Friday, July 22, 2022

भाषा से बाहर



जब मैं लिखना चाहती हूँ
सदियों से गले के भीतर अटकी हुई
सिसकी के बारे में
लाख खंगालने के बावजूद
भाषा के पास नहीं मिलता कोई शब्द,

जब मैं लिखना चाहती हूँ भूख
दुनिया के तमाम शब्दकोषों को पलटने के बाद भी
नहीं मिलता एक शब्द जो
भूख से उठने वाली पेट की ऐंठन, चुभन
सिकुड़ती खाल, नाउम्मीद हो चुकी आँखों का सूखापन
दर्ज कर सके,

जब मैं लिखना चाहती हूँ मौन
तब न जाने कहाँ से आ जाते हैं
ढेर सारे शब्द
शोर मचाते हुए,

जब मैं लिखना चाहती हूँ
बेबसी, यातना, पीड़ा
भाषा के आंगन में शुरू हो जाता है
शब्दों का खेल,

जब मैं लिखना चाहती हूँ प्रेम
खिल उठते हैं तमाम फूल
बरसने लगते हैं बादल
बच्चे खिलखिलाने लगते हैं,
गैया लौटने लगती हैं घर
चूल्हे में बढ़ने लगती है आंच
नदियों में कोई वेग आ जाता है
रास्ते मुस्कुराने लगते हैं
यह सब होता है भाषा के बाहर,

और जब मैं तुम्हें देखती हूँ
दुनिया की तमाम भाषाएँ
देखती हैं मुझे तुम्हें देखते हुए
किसी भाषा के पास वह शब्द नहीं
जो इस देखने की मिठास को समेट सके...

Thursday, July 14, 2022

पढ़ना यानी मिलना अपनी रूह से...


आज की सुबह बारिश नहीं है. हरारत भी नहीं है. अजब सी उदास सी शांति है. किसी भी कहानी का आरम्भ और अंत मुझे मुश्किल लगता है. जैसे एक ठीक सुर से उठाना कोई राग और उसी एकदम दुरुस्त सुर पर उसे पूरा करना. दोनों सिरे अगर संभल जाएँ तो मध्यम और पंचम खिल उठते हैं.

कल रात जब मैं इसके अंतिम पन्नों से गुजर रही थी तो यात्रा की समाप्ति की थकान और शान्ति दोनों साथ थी. किताब बंद करते ही मेरी कोरों से कुछ बूँदें लुढकीं और मैं एक ख़ामोशी ओढकर देर तक आसमान देखती रही. तब तक, जब तक वो शाम के नीले से रात के काले में न बदल गया...

मुझे नहीं मालूम आज मैं क्या लिखना चाहती हूँ. क्योंकि मैं तो असल में चुप रहना चाहती हूँ. चुप ही हूँ कई दिनों से. और चुप्पी को लिखना जरूरी क्यों है. लेकिन शायद जरूरी है कि ख्वाजाबाग के जिस घर में कई दिन अटकी रही, जिस नीले दरवाजे और सफेद दीवारों को सपने में देखती रही उससे बाहर आना जरूरी है. उसके बाद क्या हुआ क्या नहीं इसके बारे में नहीं है यह बात. यह बात है एक ऐसी यात्रा के अनुभवों की बाबत जिनसे गुजरना बेहद जरूरी है.

मानव का यह यात्रा वृतांत सिर्फ कश्मीर यात्रा का वृतांत भर नहीं है. यह कई यात्राओं की बाबत है. खुद को जानने समझने की बाबत है. हम क्या हैं, क्यों हैं, जैसे हम हैं वैसे ही क्यों हैं. क्या सच में हम ऐसे ही होना चाहते हैं? हमारी किसी के प्रति नाराजगी, गुस्सा, प्रेम यह सब कहाँ से आता है. देश क्या है आखिर. अपनापन कैसा होता है. इतिहास की उन चालाकियों को देखना हम कब सीखेंगे आखिर जो जानबूझकर अधूरा सच लिए हमारे सामने खड़ा कर दिया जाता है. क्या हम उसके पार जाकर देख पाने की योग्यता कभी ग्रहण कर सकेंगे?

