बोलता. जिन बच्चों ने कहा बारिश हुई उन्होंने उसे सचमुच महसूस किया. जिंदगी में किसी भी बात का होना न होना हमारे चाहने पर निर्भर करता है. हम क्या चाहते हैं, कितना चाहते हैं, किस तरह चाहते हैं. अपने उस चाहने के प्रति कितनी जिद है हमारे भीतर...

मैं अपनी मां को वापस लाना चाहती हूं....रागिनी फूट-फूटकर रोने लगी....तभी उसने देखा कि दरवेश उसकी मां में बदल गया. वो दरवेश उसकी मां ही थी. जो भेष बदलकर रागिनी से मिलने आई थी. रागिनी देर तक मां से लिपटकर रोती रही. मां ने उसे खूब प्यार किया. दोनों ने जलेबियां खाईं. और देर तक बारिश में भीगती रहीं.

अगले रोज जब रागिनी की आंख खुली तो न बादल थे, बारिश, न जलेबियां, न बच्चे न दरवेश न मां....हां, लेकिन रागिनी की आंख में आंसू भी नहीं था....

Wednesday, June 5, 2013

मायूस तो हूं वायदे से तेरे



मायूस तो हूं वायदे से तेरे
कुछ आस नहीं कुछ आस भी है,
मैं अपने ख्यालों के सदके
तू पास नहीं और पास भी है.

दिल ने तो खुशी माँगी थी मगर,
जो तूने दिया अच्छा ही दिया.
जिस गम को तअल्लुक हो तुझसे,
वह रास नहीं और रास भी है.

पलकों पे लरजते अश्कों में,
तसवीर झलकती है तेरी.
दीदार की प्यासी आँखों को, 
अब प्यास नहीं और प्यास भी है.
- साहिर लुधियानवी