Saturday, October 27, 2012

आकाश से टकराती खिलखिलाहटें


मासूम खिलखिलाहटों के एक रेले ने जिस मजबूती से मुझे अचानक आ पकड़ा था कि व्यक्तित्व में समाई शाश्वत उदासियां भी भाग खड़ी हुईं. कैसा अजूबा था. उन चेहरों से, उन नामों से कोई पहचान नहीं थी सिवाय इसके कि वो बच्चे थे और मुझे बच्चों से बेहद प्रेम. बच्चे प्रेम को सूंघ लेते हैं. शुरूआती संकोच बमुश्किल दस मिनट में धराशायी हो चुका था.

मैं ऊधमसिंह नगर से थोड़ी ही दूर स्थित प्राथमिक विद्यालय रामसजीवनपुर में एक छात्र बनकर गई थी. उनके बीच बैठी, उनकी किताबें पलटते हुए. उस स्कूल में बच्चे एक अखबार निकालते हैं. हर रोज वो गांव के कोने-कोने में फैल जाते हैं और खबरें लेकर आते हैं. फिर उन खबरों को लिखते हैं और एक चार्ट पेपर पर उन खबरों को चिपकाते हैं. बच्चों की खबरों को चिपकाते हुए अपनी पहली अखबार की नौकरी की याद ताजा हो आई जब कंप्यूटर का जमाना नहीं था. 

अखबार बोर्ड पर चिपका कर बनते थे. मैं कैंची से खबरों की कटाई-छंटाई करके खबरों को चिपकाती हूं. उनसे पूछते हुए कि कौन सी खबर कहां लगेगी. बच्चों का उत्साह इस कदर उफन रहा था कि वो मुझ पर गिरे जा रहे थे. हर बच्चा करीब बैठना चाहता था. मुझे छूना चाहता था. मैं बीच-बीच में सबके किसी के सर पर हाथ फिरा रही थी, किसी के गाल छू रही थी. हम सब कितने गहरे दोस्त हो गये थे.
हमारे एक साथी को इन बच्चों के शिक्षक राघवेन्द्र का साक्षात्कार रिकार्ड करना था, मैं उस साक्षात्कार को सुनना चाहती थी. बच्चों के हुजूम को मैं उंगली से इशारा करके चुप रहने को कहती हूं. वो सब मुझे घेरे हुए थे. मैं जैसे उस हुजूम में घिर गई थी. ये कैसी नाइंसाफी थी कि इतने सारे बच्चों को चुप रहने को कहा जाए. उंगली के इशारे का असर कुछ सेकेंड्स में गुम हो जाता. आखिर मुझे क्लास से बाहर आना पड़ा ताकि साक्षात्कार आसानी से हो सके.

बाहर बड़ा सा आसमान और बड़ी सी जमीन थी. लेकिन मेरे इन बच्चों की खिलखिलाहटों के शोर को समेट पाने को आज धरती छोटी पड़ रही थी. बच्चे मुझे खींच रहे थे. मैडम जी, आपको नहर दिखायेंगे. मैंने देखा मना करते-करते भी मैं नंगे पांव आधा रास्ता तय कर चुकी हूं. आधे रास्ते से लौटती हूं. मैडम जी, हम आपको डांस दिखायें कुछ बच्चे नाचने लगते हैं. तभी कोई मेरी हथेली पर एक टाॅफी रख जाता है. डांस खत्म हो जाता है, अंताक्षरी शुरू होती है...मजा नहीं आता. उनका उत्साह आसमान छूने वाला था. सुभाष जी को आती है कला बच्चों का हाथ पकड़कर आसमान छूने की मैं तो बस हक्का बक्का थी. मुझे बस प्यार करना आता है, कई बार उस प्यार को भी संभाल नहीं पाती. आज भी वही हाल था. बच्चों के प्यार से मेरा दिल भरा था लेकिन मैं उन्हें संभाल नहीं पा रही थी.