खुद के भीतर झांकना मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह सिलेबस में कहीं नहीं है, स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता खुद के भीतर झांकना, खुद को टटोलना. समूचे देश को, एक ऐसी नफरत की आग में झोंकना आसान है जिसका असल में कोई सर-पैर ही नहीं लेकिन यह मुश्किल है कि उदासी और नाराजगी की नन्ही किरचों को सुभीते से निकाला जाय कि दर्द में तनिक कमी आये.

कश्मीर क्या है आखिर...कश्मीरी कौन हैं. जिन कश्मीरी पंडितों के दर्द, तकलीफ को राजनीति ने बेहद चालाकी से अपने नफे के लिए भरपूर उगाहा उनके दर्द असल में हैं क्या यह किसने पूछा? जिन कश्मीरी मुसलमानों के लिए नफरत उगाई उनके भीतर जो प्यार था/है, जो अपनापन है उसे किसने देखा?

जिन दिनों मैं रूह के जरिये कश्मीर की यात्रा पर निकली थी उन दिनों मेरी बेटी मुझे पढ़ते हुए देख रही थी. और एक रोज उसने मुझे मैसेज किया, ' रूह के बारे में लिखना, रूह को पढ़ना अपनी रूह को तलाशने जैसा है.' मैंने उसे पूछा कि यह किसने लिखा? उसने कहा, यह तुम्हारे बारे में है. मुझे लगा तुम ऐसा ही महसूस कर रही हो.

एक ही वाक्य में उसने मेरी पाठकीय यात्रा को कह दिया. सचमुच यह अपनी रूह तलाशने जैसा है. इस किताब में न जाने कितनी ऐसी जगहें हैं जहाँ देर तक ठहरना चाहिए. न जाने कितने ऐसे हिस्से हैं जिनका सार्वजनिक पाठ होना चाहिए. यह किताब प्रेम के बारे में है नफरत के बारे में नहीं. जो होती नफरत के बारे में तो शायद बेस्ट सेलर हो चुकी होती अब तक, नफरत की मार्केट जो कमाल की है.

मुझे ख़ुशी है कि अपनी ही दुनिया में डूबा हिंदी साहित्य जगत कितना ही आत्म आनन्द में रत रहे लेकिन रूह को युवा पाठकों ने दिल से लगा रखा है. मैं हर युवा के हाथ में यह किताब देखना चाहती हूँ, रिकमंड करती हूँ. अगर आप सचमुच इंसानियत के पैरोकार हैं, दुनिया में अमन और सुकून चाहते हैं, कश्मीर को सच में इस देश का हिस्सा मानते हैं तो कुछ धाराओं और अनुच्छेदों से बाहर आकर, वहां के लोगों को गले से लगाना होगा. यह किताब वादी के हर इन्सान के दिल में धड़कते उस प्यार के बारे में है जो वो हमसे करते हैं, उस उदासी के बारे में है जो उन पर थोपे गए इल्जामों के भीतर सांस लेती रहती है. उस उम्मीद के बारे में है जिसमें प्यार की रौशनी होगी एक दिन.

कश्मीर सिर्फ पेड़, पहाड़, झील नहीं है, कश्मीर वहां रहने वालों के दिलों की धड़कन से आबाद है. नफरत से सिर्फ नफरत बढ़ सकती है, प्यार से प्यार. माया आंटी कहती हैं कि 'अगर हम वर्तमान को दुरुस्त करना चाहते हैं तो हमें सामने वर्तमान ही रखना होगा. बार-बार अतीत को सामने रखकर हम वर्तमान को दुरुस्त नहीं कर सकते.' कितनी सच बात है यह. लेकिन सच में क्या हम दुरुस्त करना चाहते हैं? अगर चारों तरफ प्रेम और सौहार्द हो गया तो क्या होगा राजनीति का. बेहद चालाकी से हमें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया और हम मोहरे की तरह इस्तेमाल होते रहे.

