Thursday, December 31, 2015

हम तुझे बीतने नहीं देंगे...



कैलेण्डर के आखिरी पन्ने से गप्प लगाते लगाते कब नींद लगी पता ही  नहीं चला. ये लम्हों से गुफ्तगू के दौरान लम्हों का हमें जवाब का एक ढब है. 'नींद' हाँ ये सौगात मिली इस बरस. नींद को तरसी, बिन मौसम बरसी आँखों को नींद मिली। खुद पे फिर से ऐतबार करना सीखा, कुछ कमजोरियों को साधना सीखा, कुछ नयी कमजोरियों से दिल लगाना भी.

जिन नन्ही उँगलियों को थामकर अ ब स द लिखना सिखाया, जिसे साइकिल के आगे वाले डंडे पर बिठाकर इतराई फिरती है, जिसके होने ने जिंदगी को एक अलग ही एहसास दिया, उस नन्हे भाई को उसके ख़्वाबों  के साथ होते देखना का सुख मिला, उसके ख्वाबों से हमारा रिश्ता जुड़ा। परिवार शब्द में एक नयी धड़कन शामिल हुई, अपनी खिलखिलाहटों के साथ ऐ बीते हुए बरस तू, अब हम तुझे बीतने नहीं देंगे।

हथेलियों में अपनी बंद आँखों को खोलकर जिसने दो जहाँ खोल दिए थे अब उस बेटी का संसार खुलते देखती हूँ. बचपन और किशोरावस्था हाथ थामे चल रहे हैं. जिंदगी के संघर्ष भी संगीत से लगते हैं उसकी हथेलियां छूते हुए. जब मैं नींद में थी लाडो नानी से पूछकर बनाती है मेरे लिए हलवा, और ठीक बारह बजे हम एक दुसरे को मीठा खिलाते हैं. हमेशा माँ के बनाये मीठे से नए कैलेण्डर का पन्ना पलटती रही हूँ, इस बार बेटी के बनाये मीठे से. जिंदगी की इस मिठास के बाद भी कोई शिकायत करने से बड़ा गुनाह कोई नहीं।

Tuesday, December 29, 2015

विस्मित माँ की डायरी



जिन्दगी की हर हरारत पे एक ही मरहम है, हमारे बच्चे। हर  दिन हमें चौंकाते हैं.

हम दोनों माँ बेटी दिन भर बच्चों की तरह झगड़ते हैं, रूठते हैं, कभी मैं उसकी चॉकलेट चुरा के खा लेती हूँ कभी वो मेरा मोबाईल छुपा देती है. कभी वो खाना न खाने की ज़िद पे डाँट खाती है कभी रसगुल्ले गर्म करके पेश करती है और झप्पी पाती है, कभी टीवी पर कोई दूसरा गाना लगाकर स्पीकर पे दूसरा गाना प्ले करके हँसते हैं तो कभी न्यूज़ चैनल और तारक मेहता का उल्टा चश्मा के बीच तलवारें खिंचती हैं, कभी वो मूड ऑफ देखकर मिमिक्री करती है तो कभी बेवक़्त आ गयी कच्ची नींद को कमरे का दरवाजा बंद करके घर को एकदम शांत बनाकर गहरी नींद में ढालने की कोशिश करती है. मुझे ज्यादा वक़्त यही लगता है कि वो माँ है मैं नहीं। कभी वो नानी से कहती है, 'नानी जल्दी से पढ़ाई कर लेने दो वरना मम्मा आ जाएगी तो पढ़ने नहीं देगी'.

रिपोर्ट कार्ड आता है तो झूठ-मूठ का नाटक करती है डरने का और मैं नाटक करती हूँ डांटने का. फिर हम दोनों हंसती हैं खिलखिलाकर। वो कहती है, ' मम्मा आपसे डर क्यों नहीं लगता मुझे, मेरी सारी फ्रेंड्स तो बहुत डरती हैं अपनी मम्मा से?' मैं कहती हूँ कि 'मैं दोस्त हूँ न इसलिए। ''बेस्ट फ्रेंड्स' वो मुझे सुधारती है.

तो नयी-नयी टीनएज में एंट्री ली मेरी इस बेस्ट फ्रेंड ने आज की मेरी हरारत को अचीवमेंट में बदल दिया। मुझे आदेश मिला कि आज आप बेड से नहीं हिलेंगी। और उसके बाद मेरे सामने पेश हुए उसके बनाये हुए लज़ीज़ कुरकुरे पराठे। एक-एक कौर खाते हुए जी निहाल हुआ जा रहा था. सिर्फ चार दिन हुए उसे शाम को रोटी बनाना सिखाने की प्रक्रिया में आये। रोज एक रोटी बनाने से सीखना शुरू करने वाली ने आज सामने थाली पेश की (सिर्फ पराठा अभी, सब्जी रजनी आंटी की बनायीं हुई है) तो जी लहलहा गया.

मुझे यकीन है कि अगर ये मेरा बेटा होता तो भी यही करता।

(शीर्षक माधवी से उधार )


Monday, December 28, 2015

चीज़ें माटी हैं, लम्हे हीरे के थे...


नज़र के ठीक सामने शाम का सूरज डूब रहा था. गज़ब की कशिश होती है डूबते सूरज की भी. वैसे डूबना अगर सलीके से आ जाये तो हर डूबने की कशिश लाज़वाब ही होती है. और बगैर ठीक से डूबे उगने का कोई मजा ही नहीं। बहरहाल, इस वक़्त बात डूबने की नहीं, भूलने की है. तो डूबते सूरज की कशिश को कैद करने का जी चाहा। तो देखा कैमरा नदारद। ठीहे पे चीज़ न हो तो तुरंत अपनी लापरवाही पे भरोसा पुख्ता होने लगता है, सो तुरंत दिमाग दौड़ाया कि वो तो मैं कहीं भूल आई हूँ. इस बात को काफी दिन भी हो चुके हैं. जिन दोस्तों की संगत में ये भूलने का प्रकरण हुआ उन्हें फोन लगाया। जाने क्यों जी घबराया नहीं, एकदम नहीं लगा कि खो भी सकता है. दोस्त कहीं व्यस्त था, थोड़ी देर बाद फोन लगाया, दोस्त फिर व्यस्त, तीसरी बार लगाया तो वो बोला 'कितनी लापरवाह हो, मैं सोच रहा था कि देखूं कब याद आता है?' मैंने कहा, 'दोस्त किसलिए बनाये हैं, इसीलिए न कि मेरी लापरवाहियों को सहेज लें.' हम दोनों हंस दिए.

आज ही दोपहर पार्किंग में गाड़ी लगायी और चाबी उसी में लगी छोड़कर चली गयी. लौटी तो चाबी गुम. सारी जेबें ढूंढी, न मिली। पार्किंग वाला सिक्योरिटी का बंदा आया, 'मैम चाबी ढूंढ रही हैं क्या', मैंने कहा हाँ, तो उसने चाबी दे दी.' ये दोनों घटनाएँ आज ही की हैं.

बचपन से लापरवाह हूँ. बहुत डांट खायी हूँ. स्कूल में टिफिन, पेन्सिल बॉक्स भूल आती थी तो खोया पाया विभाग संभाल देता था. थोड़ा बडी हुई तो इन्गेज़मेंट हुई और तब पहली बार अंगूठी पहनी, हफ्ते भर में गुमा दी, अंगूठी झाड़ू में माँ को मिली तीन दिन बाद. डांट मुझे अब तक मिलती है. घर में हमेशा गहना पैसा घडी सब खुला ही पड़ा रहा, कभी सहेजना आया ही नहीं। कई बार घर में हाथ बंटाने आने वाली साथी सुबह को कभी झुमका कभी पायल दिया करती। माँ की जगह वो डांटतीं, मैं हंस देती। सम्भालना सीखा ही नहीं, हाँ जिन चीज़ों को लेकर इतनी मगजमारी करनी पड़े उन्हें पहनना ही बंद कर दिया, नो गहना शहना। फिर भी खोने को बहुत कुछ था. हालाँकि कभी कुछ खो भी गया तो बहुत गम नहीं हुआ किताबें खोने के सिवा. घर की चाभियां खोने का रिकॉर्ड होगा मेरा। ओरिजिनल सर्टिफिकेट की फ़ाइल कई साल खोयी रही. लोग कहते हैं कि दुनिया बहुत ख़राब है, आँख से काजल चुरा लेते हैं लोग, मुझे तो वापस ही लौटाते मिले लोग चीजें'

फिर सोचती हूँ, अगर ऐसा है तो क्यों तमाम लम्हों को ढूंढती फिरती हूँ, तमाम बिछड़ गए लोगों को तलाशती फिरती हूँ, देखती हूँ अजनबी चेहरों की ओर कि कोई गुमे हुए सोने के बुँदे की तरह लौटाएगा कोई बीता लम्हा, कोई खो गया सा अपना कहते हुए, 'कितनी लापरवाह हो, लो सम्भालो अपनी चीज़ें, अब मत गुमाना।' लेकिन ऐसा कोई नहीं कहता।

चीज़ें जो मिल गयीं वो माटी हैं लम्हे जो गुम गये हीरा थे....

Friday, December 25, 2015

कहानियों वाला आसमान



लड़की को कहानियां सुनना पसंद था, लड़के को कहानियां कहना। वो जब मिलते तो कहानियों का एक संसार खुलता। लड़के की किस्सागोई गज़ब थी, लड़की की कहानियों की प्यास अज़ब थी. लड़के की पोटली में किस्सों का खजाना था. प्यार की कहानियां, राजा रानी की कहानियां, तोता मैना की कहानियां, नदी, जंगल, पहाड़ की कहानियां, खेत खलिहान की कहानियां, परियों की कहानियां, टूटते तारे और अधूरी इच्छाओं की कहानियां।

लड़का कहानियां खुले आकाश के नीचे ही सुनाता था. उसकी एक शर्त थी कि कहानी सुनते वक़्त लड़की को सोना मना है. लड़की का कहानी में जागना ज़रूरी था, संसार में भले ही वो सोयी हो. इसके लिए लड़की को हुंकार भरनी होती थी. लड़की कभी ठंडी सड़कों पर गर्म सांसों की आंच सेंकते हुए कहानियां सुनती, कभी नदी के पानी में झिलमिलाते चाँद को देखते हुए, कभी घंटाघर की बंद हो चुकी सुइयों के ठीक नीचे बैठकर, कभी चाय की ठेली के पास चाय सुड़कते हुए कहानियां सुनती। वो लड़के को गौर से देखती, कहानियां सुनाते हुए वो किसी फ़क़ीर सा लगता था. लड़की को कहानी सुनना इबादत में होने सा लगता। लड़की गलती से भी हुंकार भरना नहीं भूलती थी.

एक रोज लड़का उसे बिना बताये दूर देश चला गया. लड़की को कहानियों की याद बेहद सताती। वो बिना कहानी के भी हुंकार भरने की आदी हो चुकी थी. वो लड़के की तलाश में भटकती फिरती। दिन महीने साल बीते, लड़की भटकती रही. कई कहानी सुनाने वाले आये. तरह-तरह की कहानियां निकालते झोली से, तरह तरह की किस्सागोई अपनाते लेकिन लड़की को लड़के की कहानियों का इंतज़ार था. अगर कभी एक टुकड़ा नींद उसे हासिल हो भी जाता तो वो सपने में भी हुंकार भरती।

उधर लड़का रास्ता भटक चुका था. किसी ने शायद उसके रास्तों को छुपा दिया था, या रास्तों की अदला-बदली कर दी थी. वो पांव उठाता लेकिन जाने कहाँ पहुँच जाता। लड़का कहानियां भूल गया था. सपनो के साथ साथ वो नींद से भी बिछड़ गया था, जागी आँखों से नींदों का इंतज़ार करता और बंद आँखों में सिसकता। अपनी पोटली टटोटलता वहां कहानियां बची ही नहीं थीं, कुछ टुकड़े बचे थे. उन टुकड़ों को जोड़ना फिजूल था. लड़का बस चलता जाता कि कभी तो सही राह तक पहुंचेगा ही.

लड़की अब खुद की कहानियां लिखने लगी. अब उसकी कहानियों में वो सब होता जो जिंदगी में नहीं होता था. उसके सारे ख्वाब कहानी होने लगे. आज़ाद होते ख्वाब कितने हसीन होते हैं. लड़की ख़्वाबों  की आंच और सुलगाती, जिंदगी बेरहमी की आंच और बढाती। लड़की ने दुनिया के तमाम बांस के जंगलों से कलम बनने का इसरार किया। नदी उसकी आँखों में थी बस रात से रोशनाई मांगी उसने और नदी में घोल दी. कहानियां रात के आसमान पे लिखी जाने लगीं। ये कहानियां ज़माने के पढ़ने के लिए नहीं उसके खुद के जीने के लिए थीं.

आसमान में अब तारे नहीं कहानियां बसने लगीं। एक रोज नींद खो चुका लड़का आसमान ताक रहा था. अचानक उसकी बहती आँखों में मुस्कान चमकने लगी. वो अपनी खोई हुई कहानियों को देख पा रहा था. पढ़ पा रहा था. उसे अरसे बाद अपने दिल की धड़कनों की आवाज़ सुनी। अरसे बाद उसकी चाय पीने की इच्छा हुई.

लड़की धरती के एक छोर पर कहानियां लिखती जा रही थी लड़का धरती के दूसरे छोर पर कहानियां पढ़ रहा था. लड़की भूखी प्यासी, जागी सोयी बस कहानिया लिखती, कि वो जानती थी कि उसने कहानी लिखनी बंद किया और उसकी नब्ज़ थमी. वो लिखती थी क्योंकि वो जीना चाहती थी. उधर लड़का कहानियों के आसमान को ओढ़ता, बिछाता। वो जानता था कि उसकी जिंदगी ऑक्सीज़न से नहीं आसमान पे लिखी जा रही कहानियों से चल रही है. लड़का कहानी पढ़ते हुए हुंकार भरता, लड़की कहानी लिखते हुए हुंकार भरती।

एक रोज लड़का कहानी पढ़ते पढ़ते चौंक के उठा और कहानी की परीजाद के महल  की तरफ जानेवाली सड़क पे चलने लगा. परीजाद को मारने के लिए राछस निकल चुका था. शहजादा परीजाद के महल से बहुत दूर था. उस रात बहुत बारिश हो रही थी. लड़का चलता रहा, चलता रहा... लड़की की आँख लग गयी कहानी लिखते-लिखते। शहज़ादे को जिस ख़ुफ़िया रस्ते से परीजाद के पास पहुंचकर उसे बचाना था वो शहज़ादे को बताने से पहले लड़की की आँख लग गयी. लड़का भागने लगा, उसे, सिर्फ उसे ही वो रास्ता पता था, उसे परीजाद तक पहुंचना था. वो ज़ोर ज़ोर से हुंकार ले रहा था कि धरती के किसी भी कोने में नींद में लुढक चुकी लड़की तक उसकी हुंकार पहुँच सके, वो जागे, कहानी लिखे, शहज़ादे को परीजाद तक राछस से पहले पहुंचाए। लेकिन लड़की को सदियों की जाग के बाद नींद आई थी. कलम उसके हाँथ में थी, आँखों की नदी में घुली रात की सियही उसके गालों पे सूख चुकी थी. लड़के के पांव भागते जा रहे थे कि अचानक उसे ठोकर लगी. वो उठा, भागा, चिल्लाया, लड़की को जगाने की कोशिश की लेकिन राछस परीजाद तक पहुँच चुका था.