मैडम जी, हमें कोई खेल खिला दो ना? बच्चे मेरी मुश्किल समझ गये थे शायद. मैं कौन सा खेल खिलाउं....अपने बचपन में लौटती हूं...खो-खो, कबड्डी...अचानक याद आता है कि सुभाष जी ने बच्चो से हाथ पकड़कर गोला बनवाया था. मैं कहती हूं चलो सब एक दूसरे का हाथ पकड़ो और गोला बनाओ. सेकेंड्स में गोला बन गया. बच्चे इतने ज्यादा थे कि धरती कम पड़ गई. मैं अनाड़ी थी. अंदाजा ही नहीं मिली कि मेरे बच्चों के कदमों को ये धरती तो बहुत कम है. मैंने थोड़ी सी अक्ल का इस्तेमाल करते हुए कहा दो गोले बनाओ. वाह! सेकेंड्स में दो गोले तैयार हो गये. बाहर वाला गोला घूमता तो अंदर वाला गोला तालियां बजाता. फिर अंदर वाला गोला घूमता और बाहर वाला गोला तालियां बजाता. मैंने चैन की सांस ली....बच्चे इतने खुश थे कि चिल्ला रहे थे. उनका शोर आसमान से भी ऊंचा जा रहा था. कुछ बच्चे बीच बीच में गोले से बाहर आकर मेरे करीब बैठ जाते. मैडम जी, आप जाना मत...उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा. मैंने कहा, नहीं जाउंगी...अपने झूठे शब्दों पर मुझे खुद हैरत थी क्योंकि मेरे आना भले ही तय नहीं था लेकिन जाना तो तय था ही. आप झूठ बोल रही हो आप चली जाओगी...एक लड़की उदास हो जाती है. मेरी गोद में सर रखती है. कोई आकर मेरी हथेली पर हाजमोला की गोली रख देता है. उधर गोले वाला खेल भी अब बिगड़ चुका था और सब के सब फिर मुझे घेरे बैठे थे.

तभी स्कूल की घंटी बजी और इंटरवल हो गया. मैंने राहत भरी नजरों से बच्चों को देखा. लेकिन ये बच्चे हमें हमेषा गलत साबित करते हैं. बहुत सारे बच्चों ने घोशणा कि उन्हें भूख ही नहीं लगी है. वो खाना नहीं खायेंगे. मैं समझ गई थी कि ये और कुछ नहीं मुझे न छोड़ने का लालच था. मैं कहती हूं खाना खाओ तुम लोग फिर खेलेंगे. नहीं,,,,फिर आप चली जाओगी...मैं उदास हो गई थी कि मुझे सचमुच ही जाना था. बच्चे खाना छोड़े बैठे थे. मैंने कहा, मुझे बहुत भूख लगी है चलो सब मिलकर खाना खाते हैं. मिड डे मील खाने का सिलसिला तो उत्तरकाशी के स्कूल से शुरू हो ही चुका था. बच्चे यह सुनकर बेहद खुश थे कि मैं उनके साथ खाना खाने वाली हूं. मिनटों में सबके हाथ में खाना था. गर्मगर्म उरद की दाल और चावल. सच कहूं...बच्चों के प्यार में याद ही नहीं रहा था कि हम बिना एक कप चाय पिये ही इस सफर को निकल पड़े थे. खाने की खुशबू ने याद दिलाया कि पेट को कुछ चाहिए. बच्चों की थालियां बढ़ी हुई थीं. मैं सबकी थाली से एक एक कौर खाती हूं और तृप्त होती हूं. आत्मा की भूख शांत हो रही थी उन निवालों से. जाने कितनों ने कितने ढंग बताये, योग, ध्यान, पूजा, अर्चना, मुझ पर कभी कुछ असर नहीं किया....लेकिन बच्चों की उस दुनिया में जाकर लगा कि आत्मा पर जितने घाव थे वो भर गये हों जैसे. मन उस मुक्ति ओर प्रस्थान कर चुका था जिसकी तलाष में जाने कितने सदियों से ऋषी मुनि, संतजन भटक रहे हैं. यही वो शोर था जो भीतर के कोलाहल को शांत कर रहा था. हां, बिना धार्मिक हुए भी संत हुआ जा सकता है...बरबस खुद से कह उठती हूं.

