Monday, April 20, 2009

दुनिया के मशहूर प्रेम पत्र-१६ तुम मेरा बोधिवृक्ष

सुप्रिय,
थोड़ा तुम्हें अजीब लग सकता है, लेकिन अब इतनी दूर तक साथ चलते हुए मुझे लगने लगा कि तुम मेरे लिए जेंडर की, नाम या जाति की सीमाओं से परे मात्र एक ऐसा वजूद हो, जिसके भीतर से मैं गुजरता हूं और नितान्त किसी और लोक में चला जाता हूं। वहां की नागरिकता को हर कोई हासिल नहीं कर सकता। हो सकता है, उस लोक का मैं ही एकमात्र अकेला नागरिक होऊं। यदि वहां रहकर मुझे किसी से बात भी करना हो तो वापस तुम में से गुजरना होगा। क्या(...), तुम किसी ऐसे संसार की कल्पना कर सकती हो, जिसका ईश्वर और जिसका नागरिक एक ही और एकमात्र व्यक्ति ही हो! यहां तक कि तुम भी उस संसार के इस छोर पर रुका रह जाने वाला कोई चिन्ह हो? क्या तुम उस व्यक्ति के अकेलेपन के सुख या उस अकेलेपन के दु:ख की कल्पना कर पाओगी? बहरहाल, यह अलग बात है कि जब मुझे बात करनी होगी, मैं तुमको रचूंगा और बात करूंगा और कहने की जरूरत नहीं है कि मैं हर खत लिखते समय तुम्हें नये ढंग से रचता हूं। उन्नीस बरस के बाद मैंने तुम्हें अपने लिए और अपनी तरह से रचा। हालांकि, मैं विधाता नहीं हूं। लेकिन मैं तुम्हें रच-रच कर खुद को भी रचता ही हूं। क्योंकि, तुम्हें बीच में रखकर मैं खुद को बार-बार छानता हूं। एक बहुत क्षीण और सूक्ष्म से तार हैं, तुम्हारे होने के जिसके बीच से मैं गुजरता रहता हूं. और, अब मैं इतना बारीक हो गया हूं कि मेरा समूचा अस्तित्व सितारों पर उड़ती धूल की तरह है. तारों भरे आकाश की तरफ देखने का कभी तुम्हें मौका मिले तो मानना, वहां रोशनी की धूल की तरह मैं ही हूं.कल मैंने एक उपन्यास पढऩा शुरू किया था. द लास्ट टेम्पटेशन. यानी क्राइस्ट बनाम यीशू प्रभु की आखिरी कामना. इसमें लेखक ने एक कल्पना की कि क्राइस्ट को जब सूली पर चढ़ाया गया होगा तो मृत्यु के आखिरी क्षणों में उनकी इच्छा मेरी के साथ शारीरिक सुख के अनुभव की रही होगी. वही पवित्र मेरी, जिसे उन्होंने धूल से उठाकर इंसान होने का सम्मान दिया था. मुझे इस उपन्यास को पढ़ते हुए लगा कि इसमें बहुत बड़ी जोखिम है. एक तो यह क्रिश्चियन बिलीफ की किरचें-किरचें उड़ा देता है, दूसरे मुझे यह महत्वपूर्ण लगता है कि क्राइस्ट की विश्वजनीन छवि के बावजूद उन्हें मनुष्य की तरह समझने की एक ईमानदार कोशिश की गयी है. यह कोशिश क्राइस्ट को गिराने और सेक्स की सनसनी बनाने के लिए नहीं है, बल्कि सत्य को ज्यों का त्यों रखकर समझने की है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्य क्या है? सत्य को जानने के नाम पर हम भारतीय भी यह जानते हैं कि यह नहीं, यह नहीं (अर्थात नेति-नेति) अर्थात हम केवल झूठ को पकड़ते हैं और कहते है, यह सत्य नहीं. नतीजतन, अंतहीन विश्लेषण करते जाते हैं. अत: द लास्ट टेम्पटेशन का लेखक यही जानने की कोशिश करता है कि ईसा के बियांड भी कुछ था या ईसा भी एक देह का ही नाम था. क्या कोई भी, आदमी होने को फलांगकर अवतार पुरुष हो सकता है? क्या देह को रखकर बुद्ध या महावीर नहीं बना जा सकता है? मैं बुद्ध का या महावीर का अपमान किये बगैर यह बात कहना चाहता हूं कि क्या मनुष्य हुए बगैर सीधे-सीधे कोई ईश्वर हो सकता है?