परीजाद ने शहज़ादे को बहुत पुकारा, शहज़ादा परीजाद की मदद को बहुत तड़पा लेकिन वक़्त बेरहम था. लड़की नींद में हुंकार भर रही थी, लड़का बारिश को चीरता हुआ भाग रहा था,... राछस अट्हास कर रहा था.

कहानियां  उसी रोज़ भस्म हो गयीं सारी, आसमान खाली है कहानियों से. शहज़ादा रास्ता भटक चुका है,

शहज़ादे के इंतज़ार वाली घायल परीजाद राछस का मुह तोड़ने की तैयारी कर रही है.

लड़की कब्र में गहरी नींद सोयी है. लड़का उसकी नींद के सिरहाने बैठा है, वो कहानी सुनाता रहता है, कब्र से हुंकार उठती रहती है.


Thursday, December 24, 2015

मस्तानी तो दीवानी थी लेकिन...



एक स्त्री द्वारा दूसरी स्त्री को अकेलेपन और दुखी होने के अभिशाप देने के साथ फिल्म न खुलती तो संजय लीला भंसाली के दिव्य, विराट प्रेम के शाहकार में कोई कमी आ जाती क्या? पता नहीं मेरा मन वहीँ से उखड गया था. मैं मन में 'गुज़ारिश' की सी चाह लिए गयी थी शायद। हालाँकि भंसाली के सिनेमाई वैभव, उनके  आँखों पर धप्प से गिर पड़ने वाले रंगों के विशाल संसार में गुम हो जाने के खतरों से नावकिफियत नहीं थी.

प्रेम वो चाहे जिस डगर से पुकारे पांव खिंचते जाते है सो सोचा कि चलो मस्तानी की कहानी सुनते हैं भंसाली साहब से. भंसाली उस्ताद किस्सागो हैं. वो इतिहास से कहानी उठाते हैं और दर्शकों के मुताबिक उसमें रंग भरते हैं. दीपिका और प्रियंका आमने-सामने आती हैं और देवदास की याद ताज़ा हो आती है माधुरी और ऐश्वर्या की याद.

रूपहले पर्दे पर ऐतिहासिक प्रेम खुलता है लेकिन क़टार सा धंसता नहीं कलेजे में. कोई पीड़ा, कोई जख्म, कोई संवाद पिघलकर आँखों से बहने नहीं लगता। दुःख की महीन कोपलों को दिव्य दृश्य रिप्लेस कर देते हैं. पत्नी काशी हमेशा दीयों, रंगों और ज़ेवरों में घिरी है. लेकिन मस्तानी वो तो योद्धा है. मालूम नहीं क्यों तोहफे में खुद को पेशवा के आगे पेश करने और उसकी तमाम शर्तों के आगे 'क़ुबूल है' की मुहर लगाकर ही क्यों इतिहास से प्रेम सिद्ध होते आ रहे हैं. या ऐसे ही प्रेम को इतिहास में जगह मिली हो क्या पता.

जाने कब तक, कितनी बार दूसरी पत्नी को या प्रेमिका को या तो 'रखैल' की  गाली सहनी होगी या राधा और रुक्मिणी प्रकरण में पनाह लेनी पड़ेगी। क्या सचमुच फिल्मकारों को राधा के दुःख का अंदाजा है या उसके मंदिरों में पूजे जाने में ही प्रेम की महानता को देखना काफी है.

काशी के जिस दुःख से नाना पिघल जाता है वो दुःख भंसाली दर्शकों की रगों में उतार पाने से चूक जाते हैं. मस्तानी का योद्धा रूप आकर्षित करता है लेकिन उसका प्रेम सिर्फ परदे पर ही चमकता है दिल तक नहीं उतरता।

पेशवा न्याय प्रिय है. मस्तानी का सम्मान बचाता है. उसकी सुरक्छा का ख्याल रखता है, उसे दो गांव देता है, परिवार और समाज से लड़ जाता है उसके लिए, पेशवाई से मुह तक मोड़ लेता है फिर भी जाने क्यों कुछ सवाल उठते ही हैं मन में.

अगर मस्तानी ने खुद को तोहफे में सौंप न दिया होता तो? और क्या ये कोई बात ही नहीं कि एक ही पुरुष एक ही वक़्त पे दो अलग-अलग स्त्रियों से पिता बनने की खबर सुनता है? मस्तानी को 'कटार' देकर (अपने प्रेम को स्वीकार करके) लौटते हुए कितनी बार पेशवा का दिल प्रेम से बिछड़ने के दुःख से भर उठा था? किस तरह वो मस्तानी को बिसराकर काशी के संग सहजता से अंतरंग होता है? और एक अहम सवाल कि मस्तानी अगर मुसलमान न होती तो क्या होता? तो क्या पेशवा की पत्नी काशी मस्तानी को स्वीकार लेती? क्या उसका दुःख तब कम होता?

अगर एक ही वक़्त में एक पुरुष दो स्त्रियों के साथ रिश्ते में है, तो दोनों के साथ न्याय सम्भव नहीं। किसी न किसी को दुःख होना तय है, वो दुःख पेशवा का दुःख भी था क्या? क्यो वो एक दृश्य में दिए बुझाने के साथ ही बुझता नज़र आता है? कितने ही ऐसे दृश्य थे जहाँ भाव की प्रधानता पर दृश्य की प्रधानता का कब्ज़ा दीखता है. फिल्म का अंत खासा ड्रामेटिक है. मस्तानी के बच्चे के मुह में कुछ संवाद रखकर भंसाली जरा सी नब्ज थाम पाते हैं, पल भर को.

'जो इंसान के बस में नहीं वो इश्क़ के असर में है,' 'इश्क़ इबादत है और इबादत के लिए इज़ाज़त की ज़रुरत नहीं होती' 'तुझे याद किया है किसी 'आयत' की तरह' जैसे संवाद मोहते हैं.फिल्म वाकई शानदार है लेकिन अगर ये प्रेम कहानी थी तो प्रेम मिसिंग ही लगा. तमाम तामझाम में  प्रेम ही  छूट गया हो मानो। हालाँकि प्रेम का वैभव सुनहरे परदे पर कायम रहा.

या मुझे प्रेम की समझ नहीं या भंसाली चूक गए. जानती हूँ पुरस्कार बहुत मिलेंगे आपको लेकिन मेरे लिए तो अब भी मांझी की प्रीत ही साँची है.



Tuesday, December 22, 2015

आप इसकी हड्डी तोड़ दीजिये...



(पैरेंट टीचर मीटिंग )
दृश्य-एक 
पिता(गुस्से में फुफकारते हुए )- 'मैम  आप इसकी हड्डी तोड़ दीजिये। दिमाग ख़राब है. २० में से १२ नंबर?  हद है. नाक कटा दी है इसने हमारी सोसायटी में'.
माँ - शहर के इत्ते महंगे स्कूल में पढ़ा रहे हैं. इतनी फीस दे रहे हैं. और नतीजा ये ? मैडम ये कोई बात नहीं होती।
मैम(शांत भाव से )- आप लोग ज्यादा ही परेशान हैं. बच्चा ठीक है. क्लास में अच्छा कर रहा है. नंबर भी बुरे नहीं हैं. अगली बार और अच्छा करेगा। है न बेटा?
पिता - क्या बात कर रही हैं आप? आप तो इसे और बिगाड़ रही हैं. ये अच्छे नंबर हैं ?(एक थप्पड़ बेटे को लगाते हुए. बच्चा आठवीं का है)
मैडम- अरे सर क्या कर रहे हैं. ऐसे सबके सामने बच्चे को नहीं मारते। वो अच्छा बच्चा है. आप फ़िक्र न करें। शायद एग्जाम में डर जाता होगा इसलिए नंबर कम आते हों.
पिता- डर ? डर जाता है? मर्द होकर डर जाता है ? फिर तो इसे पैदा ही नहीं होना चाहिए। कमबख्त। (गुस्से में उठ खड़े पिता बच्चे को एक और थप्पड़ लगाते हैं )
माँ- छोटा बेटा देखिये मेरा। वो देखिए कित्ते प्यार से खड़ा है. सब सब्जेक्ट में अव्वल आता है. और एक ये है.
मैडम- देखिये सब बच्चे अलग होते हैं. तुलना मत करिये। मैं संभाल लूंगी। है न बेटा ? हम दोनों मिलकर सब ठीक कर लेंगे न? (मैम बच्चे को सहेजने की कोशिश करती हैं ).
पिता- आप क्या संभाल लेंगी। हुंह। मैं मैनेजमेंट से शिकायत करूंगा आप लोगों की. बच्चो की गलत चीज़ो को बढ़ावा देते हो आप लोग. (गुस्से में क्लास से बाहर चले जाते हैं)

दृश्य- दो 
माँ- कितनी बिगड़ गयी है ये आप लोग कुछ करते क्यों नहीं? सारी कॉपी खाली पड़ी हैं?
सर- क्या करें आपकी बेटी है ही इतनी लापरवाह। कोई काम टाइम पे नहीं करती। सुनती ही नहीं।
माँ - तो आप थप्पड़ लगा दिया करो न. कित्ता पैसा फूंक रहे हैं इसके ऊपर. और ये पढ़ के ही नहीं दे रही.
सर- वाकई ये बहुत बद्तमीज है.(बच्ची से) क्या चाहती हो पीटना शुरू करूँ?
माँ- अब आप इससे पूछेंगे? मैं कह रही हूँ आपसे। ठोंकिये, पीटिए कुछ भी करिये। मुझे इसका रिजल्ट चाहिए बस.
(बच्ची क्लास सेवन की है )

दृश्य- तीन

टीचर- आपकी बेटी का ध्यान ही नहीं रहता क्लास में. मैं इसके बारे में क्या बताऊँ? नाक में दम करके रखा है इसने।
माँ(मुस्कुराकर कर )- अच्छा? ये तो बहुत अच्छी बात है।
टीचर- ये क्या कह रही हैं आप?
माँ- बिलकुल। हर सब्जेक्ट  के टीचर्स यही कहते हैं कि बड़ी सिंसियर है आपकी बेटी। सुन सुन के बोर हो गयी हूँ मैं तो. अब जबकि आप बोल रहे हैं कि  नाक में दम करके रखा है तो सुख की ही तो बात है. बच्चा नार्मल है यानी।
टीचर- अजीब माँ हैं आप? आपकी बेटी मैथ्स में फेल है फिर भी.
माँ- वो सब्जेक्ट में फेल हो तो हो जिंदगी में उसे अव्वल आना ज़रूरी है. रही बात सब्जेक्ट की तो वो नहीं मैं और आप फेल हैं. एक बात बताइये, आप मेरी बेटी के दोस्त हैं क्या?
टीचर- क्या? दोस्त? देखिये ये किताबों और फिल्मों में ही अच्छा लगता है. ३५ उजड्ड बच्चों को सम्भालना पड़े तो सब दोस्ती निकल जाये।
माँ - चलिए, आपकी मर्जी। मत बनिए दोस्त लेकिन मेरी बेटी की गणित से दोस्ती तो आपको ही करानी होगी। क्योंकि बिना विषय से दोस्ती किये कोई बच्चा उसे कैसे एन्जॉय करेगा। और बिना एन्जॉय किये नंबर तो आ सकते हैं लेकिन विषय से दुश्मनी जिंदगी भर की तय है. मुझे नंबर नहीं मेरे बच्चे की विषय से दोस्ती चाहिए। और ये तो आपको करना ही पड़ेगा।

(किसको कहाँ- कहाँ बदलना बाकी है.... सफर अभी बहुत तय करना है... )

Sunday, December 20, 2015

हिसाब किताब में गुम दिसंबर


'सुनो,' उसे पुकारती हूँ. वो सुनता नहीं।
हाथ पकड़कर हिलाती हूँ वो ढीठ की तरह वापस बही खाता खोलकर बैठ जाता है.
'सुनो न, चलो धूप में बैठकर चाय पीते हैं' मनुहार करती हूँ.
वो सर खुजाकर देखता है. उसकी आँखों में मेरी बात मानने की इच्छा नज़र आती है. वो घुटनों के बल उठने को होता है कि अचानक उसे कुछ याद आ जाता है.
'अभी रहने दो बहुत काम है' वो अनमने ढंग से कहता है.
मैं नाराज होना चाहती हूँ लेकिन मुझे हंसी आ जाती है. हंसने पर वो रूठता है.
'मजाक उड़ा रही हो?' वो भुनभुनाता है.
'मैं नहीं तुम खुद उड़ा रहे हो मजाक। ये क्या बही खाता खोल रखा है. आखिर सर्दियों की गुनगुनी धूप में साथ चाय पीने से ज्यादा ज़रूरी कौन सा काम है भला?' मैं झूठमूठ का गुस्सा दिखाती हूँ.
'पूरे बरस का हिसाब है मैडम जी।  एक एक कर ग्यारह महीने गुजर गए. इन ग्यारह महीनों की जवाबदेही मेरे ही तो सर है.' वो उदास होकर बोला।
'तुम्हें कोई हिसाब नहीं रखना पड़ता ?' उसने पूछा।
 'नहीं' मैंने मुस्कुराकर कहा.
बेचारे दिसम्बर को मेरी बात समझ नहीं आई. वो फिर से हिसाब किताब में डूब गया. 

Tuesday, December 15, 2015

शब्द भर 'ठीक'



'ठीक' कहने से पहले जांच लेना खुद को ठीक से
कि कहीं 'अ ठीक' साथ चिपक न जाये
कहे गए 'ठीक' की पीठ पर

'ठीक' को सिर्फ शब्द भर बना रहने देना
उसे अपनी मुस्कुराहटों से सजाना, संवरना


और जो इस ठीक से बचा हुआ सच है न
उदास, तन्हा, बोझिल, जख्मी
उसे मेरी हथेलियों पे रख देना।


Saturday, December 12, 2015

आगे बढ़ने की मुनादी



पीछे छूट गए रास्ते
आगे बढ़ने की
मुनादी हैं

सामने उगते हुए सूरज और
रौशनी से नहाये रास्तों की पुकार है
और पीछे तय कर चुके रास्तों से मिले सबक

जिंदगी की ओऱ बढ़ना ही
जिंदगी को गढ़ना है...