यह एक कश्मीरी पंडित की इनसाइड स्टोरी है, वो परिवार जिसने वो सब सहा जिसे फिल्म में देखकर लोगों का  खून खौल उठता है और उनका देश प्रेम हिंसक हो उठता है. लेकिन जिसने वह सब जिया, सहा उसके भीतर तो कोई गुस्सा नहीं, कोई प्रतिशोध नहीं. वो तो प्यार से भरा हुआ है. रूह को पढ़ते हुए और भी न जाने कितने कश्मीर से आये दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी याद आये जिनके पास उनकी कहानियां तो थीं लेकिन नफरत नहीं थी कहीं. मैं खुद 8 साल एक कश्मीर से विस्थापित परिवार के घर में किरायेदार के तौर पर रही हूँ. मकान मालिक की आँखों से जो कश्मीर मैं देखा करती थी उसमें हमेशा प्रेम ही नजर आता था और उनकी याद में जो लोग आते थे वो न हिन्दू थे न मुसलमान वो बस कश्मीरी थे. 

रूह को पढ़ना जरूरी है और अगर इसे ठीक से पढ़ा है तो निश्चित तौर पर भीतर काफी कुछ बदलता महसूस होगा. क्योंकि यह सचमुच अपनी रूह को टटोलने जैसा है.

Monday, July 11, 2022

बस घर आने वाला है- रूह


एक बड़ा सा इतवार सारा दिन घर में डोलता रहा. मैं उससे आँखें चुराती रही. आलस खूबसूरत शय है. मैंने आलस का हाथ थाम रखा था और इतवार के मन में जितने मंसूबे थे उन सबको धराशाई करती रही. दिन भर बारिश होती रही और मैं सोने और जागने के बीच में झूलते हुए आसमान ताकती रही.

रूह पास में रखी रही...मैं उसे देखती रही. कभी पलट भी लेती लेकिन आगे के पन्नों पर बढ़ने से जाने कैसा संकोच था कि पढ़े हुए पन्नों को फिर से पढ़ने लगती. फिर उसे पलटकर रख देती और खिड़की के शीशे पर गिरती बारिश से बनती आकृतियों को देखने लगती.

आखिर शाम तक आलस में और मुझमें समझौता हो गया. मैंने उससे थोड़ी मोहलत मांगी उसने आसानी से दे भी दी. मैंने रूह उठा ली. वाइन पीने की इच्छा को चाय पीने की इच्छा के आगे देर तक रखे रहने दिया. और आखिर चाय पीने की इच्छा ने चाय का कप आगे बढ़ा दिया.

असल में मुझे नहीं पता था कि मैं किस यात्रा पर निकली हूँ या फिर शायद मुझे पता था. ख्वाज़ाबाग़ पहुँचने की मुझे कोई जल्दी नहीं थी. लेकिन आखिर तो पहुंचना ही था. और...मेरी शाम धुंधलाने लगी. यह बीती रात की बाबत है. बीती रात जब मैं पन्ना दर पन्ना सफर करते हुए रूह का हाथ थामे ख्वाजाबाग की उस गली, उस गेट को ढूंढ रही थी जो लेखक की स्मृति में था. पढ़ते हुए इस कदर इकसार हो चुकी हूँ कि मुझे यह मेरी ही कहानी लग रही है. और ख्वाजाबाग की उस कॉलोनी की उस गली के आखिरी घर के सामने मैं ही खड़ी हूँ.

कि मुझमें उस घर के भीतर जाने की हिम्मत नहीं हो रही. मैं किताब को पलटकर रख देती हूँ. एक अजीब सी हूक, एक बेचैनी घेर लेती है. आखिर फिर से किताब उठा लेती हूँ और फफक फफक कर रो पड़ती हूँ. रोती ही जाती हूँ.