हमारे स्कूल से जाने का वक्त था. बच्चे हाथ छोड़ने को तैयार नहीं. मैं एक झूठा वादा बोकर उठती हूं कि फिर आउंगी जल्दी ही. जानती मैं भी हूं कि उत्तराखंड के इस सुदूरवर्ती गांव के छोटे से स्कूल में दोबारा आउंगी या नहीं पता नहीं...बच्चे भी इस सच को जानते हैं. वो इस झूठ का बुरा नहीं मानते. नजर की आखिरी हद तक वो हाथ हिलाते रहते हैं. मैं जानती हूं वो बच्चे हैं. वो अब तक मुझे भूल भी चुके होंगे लेकिन उन्होंने उन चंद घंटों में जो मुझे दिया उसे मैं उम्र भर नहीं भूल सकती.

नाम, पता, ओहदा उन्हें किसी बात से मतलब नहीं था उन्हें मतलब था बस प्यार से. ऐसा निष्छल संसार बच्चों का ही हो सकता है. समंदर, रेगिस्तान, जंगल पहाड़ न जाने कितनी यात्राएं एक टुकड़ा षान्ति के लिए कर डाली थीं. वह शांति यहां मिली. मैं खाली हाथ गई थी और भरे मन लौटी...

उस रात जिंदगी ने एक टुकड़ा नींद बख्शी थी मुझे.

Monday, October 8, 2012

अभिनय


'अभिनेता का कर्तव्य मनुष्य की आत्मा को रंगमंच पर जीवन प्रदान करना है'- . स्तानिस्लाव्स्की

'सच्ची ट्रेजडी बाहरी परिस्थितियों और घटनाओं के कारण घटित नहीं होती, वह घटित होती है क्योंकि वह व्यक्ति जिसके साथ ट्रेजडी घटित होती है, वैसा है जैसा कि वह है. ट्रेजिक हीरो अपनी ट्रेजडी अपने साथ लाता है जो वह है उस कारण वह अभिशप्त होता है ' - सिडनी कासलमैन
इन दिनों रंगमंच पर कुछ किताबें पलट रही हूं. जानने को जितना भी विस्तार मिले कम ही लगता है. पिछले दिनों रंगमंच के एक साथी ने कहा,' दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो एक्टिंग न करता हो'. यह कहकर उसने मेरी उस बात को धडाम से गिरा दिया कि 'मुझे एक्टिंग करनी नहीं आती' . लेकिन मुझे तो सचमुच एक्टिंग करनी नहीं आती. अगर आती होती तो जीवन आसान न हो जाता. यह बात मैं खुद से कहती हूँ. नाटक में इसे 'स्वगत' कहते हैं. 

जिंदगी ढेर सारे मास्क लिये खड़ी रही लेकिन मुझे अपने चेहरे पर लगाने लायक कोई मास्क नहीं मिला. जब भी कोशिश की कि कोई मास्क लगाकर जिंदगी को आसान बनाया जाए, इतनी घुटन हुई कि बिना मास्क के जिंदगी के जोखिम उठाना ही बेहतर आॅप्शन लगा.. 

रंगमंच से जुड़ाव सिर्फ नाटक देखने तक का रहा हो ऐसा भी नहीं. नाटकों को पढ़ने, रंगमंच से जुड़े दोस्तों से जुड़ने और कुछ नाटक लिखने से भी जुड़ाव रहा. नाटकों की समीछायें लिखने से भी. सोचती हूं तो खुद को काफी करीब पाती हूं रंगमंच के. लेकिन अजीब सा डर है जो रंगमंच से सीधे जुड़ने के बीच आता रहा. शायद वो मास्क लगाने का डर था, या लोगों के हुजूम का. भीड़ मुझे कभी अच्छी नहीं लगती. डर लगता है. मुझे याद है मेरी दोस्त ज्योति जब इप्टा में थी और मैं उसके नाटक देखने जाया करती थी, मंच पर वो होती थी और रोएं मेरे खड़े होते थे. वो कभी गल्तियां नहीं करती थी और मैं हमेशा नर्वस रहती थी. मेरी बेटी जब पहली बार मंच पर थी तो मैं कांप रही थी. मेरे आंसू बह रहे थे. हालांकि अपने दोस्तों को नाटक की भूमिकाओं में खुद को खोते हुए देखती हूं तो बहुत अच्छा लगता है. कुछ देर को वो अपना 'मैं' उतारकर रख देते हैं. एक किरदार को पहन लेते हैं. उसका सुख, उसका दुख, उसका जीवन, उसकी भाव-भंगिमाएं, उसका मौन, उसके शब्द. कम से कम उतनी देर उनका 'मैं' राहत में होता है. वो दूर बैठकर हमारे भीतर बसे दूसरे शख्स को देखता है, तालियाँ बजाता है लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं, अभिनेता का अस्तित्व किरदार के अस्तित्व में लगातार सांस लेता रहता है.