जन्मदिन मुबारक सखी!



Thursday, December 10, 2015

कुंदन



सूरज की किरणे
झील के पानी को
बनाती हैं सोना

तुम्हारा प्यार
मुझे कुंदन

Friday, December 4, 2015

साढ़े चार मिनट-दो



वो आखिरी बार था जब मां की जिंदा हथेलियों को इस तरह किसी ने अपनी हथेलियों में रखा था।
उसी रात मां मर गई।
रोज की तरह चांद गली के मोड़ वाले पकरिया के पेड़ में उलझा रहा।
मां रात को सारे काम निपटाकर सोईं और फिर जगी नहीं।
बरसों से वो उचटी नींदों से परेशान थीं। सुबह उनके चेहरे पर सुकून था। वो सुकून जो उनके जिंदा चेहरे पर कभी नहीं दिखा।

वो आता, थोड़ी देर खामोशी से बैठता, चाय पीता चला जाता।
न वो मेरी खामोशी को तोड़ता न मैं उसकी।
हमारे दरम्यिान अब सवाल नहीं रहे थे। उम्मीद भी नहीं।
लाल पूछ वाली चिडि़या जरूर कुछ उदास दिखती थी।
मां ने पक्षियों को दाना देकर घर का सदस्य बना लिया था। वो घर जो उन्हें अपना नहीं सका, उस घर को उन्होंने कितनों का अपना बना दिया।

'तो तुमने क्या सोचा?' एक रोज उसने खामोशी को थोड़ा परे सरकाकर पूछा।
मैं चुप रही।
वो चला गया।
मैं भी उसके साथ चली गई थी हालांकि कमरे में मैं बची हुई थी।

दोस्त मेरी हथेलियों को थामती। मुझसे कहीं बाहर जाने को कहती, बात करने को कहती। उसे लग रहा था कि मैं मां के मर जाने से उदास हूं।
असल में मां की इतनी सुंदर मौत से मैं खुश थी। इसके लिए मैं उसकी अहसानमंद थी।
जीवन भर मां को कोई सुख न दे सकी कम से कम सुकून की मौत ही सही।

अनार की डाल पर इस बरस खूब अनार लटके। इतने कि डालें चटखने लगीं।
लाल पूछ वाली चिडि़या फिर से गुनगुनाने लगी।
मां की तस्वीर पर माला मैंने चढ़ने नहीं दिया।
उस रोज भी कमरे में चार लोग थे।
वो, मैं दोस्त और मां तस्वीर में.
वो जो सबसे कम था लेकिन था
मैं जो थी लेकिन नहीं थी
दोस्त पिछली बार की तरह वहीं थी न कम न ज्यादा
मां कमरे में सबसे ज्यादा थीं, तस्वीर में।

'साथ चलोगी?'  उसने पूछा.
'साथ ही चल रही हूं साढे़ चौदह सालों से,'  मैंने कहना चाहा लेकिन चुप रही।
'कहां?'  दोस्त ने पूछा।
'अमेरिका....' उसने कहा
'लेकिन...' दोस्त ने कुछ कहना चाहा लेकिन रुक गई।
'यहां सबको इस तरह छोड़कर...कैसे...' दोस्त ने अटकते हुए कहा।
शायद उसे उम्मीद थी कि वो पिछली बार की तरह उसे रोक देगा यह कहकर कि, 'लेकिन की चिंता मत करो, मैं संभाल लूंगा। सब। बस भरोसा करो।'

उसने कुछ नहीं कहा। मैं मां की तस्वीर को देख रही थी।
'हां, मैं भी वही सोच रहा था।' उसने आखिरी कश के बाद बुझी हुई सिगरेट की सी बुझी आवाज में कहा।
'आपका जाना जरूरी है?'  दोस्त राख कुरेद रही थी।
वो खामोश रहा।
चांदनी अनार के पेड़ पर झर रही थी।
'हां,'  उसने कहा। दोस्त उठकर कमरे से चली गई। शायद गुस्से में। या उदासी में।
अब कमरे में तीन लोग थे मैं वो और मां।
'तुमने मेरी मां को सुख दिया,'  कहते हुए मेरी आवाज भीगने को हो आई।
'तुम्हें भी देना चाहता था...' उसने कहा।
मेरे कानों ने सिर्फ 'था' सुना...

वो बिना ये कहे कमरे से चला गया कि 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा।'
न मैं यह कह पाई कि 'उम्र भर उसे न देख सकने का रियाज कर रही हूं...'

बच्चे अपने-अपने कमरे में सोने की कोशिश कर रहे थे।

Tuesday, December 1, 2015

साढ़े चार मिनट


कमरे में तीन ही लोग थे। वो मैं और एक हमारी दोस्त...। तीनों ही मौन थे।
मैं वहां सबसे ज्यादा थी या शायद सबसे कम।
वो वहां सबसे कम था या शायद सबसे ज्यादा।
दोस्त पूरी तरह से वहीं थी।
मैं खिड़की से बाहर देख रही थी।

सब खामोश थे। यह खामोशी इतनी सहज थी कि किसी राग सी लग रही थी। मैं खिड़की के बाहर लगे अनार के पेड़ों पर खिलते फूलों को देख रही थी। जिस डाल पर मेरी नजर अटकी थी वो स्थिर थी हालांकि उस पर अटकी पत्तियां बहुत धीरे से हिल रही थीं।

उन पत्तियों का इस तरह हिलना मुझे मेरे भीतर का कंपन लग रहा था। मुझे लगा मैं वो पत्ती हूं और वो...वो स्थिर डाल है। डाल स्थाई है। पत्तियों को झरना है। फिर उगना है। फिर झरना है...फिर उगना है।

'मुझे मां से बात करनी है...' वो बोला।

उसके ये शब्द खामोशी को सलीके से तोड़ने वाले थे।
मैं मुड़ी नही। वहीं अनार की डाल पर अटकी रही।
दोस्त ने कहा, 'अच्छा, कर लीजिए।'
'क्या वो यहीं हैं...?'  उसने पूछा।
'हां, वो अंदर ही हैं।'  बुलाती हूं।

कुछ देर बाद कमरे में चार लोग थे। मां मैं वो और दोस्त।
मैं अब भी खिड़की के बाहर देख रही थी।
'आप अंकल से बात कर लीजिए...' उसने मां से कहा।
मां चुप रहीं।

'लेकिन...' दोस्त कुछ कहते-कहते रुक गई।
'किसी लेकिन की चिंता आप लोग न करें...मैं सब संभाल लूंगा। सब।'
उसने मां की हथेलियों को अपने हाथों में ले लिया।
दोस्त ने कहा, 'फिर भी।'
'परेशान मत हो। यकीन करो। बस।' उसने बेहद शांत स्वर में कहा।
कमरे में मौजूद लोगों की तरफ अब तक मेरी आधी पीठ थी। अब मैंने उनकी तरफ पूरी पीठ कर ली ताकि सिर्फ अनार के फूल मेरे बहते हुए आंसू देख सकें।
मां कमरे से चलीं गईं...दोस्त भी।

वो मेरे पीछे आकर खड़ा हुआ। अब वो भी कमरे के बाहर देख रहा था। शायद अनार के फूल...या हिलती हुई पत्तियां। कमरे में कुछ बच्चे खेलते हुए चले आए। उसने बच्चों के सर पर हाथ फिराया...बच्चे कमरे का गोल-गोल चक्कर लगाकर ज्यूंयूयूँ से चले गए।

अब कमरे में वो था और मैं...बाहर वो अनार की डाल...
उसकी तरफ मेरी पीठ थी....उसने कहा, 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा है...'

गहरी सर्द सिसकी भीतर रोकने की कोशिश अब रुकी नहीं।
अनार की डाल मुस्कुरा उठी।
'सिर्फ साढ़े चार मिनट नहीं, साढ़े चौदह साल...' मैंने कहा...

उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया।
हम दोनों अनार की डाल को देखने लगे...
बच्चे फिर से खेलते हुए कमरे में आ गए थे...उसने फिर से उनकी पीठ पर धौल जमाई...

(लिखी जा रही कहानी का अंश )

Monday, November 30, 2015

संसार कोई 'तमाशा' लगता है...



प्रेम क्या है? अच्छा होना क्या है? व्यवस्थित होने के मायने क्या हैं आखिर?

प्रेम का मूल काम हमारे अंतस को रोशन करना है। हम जहां हैं, जिस तरह के हम हैं, वहां से उठाकर हम आगे ले जाना है।

जीवन में अनचाहे आ गये स्थगन को घिस-घिसकर मिटाना और उसे सक्रियता की ओर ढकेलना है। प्रेम नहीं था तो था एक सभ्य] सुसंस्कृत शांत जीवन. वक्त पर उगने वाली सुबहें, वक्त पर ढल जाने वाली रातें...
प्रेम नहीं था तय वक्त पर आ जाती थी गाढ़ी गहरी नींद, सुबह ठीक वक्त पर खुल भी जाती थी। मार्निग वॉक थे, अखबार थे। थोड़ा वक्त पापा का थोड़ा पत्नी और बच्चों का।वीकेंड्स की आउटिंग्स थी कभी दोस्तों के साथ मौज-मस्ती भी।

प्रेम नहीं था तो मन लगाकर काम होता था, बॉस खुश रहता था। प्रेजेंटेशन लल्लन टॉप होते थे और इनीक्रेमेंट मुस्कुराते हुए आते थे अकाउंट में।

सब कुछ कितना सधा हुआ था जीवन में...सब कुछ।

और एक दिन प्रेम हुआ...

लड़के ने वो सब किया जो प्रेम में एक प्रेमी को करना चाहिए। गिफ्ट दिये, डिनर किये, फिल्में देखीं, चुुंबनों का आदान-प्रदान भी। कभी-कभार कुछ आगे भी गये...पर लड़की कहती रही कि तुम नहीं हो...क्यों नहीं हो...कहां गुम हो गये तुम...?

लाख समझाया लड़के ने, 'अरे मैं हूं ना? देखो तुम्हारे सामने...तुम्हारा हाथ थामे बैठा तो हूं। तुम्हारी हर कॉल उठाता हूं, तुम्हारी हर आवाज पर दौड़कर आ जाता हूं...यही तो हूं मैं..' .वो कहती, 'नहीं...तुम नहीं हो...क्यों नहीं हो तुम...कहां गुम हो गये तुम...'

लड़का फिर समझाता अरे, 'मैं यही तो हूं...' वो कहती रही कि' तुम क्यों नहीं हो...' अब झल्लाहट होने लगी. ये क्या रट है कि 'तुम कहां हो, क्यों गुम हो गये.'

एक रोज लड़के ने उसे जाने को कह दिया...
वो रोती रही...लड़का चलता चला आया...लेकिन क्या वो  आ पाया?

ये कैसा प्रेम है जो सब तहस-नहस कर देता है, अच्छी खासी जिंदगी की वाट लगा देता है। भूख-प्यास, नींद काम सब रुक जाते हैं। मुस्कुराहटें अधूरी सी लगती हैं, सारा संसार कोई तमाशा लगता है...

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इम्तियाज, तुम कमाल हो, बस एक बात कहनी है तुमसे कि सबके जीवन में वो एक  भी नहीं होता जो उसे स्पेशल फील कराये...

सबको अपनी कहानी के अंत तक खुद ही पहुंचना होता है कदम-कदम चलकर...इसका कोई शॉर्टकट नहीं बावजूद इसके कि सारी कहानियां एक सी ही तो होती हैं...

सिनेमा पर किसी कविता को झरते हुए देखने का सुख है तमाशा, अपने भीतर गुड़प गुड़प करके गोते लगाना है तमाशा, कैमरे के अंदर से झरते किन्हीं म्यूजिकल नोट्स को आंखों से सुनने का अनुभव है तमाशा...

(तमाशा- प्रेम के उच्चतम से संसार के न्यूनतम तक...)


Thursday, November 26, 2015

विवाह संस्था पर सवाल तो हैं



'शादी जब पुरानी हो जाती है तो वो सड़ने लगती है। उसमें से बदबू आने लगती है।' फिल्म इज़ाजत का यह संवाद अक्सर दूसरे अल्फाजों में दूसरे हालात में कानों से टकराते रहते हैं। जिस प्रेमी का हाथ थामकर दुनिया हसीन हो उठती है, जिसकी एक मुस्कुराहट पर जां निसार करने को जी चाहता है, जिसके एक आंसू पर विकल हो उठते हैं जिसके बिना एक पल भी जीना दुश्वार होता है उसी प्रेमी के साथ विवाह करने के बाद ऐसा क्या हो जाता है कि दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता रिसने लगता है। न भी हो प्रेम विवाह, अरेंज्ड मैरिज में भी तो लगभग ऐसा ही होता है न? शादी जैसे भी हुई हो शुरुआती दौर में जोर से लहलहाती है, खिलखिलाती है, चहचहाती है। दो मासूम लोग, विपरीत लिंग का आकर्षण, ढेर सारी आजादी। मानो पंख लग जाते हैं। फिर धीरे-धीरे कपूर सा उड़ने लगता है प्यार। दो जन खुशबू पकड़ने को बेताब हो उठते हैं। सारी ताकत लगा देते हैं। खुशबू उड़ती ही जाती है। बेचैनी बढ़ती जाती है। एक दूसरे पर आरोप, शिकायतें, नाराजगी, जो किया जो नहीे किया उसका हिसाब-किताब और अंत में एक सूखी टहनियों वाले पेड सा रिश्ता जिसकी टहनियों पर रस्मो-रिवाज, जिम्मेदारियां, चिड़चिड़ाहटें टंगे हुए उसे बदसूरत बनाते नज़र आते हैं।

जो जरा भी जिंदगी में, रिश्तों में डेमोक्रेटिक होने पर यकीन करता है, जो सोचता है कि रिश्तों की खुशबू कपूर सी उड़ जाने वाली नहीं ठहर जाने वाली होने चाहिए वो शादी के नाम पर घबराने लगता है। लड़कियां हों या लड़के दोनों ही। शायद ऐसे ही सवालों, घबराहटों के बीच से लिव इन रिलेशनशिप की राह निकालने की कोशिश की गई होगी। मतलब साफ है, साथ रहने में दिक्कत नहीं लेकिन शादी में है। क्यों है ऐसी शादी जो है भी जरूरी और जिसमें सुकून भी नहीं। 

क्यों शादी होते ही दो लोग एक दूसरे पर औंधे मुंह गिर पड़ते हैं। पूरी तरह अपने वजूद समेत ढह जाते हैं। दूसरे के वजूद को निगल जाने को आतुर हो उठते हैं। क्यों स्त्रियां चाहे वो कितनी ही पढ़ी-लिखी या नौकरीपेशा हों एक पारंपरिक सांचे में ढलते हुए देखी जाने लगती हैं और वे स्वयं ढलने भी लगती हैं। क्यों पुरुष भी एक मर्दवादी सोच से अनचाहे ही सिंचित होने लगते हैं और बच नहीं पाते और पत्नी को सुरक्षा देने और उन पर अपना अधिकार समझने के कन्फ्यूजन में।