ऊंचे फ्रेस के पेड़ों की कतारों को पहचनाते हुए पिता की गोद में बैठे हुए सुनना कि 'बस घर आने वाला है'.
रूह ने मेरा हाथ पूरे वक़्त कसकर पकड़ा हुआ था. रूह चाहती थी घर में मैं अकेले प्रवेश करूँ.
'बस यहीं रोक दो यही मेरा घर है...'
'हम जिस दरवाजे से सेब चुराने जाते थे हमें अब उस दरवाजे से भीतर जाना होगा.'
अपनी हिचकिचाहट में मैंने दरवाजे को धक्का दिया. कुछ देर की जद्हदोजेहद के बाद वह दरवाजा खुला इसके भीतर प्रवेश पूरी तरह अतीत में प्रवेश था,

सच कहूँ इन पन्नों से गुजरते हुए मैं हर पल बिखर रही थी. टूटी सिसकियाँ, अटकी हुई हिचकियाँ बरसती बूंदों के सुर में सुर मिला रही थीं. इनको कोई कैसे लिख सकता है. मैं कैसे लिख सकती हूँ ख्वाजाबाग के उस घर, उस बुखारी, उस बैठक, उस रसोई की बाबत कुछ भी.उस खिड़की के बारे में कैसे लिख सकती हूँ जिससे लेखक ने घंटों आसमान ताकना सीखा था. उस जगह के बारे में कोई भी कैसे कुछ लिख सकता है जहाँ बचपन में टाफियां छुपाई हों...मेरे बचपन की तमाम स्मृतियाँ ख्वाजबाग की स्मृतियों में घुलने लगीं. लेखक और मैं इकसार होने लगे थे. कि मेरी रुलाई की रफ्तार तेज़ होती जा रही थी.

बस फर्क इतना था कि लेखक अपनी बेचैनी के साथ घर से निकल गया और मैं वहीं छूटी रह गयी. वहीं दरवाजे से टिककर खड़ी रसोई में माया आंटी को खाना बनाते देख रही थी ठीक वैसे ही जैसे इंदौर में देखती हूँ उनके आश्रम में. मैं वहीं फर्श पर लेट जाना चाहती हूँ, बचपन में छुपाई सारी टॉफियां निकाल लेना चाहती हूँ, कुछ नयी टॉफियां छुपा देना चाहती हूँ कि फिर कोई लौटे बरसों बाद तो वो उदास न हो.

रूह ने कहा, 'कुछ देर और ठहर जाओ, पता नहीं फिर तुम कब यहाँ कभी आ भी पाओगे या नहीं.'
'मैं आऊँगा पर अभी मैं रुक नहीं सकता हूँ...'

लेखक अपनी उदास आँखें लेकर घर से जा चुका है जबकि मैं वहीं छूटी हुई हूँ. रात भर सपने में मैं उस घर में भटक रही थी. क्या वो मेरा ही घर था, क्या मैं रूह थी...मेरी रूह कहाँ है आखिर.मेरी आवारा रूह तो कहीं भी भटक जाती है, अटक जाती है. मैं देहरादून में हूँ और वो मेरे पास नहीं...

(अंतिम से पहले...)

Friday, July 8, 2022

रूह की तस्वीर कोई कैसे खींच सकता है



कल दिन भर पेट में हंसी के बगूले उठते रहे. शाम को बेबी आंटी का फोन आया और बगूलों को उनकी आवाज़ ने थाम लिया. बेबी आंटी से मैं मिली नहीं हूँ, उनके कुछ किस्से सुने हैं माया आंटी से. उनके फोन आने की बात से लगा कि मैं उन्हें जानती हूँ. उनके गले लग जाने की इच्छा हुड़क बनकर उभरने लगी. उनका कहना 'तू बस आ जा' आँखों में बदलियाँ भर देता है.