हम जिन चीजों में कमजोर होते हैं उनके प्रति आसक्ति होती ही है. जाने अनजाने न जाने कितनी बार अभिनय की तरफ खिंचाव हुआ है. नाटकों को देखने का जुनून, रंगमंच से जुड़े लोगों से मिलने की बात और अब सोचती हूं अपनी पहली कहानी (जिसने पहचान दी थी) अभिनय ही थी. सोचा तो कभी नहीं था इस बारे में फिर भी...

न...न....एक्टिंग करनी नहीं. बस सीखनी है. हालांकि बिना सीखे भी मास्क वाले चेहरों में और बिना मास्क के चेहरों में भेद करना खूब आता है मुझे, शायद इसीलिए एकान्त ही मुझे रास आता है भीड़ नहीं... 

Friday, October 5, 2012

कर्ज़ अल्फाजों का, शुक्रिया दोस्तों का


कलम पकड़ती, तो न जाने कितनी देर तक उसे ताकती ही जाती. आंखों में जो दृश्य थे वो एहसास बनकर रगों में दौड़ते फिरते थे. एक दृष्य कई-कई रंगों में, कई-कई अहसासों में मंडराता. लिखने को शब्द नहीं. कागज कोरा का कोरा...क्या लिखें, कैसे लिखें और उससे भी बड़ा प्रश्न कि क्यों लिखें...? रात की सियाही जैसे-जैसे आसमान पर छलकती जाती न लिखने की पीड़ा गहराती जाती. 


न लिखने की...? अम्म्म्म्....नहीं, न लिखने की नहीं, न लिख पाने की. कागज पर कुछ अगड़म-बगड़म से शब्द गिर पड़ते तो चैन आता. सवेरे उस कागज को चिंदी-चिंदी करके हवा में उछाल देना और शुक्रिया अदा करना अक्षरों का जिनसे खुद को खाली किया. इसी बीच रिल्के के कुछ खत हाथ लगे. उन्होंने काप्पुस को लिखा, अगर तुम लिखे बगैर जी नहीं सकते तो लिखो...तब ही लिखो

लिखने को लेकर कभी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही, बस कि यह एक मजबूरी सा शामिल रहा जीवन में. जिसके न होने से होने तक का सफर एक तकलीफ का सफर ही रहा. लिखना कोई लग्जरी नहीं, युद्ध है अपने भीतर का. इस युद्ध में लेखक की बस हार ही होती है. हां, उसके पाठकों को जरूर कुछ हासिल होता है. पाठकों का हासिल कभी-कभार लेखक के जख्मों पर मरहम लगाता है.

इसी बीच प्रोफेशनल राइटिंग की राह मिली. पेशा चुन लिया पत्रकारिता का. यहां दिल-विल की सुननी ही नहीं थी. बस आंखों देखी लिखनी थी. सच देखना, उसकी पड़ताल करना और वही लिखना. लेकिन कोई बताये कि बिना संवेदना के कुछ भी लिखना संभव है क्या. हर घटना पहले दिल पर नक्श होती है, फिर लफ्जों में उतरती है. इसी के चलते पत्रकारिता भी दुश्वार ही रही. 