आज जब विवाह संस्था पर सवाल उठने लगे हैं तो जरा यह समझने की भी जरूरत है कि वो क्या चीज है जो शादी जैसे रिश्ते को सवालिया कठघरे में खड़ी कर रही है। कितने बरसों का साथ से ज्यादा जरूरी है समझना कि वो साथ कितना सुंदर और मीठा था। शादी की 50वीं सालगिरह मनाना, सामाजिक उत्सवों में ग्रुप फोटों में मुस्कुराते हुए नजर आना, फेसबुक पर अपने प्रेम के इजहार वाली तस्वीरें चिपकाना अलग बात है और एक खुशनुमा, भरोसे से भरा, सम्मान से भरपूर, एक-दूसरे को समझने वाला रिश्ता जीना और ही बात है। क्यों शादी ऐसा रिश्ता अक्सर बनते-बनते रह जाती हैं जिसमें दो लोग एक साथ उग रहे हों, बढ़ रहे हों और एक साथ महक रहे हों। 

आखिर शादियों में स्पेस क्यों नहीं होता। क्यों दो लोग एक-दूसरे पर शुरुआत में प्यार के नाम पर टूट पड़ते हैं और बाद में एक-दूसरे से असहनीय तरह से चिढ़ने लगते हैं। पति और पत्नी अनजाने ही किस तरह एक-दूसरे के प्रति प्यार में आकंठ डूबे होते हुए ही आक्रामक होने लगते हैं उन्हें पता नहीं चलता। उन्हें यह पक्का यकीन हो चुका होता है कि उनके साथी की खुशी की सारी वजहें सिर्फ और सिर्फ उससे ही होनी चाहिए। अगर उसके पास दुखी होने या खुशी होने की कुछ अपनी निजी वजह हैं तो यह बात बेहद बेचैन करती है उन्हें। ”तुम खुश हो लेकिन तुम्हारी खुशी की वजह मैं तो नहीं हूं ना। यह बात मुझे चैन से रहने नहीं देती।” ऐसी पीड़ाएं उभरती हैं। 
यह रिश्ता अगर समाज, परंपराओं और रीति रिवाजों की भेंट न चढ़ा होता, अगर दो व्यक्तित्व सामाजिक परवरिश के चलते एक समर्पण और दूसरा अधिकार की चाह लिए न बढ़े होते, अगर दो लोगों के रिश्तों में, उनके जीने के ढंग में हर वक्त कोई अपनी नाक न घुसा रहा होता तो शायद विवाह संस्था का रूप कुछ और ही होता। समानता और सम्मान की भावभूमि पर खड़ा रिश्ता तां उम्र महकता रहता। समाज ने विवाह संस्था की नकेल अपने हाथ में ले रखी है वो दो लोगों के बेहद निजी पलों को निजी भावनाओं को भी नियंत्रित करता रहता है। वो नकेल विवाह संस्था को तो बचा लेती है लेकिन उसमें होने वाले प्रेम को खा जाती है। 

निकोलाई चेर्नीस्कोवेस्की के उपन्यास की वेरा याद आती है जो विवाह को एक खुले स्पेस और पूरी आजादी सम्मान और प्रेम के साथ जीना जानती है। जबरन एक साथ होने या सोने की जिद, जुनून या दबाव से बहुत दूर...हंसता मुस्कुराता रिश्ता जिसका आधार सिर्फ एक-दूसरे का सम्मान और प्यार है। एक-दूसरे पर अटूट भरोसा है। 

प्रकाशित 

Saturday, November 14, 2015

जो छूट जाता है वही हासिल है...


जाने कब किससे सुना था कि दीवारों से घर नहीं होता, उसमें रहने वाले लोगों से होता है...अच्छा लगा था सुनना। लेकिन सच्चा नही। क्योंकि दीवारों, खिड़कियों, रास्तों का अपनापन भी बहुत महसूस किया है। लौटकर आने पर ताला खोलते वक्त ऐसा नहीं लगता कि यहां किसी को मेरा इंतजार नहीं था। मानो इस घर के कोने-कोने को मेरा इंतजार रहता है। घर के पर्दे, दीवारें, खिड़कियां, सोफे पर आधी पढ़कर छूटी हुई किताब, दरवाजे के बाहर लगा अखबारों का ढेर...पानी के लिए पड़ोसी की छत पर पहुंचाये गये पौधे...सुबह दाना खाने आने वाली चिड़िया, कबूतर, तोते...सब तो बाहें पसारे इंतजार करते मिलते हैं। अपने कमरे की महक, सिरहाने लटका चार्जर, जल्दबाजी में आधा उलटा रह गया डोरमैट, ठीक से न बंद हुई तेल की शीशी, छूटा रह गया एक छोटा सा जाला सब जैसे किसी लाड़ से देखते हों। जाते वक्त की हड़बड़ी में भी जाने के ठीक पहले दो पल को ठहरना और सांस भर घर को जीना जैसे आदत हो...।

इस कदर जज्ब करने की इतनी सी मोहलत कभी जिंदगी ने नहीं दी, इश्क ने भी नही...।

मालूम होता है दीवारें सांस लेती हैं मेरे साथ, कभी तेज कभी मध्धम। इन दीवारों ने मुझे उस तरह संभाला है जिस तरह कोई आत्मीय दोस्त संभालता है, बिना सवाल किये, बगैर तर्क किए, बिना कठघरे में घेरे। मुठ्ठियों के प्रहार और गुस्से के भीतर छुपे प्यार को सहेजते हुए।

कितना गुस्सा उतरा इन दीवारों पर...कितनी रातों को इनसे बातें करते हुए रातें गुजारीं...खिड़की से बाहर झांकते कभी तो कभी छत पे टंगे पंखे पर अपनी आंखें टांगकर भी। कितनी बार अपनी खुशियां भी उछालीं इन दीवारों के भीतर...तब धीमे से मुस्कुराते हुए भी देखा इन दीवारों को...लोगों से गले लगकर प्यार जताते हुए कभी खुद को पूरी तरह सौंप दिया हो याद नहीं। कभी-कभार मां के कंधे पर समूचा लुढ़क जाने को जी चाहा जरूर लेकिन वो इच्छा भी समेट ही ली। लोगों को मिलते वक्त, बिछड़ते वक्त रोते हुए देखना सहज लगता है, शायद उनकी मुलाकातें, या बिछोह हल्के हो जाते हांेगे, तरल होकर उनका भारीपन बह जाता होगा... मैं ऐसा कभी कर नहीं पाई। मेरा कुछ भी शिद्दत से महसूसना एकांत मांगता है। उस वक्त दीवारें ही होती हैं आसपास।

इन दीवारों के पास वो सब है जो व्यक्ति के पास नहीं, रिश्तों के पास नहीं। छूटते लम्हों और लोगों से बिछड़ते वक्त जो नमी बचा लाये थे न हम वो इन दीवारों के साये में महफूज है। जो छूट जाता है असल में वही हासिल है...


Thursday, October 29, 2015

मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं


गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारों, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

जो हमपे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरे आक़बत सँवार चले

कभी तो सुबह तेरे कुंज-ए-लब्ज़ हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-ए-बार चले

मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले.

- फैज़ अहमद फैज़

Tuesday, October 27, 2015

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमें न मौका सिसकी का



वो काम भला क्या काम हुआ जिसका बोझा सर पे हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसका चर्चा घर पे हो

वो काम भला क्या काम हुआ जिसमे साला दिल रो जाये
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जो आसानी से हो जाये

वो काम भला क्या काम हुआ जो मजा नहीं दे विह्स्की का
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमें न मौका सिसकी का

वो काम भला क्या काम हुआ जिसकी न शक्ल इबादत हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसकी दरकार इज़ाज़त हो

वो काम भला क्या काम हुआ जो कड़वी घूँट सरीखा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमे सब कुछ मीठा हो

- पियूष मिश्र


Thursday, October 22, 2015

हिज्र की शब और ऐसा चांद

पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चांद

मेरी करवट पर जाग उठे
नींद का कितना कच्चा चांद

सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद

रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चांद...

- परवीन शाकिर 

Tuesday, October 20, 2015

पूर्णता अभिशाप है


एकांत बड़ी महफूज जगह है. बाहरी एकांत नहीं, भीतर का एकांत। गहन एकांत। उदासी के सबसे कीमती ज़ेवर उसी लॉकर में रखे होते हैं. उदासियाँ जब इश्तिहार सी होने लगती हैं तो उनकी आत्मा पे सलवटें सी पड़ने लगती हैं. उन्हें बचा के रखना ज़रूरी है. सहेज के.

ज़माने भर में कोहराम मचा है, सब कह रहे हैं, मैं भी कह रही हूँ. इन दिनों कुछ ज्यादा ही कह रही हूँ. लेकिन सोचती हूँ सुन कौन रहा है. मौन एक कोलाहल में तब्दील हो चुका है. कहते कहते थक जाना, सोते सोते जग जाना। सांसों की आवाजाही पे कान धरके घटती बढ़ती उसकी लय को पकड़ने की कोशिश करना।

इस एकांत में सबसे ज्यादा जो काम होता है वो खुद को खारिज करने का होता है. मुझे शोर अच्छा नहीं लगता। मैं अपनी ही आवाज से डरने लगी हूँ. ऐसे गहन एकांत में सांस की लय भी साफ़ सुनाई देती है. एकदम साफ़.

मुझे नींद आ रही है लेकिन जानती हूँ जैसे ही आँखें बंद होंगी नींद गायब हो जाएगी। कभी कभी यूँ लगता है कि मैं अपनी देह की कब्र में जागती हुई कोई लाश हूँ. मिटटी में दबी मिटटी। अँधेरे में दफ़न अँधेरा। रौशनी की उम्मीद बेमानी है. अजीब बात है कि दफ़न होकर भी चैन नहीं है.

चैन होता क्या है आखिर? सोचती हूँ कब था चैन जीवन में. जब कोई लम्हा वक़्त की शाख से टूटकर गिरने को हुआ था और हमने अपना आँचल फैला दिया था. वो टूटकर गिरना मुक़्क़मल नहीं हुआ, न हसरत से तकता इंतज़ार, लेकिन वो जो अधूरापन था, वो चैन था शायद।

किसी इच्छा का पूरा होना कुछ नहीं होता, इच्छा का होना सबकुछ होता है. उस इच्छा के होने में ही जीवन है, चैन है, शांति है. पूर्णता अभिशाप है.


Saturday, October 17, 2015

चुप रहना गुनाह है


चीखो  दोस्त
कि इन हालात में
चुप रहना गुनाह है

चुप भी रहो दोस्त
कि लड़ने के वक्त में
महज बात करना गुनाह है

फट जाने दो गले की नसें
अपनी चीख से
कि जीने की आखिरी उम्मीद भी
जब उधड़ रही हो
तब गले की इन नसों का
साबुत बच जाना गुनाह है

चलो दोस्त
कि सफर लंबा है बहुत
ठहरना गुनाह है

कहीं नहीं जाते जो रास्ते
उनपे बेबसबब दौड़ते जाना
गुनाह है

हंसो दोस्त
उन निरंकुश होती सत्ताओं पर
उन रेशमी अल्फाजों पर
जो अपनी घेरेबंदी में घेरकर, गुमराह करके
हमारे ही हाथों हमारी तकदीरों पर
लगवा देते हैं ताले
कि उनकी कोशिशों पर
निर्विकार रहना गुनाह है

रो लो दोस्त कि 
बेवजह जिंदगी से महरूम कर दिये गये लोगों के
लिए न रोना गुनाह है.

मर जाओ दोस्त कि
तुम्हारे जीने से
जब फर्क ही न पडता हो दुनिया को
तो जीना गुनाह है

जियो दोस्त कि
बिना कुछ किये
यूं ही
मर जाना गुनाह है....

Tuesday, October 13, 2015

लौटाया जाना जरूरी है


हालांकि लौटाये जाने पर भी
सब कुछ लौटता नहीं फिर भी
उधार की चीजें लौटाया जाना जरूरी है

नहीं लौटता वो रिश्ता
जो चीजों की उधारी के दरम्यिान
कायम हो जाता है
हमारी जरूरतों से

पढ़ी हुई किताबों के लौटाये जाने पर
नहीं लौटते पढ़े हुए किस्से
किताब के पन्नों पर चिपकी,
मुड़ी ठहरी हमारी नजर
हमारी उंगलियों की छुअन...
देर तक उसका सीने पे पड़े रहना
किताब के पन्नों में भर गई हमारी ठंडी सांसें

मांगी गई स्कूटर लौटाये जाने पर
वापस नहीं लौटता वो सफर
जो उधारी के दौरान तय किया गया हो
उधार के स्कूटर पर बैठकर मिलने जाना महबूबा से
उसका सहमकर बैठना पीछे वाली सीट पर
रास्ते में सफर के दौरान उग आये नन्हे स्पर्श
और रक्ताभ चेहरा, सनसनाहट
नहीं लौटती स्कूटर लौटाने के साथ...

महंगे चाय के कप लौट जाते हैं पड़ोसियों के
लेकिन नहीं लौटती उन कपों को ट्रे में रखकर
लड़केवालों के सामने ले जाने की पीड़ा
और भीतर ही भीतर टूटना कुछ बेआवाज

लौटाये गये म्यूजिक एलबम के साथ
नहीं लौटता उम्र भर का वो रिश्ता
जो सुनने के दौरान कायम हुआ
उस संगीत से

लौटाये जाने पर नहीं लौटते वो आंसू
जो उधार के सुख से जन्मे थे

फिर भी उधार ली हुई चीजों का
लौटाया जाना जरूरी है...


Sunday, October 11, 2015

प्यार का पता नहीं लेकिन...



हम दोनों ही अपने रास्ते खो चुके थे
और नए रास्ते तलाश रहे थे

हम दोनों बहुत थक गए थे
लेकिन हारे नहीं थे

हम दोनों उदास थे
और मुस्कुराहटें ढूंढ रहे थे

हमारी त्वचा पे उभर आई झुर्रियों में
किसी रिश्ते का नाम नहीं था

हम दोनों खो गए थे खुद से
लेकिन एक-दुसरे को थामे हुए थे

हमारे भीतर थोड़ी सी मृत्यु शेष थी
और एक पूरा जीवन

प्यार का पता नहीं
लेकिन कुछ था हमारी हथेलियों में
रेखाओं के अलावा...