'मैं कुछ भी नहीं कह पा रहा था. मेरा गला भारी हो गया था. मैं कितना कहना चाहता था कि बेबी आंटी मैं आपसे बहुत प्रेम करता हूँ, अभी भी. ठीक इस वक्त मैं आपके गले लग जाना चाहता हूँ. जब उन्हें मेरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई तो उन्होंने, 'अच्छा बेटा आना तो फोन करना' कहकर फोन काट दिया.

मेरे मन में अजीब सी कशमकश चल रही है. क्या बेबी आंटी लेखक के और देहरादून में बैठी इस पाठक के, इंदौर में बैठी माया आंटी के मन में उनके लिए कितना प्रेम है कभी जान पायेंगी. अगर नहीं तो क्यों नहीं. लेखक ने क्यों नहीं कहा, जो उसने महसूस किया. शायद वो हम सबके हिस्से का भी कह देता. न कहकर क्या लेखक अपने लिए लिखने का राशन जमा करता है. यह तो ठीक नहीं. मुझे नहीं पढ़ना ये सब. नाराजगी आ घेरती है. 

लेखक की बरसों पहले लिखी एक कविता का टुकड़ा याद आ गया, 

'सोचता हूँ, 
अभी वो कहीं अगर मुझसे टकरा जाएगी,
कहीं भी
सड़क में, बाज़ार में, किसी मोड़ पर
तब शायद वो मुझे मेरे नाम से ही पुकारेगी
पर मैं इस तरफ खड़े होकर,
विदूषक ही तरह सुन रहा होऊंगा
और चुप रहूँगा 
मानो वो किसी और को आवाज़ दे रही हो
फिर मैं ऊपर आसमान की तरफ देखूंगा,
अगर बादल होंगे तो उनके बारे में सोचूंगा...

अपने मन की बात न कह पाने, पुकार पर पलटकर जवाब न देने पर पूरी किताब लिख सकते हैं लेकिन कह नहीं सकते कि 'तुमसे प्यार है...' हद है. एक अजीब सी बेचैनी के साथ दोबारा किताब उठती हूँ तो भीगी आँखें हंस देती हैं. इसी कशमकश में तो लेखक भी है. न कह पाने और फिर उस एक लम्हे में अपने मन की बात न कह पाने की पीड़ा को यहाँ-वहां बरसों व्यक्त करने की बेचैनी. सरल होना इतना कठिन क्यों बना लेते हैं हम. मेरे सामने बेबी आंटी हैं...और उनकी गोद में बैठा एक नन्हा सा बच्चा जो उन्हें बेहद प्यार करता है, अब भी. लेकिन दुनिया में शब्दों का इतना ढेर है, इतना शोर है कि सबसे पवित्र भावों को कहने के समय उसने चुप रहना सीख लिया है.

पढ़ने के दौरान...नहीं, लिखने के दौरान या शायद जीवन के दौरान जिन पलों के आने से आँखें चुराती हूँ जब वो सामने आ खड़े होते हैं तो पैर के अंगूठे से पत्थर की फर्श को कुरेदने का जतन शुरू कर देती हूँ. हमेशा से सोचती थी कि प्रेम में भीगे लम्हों की बाबत बात नहीं करनी चाहिए, उन्हें लिखना नहीं चाहिए, उन्हें पढ़ना नहीं चाहिए. उन्हें छोड़ देना चाहिए वैसे ही जैसे हम साँसों के बारे में बात नहीं करते उसके बारे में लिखते नहीं लेकिन वो न हो तो क्या हो आखिर...जैसे क्या हम फूल खिलने को लिख सकते हैं, हवा की छुअन को लिख सकते हैं उसी तरह प्रेम के लम्हों को भी क्योंकर लिखना चाहिए...उन्हें तो बस खिलना चाहिए...महकना चाहिए...