हर लेखक अपने मौन में रहता है. उसका एकान्त उसकी पूंजी होता है. पत्रकारिता आपको न मौन रहने की गुंजाइश देती है, न एकान्त. कभी लेखक पत्रकार से कहता मैं भी हूं. कभी पत्रकार लेखक को डपट देता, तुम्हारी जरूरत ही नहीं. इसी युद्ध में बारह बरस गुजर गये. अनुभवों के न जाने कितने गांव देखे, अहसासों की न जाने कितनी रणभूमि पर अक्षरों के युद्ध लड़े. इस युद्ध में कभी लेखक जीतता, कभी पत्रकार. कभी-कभी दोनों एक साथ हो लेते और संभाल लेते एक-दूसरे को. लेकिन यकीन मानिए इस खेल में मैं हमेशा ही हारी. मुझे कविताओं ने पनाह दी. वो कविताएं जिन्हें कविता कह पाने का साहस कभी हुआ ही नहीं. एक संकोच घेरे रहा कि क्या ये कविता है? वो संकोच अब भी अपने हर लिखे को लेकर कायम है. ये लिखते वक्त एक मित्र की बात याद आती है कि विनम्रता भी एक किस्म का अहंकार है. फिर भी इस संकोच से नहीं निकल पाती. 

तो लिखना एक किस्म की तकलीफ है, जिससे उम्मीद का जन्म होता है. लेखक चाहे तो अपने पाठकों का आसमान बड़ा कर सकता है....लेकिन ये जिम्मेदारी बहुत बड़ी है. लेखक होना....बहुत बड़ी बात है अगर कोई आपके लिखे को मान दे तो उसे पलकों पर उठाना चाहिए.

यह पलकों पर उठाना ही था कि जब मुझे अपने साथियों के साथ लेखन कार्यशाला हेतु उधमसिंह नगर जाना था तो संकोच को पीछे धकेल ही दिया और अपने गुरुओं का देय चुकाने चल पड़ी. सिखाने नहीं, सीखने. सामने वही सवाल थे जो हर रोज मेरे सामने होते हैं, तब से जब से होश संभाला. हर बार लिखने से पहले वही बात कि कहां से शुरू किया जाए लिखना. कैसे आगे बढ़ें और किस तरह पाठकों का हाथ पकड़ लें. भाषा, शैली, विन्यास, लिखने को लेकर संकोच सब कुछ तो वैसा का वैसा ही. ऐसा लगा कि सवाल भी मेरे ही हैं और जवाब भी मुझे ही देने हैं. अपने गुरू का स्मरण करते हुए उन्हें ही सामने कर देती हूं. कितनी बार झगड़ी हूं मैं रिल्के से भी कि जब काप्पुस के सवालों के जवाब दिए तो मेरे क्यों नहीं. मैं काप्पुस से कम योग्य तो नहीं. वो फिर मुस्कुराते हैं, अगर अब तक के गुजरे अवसाद से बड़ा अवसाद गुजर रहा है तो समझ लो जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है...हां, हां, समझ गई मैं...गुस्से से भर उठती हूं. बचपन से अब तक सैकड़ों बार पढ़ चुकी हूं ये लाइनें. बहुत अवसाद मिल गया. अब जरा ये भी बताइये कि रखूं कहां इसे....वो चुप ही रहते हैं. जवाब आता है 'लिखने में.' जवाब कहां से आता है. रिल्के तो खामोश थे. मैं भी चुप थी. फिर कौन बोला? 

पता नहीं. बस इतना पता है कि हर अनुभव का दर्ज होते जाना जरूरी है. न जाने आने वाले वक्त में कौन सा अनुभव रोशनी बनकर किसी को राह दिखा रहा हो. अच्छा, बुरा, सही, गलत लिखने में कुछ नहीं होता. बस कि दिल से महसूस करना और उस महसूस किये को अक्षरों में शरण देना. आखिर सदियों पहले के वक्त को हमने अक्षरों से ही तो जाना है. अपने सवालों को तराशते हुए, अपने ही सवालों में बार-बार उलझते हुए, सुलझते हुए बस कुछ दर्ज करते जाना...यही तो है लिखना. संकोच...यही तो बचाता है हमारे भीतर हमारा होना...उधमसिंहनगर के सभी साथियों की शुक्रगुजार हूं जिन्होंने अपने सवालों के योग्य मुझे चुना. एक उम्मीद जागती है कि अपने भीतर के सवालों को बाहर निकालने के बाद भीतर जो जगह बनी होगी, उसमें लिखने की संभावनाओं ने जरूर जन्म लिया होगा. आमीन!