Tuesday, October 6, 2015

अंतिम छोर पर



मैं अपनी भावनाओं के अंतिम छोर पर खड़ी हूं। न मुझे अब अंदर से कुछ महसूस होता है न बाहर से। अगर संक्षेप में कहूं तो मैं एक पुरानी घिस चुकी किसी स्वचालित मशीन के जैसी हो चुकी हूं। रोजमर्रा की जरूरतों की फेहरिस्त ने मेरे दिमाग को खत्म कर दिया है। मैं मेयुडन और विज्नोरी में एक आम गृहिणी की जिंदगी जी ही चुकी हूं। घर के सारे काम करना, अब भी वही कर रही हूं। घर के सारे काम जो मुझे आते हैं, मुझे नहीं आते हैं सब। जो मुझे एकदम पसंद नहीं। हर वक्त घर के कामों में, चिंताओं में उलझे रहना, सुबह से रात तक बस खटते रहना...मैं यह सब कर रही हूं। चाहते न चाहते...मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। बस जो काम मैं नहीं कर पा रही हूं वो यह कि मैं हफतों कुछ लिख नहीं पाती हूं....लेकिन कौन इसे जरूरी काम समझता है...कौन...

- मरीना त्स्वेतायेवा  की डायरी, १९३१ 

Sunday, September 27, 2015

क्या लौट आया है मोहब्बत का मौसम...



मैं कौन हूँ. मेरे चेहरे से जो नाम जुड़ा है वो किसका है. मेरे गले में पड़ी नाम की तख्ती पे क्या दर्ज है आखिर। इन उँगलियों की पोरों से किसका नाम लिखती रहती हूँ बेसाख्ता. ये किसके नाम की पुकार पे चौंक जाती हूँ. ये किसकी सांस है जिसे मैं सहती हूँ. ये रास्ते किसने बिछाये हैं जिन पर बेतहाशा भागते जाना, भागते जाना है. ये गुमसुम से पड़े ख्वाब किसके हैं. इन आँखों में छुपी बदलियाँ कहाँ से आयीं आखिर इनको कौन सी धरती चाहिए बरसने को. ये जो शोर का समंदर है, शब्दों का ढेर इसके पीछे छुपा मौन इस कदर जख्मी क्यों है आखिर। इतने लोगों के बीच तन्हाई क्यों है आखिर। तन्हाई के सीने में ये सिसकियों का सैलाब कहाँ से आया. कौन छोड़ गया होगा अपने क़दमों की चाप जिसपे उग आई हैं उदासी की सदाबहार बेल. मौसम सर्द हो चला है, आसमान थोड़ा और करीब आ गया है, चौदस का चाँद खिड़की से झांकते हुए क्यों अनमना सा दीखता है आज. अपने दुपट्टे में खुद को लपेटते किसको ढूंढ रही हूँ आकाश में.

क्या फिर से लौट आया है मोहब्बत का मौसम कि खुलने लगे हैं कुछ मीठे से दर्द भी. सवाल तन्हा हैं बहुत, 

Saturday, September 19, 2015

रवीश के साथ होना है अपने साथ होना...



रवीश आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं, आपकी रिपोर्ट बहुत अच्छी होती है, रवीश आपकी बेबाकी को लेकर चिंता होती है आपकी, ऐसा कहने वाले हैं बहुत सारे लोग हैं लेकिन क्या होता है इससे। क्यों इस अच्छा लिखने वाले को सोशल मीडिया से हट जाना पड़ता है? क्यों लोकतंत्र के नाम पर फैलती जा रही अराजकता का मुंहतोड़ जवाब देने को एकजुट नहीं होते हम? रवीश ने अच्छा लिखने, खरा बोलने का ठेका अपने परिवार की सुरछा, अपने चैन की कीमत पर लिया है क्या? और हम? हमारी भूमिका क्या है आखिर? सिर्फ इतना कह देना कि आप अच्छा लिख रहे हैं से बात नहीं बनेगी। सोशल मीडिया हो या कोई और जगह मुंहतोड़ जवाब देना होगा। देना ही होगा।

पहले मेरी और रवीश जी की काफी लम्बी बातचीत हुआ करती थी. उनकी चिंताओं में तब भी यही हुआ करता था, अच्छा कह देना काफी नहीं अगर उसे सुनने, देखने, पढ़ने के बाद कुछ बदलाव ही न हो. रवीश प्रशंसाओं की दरकार नहीं रखते, अभिभूत नहीं होते लेकिन उनका सम्मान करते हैं. लेकिन वो चाहते हैं कि प्रशंसा हो या न हो बदलाव हो. आज भी उनकी चिंता यही है कि सही मुद्दे को जगह मिले उस पर बात हो। और देखिये सही मुद्दे की हिमायत करते-करते उन्हें कितना कुछ झेलना पड़ रहा है.

वो अपना काम ज़रुरत से ज्यादा ही ठीक ढंग से कर रहे हैं. अब हमें भी करना है अपना काम. सोशल मीडिया के अराजक तत्वों को मुंह तोड़ जवाब देना होगा। एक पत्रकार के तौर पर वो अपना कर रहे हैं, अब हमारी बारी है.… ये फासीवाद का जो नया रूप सोशल मीडिया पर अवतरित हुआ है इसका जवाब देना ही होगा वरना ये कहने का कोई अर्थ नहीं कि रवीश आप अच्छा काम कर रहे हैं. सवाल ये है कि हम क्या कर रहे हैं? 


Friday, September 18, 2015

प्यार - 4



जैसे फूल के इर्द-गिर्द
बुन जाता है कोई जाला

वैसे ही प्रेम के इर्द गिर्द
जमा हो जाती है थोड़ी सी उदासी...


Thursday, September 17, 2015

प्यार - ३



राख समझकर छोड़ गए जो
सारे फूल वहीँ खिले

मौन समझकर लौटे जहाँ से
सारे शब्द वहीँ उगे

पतझड़ समझकर झाड़ा किये जिसे
सारे मौसम वहीँ खिले

बंद गली ने रास्ता रोका
सारे रास्ते वहीँ मिले 

प्यास जहाँ पे अटकी, भटकी
सारे झरने वहीँ झरे

तय किये फासले जितने ही
उतने और करीब हुए.… 


Tuesday, September 15, 2015

प्यार -2



रंग थे
खुशबू थी
तितलियाँ नहीं

बादल थे
बारिश थी
धरती नहीं

रास्ता था
राहगीर थे
मंज़िल नहीं

स्वर थे
साज थे
संगीत नहीं

रात थी
ख्वाब थे
नींद नहीं

तुम थे
हम थे
प्यार नहीं...


प्यार



उसने मुझे आवाज दी
मैंने आवाज सुनी
शब्द नहीं

मैंने उसे आवाज दी
उसने शब्द सुने
आवाज़ नहीं

हम दोनों एक दूसरे की तरफ बढे
लेकिन पहुंचे नहीं।





Saturday, September 5, 2015

इससे कम पे अब बात बनेगी नहीं...


बहरी सत्ताओं के कानों में
उड़ेल देना हुंकार

भिंची हुई मुठ्ठियों से तोड़ देना
जबड़ा बेशर्म मुस्कुराहटों का

रेशमी वादों और झूठे आश्वासनों के तिलिस्म को
तोड़ फेंकना
और आँखों से बाहर निकल फेंकना
जबरन ठूंस दिए गए चमचमाते दृश्य

देखना वो, जो आँख से दिखने के उस पार है
और सुनना वो
जो कहा नहीं गया, सिर्फ सहा गया

जब हिंसा की लपटें आसमान छुएं
तुम प्रेम की कोई नदी बहा देना
और गले लगा लेना किसी को जोर से

अँधेरे के सीने में घोंप देना रौशनी का छुरा
और दर्ज करना मासूम आँखों में उम्मीद

हाँ, ये आसान नहीं होगा फिर भी
इससे कम पे अब बात बनेगी नहीं।

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ठोंक दो कीलें हथेलियों में
खींच लो जबान हलक से 
जोर से करो वार रीढ़ की हड्डी पर
नाखूनों में खप्पचियां घुसा दो
तोड़ दो सर पे ढेर सारी कांच की बोतलें
तेज़ाब की नदी बहा दो जिस्म पर
कोड़ों से पीठ छलनी कर दो
आओ हत्या ही कर दो तुम मेरी
बस कि हमारी बेबसी है कि नहीं बन सकते समझौतापरस्त
और तुम्हारी बेबसी कि नहीं हिला सकते फौलादी इरादों से हमें...


Thursday, September 3, 2015

कितनी टूटन है अंदर भी बाहर भी

नींद के दरवाजे पर एक भयावह ख्वाब की दस्तक होती है। मैं डर जाती हूं। वो ख्वाब इन दिनों मुसलसल दिक किये है. उसके डर से नींद से छुप जाना चाहती हूं।  चादर को और कसकर लपेट लेती हूं। आंखें बंद कर लेती हूं लेकिन सोती नहीं। उस ख्वाब की  दस्तक बढ़ती जाती है।

मैं सोचती हूं कि चादर के भीतर मैं सुरक्षित हूं। बंद आंखों के भीतर के अंधेरे मुझे छुपा लेंगे।  हालांकि जानती हूं कि बचना आसान नहीं है। वो कभी भी, कहीं भी दबोच लेता है। उसे तो नींदों का भी इंतजार नहीं होता। जागती आंखों में भी आ बैठता है। मेरा तमाम आत्मविश्वास उस भयावह ख्वाब के आगे पस्त हो जाता है। रात के दो बज रहे हैं और मैं कभी फोन को उलट-पुलट रही हूं कभी अपना ध्यान हटाने को कोई पुरानी याद चुनना चाहती हूं।

तकिये के नीचे दाहिनी तरफ मैं सबसे मीठे ख्वाब रखती हूं। और बांयी तरफ उदास जागे हुए पल। बांयीं तरफ का तकिया अक्सर भीगा रहता है। अपनी तरकीब लगाकर मैं दाहिने को बांयी तरफ करके उस गीलेपन को सोखने का प्रयास करती हूं। लेकिन कभी भी कर नहीं पाती। जब मेरी आंख लग जाती है तो मेरी तकिये के नीचे काफी उथल-पुथल होती है।

नींद की ड्योढ़ी पर भयावह ख्वाब की दस्तक बढ़ती जाती है  लगातार... लगातार.... मैं जानती हूं उस ख्वाब की तासीर को। उसके पास मत्यु है। मत्यु से उपजा भय है। ढेर सारी लाशों के ढेर के बीच मैं अकेली...गलती से जीवित बच जाने के दंश को भुगतती। कोई नन्ही सी ठंडी उंगली मेरे पांव से छू जाती है। मैं घबराकर भागती हूं तो एक निर्वस्त्र देह से टकरा जाती हूं, जिस पर से कफन उड़ चुका है। नज़र की आखिरी हद तक कफन ओढ़े सोये पड़े लोग हैं। कफन के नीचे से सिसकियां रिस रही हैं। कोई उन्माद आसपास ही सांस ले रहा है। मैं अपनी मौत से मरने से नहीं डरती...लेकिन ये जरूर चाहती हूं कि जीने की इच्छा की मौत नहीं होनी चाहिए। मैं आंख खोलती हूं तो भी ख्वाब टूटता नहीं। पानी पीने पर भी नहीं। मोबाइल पर कुछ खंगालने की कोशिश पर भी नहीं। कोई किताब पढ़ने पर भी नही। मालूम होता है कोई मुझे पुकार रहा है। मैं भाग रही हूं। लाइट ऑन करती हूं। कमरे के बाहर जाने की हिम्मत जुटाती हूं। 

सुबह आकाश के कोने में आने की तैयारी कर रही थी। ये जो ख्वाब है जो मुझे डराता है, यह क्या ख्वाब ही है सचमुच। काश कि ख्वाब ही होता। सुबह का अखबार खून से भीगा हुआ मालूम होता है...डर के मारे अखबार फेंक देती हूं। सोशल मीडिया में वो नन्ही सी ठंडी ऊँगली पूरा जिस्म बनकर तैरती है. कोई खौफनाक चेहरा अट्टहास करता है...बहुत डर लगता है इन दिनों...


Monday, August 24, 2015

वापस लौटना मुझे अच्छा नहीं लगता...



लड़की बेसब्र होकर रास्तों को बाहों में समेट लेने को दौड़ पड़ती थी। जब रास्ते उसके हाथों से फिसल जाते तो उसके भीतर एक और ही इच्छा जागती, उन रास्तों पर बिछ जाने की इच्छा, बहती धार को पोर-पोर में जज्ब कर लेने की इच्छा या अपनी सारी नमी बारिशों के हवाले कर देने की उफनती हुई इच्छा...लड़की अपने भीतर ढेर सारी इच्छाओं को गड्डमगड्ड होते देखती।

इन गड्डमगड्ड होती इच्छाओं के बीच एक चेहरा उगता। सुबह की पहली किरन सा उजला चेहरा। उस चेहरे की नाक पकड़ना लड़की को इतना पसंद था कि वो सारी रात अपनी इच्छाओं की आंच पर अपने आंसुओं का ईंधन डालकर उन्हें जलाये रखती और जैसे ही वो चेहरा उगता वो उसकी नाक पकड़ने को लपकती...

'आह...लगता है न पगली...' चेहरा अचानक बोल पड़ता।
'अरे, तुम तो सच्ची में हो?'  लड़की उसकी नाक पकड़े पकड़े ही पूछती।
'नहीं....मैं नहीं हूं...भूत है मेरा...' लड़का अनमना होकर जवाब देता।
'भूत....हा हा हा...हा...हा...हा...'
लड़की जोर-जोर से हंसती...

'अगर तुम भूत हो तो भी मत डरो। तुम्हारा कोई कुछ न बिगाड़ सकेगा.., '
'हां, अगर मैं भूतनी होती या डायन तब तो गई थी काम से...तुमको पता है पहले लोग डायनों से डरते थे अब डायनें लोगों से डरती हैं....'
लड़की की आवाज ज़रा सर्द होने लगी थी।

'वैसे है तो तू चुड़ैल ही...पर मैं तुझे कुछ होने नहीं दूंगा...' कहते हुए लड़के ने उसकी उदास होने को आई आवाज को धौल देते हुए उसकी चोटी खींची।

लड़की फिर से खिलखिला उठी...कि उस रोज हंसने का मौसम था...शाखों पर पत्ते हंस रहे थे, सड़कों पर भरा हुआ बारिश का पानी खिलखिला रहा था, छप्पाक छप्पाक खेलते बस्तों के भीगने से बेपरवाह बच्चे खुश थे, बछड़े की गरदन पर दुलार करती गैयया खुश थी....आसमान खुश था...धरती खुश थी...
लड़की को इस कदर खुश देखकर लड़का उदास हो जाता। जाने क्यों लड़की का यूं खिलखिलाकर हंसना उसे अच्छा शगुन नहीं लगता था। उसकी हर हंसी के भीतर लड़के को कोई उदासी, कोई नमी सी झांकती मिलती थी।

उधर लड़की ने बेवजह हंसना अभी नया-नया ही सीखा था। उसकी हंसी किसी नवजात की किलकारी सी मालूम होती थी। जिसे देख सुख का समंदर भी उमड़ पड़ता और अनजाना कोई भय भी दबोच लेता। तुरंत हाथ काला टीका लगाने को बढ़ते और मुंह से थू-थू निकलती है। उफफफ ये बुरी नज़र का चक्कर...