तमाम यात्रा एक लम्बी कविता में बदलने लगी है. रूहानी, लेखक और गुल मोहम्मद के साथ गुलमर्ग के रास्ते पर निकल पड़ी हूँ. सारे रास्ते मुझे गुलमर्ग याद आता रहा. 2012 में इन्हीं रास्तों पर पहली बार मैं कुदरत की ऐसी खूबसूरती देख फूटफूट कर रोई थी. यूँ पूरी कश्मीर यात्रा के दौरान मेरी आँखें भीगी ही थीं. लेकिन गुलमर्ग के रास्तों पर मैंने पहली बार अजीब सी दिव्यता, अपनेपन और मुक्ति को एक साथ महसूस किया था. शायद आध्यात्मिक लोग इसे ही कहते होंगे ईश्वर के दर्शन होना. मेरी बहती आखें रूहानी की शरारतों और लेखक के संकोच को इग्नोर कर रही हैं.

बस लेखक के लिखे में कुछ वायलिन के गुंथे हुए सुरों को पढ़ पा रही हूँ.
'तुम्हें कुछ पढ़कर सुनाऊँ?' रूह ने पूछा.
'हाँ सुनाओ' लेखक ने कहा.
ये ललद्यद हैं जो मुझे बहुत पसंद हैं...
who is to die and who they kill?
who can kill and who is to die?
one who gorgets God for the sake of the hearth,
Is sure to die and is to be killed.''

तुम्हें पता है, हर देश में, हर धर्म में ललद्यद जैसे लोग हुए हैं जिन्होंने भाईचारे, आपसी प्रेम और शांति से जीने की सुंदर बातें की हैं. और वो आम लोगों के बीच बेहद प्रसिद्ध भी हुए हैं. लेकिन फिर भी ये हिंसा कभी खत्म नहीं हुई.'

'मुझे लगता है कि लोग बोर हो जाते हैं. जैसे हमारे देश में लोग गाँधी से बोर हो गए हैं. जैसे ही कोई गाँधी के अलावा कोई विवादास्पद बात उनके बारे एसा कहता है तो लोगों के कान खड़े हो जाते हैं. हमें अपनी ज़िन्दगी में लगातार ड्रामा चाहिए होता है. हमारे घरों को ही ले लो, चार-छह लोगों में हम इतना ड्रामा खड़ा कर देते है कि हमारा आपस में साथ रहना मुश्किल हो जाता है.'

'यह इतना आसान नहीं है.' रूह ने कहा. 
'वह बर्फ में पैर रखते हुए पहाड़ों में ऊपर की तरफ चलने लगी. मेरी इच्छा हुई कि मैं उसकी तस्वीर खींच लूं इस वक़्त. इन घने देवदार के जंगल में, बर्फ के बीच चलती हुई वह किसी पेंटिंग सी लग रही थी.'
तस्वीर खींचने की इच्छा को भीतर धकेलते हुए लेखक ने सोचा कि रूह को तस्वीर खिंचवाना पसंद नहीं, यूँ भी कोई रूह की तस्वीर कैसे खींच सकता है.

सोशल मीडिया पर उतराते मैसेज की बाढ़ का ललद्यद जैसे कवि कभी मुकाबला नहीं कर सकते.
'जिस देश में लोगों को अच्छी कला, अच्छी कविता की समझ नहीं है, वहां हिंसा का होना आम बात है.'

(जारी...)

Thursday, July 7, 2022

उसका नाम रूहानी था - रूह



आँख देर से खुली. जाने रात की हरारत के कारण या बारिश की मध्धम धुन को ओढ़े पड़े रहने के लालच के कारण. माँ फोन पर पूछती हैं, बुखार कैसा है? मैं हंसकर कहती हूँ, 'बुखार नहीं है, हरारत है. एक किताब पढ़ रही हूँ जब तक वह खत्म नहीं होगी यह हरारत रहेगी.' माँ मेरे पागलपन की आदी हैं. बेफिक्री से कहती हैं, 'ठीक है फिर जल्दी खत्म करो किताब'. 