मुझे उपन्यास इसलिए अच्छा लगा कि लेखक क्राइस्ट के भीतर देह की तलाश क्राइस्ट के लिए नहीं अपने लिए करता है. यह क्राइस्ट की पूज्य छवि का ध्वंस नहीं है. यह वैसा ही है कि एक साधारण आदमी और बुद्ध के देह होने में अलग कहां होते हैं? यहां सेक्स और महानता दोनों प्रश्न की तरह हैं. क्राइस्ट तो एक बहाना है. क्राइस्ट को इस सच्चाई से छानकर देखना अपनी छुद्रता से मुक्त होना है. क्या भारतीयों ने श्रीमती इन्दिरा गांधी या लता मंगेशकर के जीवन में देह के अर्थ को सामने रखकर कभी कुछ लिखने की कोशिश की? महादेवी और मीरा के जीवन में भी देह है और वे उसे लांघकर कहां और किधर गईं? हम मिथ की मीरा या मिथ के क्राइस्ट या मिथ के महावीर को लांघकर उन्हें समझने की कोशिश करें, तो पायेंगे कि सेक्स के ऊपर कैसे उठा जा सकता है? क्या साधना के दौरान बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर उन्हें यशोधरा का स्वप्न आया होगा कभी? मुझे तो यही लगता है कि मैं चुप-चुप हमेशा आदमी होने की सीमा से जूझता रहता हूं. और जूझकर वहां चला जाता हूं, जहां सिर्फ मैं ही अकेले नागरिक की तरह टहलता रहता हूं. मुझे तो लगता है द लास्ट टेम्पटेशन एक महान कृति का दर्जा चाहे हासिल न कर पाये, लेकिन क्राइस्ट के बहाने मनुष्य होने की पीड़ा को फलांगकर देखने की कोशिश है. कभी तुमको पढऩे भेजूंगा. प्रिय, कभी-कभी इच्छा होती है, तुम्हारा घर किताबों से भर दूं. कुछ किताबें मुझे ऐसी लगती हैं, जिनकी हर लाइन पढ़कर, उसकी व्याख्या करके तुम्हें बताना चाहता हूं. मैं अच्छा लेखक चाहे न बन पाऊं पर मैं एक बहुत गहरा पाठक बनना चाहता हूं. यह ज्ञान मुझे बहुत पहले प्राप्त हो गया था. तुम्हें खत लिख-लिखकर तो और भी ज्यादा. तुम मेरा बोधिवृक्ष हो, जहां मैं आंख मूंदकर चुपचाप बैठा रहता हूं. एक दिन मैं तुम्हारे पास आऊंगा. पुस्तकों का एक बड़ा सा गट्ठर लेकर. इससे प्यारी चीज तुम्हारे लिए क्या होगी. बाकी ठीक.
तुम्हारा........

प्रेम पत्रों की अन्तिम कड़ी कल....

2 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही बढ़िया .इस तरह का कहना सुनना सब रोचक -रोमांचक सा लगता है ..शुक्रिया प्रतिभा जी इस दुनिया से रूबरू करवाने का

Kavi Pankaj Prasun said...

प्रतिभा मैडम ,
प्रेम पत्रों का यह सिलसिला यूं ही चलता रहे आप दुनिया के १६ नहीं बल्कि हजारों प्रेम पाटों से पाठकों को रूबरू कराएंगी.
काफी दिनों बाद आपके ब्लॉग पर विजिट किया . साधुवाद