'अच्छा अब बस करो.' लड़का उसकी हंसी पर से अपनी निगाहें फेरते हुए कहता है। उसे डर है कि कहीं उसकी ही नजर न लग जाये लड़की को।
'क्यों? मैं तुम्हें हंसते हुए अच्छी नहीं लगती?'  लड़की हंसते-हंसते ही पूछती।
' नहीं, मैं तुम्हारी हंसी के पीेछे से आने वाली उदासी से डरता हूं। '
'अच्छा, मेरी दादी कहती थीं कि लड़कियों को जोर से नहीं हंसना चाहिए। वो भी नजर लगने से डरती होंगी तुम्हारी तरह, सारा जमाना तो लड़कियों की मुस्कुराहटों का बैरी ही बना है न जाने कबसे....लेकिन तुम डरा मत करो...
मैं तो इतना हंसना चाहती हूं कि सारी दुनिया में सिर्फ हंसी ही बचे. सोचो अगर धरती की सारी लड़कियां एक साथ खुलकर हंसे तो धरती किस कदर गम से खाली होगी...किस कदर महकती...लहकती...'
' हम्ममम ये तो है...लड़के ने धीरे से कहा।'

'बस, हमें अपने हंसने की वजह खुद बनना होगा...हर निराशा के आगे अपनी मुस्कुराहटों की बाड़ लगा देनी होगी...मैंने देखा है दुःख न मुस्कुराहटों से बहुत घबराता है। सच्ची।'  लड़की ने उसकी नाक फिर से पकड़ते हुए कहा...

'अच्छा बाबा ठीक है....'  लड़का अपनी लाल हो चुकी नाक को सहलाने लगा।
उस रोज बहुत बारिश हो रही थी। बहुत बारिश। लड़की ने अपनी भीगने की इच्छा को लड़के की हथेली पर रख दिया। लड़का उसे पंखों पर बिठाकर उड़ चला बादलों के गांव। धरती का कोना-कोना भीग रहा था...लड़की ने भी अपने सारे सूखे मन उस बारिश में बाहर निकाल लिए....कि कोई कोना भी सूखा रहे मन का तो भीगने का क्या फायदा...लड़की रास्तों पर नाचती फिरती थी। हरी-हरी पत्तियों को दुलराती फिरती थी। धरती की धानी चूनर को लपेटे वो खुद धरती हो गई थी।

वादियां कैसी चांदी सी चमक उठी थीं उस रोज। उनके चेहरे भी चांदी हो गए थे...उनकी हंसी भी। मुस्कुराहटों के गुच्छों को समेटने को पेड़ों की टहनियां कम ही पड़ गयी थीं। सो दीवारों पर भी उग आये थे हंसी के गुच्छे। कोई हरी सी हंसी...भरी-भरी सी हंसी।

वो बार-बार दौड़कर रास्तों के गले लगने को भागती, मौसमों को मुट्ठियों में भींच-भींचकर खुद को निचोड़ने की कोशिश करती। और थककर बैठ जाती...बूंदों भरे रास्ते पर।

लड़का उसे लाड़ में भरकर लौट चलने को कहता... लड़की की चहक दुगुनी हो जाती।

'नहीं...वापस लौटना मुझे अच्छा नहीं लगता...सुना तुमने...' और वो अपनी खिलखिलाहटों को आसमान में उछाल देती।

अब आसमान से बूंदें अकेले नहीं बरस रही थीं, उसमें लड़की की हंसी भी बरस रही थी।


Sunday, August 23, 2015

जिसको जैसी आंच मिली...


किसी ने दाल पकाई
किसी ने मुर्ग
किसी ने देगची पर चढ़ाये शब्द

जिसको जैसी आंच मिली
उसकी वैसी बनी रसोई

चैन से सोया था मजूर दाल खाकर
रात भर देखता रहा सपने मुर्ग के

मुर्ग खाकर बमुश्किल आई नींद में
सपने में दिखती रही बड़ी गाड़ी

शब्द की देग तो चढ़ी ही रही
कि कोई किस्सा पकने को न आता था
आंच कुछ कम ही रही हमेशा

जागती आखों में कोई शाल उढ़ाता रहा
लोग तालियां बजाते रहे

अधपकी देगों से आती कच्चे मसालों की खुशबू से दूर
कोई बांसुरी बजा रहा है.… सुना तुमने?


Wednesday, July 29, 2015

'लव इस नॉट अ च्वाइस'

डू यू लव मी ?
अपनी देह के तमाम घाव बिसरा कर, रेंगकर सूख चुके खून की पपड़ियों के बीच बेहद विश्वास से भर कर वो उससे पूछती है. विश्वास, हाँ यही तो होता है इकलौता सिरा प्रेम का, वो उसकी आँखों में लबालब था.

डू यू लव मी ?
वो फिर से पूछती है. उस पोखर का पानी उसकी आँखों में है जिसमें पांव डाले वो चांदनी रात में एक दूसरे की हथेलियों की लकीरों को बहा दिया था. उस पोखर के भीतर प्रेम का समंदर उमड़ आया था. उस झरने के नमी थी उसकी आवाज में जिसके किनारे किल्लोल करते वक़्त खुद से बिछड़ जाने को बेचैन हो उठी थी वो. अपनी देह के तमाम जख्मों पर वो एक मरहम लेने लौटी थी.
डू यू लव मी ?

वो एक बार फिर पूछती है.प्रेमी का मौन से वो आशंकित है. इस बार उसका सवाल खाली नहीं जाता। वो उसकी आँखों में आँखें डालकर कहता है'नहीं'.
बस अगले ही पल एक गोली वो अपने सीने में उतार लेती है.… 

वो प्रेमी जो उसकी खुशबू के पीछे बौराया फिरता है उसे उसी प्रेम के समंदर वाले पोखर में डुबो देता है. जिसकी साँसों की गर्मी से वो पिघल जाया करता था अब अपनी सांसों को बचाने के लिए उसकी एक एक चीज़ को ठिकाने लगाता फिरता है.… अपनी पत्नी और बच्चे के साथ सामान्य जीवन में लौटना उसकी च्वाइस है. हालाँकि प्रेमिका जानती थी कि'लव इस नॉट अ च्वाइस'....

(दिन में'मसान'के ट्रेलर देखकर ही उस फिल्म को देख पाने की हिम्मत नहीं जुटा पायी सो'बिफोर द रेन्स' देखने लगी. नंदिता दास और राहुल बोस को अरसे बाद स्क्रीन पर देखना अच्छा लगा. लेकिन प्यार के ऐसे अंजाम से दिल उदास भी है. फिल्म के और भी पहलू हैं लेकिन फ़िलहाल तो आसमान में टंगे बादलों और भारी बारिश की चेतावनी के बीच ' बिफोर द रेन्स ' ही आँखों से बरस रही है)

Monday, July 27, 2015

चाय वाकई अच्छी है


जिंदगी अपनी रफ़्तार से चलते-चलते दो कदम पीछे को लौटती है. मुस्कुराती है, निगाह भर देखती है खुला आसमान। उसमे बनने-बिगड़ने वाली आकृतियां। धान के खेतों के बीच से गुजरते हुए उसकी खुशबू को साँसों में जज्ब करते हुए बचपन का जाने कौन सा टुकड़ा स्मृतियों से बाहर आकर खड़ा हो जाता है.

वही छोटी फ्रॉक वाली कोई लड़की, कटोरा भर धान के बदले आइसक्रीम देने वाले भैया की साइकल के पीछे भागती। बच्चों के रेले में अपना छोटा सा गिलास हाथ में लिए भैंस के पास पहुँचने की होड़ में, कि झाग वाला दूध जो भैंस के थन से सीधे गिलास में गिरता है लेने की हड़बड़ी, दूध से मूंछें बनाकर मुस्कुराना। तेज़ गर्मियों से बचने के लिए दादी का पल्लू थामे मिटटी वाले घरों में दोपहर बिताना, दादी के सोते ही चुपके से निकल भागना। चारा काटने वाले मशीन में पूरा लटक जाने के बाद भी उसे हिला तक न पाने की चिड़चिड़ाहट, अमिया चुराने, खेतों से बाकी बच्चों के साथ 'सीला' (खेतों में गिरे अनाज के दाने) बीनना, सर पर अनाज के गठ्ठर को रखकर चलने की ज़िद और फिर एक छोटा सा गठ्ठर रख दिए जाने की ख़ुशी। रस्ते भर गर्दन का लचर पचर हिलना और बाकी लड़कियों का मजाक उड़ाना।

चाची, बुआ जिज्जी के साथ कुँए से पानी लेने जाना। रस्सी डालना और डाँटा जाना कि 'गिर जइहो बिट्टा, नगीचे मत जाओ' कलशी के पानी में गड़प से गिरने की आवाज सुनने को वही कुँए की जगत पे बैठ जाना। घूंघट की आड़ से झांकती मुस्कुराहटों को खिलखिलाहटों में बदलते देखना, ठीक उसी वक़्त सूरज का डूबने के बहाने छू लेना उन तमाम खिलखिलाहटों के रेवड़ को, सुरमई आँखों को. फिर वो एक साथ कई कलशे लेकर लौटता झुण्ड और मेरी जिद पर धर दी जानी छोटी सी कलशी सर पर बहुत कम पानी वाली। चूल्हे पर रोटी बनाना सीखने की ज़िद और हाथ जला लेना, त्योहारों पर जानवरों की पीठ पर रंग के गोले बनाकर सजाना उन्हें, नई घंटी पहनाना। खूब सारा लुका छुपी और कभी छुपे ही रह जाना और बाकी बच्चो का खेल ख़त्म करके घर चले जाना।

बस दो कदम पीछे लौटने पर स्मृतियों की कितनी नाज़ुक परतें खुलती हैं, कि तभी कोई आवाज देता है चाय तैयार है.… मुस्कुराती आँखों से बादलों में छुपे उस सूरज की बदमाशी पर मुस्कुराती हूँ जो मुझ जैसी आलसी को भी सुबह जल्दी उठाकर बुलाता तो है लेकिन बादलों में छुप जाता है.

चाय वाकई अच्छी है, मैं दोस्त से कहती हूँ... ये दिन की अच्छी शुरुआत है.…
(ऊधमसिंह नगर, डायरी )

Monday, July 13, 2015

बारिश, शोर, तन्हाई...


सारी रात सिरहाने बारिश शोर करती रही। अब जबकि रात बीत चुकी है.

महसूस होने के लिए होना जरूरी नहीं होता लेकिन होने के लिए होना ही होता है। बिना हुए महसूस तो हुआ जा सकता है लेकिन हुआ नहीं जा सकता। और जो जगह होने से भरती है वो महसूस करने से नहीं भरती। लेकिन इसके ठीक उलट बिना महसूस हुए होने का भी क्या अर्थ है। कि हथेलियों में हथेलियां हों लकिन कोई जुम्बिश ही न हो। साथ वाली कुर्सी खाली होने पर ज्यादा भरी लगती र्है कई बार और एक साथ दो प्याली चाय पीना भी। अपनी हरारत को अपनी खामोशियों में पीने से बेहतर जीना कोई नहीं। शब्द झूठे हैं कि उनमें कुछ भी नहीं। कुछ भ्रम जिन्हें टूटना ही है एक दिन। महसूस होना टूटता नहीं। कभी-कभी टूटता भी है लेकिन महसूस  होने को होना ही तोड़ सकता है बस।

अजीब बात है कि इंतजार को तोड़ता है इंतजार का टूटना ही। लेकिन शायद इंतजार अपने अस्तित्व में ही खिलने का आदी हो। न होने में होने का सुख बेहतर है, होकर न होने की दुविधा से। इत्ती बड़ी दुनिया में सब तो हैं ही फिर भी कितने तन्हा हैं सब के सब। सच तो यह है कि जिस तनहाई से निकलने की कोशिश में हम हाथ पांव पटकते हैं असल ठौर वहीं है। उसी तनहाई में हमारा केन्द्र है। हमारी जिंदगी के संगीत के सम। जिंदगी के सम से भटककर जिंदगी की लय को तलाश करना फिजूल है।
बारिश इन दिनों मगन होकर नाचती फिर रही है। उसकी लडि़यों को हथेलियों पे लेना अच्छा लगता है लेकिन ऐसा भी लगता है कि इस तरह लडि़यां टूट जाती हैं बारिश की। हर अच्छी लगने वाली चीज की तरफ हाथ बढ़ाने की फितरत भी अजीब है। इस फितरत में बहुत टूटन है


Saturday, July 4, 2015

कॉपीराइट वाली मुस्कान..



लड़का हर शाम उसकी पलकों की जाग को नींद की चादर ओढ़ाकर सुभीते से  विदा लेता। उसके सिरहाने अपनी खुशबू  रखता और बेहद आहिस्ता से रुखसत होता। वो सारी रात चाँद से, बारिश से या हवाओं से गुज़ारिश करता कि लड़की की जाग पर वो जो नींद की चादर ओढ़ाकर आया है, उसे सब मिलकर सहेजे रखें । लड़की की सदियों की जाग का उसके पास कोई उपाय नहीं था,  कुछ प्रयास थे जिन्हें वो करते रहना चाहता था. लड़का कभी उसके सिरहाने सारी रात बैठकर उसे सोते हुए देखना चाहता तो लड़की उसे वापस भेज देती ये कहकर कि ' तुम्हारे होने से तुम्हारे होने का एहसास टूटता है'. लड़का एहसास बचाना ज़रूरी समझता और चला जाता।

लड़की की जाग पर स्मृतियों की पहरेदारी थी. वो नींद की चादर के भीतर करवटें बदलती रहती और स्मृतियों की चुभन को महसूस करती रहती. लड़के की कोशिश नाकाम हुई ये सोचकर उसका दिल न टूटे इसलिए सुबह वो लड़के को अपनी गहरी मुक्कमल नींद का यक़ीन दिलाती।

लड़की को रात को प्यास लगती लेकिन वो अपनी प्यास को नींद की चादर में समेटे रहती। वो अपनी जाग तो समेट सकती थी लेकिन नींद की चादर से बाहर निकलने पर सिरहाने रखी लड़के की खुशबू के बिखरने का जोखिम वो नहीं ले सकती थी.  लड़का हर रोज नींद की चादर ओढाते हुए उसके कान में कहता कि सुबह की पहली किरण से पहले वो उसकी पलकों को अपनी हथेलियो से ढँक लेगा। लड़की उन हथेलियों को अपनी पलकों पर महसूस करने के लिए सारी रात अपनी प्यास को समेटे रहती।

नींद बाहर होती तो ज़रूर आती, नींद तो भीतर थी अधूरी उचटी,  उखड़ी,  बेचैन नींद। हर नींद अपने भीतर इतने किस्से लिए होती कि नींद अपने ही भीतर समाये किस्से सुनने को उठ बैठती। आँखें कड़वी होने लगती लेकिन किस्से खत्म ही न होते।

नाना जी की कहानियों से लम्बे किस्से. दुनिया की सबसे सुन्दर राजकुमारी के किस्से और उस खतरनाक राछस के किस्से। आधी रात तक किस्सों के बीच की हुंकार और  खिंचते जाते किस्से. किस्से ख़त्म नहीं होते, जाने कब.… नींद झरती किस्से की जगह हम  माँ की गोद में लुढक जाते. जाने वो किस्सा सपना थे या नींद। जो भी था लेकिन नाना जी मुस्कुराहट सच्ची थी बिलकुल लड़के के मुस्कुराहट की तरह. उसकी नन्ही सी कोमल सी मुस्कान, जिसके एक सिरे पर कोई झरना ठहरा हुआ मालूम होता और दूसरी तरफ फूलों की घाटी।

लड़की ध्यान से याद करती नाना जी की मुस्कराहट को. जो अक्सर चाय में चीनी कम होने की शिकायत करते वक़्त खिलती थी, या गुलगुले खाने की फरमाइश के वक़्त। लड़की को लड़के की और  नाना जी की मुस्कुराहट एक जैसी लगती।

वो अपनी बात को कन्फर्म करने माँ के पास जा पहुँचती। नाना जी की मुस्कान को कागज पे उतारती और लड़के की मुस्कान को भी. उसे दोनों एक सी लगतीं। नाना जी नींद के लिए किस्सों की चादर ओढाते थे और लड़का अपनी नींद की चादर ओढ़ाकर नए किस्से गढ़ने लगा था.

