Sunday, February 15, 2009

गुलज़ार के संग एक शाम


कल की रात गिरी थी शबनम
कल की रात बड़ी उजली थी
कल की रात तेरे संग गुजरी...

गुलज़ार साहब की लिखी ये नज़्म सचमुच जी उठी
बीती रात। आसमान से हलकी झरती उस की बूंदों
के बीच जेनेसिस क्लब ख़ुद गुलज़ार साहब की आवाज
में महक उठा जब उहोंने एक एक कर अपनी नज्मों को
पढ़ना शुरू किया। उस रात वो आसमान सचमुच जरीवाला
नीला आसमान हो गया था। और ये कोई कल्पना नहीं थी।
वहां मौजूद हर शख्श अपने भीतर एक गुलजार को उगता
हुआ महसूस कर रहा था।
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात बहर बुझाते हुए रिश्ते को तप हमने
मुझको इतने से काम पर रख लो
जब भी सीने पर झूलता लौकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा
करता रहूँ उसको....
इस नज्म को पढ़ते हुए उनके चेहरे पर
जोप शरारत के भावः थे वे उनकी उम्र को बहुत पीछे
छोड़ रहे थे...
उनकी पेर्सोनाल्तिटी के तमाम शेड्स यहाँ मौजूद थे।
पाकिस्तान के बटवारे के दर्द को बयां करने वाली नज़्म
भमीरी का जादू था तो जुलाहे से रिश्तों को बुनने के
तरकीब सीखने की ख्वाहिश भी थी...
उन्होंने अपने चाहने वालों के सवालों के जवाब भी दिए
और एक जवाब में शरारत से कहा की मुझे इन दिनों
फुर्सत तो मिल जाती है पर जाना नहीं मिलती।
सफ़ेद लिबास में सजे उस शायर की बहकी बहकी सी
बातें सबको अपनी गिरफ्त में रही थी। मौका वैलेंटाइन डे
का और इस कदर रोमेंटिक रात भला कौन भूल पायेगा।
गुलज़ार साहब पिछले दो दिनों से लखनऊ में हैं। मेरी उनसे
अलग से हुई मुलाकात का जिक्र और बहुत कुछ अभी बाकी
है। फिलहाल आज उनके प्ले खराशें देखने जाने का वक़्त है।
इस बारे में भी कल बात होगी...फिलहाल इतना ही...

Thursday, February 12, 2009

दूरियां

मैं सोचता
रहाऔर दूर चला आया
मैं दूर चला आया
और सोचता रहा
तुम सोचती रहीं

और दूर चली गईं
तुम दूर चली गईं
और सोचती रहीं
इस तरह हमने तय की दूरियां।

- मंगलेश डबराल

Tuesday, February 10, 2009

एकांत की खातिर

अस्तित्व सिर्फ़ साथ भर के लिए नहीं अपनी
तन्हाई के लिए भी जरूर चाहिए। दूर कमरे
में बैठा जो मेरी तन्हाई की हिफाज़त कर सके।
साथ के लिए तो बहुतों ने किसी न किसी को
चाह होगा पर किसी ने एकांत खातिर भी किसी
को चाहा हो नहीं जानती।
मैंने जरूर चाहा है........
अमृता की डायरी से.....

Sunday, February 8, 2009

प्यार

मुझे प्यार नहीं चाहिए, मुझे पारस्परिक समझ चाहिए।
मेरे लिए यही प्यार है, और जिसे आप प्रेम की संज्ञा देते
हैं- बलिदान, वफादारी, इर्ष्या, उसे दूसरों के लिए
बचाकर रखिये, किसी दूसरे के लिए।
मुझे यह नहीं चाहिए। सचमुच नहीं।

- मारीना

Sunday, February 1, 2009

is vasant men


इस वसंत के किनारे रुको
इसके फूलों में
इसके पानी में
इसकी हवा में
डूब जाओ थोडी देर को
सुनो इसके पदों की आवाज़
छुओ इसकी पत्तियां
सौंप दो अपने को
एक नाद सुने देगा
दिखाई देंगे देवदूतों के चेहरे
तुम्हारे भीतर प्रेम
बस धीमे से एक बार
नाम लेगा किसी का
तुम अमर होगी इस ऋतू में
फूल, पानी, हवा, वृक्ष और पत्तियां
तुम्हें धन्यवाद देंगी
नदियों में तुम्हारे लिए
आशीष होगा!
अलोक श्रीवास्तव की कविता