Saturday, July 4, 2009

एक दिल बच गया है साबुत

हमने भी विदा कर दिया प्रेम
रुखसत कर दीं ख़ुद को टटोलने की
कोशिश करती बातें
ख़ुद पर से उतार दिया चांदनी का जादू
यह सफर यहां खत्म होता है

अब एक नाव तट से बंधी खड़ी है
एक आदमी कहीं पगडंडियों में खो गया है

पर, एक दिल बच गया है साबुत

कितना कुछ नष्ट होने के बाद भी
एक तपिश कहीं बची रही गयी है
शायद, कम ही जानते थे हम भी
गमे इश्क को।

दुख, प्रेम और समय

बहुत से शब्द
बहुत बाद में खोलते हैं अपना अर्थ

बहुत बाद में समझ में आते हैं
दुख के रहस्य

खत्म हो जाने के बाद कोई संबंध
नए सिरे से बनने लगता है भीतर
...और प्यार नष्ट हो चुकने
टूट चुकने के बाद

पुनर्रचित करता है खुद को
निरंतर पता चलती है अपनी सीमा
अपने दुख कम प्रतीत होते हैं तब
और अपना प्रेम कहीं बड़ा...
- आलोक श्रीवास्तव

Wednesday, June 24, 2009

मत बुझाओ इंतजार का चांद

तिथियों की गणना के हिसाब से तो पूर्णमाशी थी उस रोज लेकिन चांद न जाने कहां गुम था। हवाओं ने जिस्म को सहलाया तो महसूस हुआ कि हवाओं में भी तिथियों की वही गणना है जो ज़ेहन में। कैलेंडर-वैंलेंडर की बात नहीं है। दिल की बातें और वही हिसाब-किताब। न एक रत्ती कम, न एक रत्ती ज्यादा।

इंतजार की गहरी पीड़ा से डूबे, रचे-बुने एक-एक लम्हे की कीमत सोने या हीरे से कम भी तो नहीं होती। इसलिए पक्के सुनार की तरह हर लम्हे का सही-सही हिसाब रखना होता है. एक अनकहा वादा था दोनों के बीच कि पूर्णमाशी का चाँद साथ देखेंगे हमेशा. उस रात की सारी हवाओं को एक साथ पियेंगे. जख़्मों को खुला छोड़ देंगे कि हवा ही लगे कुछ. तो ये कौन सी अमावस आ गई है, जिसने तिथियों का हिसाब-किताब बिगाड़ दिया।

देखो, उस पगली को लालटेन लेकर ढूंढ रही है अपने ख्वाब का चांद...


Monday, June 22, 2009

ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है

िजंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा।


तू मिला है तो एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है,


इक $जरा सा $गमे दौरा का भी है ह$क है जिस पर
मैंने वो सांस भी तेरे लिए रख छोड़ी है


तुझ पे हो जाऊंगा कुर्बान तुझे चाहूंगा
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा...


अपने जज़्बात में नग़्मात रचाने के लिए
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे,


मैं तस्सवुर भी जुदाई का भला कैसे करूं
मैंने $िकस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे,


प्यार का बनके निगहेबान तुझे चाहूंगा
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा...

तेरी हर चाप से जलते हैं ख्य़ालों में चिरा$ग
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये

तुझको छू लूं तो फिर ऐ जाने तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुश्बू आये

तू बहारों का है उन्वान तुझे चाहूंगा
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा...

Sunday, June 21, 2009

संगीत का दिन और दिल का साज



आज विश्व संगीत दिवस है. मुझे नहीं पता कि ऐसे दिनों का क्या महत्व होता है लेकिन इतना $जरूर है कि मेरे लिए हर दिन संगीत का दिन, कविता का दिन हो यही चाहती हूं. कविता जिसमें  जिन्दगी  के सारे रंग हों, संगीत जिसमें जिं़दगी के सारे आरोह-अवरोह, मींड़, गम$क, मुर्की, आलाप सब शामिल हों. न जाने कितने सुर अपने-अपने सधने के इंत$जार में बेकल होकर इधर से उधर घूम रहे हैं. कई बार तो ये हमारे बेहद करीब से हमें छूते हुए निकल जाते हैं. कोई मुंह देखता है तो कोई, सिरहाने बैठ ही जाता है चुपचाप . ये सुर भी चाहते हैं कि कोई आए और थाम ही ले उन्हें. लेकिन यह सबके बूते की बात नहीं. बहुत रिया$ज चाहिए. कड़ी साधना. देह के इस साज में सांसों का सुर साधना भी रिया$ज ही तो है. आइये हम सब साधते हैं अपनी-अपनी जिं़दगी के तमाम बिखरे हुए, टूटे हुए सुर कि िजंदगी मुस्कुरा ही उठे. आमीन!

Saturday, June 13, 2009

सफर में शब्द और कोई नहीं...