लड़की अपनी जाग में विचरती थी लेकिन ठीक सुबह की पहली किरण के उगने से पहले नींद पलकों पे रख लेती। उसे अपनी पलकों पर लड़के की हथेलियों की छुअन से जागना इतना अच्छा लगता था कि वो सारी उम्र सोने और जागने के खेल में जिंदगी बिता देना चाहती थी.

कभी हथेलियों की छुअन सूरज की किरण से हार भी जाती थी लेकिन तब वो सूरज की किरण की ओर से मुंह फेरकर तब तक सोयी रहती जब तक लड़के की आहटें उसके कानों तक न आ पहुंचतीं। ये जाग का और नींद का एक खेल था.

एक रोज हथेलियों को पलकों पे महसूस करने के इंतज़ार में दोपहर हो गयी. लड़की उसी नींद की चादर के भीतर अपने दोनों घुटनों के बीच अपना सर फंसाये लेटी रही. कितने बुलावे आये वो नींद की चादर से बाहर न निकली. उसकी पलकें इंतज़ार में थीं. बिना पलकों पर एक छुअन उगे उसका दिन उग ही नहीं सकता था. बुलबुल, मैना, तोता, कबूतर सब आये लेकिन लड़की धुन की पक्की थी और वादे की भी. लड़का जिंदगी के ट्रैफिक जाम में फंसा रहा और लड़की नींद की चादर के भीतर अपनी प्यास में सुलगती रही.

मौसम उसके माथे पर हाथ फेरकर जाते रहे लेकिन लड़की न उठी. मौसम बीते, बरस बीते न लड़की की सुबह हुई न लड़की की नींद की चादर हटी.

एक रोज आषाढ़ की तेज़ बारिश वाली रात में कोई मुसाफिर वहां ठहरने को रुका। किसी ने उसे सोने को जगह तो दे दी लेकिन ताकीद के साथ कि इस घर में नींद नहीं आ सकेगी उसे. मुसाफिर ने कहा उसे नींद नहीं थोड़ी बर्फ चाहिए, उसकी हथेलियों में बहुत जलन है। पडोसी बर्फ लाने गया. मुसाफिर बेसब्र बेचैनी में घर में भटकने लगा. वो किसी गहन पीड़ा में था. बेचैनी में उसने लड़की की नींद की चादर खींच ली और उसे कहा मुझे बर्फ चाहिए। बहुत जलन हो रही है. लड़की अपनी उनींदी जाग में बुदबुदाई प्यास.... मुसाफिर  ने बिना उसकी और देखे उसे जगाने के लिए उसकी पलकों को छुआ.

लड़की ने आँखें खोलीं, 'कितनी देर कर दी तुमने आने में',

नींद की उस उधड़ी चादर के बीच लड़की की प्यास टूट चुकी थी. लड़की ने पलकों पर उस छुअन को महसूस किया, मुस्कुराई और बुदबुदाई नाना जी की मुस्कान बहुत अच्छी थी, तुम्हारी तरह. एक बार मुस्कुराओ न, आषाढ़ की मूसलाधार बारिश के बीच उस मुसाफिर लड़के ने भीगी हुई पलकों से मुस्कुराते हुए कहा, कितने बरस हुए मुस्कुराये। लड़की ने अपने प्यासे  होंठों पर पानी की बूँद महसूस की. लड़के ने अपनी हथेलियों की जलन कम होते महसूस की.

जिंदगी का ट्रैफिक जाम अब भी वैसा ही था, लेकिन लड़का सारे  ट्रैफिक सिग्नल तोड़ चुका था. लड़की एक गहरी नींद में जा चुकी थी लड़का एक लम्बी जाग में उसके सिरहाने मुस्तैद था.…

नाना जी की मुस्कान पे लड़की का कॉपीराइट अब भी था।

Friday, July 3, 2015

तुम्हारी मनमर्जियां मेरी अमानत हैं...


मेरे पल्लू के कोने में
नहीं बंधी है कोई नसीहत
तुझे देने को मेरी लाडो

विरासत में मिली
संस्कारों और रीति रिवाजों वाली भारी भरकम ओढनी को
मैंने संदूक में संभालकर नहीं रखा था
उसे तार-तार करके फेंक आई थी
बहत दूर
कि उसके बोझ से मुझे ही नहीं
समूची धरती को मुक्ति चाहिए थी

कोई हिदायत नहीं मेरी मुठ्ठियों में
तुम्हारे लिए
न नियम कोई , न ताकीद
कि अपने नियम तुम खुद बनाओ
कोई रास्ता नहीं बताऊँगी मैं तुम्हें
कि इस पर चलो और इस पर न चलो
अपना सही और गलत खुद तुम तय करो

मजबूती से करो प्रतिवाद
अपने से बड़ों से भी
कि उम्र में बड़ा होना
नहीं होता बड़ा होना

तुम्हारे गिरने पर संभाल लूंगी दौड़ के
ऐसा कोई वादा नहीं है मेरे पास
तुम्हारे लिए
लपक कर तुम्हें चूम लेने की
अपने सीने में समेट लेने की
पलकों में छुपा लेने की हसरत को
भींच लिया है मैंने अपने ही भीतर
सहना, हरगिज नहीं
जरा भी नहीं
जिंदगी सहने का नहीं
जीने का नाम है
घूरकर देखना इस तरह कि
हिमाक़त करने वाले
सोचने से भी बाज़ आये हिमाकतों के बारे में

शर्म, संकोच, विनम्रता, मधुरता ये शब्द हैं मात्र
इन्हें सिर्फ विवेक से हांकना मेरे लाडो
कि विनम्रता कोई संजीवनी बूटी भी नहीं
मत फ़िक्र करना किसी के कहने सुनने की
कि तुम्हारी मनमर्जियां मेरी अमानत हैं

जानती हूँ दिल तोड़ना हम स्त्रियों को नहीं आता
पर अपना दिल टूटने से बचाना भी होगा

तुम्हारी माँ के पास कुछ भी नहीं
तुम्हें देने को
सिवाय इसके कि
वो तुम्हारे क़दमों की ताक़त है
तुम्हारे पंखों की जुम्बिश
तुम्हारे खुद पर किये गए यकीन का ऐतमाद
तुम्हारे प्रतिवाद का स्वर की खनक
कभी कुछ भी गलत न सहने की हिम्मत
नाइंसाफ़ियों के मुंह पर तुम्हारा जड़ा हुआ तमाचा
तुम्हारी तमाम आवारगी में तुम्हारा साया
खिलखिलाहटों पे नज़र का काला टीका...

Wednesday, July 1, 2015

जब बारिशें आएं तो...



जब बारिशें आएं तो रेनकोट और छतरियों को पर धकेल देना, तमाम नसीहतों को दीवार की खूँटी पे टांग देना, निकल पड़ना बारिश के संग बरसे फूलों से भरी सड़क की ओर. घने बनास के जंगल टोकरियों में भरे भरे बादल लिए खड़े मिलेंगे, उन बादलों की नाक पर ऊँगली रखकर पूछना ज़रूर कि , 'आप कैसे हैं जनाब?' उनके जवाब के इंतज़ार में ठिठकना मत कि कुछ सवाल जवाब के लिए होते भी नहीं, शरारत भर होते हैं बस. कोई नदी मिलेगी राह में उफनाती, गले लगाने को बेताब, उतार लेना उस नदी को अपने भीतर, उसके भीतर उतरने की तुम्हें न चाह होगी न ज़रुरत। 

कोई आवाज़ मिलेगी भीगी सी, प्यार में डूबी, और कहना कुछ भी बेकार है जानां कि तब रुकने से रोक न सकोगे तुम खुद को. और अपनी इस भूल के बदले जीवन भर आसमान से बरसती बूँदें तुम्हें जलाएंगी। ये ही तुम्हारे इश्क़ का ईनाम होगा। 

हर बूँद के सीने में आंच होती है और हर लौ के सीने में नमी....

Tuesday, June 9, 2015

आकाश की मुठ्ठी खाली है...


रात की कटोरी में झरती है चौदहवीं के चाँद की
दूधिया फेनिल चांदनी
ख्वाबों भरी पलकों को लुढ़का देती है
तेरी बातूनी आँखें
एक ये चांदनी बहुत आज़िज़ करती है बोल बोल के
दुसरे तुम्हारी आँखें
नींद के गांव में ख़्वाबों की कोई रहनवरी ही नहीं

बस जागती आँखों की पहरेदारी पर मुस्तैद हैं कुछ दर्द दिल के
यादों के गुच्छे हिलते हैं चांदनी रात में हलके हलके
धरती जाने क्या ढूंढती फिरती है घूम घूम के
आकाश की मुठ्ठी खाली की खाली है

दूर कहीं कोई समंदर चीखता होगा उल्लास में
आकुल सा व्याकुल।


पागल समनदर पागल चांदनी
पागलपन ही तो है हर इश्क़ की दास्तान ...

Sunday, May 10, 2015

पीकू-कब्ज़ सिर्फ पेट का नहीं, जेहन का भी


अमिताभ के कान्स्टीपेशन के लिए तमाम फार्मूले ढूंढते-ढूंढते फिल्म 'पीकू' हमारे दिमाग में कबसे जमी-जमाई, फंसी जड़ मान्यताओं को साफ करने के फार्मूले भी तलाशती है। अपनी स्वर्गवासी के जन्मदिन के मौके पर भी वो उससे नाराज नजर आते हैं...सबको लगता है कि ये कैसी बात है, अब तो वो नहीं हैं इस दुनिया में...फिर भी नाराजगी। उनके इस रवैये पर मौसमी चटर्जी कहती भी है कि 'इसी वजह से दीदी कभी खुश नहीं रही...' लेकिन अमिताभ की उस नाराजगी में सारे जमाने की औरतों के लिए, उनकी सेल्फ स्टीम के लिए जो सम्मान जो प्रेम है वो जाने कितने ही 'आई लव यू जानू' वाले प्रेम पर भारी पड़ता है...क्यों औरतें अपनी पूरी जिंदगी एक आदमी के आगे-पीछे घूमने में, उसकी इच्छा अनिच्छा का ख्याल रखने में लगा देती हैं। क्यों समर्पण की देवी बनने को आतुर रहती हैं। क्या वो खुद कुछ नही हैं। क्यों वे खुद की इच्छाएं उठाकर ताक पर रखने को बेताब रहती हैं। इससे उनके भीतर अनजाना फ्रस्टेशन जन्म लेता है जो उन्हें खुश नहीं रहने देता।

अमतिाभ अपनी बेटी से कहते हंै कि क्यों शादी करनी चाहिए...इसलिए कि सब करते हैं...इसलिए कि किसी की केयर करनी है? वो शादी के औचित्य पर सवाल उठाकर विवाह संस्था के ढांचे की मूल खामियों को इंगित करते हैं। कलकत्ता जाने पर अपने छोटे भाई की पत्नी के चिड़चिड़े स्वभाव की पर्तें वो खोलते हैं कि क्यों तुमने वो नौकरी नहीं की थी जो तुम्हें मिली थी, और उसका वो दबा हुआ सा जवाब कि उसमें मेरी सैलरी इनकी पति की सैलरी से ज्यादा थी। ये झूठमूठ के सैक्रिफाइज अनजानी कुंठाओं को जन्म देते हैं। हम स्वाभााविक व्यक्तित्व नहीं रह जाते। और दूसरों पर भी अपने समर्पण और अपनी अच्छाइयों का बोझ लादते जाते हैं। जबकि इससे कोई खुश नहीं रहता। तमाम शादियों के भीतर चिड़चिड़ करती औरतें...और उनके इस चिड़चिड़ाने से आजिज आ चुके पति...क्या यह सच कभी समझ पाते हैं...भले ही अमिताभ को पेट के कान्स्टीपेशन की दिक्कत है लेकिन वो समाज के जेहनी कान्स्टीपेशन की दवा इस फिल्म में देते नजर आते हैं...कम से कम सिम्टम्स तो उभारते ही हैं।

एक पिता अगर अपनी बेटी के रिलेशनशिप स्टेटस को लेकर उसकी वर्जिनिटी को लेकर इस कदर उदार है तो दूसरी तरफ सिर्फ शादी करने के लिए शादी करने के खिलाफ भी है। हालांकि लाउड मैसेज यह जाता दिखता है कि वो अपने अकेलेपन के डर से बेटी की शादी के खिलाफ है।

फिल्म इस लिहाज भी तारीफ की हकदार है कि सभी किरदार स्वाभाविक हैं। जो जिससे नाराज है वो सामने है, और अपनी नाराजगी खुलकर व्यक्त करता है। गुस्सा है तो है, प्यार है तो है...