बालकनी की खिड़की खोलती हूँ तो जूही की पत्तियों पर अटकी बूँदें मुस्कुराकर कहती हैं 'गुड मॉर्निंग'. मैं हंस देती हूँ. सुबह की चाय बनाते हुए 'रूह' का ख्याल साथ है. सुबह पढ़ने का सुख, सुबह पढ़ने का सुख ही है उसे किसी से बदला नहीं जा सकता. कल के पढ़े हुए के साथ गड्डमगड्ड करते हुए सोचती हूँ सुबह Pat Boone, सुनूँ या Cliff Richard.' Cliff Richard गाने लगे हैं. आज की सुबह में 'रूह' को उठाने की बेताबी नहीं है. चाय के कप के करीब रूह को रखे देखना सुख है. जैसे दो प्रिय बैठे हों साथ.

'आजकल आप रूह पढ़ रही हैं न? बहुत अच्छी किताब है क्या? कितना सुंदर लिख रही हैं आप?' कल इनबॉक्स में किसी ने पूछा था. मैं देर तक चुप रही. समझ नहीं आया क्या कहूँ...क्या मैं अच्छा लिख रही हूँ? क्या किताब बहुत अच्छी है? अच्छा लगना कैसा होता है. 'अच्छी और बहुत जरूरी किताब है' इनबॉक्स में जवाब ठेलने के बाद सोचती रहती हूँ.

जीवन का सारा अच्छा वहां था जब असल में वह अच्छा नहीं था. इस किताब को पढ़ते हुए अच्छा नहीं लगता, दुःख, उदासी, बेचैनी, पीड़ा उभरती है...कहीं-कहीं अच्छा भी लगता है. मेरे तईं सबसे अच्छा पढ़ना वही था जिसे पढ़ने के बाद मैं महीनों, सालों उस पढ़े हुए में घूमती रही, परेशान रही, सोचती रही. उससे जुड़े तमाम तार ढूंढती रही, कुछ और पढ़ने को बेचैन होती रही. इस लिहाज से यह अच्छी किताब है. कि कल से दो नए गायक मेरी जिन्दगी में शामिल हो चुके हैं और एक किताब जो कल विश लिस्ट में थी तोहफा भेजने को आतुर दोस्तों में से एक ने ऑर्डर कर दी है.

रूह अपनी पूरी धज के साथ घर में रहती है. जैसे यह उसका ही घर है. किचन में, ड्राइंगरूम में, बालकनी में, कार में...हर जगह. हाँ, यह रूह का ही तो घर है.

पहली बार लेखक की हेठी घुटने टेकते हुए दिखी है तो सच कहूँ तो अच्छा लग रहा है. 'रूह हर चीज़ की तह तक जाकर संवाद करती है.' वह लेखक को कश्मीर पर लिखने को उकसाती है लेकिन यह भी कहती है कि 'कश्मीर से निकलते ही मैं जा चुकी होऊंगी.'
'हम दोनों के पास सिर्फ कश्मीर तक का ही वक्त था. जब मैंने सुझाव दिया कि हम दोनों कश्मीर के बाद भी टच में रह सकते हैं क्या? उसने कहा था, कश्मीर यात्रा खत्म होने के बाद हमारे साथ रहने का कोई कारण नहीं है.' मैं जब भी प्रेम सरीखे वाक्य बोलता तो वो डर जाती...'
इन हिस्सों को पढ़ते हुए मेरे भीतर चोर मुस्कुराहट तैर जाती है. मुझे 'बहुत दूर कितना दूर होता है' की कैथरीन याद आती है और कैथरीन की फिर से मिलने की इच्छा पर लेखक का यह सोचना याद आता है कि 'अभी तो मैं गिलहरियों का खेल देख रहा हूँ, अभी मैं कैसे आ सकता हूँ.' रूह ही कैथरीन लगने लगती है. यह लिखते हुए जो मुस्कुराहट है उसमें लेखक की रूह के साथ टच में रहने की इच्छा को इग्नोर होते देखने की तसल्ली शामिल है. सच, रूह ही है जो हमारी तमाम हेकड़ी को ठिकाने लगा सकती है.