Monday, September 24, 2012

इनमें तो कुछ भी ठीक से दर्ज नहीं....


भूगोल के किसी भी पन्ने में नहीं दर्ज हैं
एवरेस्ट से भी ऊंचे वे पहाड
जिन्हें पार किये बगैर
जिंदगी तक नहीं जाता कोई रास्ता

नहीं दर्ज कोई जंगल
जिनसे गुजरे बगैर
मुमकिन ही नहीं खुद की
एक सांस भी छू पाना

नहीं हैं कोई जिक्र उन नदियों का
जो आंखों से लगातार बहती हैं
और सींचती रहती हैं
पूरी दुनिया में प्रेम की फसल

ना...कहीं नहीं लिखा उन सहराओं का नाम
जिसके जर्रे-जर्रे में छुपे हैं
इश्के के नगमे
और विरह की कहानियां

उन दिशाओं का नाम तक नहीं
जिस ओर गया था प्रेम का पथिक
देकर उम्र भर का इंतजार

भला किस पन्ने पर लिखा है
उन लहरों का नाम
जिन पर मोहब्बत लिखा था
और वो हो गई थी दुनिया की सबसे उंची लहर

बार-बार घुमाती हूं ग्लोब
पलटती हूं दुनिया भर के मानचित्र
नहीं नजर आता उस देश का नाम
जहां अधूरा नहीं रहता
प्यार का पहला अक्षर
मुरझाती नहीं उम्मीदें

स्मृतियाँ शाम के उदास साये में
लिपटकर नहीं आतीं
और एक दिन मुकम्मल हो ही जाता है इंतजार
जिंदगी के इसी पार

किसने लिखी हैं ये भूगोल की किताबें
किसने बनाये हैं दुनिया के नक्शे
इनमें तो कुछ भी ठीक से दर्ज नहीं....

(२३ सितम्बर को अमर उजाला के साहित्य पेज पर प्रकाशित )

Wednesday, September 19, 2012

कूदो तो इतना कि आसमान छू लो


वो एक कमरे में टहल रहे थे. जैसे किसी बागीचे में हों. टहलना खत्म हुआ और सुभाष सर ने पूछा, किसने क्या देखा? किसी ने पंखा देखा, किसी ने बोर्ड, किसी ने मैम को देखा किसी ने किताबें. सुभाष सर एक बच्चे का जवाब सुनकर ठिठक गये, जब उसने कहा मैंने सूरज देखा. वो पलटे. क्या...क्या देखा आपने? वो उस बच्चे के करीब पहुंच गये. उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा मैंने सूरज देखा. कमरे में सूरज...शायद यही सोच रहे थे सुभाष सर...उस बच्चे ने चार्ट पेपर पर अपने नाम के साथ अपने हाथ से बनाये सूरज की ओर इशारा किया...वहां देखा.

कौन तय करता है सूरज के उगने और डूबने की दिशा और समय. बच्चों की दुनिया में वो सब कुछ खुद तय करते हैं. नाटक सीखने आये बच्चे खुद अपने सुभाष सर को न जानेे क्या-क्या सिखा गये. पंद्रह सितंबर का जो दिन थियेटर एक्टिवटी के लिए तय था, उस दिन का नाटककार कोई और ही था. यूं तो हमारी जिंदगी के हर लम्हे का राइटर डायरेक्टर कोई और ही है लेकिन उस दिन यह बात डीएम के आदेश के रूप में सामने आई. सामने आई बारिश की उस विभीषिका के रूप में. मौसम के गुस्से का असर ये कि दून के सारे स्कूल बंद. जिन बच्चों को कार्यशाला के लिए आना था उन्हें घर भेज दिया गया. सुभाष जी परेशान, लेकिन शो मस्ट गो आॅन...तो राजकीय जितने भी बच्चे आये थे उनके साथ खेल शुरू हुआ.