एक तरफ ढलती उम्र की दिक्कतें, बुजुर्गों की असुरक्षा की भावना, उनके व्यवहार की दिक्कतें, दूसरी तरफ उन्हें संभालने की परेशानी के बीच ठीक-ठीक संतुलन दिखता है। बुजुर्गियत को महिमामंडित नहीं किया है, दिखाया गया है कि किस तरह वो भी कई बार अनरीजनेबल होते हैं...और इससे बाकी लोगों को परेशानी भी होती है। लेकिन इस परेशानी का अर्थ प्रेम न होना नहीं है। कभी जिन्होंने बच्चों की बेजा फरमाइशों को सर माथे पर रखा था, उनकी जिद के आगे घुटने टेके थे, उनके बुढ़ापे में यह जिम्मेदारी बच्चों पर आती ही है। इससे भागना कैसा...दिक्कत होने का अर्थ दूर जाना तो नहीं। दीपिका सहेजती है अपनी जिम्मेदारी भी प्यार भी. इरफान पूरे कान्स्टीपेशन वाले माहौल में किसी कायम चूर्ण की तरह आते हैं...उनकी उपस्थिति हर हाल में अच्छी लगती है।

पीकू को ठहाके लगाकर देखते वक्त भी दिमाग में सोचने के लिए भी बहुत कुछ रह जाता है। फिल्म खत्म होती है अमिताभ के पेट की राहत के साथ लेकिन दर्शकों के जेहन की कब्जियत की ओर भी इशारा करती जाती है...

(चूंकि यह फिल्म समीछा नहीं है इसलिए फिल्म के दुसरे पछ पर कोई बात नहीं की, एक्टिंग, निर्देशन, कैमरा 
वगैरह)


Monday, May 4, 2015

ओ दाढ़ीवाले...



ओ दाढ़ीवाले,
जहाँ बता गए थे खड़े होने को उसी तरफ खड़ी हूँ
तमाम अनसुनी आवाजों को थामे
धूप और धूल के गुबार के बीच
जिंदगी की सोंधी खुशबू सहेजते

लुहार की चोट, मजदूर के पसीने
किसान की बर्बाद फसलों के नीचे से
दबी कुचली हिम्मतें तलाशते 

ओ दाढ़ीवाले
यक़ीन मजबूत है कि
सही रास्ता वही है जो तुमने बताया
जन्मदिन मुबारक हो कामरेड....


Saturday, May 2, 2015

इश्क़ मिज़ाजी भी, नियाज़ी भी....

रात भर
मिसरी की डली
ज़ुबाँ पे घुलती रही
सरकती रही

नसों में दौड़ती-फिरती
सदियों की कड़वाहट
शीरीं एहसासों की तलाश
में भटकती रही

पलकें ख्वाबों की खाली अंजुरी लिए
नींद के गांव में कुछ ढूंढती रहीं

सिरहाने लुढक गयी थी
आलता की शीशी
महावर पैरों तक पहुँचने का रास्ता ढूंढते-ढूंढते
पूरी देह में फिरती रही

एक आस का दिया था
मद्धम-मद्धम जलता
किसी रूमानी झोंके ने शरारत से उसे फूंक दिया
अँधेरे में टकरा कर गिरा दिया
प्यास का पानी भरा गिलास
मैंने खुद
और प्यास देह पर, रूह पर
दौड़ती रही

नीर भरी बदलियाँ टंगी रहे आसमानों पर
धरती तपती, रही धधकती रही

इश्क़ मिज़ाजी भी
नियाज़ी भी
मुरौव्वत कोई नहीं
न जीने से न मरने से

जिंदगी की शानों पर
आ टिका कोई आखिरी सा लम्हा
जिंदगी तमाम रास्तों पर भटक के
थक के बैठी तो देखा
पंच तत्व में हाथों की लकीरों को
डूबते-उतराते

दुनिया में किसी के अरमानों की डोली उठे
बिस्मिल्ला खान की नींद भी
शहनाई सी गूंजती है

इश्क़ के हवन में
राते भस्म होकर भभूत हो गयी थी
महावर देह भर में फैली थी
बस कि पांव खाली ही रहे
हवन की भभूत को पांव का महावर बना
इश्क़ की नवेली दुल्हन मुस्कुराई 
चल पड़ी सूरज की किरणे तोड़ने 

पूजाघर में देवता कोई नहीं है फिर भी
जाने क्या पूजना है उसे… 



Friday, April 24, 2015

आई डोंट एक्ससिस्ट स्टिल...


कभी लगता है कि घर के आईने में जो रहता है वो कोई और ही है. देह में जो सांस है जाने किसकी है. गले में नाम की एक तख्ती लटकी थी जिससे कोई मुझे पुकारता था वो तख्ती खो दी मैंने। लापरवाह जो बहुत हूँ, सब खो देती हूँ, दिन भी रात भी, सुबह भी नदी भी, ओस भी सब खो देती हूँ मैं. अब कोई मानता नहीं है मेरे होने को. आइना भी नही.

मैं अपने चेहरे पर अपनी उँगलियाँ फिराती हूँ. मैं ही तो हूँ. फिर कोई मानता क्यों नही. मैं अदालतों के चक्कर काट रही हूँ बरसों से. दुनिया की अदालतों के, रिश्तों की अदालतों के.…थककर जीवन की देहरी पे लुढ़क जाने का जी चाहता है कि अब चला नहीं जाता।

हर बार अपने होने के सुबूत कहाँ से जुटाऊँ मैं, कहाँ से लाऊँ चेहरे को रंगने वाली रंग रोगन से दमकती मुस्कुराहटें। मैंने अपने होने के सारे प्रमाणपत्र खो दिए हैं. सिर्फ सांस नहीं खोयी। यूँ इसके इस तरह खोने से बचे रहना का श्रेय मुझे नहीं जाता। ये कमबख्त यूँ ही चिपकी हुई है.

बार बार अपना ही नंबर डायल करती हूँ जो एक्सिस्ट नहीं करता। क्या मैं एक्ससिस्ट करती हूँ. सचमुच।

नन्हे क़दम दूर जाते हुए लगातार बड़े होते जा रहे हैं.… लगातार। जो फूल लगाये थे वो खूब खिल रहे हैं बस मेरे हाथ नहीं पहुँच पाते उन फूलों तक.

न पहचाने मुझे आइना, नहीं देने मुझे दुनिया की किसी अदालत में अपने होने के सुबूत। उन फूलों की खुशबू में मेरी भी खुशबू है… ये बात वो भी जानते हैं मैं भी....
(खामखाँ)

Tuesday, April 21, 2015

ऊपरवाले...आपसे जरा बात करनी है...


जिंदगी और मौत के बीच बस एक कदम का फासला है. बस एक कदम. एक लम्हा। उस एक ही कदम, एक ही लम्हे में पूरी उम्र रखी है, 19 बरस या 90 बरस. आत्महत्या देह की हत्या है, प्रतिशोध है समाज से, चीत्कार है भीतर भरे शोर का या मौन का. एक ही देह में कितनी मौतें कैद हैं कितनी जिंदगियां।

कोई एक लम्हा आता है और जिंदगी की गिरह खोल देता है, जिंदगी भक्कक से खुल पड़ती है, बिखर जाती है, संभाले नहीं सम्भलती. बूढी दादी डांटती है की नेक हौले हौले हंस छोरी और छोरी....वो तो और जोर से ठठाकर हंस पड़ती है. आसमान सुनता है उसकी हंसी, धरती सहेजती है उसकी खिलखिलाहटों के बीज, फूल बनकर उगती है वो हंसी, नदियों के अमृत में उतरती है वो पवित्र हंसी, जिंदगी की हंसी।

लेकिन कोई लम्हा ऐसा भी आता है कि मुस्कुराहटें सहम जाती हैं, दूर लौट जाती हैं होंठो की ड्योढ़ी से। कोई बात कोई मनुहार उसे मना नहीं पाती। उसी जिन्दा देह में कोई मर जाता है. वो हमसे बात करता रहता है, शाम की चाय साथ पीकर वापस घर लौट जाता है, राजनैतिक चर्चा करता है, ऑफिस वक़्त पे पहुंचता है लेकिन हम जान ही नहीं पाते कि अभी-अभी जो व्यक्ति उठकर गया है पास से वो तो कबका मर चुका है.

ये मानना कितना मुश्किल है कि वो जो सुबह चाय में चीनी कम होने की शिकायत करके गया कितने दिन हुए उसे मरे हुए.… मरना आसान नहीं, जीना भी नहीं। किसी का असमय जाना पूरे समाज पर तमाचा है, हम सब जिम्मेदार हैं असामयिक आत्महत्याओं के. देह जो आसपास सांस लेती रहती है, खिलखिलाती रहती है, कवितायेँ लिखती रहती है, सिनेमा देखती है, पॉपकार्न खाती है, चुहलबाज़ी करती रहती है लेकिन वो हमें पुकारती भी है, उनकी आँखों के समंदर आवाज देते हैं, हम सुन ही नहीं पाते।

जीते जी सहेज न पाना और किसी के मर जाने पर करुण विलाप एक किस्म की अश्लीलता सी लगते हैं मुझे। हम गुनहगार हैं.… अंशु तुम्हें सुन न पाने के, तुम्हारी हथेलियों को अपनी हथेलियों में कसकर दबा न लेने के. हम गुनहगार हैं.…सचमुच।

हालाँकि कुछ ही रोज़ पहले देह में घिसटती सांसों की मुक्ति को राहत होते भी महसूस किया है फिर भी कहती हूँ की जिंदगियां बचायी ही जानी चाहिए, शायद गलत कह रही हूँ मैं. जिंदगी नहीं जिंदगी जीने की इच्छा को बचाया जाना चाहिए, सपने, हिम्मत, हौसला बचाया जाना चाहिए, जिंदगी में आस्था बचायी जानी चाहिए.... क्योंकि देह भर नहीं होती जिंदगी।

कौन कहता है कि जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ में है , अगर सचमुच ऐसा है तो ऊपरवाले को बहुत सारी मौतों का जवाब देना होगा, बहुत सारी जिंदगियों का भी.… आइये ऊपरवाले साहब, आपसे जरा बात करनी है.

Sunday, April 19, 2015

हमेशा देर कर देता हूं मैं...


हमेशा देर कर देता हूं मैं हर काम करने में
ज़रूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं...

मदद करनी हो उस की यार की ढाढस बंधाना हो
बहुत ही दूर रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं...

किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीकत और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं...

- मुनीर नियाज़ी 

Thursday, April 16, 2015

जिंदगी तुझको बड़ी देर से जाना मैंने...


सुफैद फूलों की कतारें थीं...दूर तक. बहुत दूर तक. रात की वीरानी...सफेद फूलों की कतारों के संग संगीत सा रच रही थी. मृत्यु का कोमल संगीत...जिसके गले में कोई हिचकी कोई सिसकी अटकी हुई हो...और मृत्यु का उत्सव मुस्कुराहट बन सजा हो होठोें पर। किसी नर्मदा, बेतवा, झेलम किसी चिनाब को आंखों से छलकने की आजादी नहीं...

सुुफैद फूलों की कतारों के बीच-बीच में स्मृतियों के दिये जल रहे थे, दिये की लौ में मुस्कुराता चेहरा...ओह....मृत्यु. शुक्रिया कि तुमने दर्द का एक सिलसिला खत्म किया। मर्सी किलिंग सिर्फ बहस का ही मुद्दा है न्यायालयों के लिए, और आत्महत्या गुनाह ही। मृत्यु इन सबसे आजाद है। वही जिंदगी की तमाम गिरहों को खोलने में समर्थ है।

लड़की स्मृतियों के दियों में लगातार तेल डालती जाती, बाती बढ़ाती जाती। हवाओं को उसने अपनी लटों में बांध रखा था। हवा का कोई टुकड़ा दियो को बुझा नहीं सकता था। सुफैद फूलों की उन कतारों में सुफैद दुपट्टा लहराती लड़की कोई उड़ता हुआ ख्वाब सा मालूम होती थी। 

मरना सिर्फ देह भर नहीं होता...लड़की जानती है। एक घायल जिस्म को ढोते-ढोते भी कभी कोई थक ही जाता है। जब जज्बातों का, अहसासों का ईंधन ही न बचा हो तो बचाने को रह भी क्या जाता है। मृत्यु की कामना अपराध मालूम होती है लेकिन नहीं भी। जिस्म हो या रिश्ते जब बोझ बनकर ढोये जाने लगें,उनसे सलीके से विलग होना जीवन का सौन्दर्य बनाये रखता है। 

दुःख होना अलग बात है और शोक होना अलग। लड़की उसके जीते जी शोक में थी अब दुःख में है। दुःख में एक राहत भी घुली है...अब उसे रोज जख्मों पर मरहम नहीं लगाना होगा, अब टूटी चटखी लगभग घिसटती उम्मीदों को सहेजने की कोशिश में खुद को खपा नहीं देना होगा, अब नहीं सुनने होंगे सांत्वना के वो खंजर से चुभते शब्द कि 'सब ठीक हो जायेगा एक दिन'...जबकि जानता हर कोई है कि कुछ चीजें कभी ठीक नहीं होतीें...अब उसे रोज खुद को जवाब नहीं देना होगा कि 'क्या अब उसे प्यार नहीं रहा। '

जिंदा रहना जरूरी है...लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि जीवन जीने लायक बचा भी है या नहीं। सड़ता, गिजगिजाता , पीड़ा व संत्रास से भरा जीवन....जीते जाना जैसे कोई सजा...

सुबह की अज़ान का वक्त हुआ, लड़की की थकी हुई आंखों में नींद का एक टुकड़ा जो आ टिका था वो खुद को झाड़कर खड़ा हो गया। लड़की ने चौंककर देखा. दिये अब पलकें झपकाने लगे थे। फूलों को भी नींद आने लगी थी। सूरज कहीं आसपास ही था शायद।

उसने किचन में जाकर चाय का पानी चढ़ा दिया...एक कप चाय...बिना इलायची की अदरक वाली चाय, कम चीनी कम दूध वाली जैसी उसे खुद को पसंद है...

सुबह की पहली किरन के साथ ही उसने रात भर जागे दियों को समेट दिया...सुफैद फूलों को कहा सो जाओ...वो देर तक नहाई...कमरे में मेंहदी हसन की आवाज को धूपबत्ती की तरह जलाया...मनपसंद सैंडविच बनाये...वार्डरोब खंगाली और पहनी अपनी पसंद की असमानी साड़ी....घर से निकली तो चेहरे पर सुकून था, खूब रोने के बाद की ताजगी चेहरे पर, जैसे लगातार टीसते जख्म से निजात का सुख...

'कैसी लड़की है...अभी इसके घर में मौत हुई है...और इसके लक्षण तो देखो...' लड़की कान में मोतियों वाले बुंदे पहनते हुए सुनती है...मुस्कुराती है...

जिंदगी तुझको बड़ी देर से जाना मैंने...वो बुदबुदाती है।

उसकी स्कूटी स्टार्ट होती है...और वो ज्यययूूूंयूं से निकल जाती है...'गली-गली तेरी याद बिछी है, प्यारे रस्ता देख के चल...' एफ एम के जरिये उसके कानों गूंजती है मंेंहदी हसन की आवाज, वो स्कूटी रोककर दूसरा एफ एम चैनल को लगाती है...रास्ता अब भी वही था...