तभी इति और उदय से मुलाकात होती है. अरे, इति और उदय? इन्हें तो मैं जानती हूँ. ये यहाँ कैसे. इति उदय और बिलाल के साथ ट्रैक पर निकल पड़ी हूँ. जिस तरह पढ़ना डुबकी लगाने जैसा होना चाहिए मुझे लगता है उसी तरह देखना भी दृश्य में घुल जाने जैसा होना चाहिए. लिखना कैसा होना चाहिए इसके बारे में ठीक-ठीक पता नहीं लेकिन यह हिस्सा पढ़ते हुए लगता है कि दृश्यों को जीना ऐसा ही होना चाहिए...

'रात के क़रीब तीन बजे मेरी आँख खुली, मुझे पेशाब करना था. तभी टेंट के बाहर कुछ बहुत धीमी हरकत सुनाई देने लगी. डर के मारे मैंने ख़ुद को स्लीपिंग बैग में छुपा लिया. जब आवाज़ आनी बंद हो गयी तो मुझे उठना पड़ा , पेशाब करना बहुत जरूरी था. जैसे ही मैंने टेंट के बाहर कदम रखा तो मैं हतप्रभ सा आसमां ताकता रह गया. इतने सारे तारे मैंने एक साथ कभी नहीं देखे थे, लग रहा था कि सारे तारे पृथ्वी के थोड़ा ज्यादा क़रीब आ चुके थे. नीचे तालाब को देखने से लग रहा था कि जाने कितने तारे टूटकर तालाब में गिर पड़े हैं. चारों तरफ चांदनी में नहाए ऊंचे पहाड़. मैं कुछ देर के लिए पेशाब करना भूल गया था. मैं इसे देखते हुए सोच रहा था कि अगर मैं इस दृश्य को कभी लिखूंगा तो क्या पढ़ने वाले को वही दिखेगा जो मैं देख रहा हूँ.'

इस दृश्य को पढ़ने के बाद ऐसा लग रहा है कि यह सुबह चांदनी रात में तब्दील हो गई है. और मैं तारों भरे आकाश के नीचे तारों भरे तालाब के किनारे कहीं बैठी हूँ. भला हुआ कि मुझमें चीज़ों को शब्दशः पढ़ने का हुनर न आया और मैं उन्हें भावशः पढ़ती रही, सुनती रही, देखती रही.
बिलाल के घर न जाने और जूते चोरी के किस्सों को छोड़ आगे बढ़ रही हूँ लेकिन चोपानों की और बिलाल की पीड़ा को साथ लिए हुए ही.

बड़ी देर बाद शायद पहली बार किताब में एक ऐसा हिस्सा आता है वो भी एकदम अचानक कि मेरी हंसी ही नहीं रुक रही. होटल में एक अकेली लड़की से मुलाकात होना और उससे लेखक का कहना, 'कल मैं गुलमर्ग जा रहा हूँ अगर आप चाहें तो मैं आपको ड्रॉप कर सकता हूँ.'
'शुक्रिया ! मैं आपसे पूछने ही वाली थी. मुझे लगा आपको यह न लगे कि मैं आपके गले पड़ रही हूँ.'
'नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, बस मैं अपनी पत्नी से पूछकर आपको बताता हूँ.'
'बीवी?'
'जी वो ऊपर सो रही है'...

इसके बाद का किस्सा पाठकों के लिए छोड़ रही हूँ कि मेरी हंसी रुक ही नहीं रही...

लड़की का नाम रूहानी था...

(जारी...)