सूरज की एक तिरछी सी पतली लकीर लड़की के गालों को छूते हुए माथे पर पड़ रही थी. लड़का उसे देख रहा था. लड़के ने अपने भीतर कुछ पिघलता हुआ महसूस किया. उसने पूरे भावों के साथ कुछ कहा लड़की से. शब्द चले हौले-हौले एक सफर को. सफर लंबा था भी, नहीं भी. हर शब्द संभलता हुआ, बिखरता हुआ बस पहुंचने की जल्दी में. धरती ने आकाश को कुछ कहते हुए देखा. सुना नहीं. शब्द सफर में थे अब तक. लड़की मुस्कुराई. लड़के की आंखों में कोई गीली सी लकीर उभर आई थी. लड़की ने पलकें मूंद ली थीं बस. लड़के ने उन मुंदती पलकों में खुद को कैद होते हुए महसूस किया. शब्द अब तक सफर में थे. लड़की अतीत की गर्द झाड़-पोंछकर मन के आंगन को साफ कर रही थी।

लड़का अभिभूत था. उसके आंचल का एक कोना भर मुट्ठी में पकड़कर लड़के को लगा कि उसने पूरा आसमान मुट्ठी में ले लिया है. लड़की के माथे पर सूरज चमक रहा था. उसकी बिंदी को रोशनी से भर रहा था. उसकी आखों में भी रोशनी झांक रही थी. लड़का अपनी हथेलियों से लड़की के माथे पर पड़ती रोशनी को रोक लेना चाहता था. लड़की ने मना किया ऐसा करने से. लड़का मान गया।

लड़की ने दरवाजे पर सजाये वसंत के पौधे में बड़े दिनों बाद पानी डाला. बालकनी में झुक आई पूरनमाशी की डाल पर स्मृतियों के फूल न जाने कब से लगे-लगे मुरझा चुके थे. जाने कौन सा मोह था कि लड़की ने उसे सहेजा हुआ था अब तक. उस रोज लड़की ने उन सारे सूखे फूलों को अपने आंचल में भर कर पूरणमाशी की डाल को नये फूलों के लिए खाली कर दिया।

लड़का देख रहा था सब कुछ. शब्द अब भी सफर में थे. लड़की न जाने कहां खोई हुई थी. उसे न जाने कितना काम था. वह बीच-बीच में लड़के को देख लेती थी मुस्कुरा कर. लड़की के माथे पर पसीने की बूंदे हीरे सी चमक रही थीं. लड़का उनकी खूबसूरती में डूबा था. उसका दिल चाहा कि ये हीरे ऐसे ही चमकते रहे हैं हमेशा. लेकिन लड़की ने पसीना अपने कुर्ते की बांह से पोंछ लिया. लड़का अनमना हो गया. लड़की ने बिखरे हुए बालों का जूड़ा बनाया. जूड़ा पसंद नहीं था लड़के को. वह बालों को खुला देखना चाहता था. जुल्फों के जंगल में खुद को खो देना चाहता था. उनकी खुशबू को अपने भीतर बसा लेना चाहता था. लेकिन लड़की ने उन्हें बांध लिया था।

लड़का अब तक लड़की के प्रेम का इंत$जार कर रहा था. लड़की एकदम बेफिक्र थी, जैसे उसे किसी बात की परवाह नहीं थी. लड़का अब बेसब्र होने लगा था. लड़की अनजान ही रही और घर की दीवारों पर अपनी पसंद की पेंटिंग्स को टांगती रही।

लड़के ने फिर कुछ कहा, लड़की ने सुना नहीं. शब्द फिर सफर में...लड़के ने लड़की की आंखों पर अपनी हथेली रख दी. कानों के पास चूम लिया धीरे से. लड़की मुस्कुराई. हथेली हटाकर भी आंखें बंद ही रखीं उसने. क्या कहा तुमने? लड़की ने पूछा
प्रेम ? लड़के ने कहा।
कुछ शब्दों का सफर पूरा हो चुका था शायद. लड़की $जोर से खिलखिलाई.
...प्रेम?
जानते भी हो प्रेम?
हां, जो मुझे तुमसे है? लड़का बोला।
लड़की हंसी।
उठकर चली गई भीतर।
जानती थी वो, प्रेम पुरुषों को सिर्फ लुभाता है. उन्हें नहीं मालूम क्या होता है प्रेम कैसा होता है और कैसे किया जाता है?

लड़की हंसती रही देर तक....गहरी हंसी...हंसी ही हंसी...पूरे कमरे में उसकी खिलखिलाहटें बिखर गई थीं. बालकनी में अभी-अभी खाली हुई वो डाल उसकी हंसी के फूलों से भर गई. उदास सा वसंत चौंककर सुनने लगा उस हंसी को. लड़का घबरा गया लड़की को इस कदर हंसते देख. उसने उस हंसी को छुआ तो हाथ भीग गये उसके. ऐसी उदास, गीली हंसी उसने कभी नहीं देखी थी. लड़का डर गया...बाहर निकल गया घर से।

लड़की हंसती रही...हंसती रही...लड़के के शब्द जिनमें जन्मो का साथ, सदियों की मोहब्बत और न जाने क्या क्या था, अब तक सफर में थे।
हालांकि लड़का अब सफर में नहीं था।
कहीं नहीं.