अपनी उंगलियों को हिलाते हुए नीचे से पर लाना... ऊपर से नीचे. बच्चों के मन में रखी संकोच की पर्तें एक-एक कर उतरने लगी थीं. हां, एक बहुत सुंदर बात ये दिखी कि सुभाष सर ने सख्त हिदायत दी, खेल में शामिल सबसे छोटी बच्ची मधु के हाथ से ऊपर कोई अपना हाथ नहीं ले जायेगा. हमें अपना ही नहीं अपने साथियों की क्षमताओं का भी ख्याल रखना चाहिए. हमारी गति, हमारा वेग कहीं किसी का दिल न दुखा दे. कि पकड़ लंे हाथ अगर तो सब साथ बढ़ें...खूब बढ़ें. शायद रोजमर्रा की जिंदगी में हम बच्चों को ऐसे ही संदेश देना भूल जाते हैं, जिसे सुभाष सर ने बच्चों को प्यार से समझाया. खेल का असली मजा तब है जब सब साथ चलें.

खेल आगे बढ़ने लगा. दो हाथ किरदार बने. एक ने दूसरे से उसका नाम पूछा, हाल पूछा और भी बहुत कुछ. एक कहानी सुनाई गई. एक पढ़ाकू बच्चे की कहानी. जिसे सिर्फ पढ़ना पसंद है. उसका दोस्त, मम्मी पापा सब उसे समझाते हैं कि पढ़़ने के अलावा खेलना भी जरूरी है लेकिन वो समझता ही नहीं. इसी कहानी को बच्चों के अलग-अलग ग्रुप में नाटक के रूप में भी करके दिखाया.

बच्चे अब अपने पूरे रंग में आ चुके थे. खाने के डिब्बे भी आ चुके थे. बच्चे अंदाजा लगा रहे थे कि उसमें क्या होगा. सब अपनी पसंद की चीजों का नाम ले रहे थे. मधु, मुस्कान, धर्मवीर, जीशान, आशाराम, अमनजोत सिंह, करन, सौरभ, दिग्विजय, बिलाल, अभिषेक ने सुभाष सर और प्रिया दीदी के साथ मिलकर नाश्ता किया और दुगुने जोश से नाटक की ओर लौटे.

कूदो तो इतना कि आसमान छू लो....सुभाष सर ने कहा भी और कूदकर दिखाया भी. सारे बच्चे अपने-अपने सर के ऊपर टंगे आसमान से होड़ लेने में जुट गये. अपनी पूरी ताकत से आसमान की ओर छलांग लगाते. उनकी आंखों में ऐसी चमक थी कि लगा कि आसमान उनकी मुट्ठियों में आ गया हो. हालांकि मुझे तो वो बेचारा उनके कदमों में बिछा हुआ नजर आ रहा था.

नाटक सिर्फ संवाद नहीं होता, सिर्फ मंच नहीं...जिंदगी हर पल एक नाटक है, एक खेल. कितनी अजीब बात है कि नाटक में हम स्वाभाविक होना चाहते हैं और जिंदगी में नाटकीय. सुभाष सर कोई किताब पढ़ रहे थे. उसे पढ़ते हुए उन्हें बहुत मजा आ रहा था. कभी वो किताब पढ़ते हुए दीवार से टकरा जाते, कभी लेट जाते, कभी पैर ऊपर करके जोर-जोर से हंसते. बच्चे उन्हें देखकर खूब खिल रहे थे. रोज की स्वाभाविक बात पढ़ना जब अभिनय बनी तो मुश्किल हो गई. सब सुभाष सर की तरह पढ़ रहे थे. सचमुच....आसान नहीं अभिनय करते हुए सहज हो पाना...

यह एक तकनीक थी बच्चों के करीब जाने की, दोस्ती करने की, नाटक को खेलने की और खेल को अभिनीत करने की. थोड़ी देर में पूरे कमरे में सफेद रंग की बाॅल थीं और बच्चों की चमकती आंखें. अगर हम खेल में डूब जाये ंतो सारे संकोच धराशायी हो जाते हैं. खेल की शुरुआत में जो बच्चे सहमे हुए थे, वो अब खूब चहक रहे थे. फिर मिलेंगे के वादे के साथ धमाचैकड़ी का सिलसिला अगली गतिविधि तक के लिए रूका जरूर लेकिन इस कार्यशाला का असर उन बच्चों के जेहन पर तारी रहेगा.