Monday, October 19, 2026

ऋषिकेश : हसरतों का शहर



ढलते-ढलते शाम रात के काँधों से आ लगी थी। रात के कांधे से टिकी शाम देखी है कभी? वो भी मौसम की उस दहलीज़ पर जब एक मौसम ने विदा ली न हो और दूसरे मौसम की आमद घुंघरुओं सी बज उठी है। नवेली दुल्हन सी वो शाम बस रात में घुल जाने को आतुर। कुछ रातें अपने भीतर ढेर सारा उजास सहेजे होती हैं। यह उजास चाँद के आने-जाने के हिसाब से परे होता है। कल की रात भी ऐसी ही उजास भरी रात थी। ज़र्रर्रर्र से गुज़रते दिन का हाथ थाम शाम ने ऋषिकेश के रास्ते पर रख दिया था। सदा का प्यारा ऋषिकेश। वही ऋषिकेश जहां न जाने कितना समय बिताया। कोने-कोने से वाक़िफ़ियत रही। यहीं आधी रात को भीगते हुए सड़कों पर चक्कर काटे, गाने गाये, मुस्कुराए। यहीं उदासियों और बेचैन मन की शांति और सुकून से अदला बदली भी हुई। और यहीं मिले मेरे उपन्यास के नायक अनुभव, नायिका तृप्ति सहित तमाम किरदार और उनकी ज़िन्दगी के किस्से।

फिर यह शहर छूट गया। या शायद रूठ गया। इसे मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। मैंने बस इंतज़ार किया, कि जब इज़ाजत देगा तो गले से लगा लूँगी, वरना ड्योढ़ी पर बैठकर इंतज़ार करूंगी। शहर इन्सानों से बेहतर होते हैं, बिन मनाए भी मान जाते हैं, हाथ थाम लेते हैं, गले से लगा लेते हैं। मुझे मालूम था यह झूठी नाराज़गी है, प्यार तो अब भी वैसा ही है। शहर में दाखिल होते ही मन मुस्कुराया, आखिर फिर से आ ही गई न तेरे पास। शहर ने अपनी गर्वीली गर्दन झटकते हुए कहा, 'और मैंने आने दिया।' मैंने कहा, हाँ, चल यही सही। तू जीता मैं हारी कहते हुए शहर के भीतर प्रवेश किया। ठंडी हवाओं ने शरीर को छुआ तो सिहरन हुई। गंगा में डुबकी लगाकर आई इस हवा को मैं पहचानती हूँ। गालों को छूकर गुज़रे उस हवा के झोंके ने कहा, 'शरारती तो अब भी मैं वैसा ही हूँ।' मैंने उसके गाल थपथपा दिये।

गंगा को ऋषिकेश में देखना उसे हरिद्वार में देखने से अलग है। बनारस में देखने से अलग है और गंगोत्री में देखने से भी अलग ही है। गंगा वही है बस शहर से गुजरते हुए उस शहर का मिज़ाज अपनाती चलती है। ऋषिकेश की गंगा की बाहें खुली हुई हैं। यह सिर्फ आस्था की नदी भर नहीं लगती यहाँ बल्कि किसी सखी सी भी लगती है। ऐसी राजदार दोस्त जो आपके मन के तमाम उलझे कोनों को सुलझा दे। किसी भी घाट पर बैठकर या बिना किसी घाट के ऐसे ही किनारे पर बैठकर उससे अपना सुख दुख कह लो, सुलझी और समझदार यह गंगा आपको आज़ाद कर देगी। इस दोस्ती के लिए न अगरबत्ती चाहिए हाथ में, न घंटी न घड़ियाल। बस कि साफ मन चाहिए।

यहाँ एक किनारा गोवा बीच के नाम से जाना जाता है। टेढ़े-मेढ़े से रास्ते से होते हुए वहाँ पहुंचकर बमुश्किल सहेजी उमर छूटती सी लगी। भीतर का उच्छशृंखल मन हँसता, खिलखिलाता बौराया हुआ सा इस कोने से कोने को छू लेने को बेताब। शांति ऐसी कि लहरों और हवाओं की जुगलबंदी से बना संगीत रूह में घुल जाये। ऐसा लगे कि कुछ बोलना हो तो जरा फुसफुसाकर ही बोलो वरना शांति का यह जादू टूट जाएगा।

उस जादू को वैसे का वैसा सहेजकर हम वहाँ से उठे तो रात के कांधे से आ लगी शाम का सौंदर्य खिलने लगा था। शहर जगमग करने लगा था। जाती हुई साँझ को मानो रात ने हाथ पकड़कर बिठा लिया हो ठीक वैसे ही जैसे बिठा  लेते हैं प्रेमी उठकर जाती प्रेमिकाओं को। बस वो दो लम्हों का रोका जाना उम्र भर रुके रहने पर भारी पड़ता है। उन दो लम्हों के रुकने में जीवन खिल उठता है, कोई चाहता है रोकना, यह बात रुके रहने से ज़्यादा रूमानी है। असल में सारा खेल चाहना का ही तो है। वो कहते हैं न कि तुम न आ पाओ तो कोई बात नहीं, लेकिन आना चाहना बचाए रखना।
आकाश सिंदूरी हो उठा था। रोशनी के झरोखे खिलने लगे थे। आधा चाँद आसमान पर टंगा था और ऐसा लग रहा था आज खूब तैयार होकर आए हैं जनाब। इन सबके दरम्यान विंटर लाइन का अलौकिक दृश्य नमूदार हुआ। मानो क़ुदरत आज जमकर मेहरबान थी। विंटर लाइन अक्सर मसूरी से देहरादून वाले रास्ते में ही देखी है। यह पहली बार था कि ऋषिकेश में यह दृश्य सामने था। चुपचाप इस अलौकिकता के जादू में खोये हुए हम वापस आना भूलने ही लगे थे। मन ऐसा बावरा है कि उसे जितना सुख दो, उसकी उतनी ही भूख बढ़ती है। वापसी को उठे लेकिन उठ न सके। बड़ी मशक्कत से उठे तो फिर चल पड़े कोलाहल से दूर एक नए ठीहे की तलाश में जहां चाय पी जा सके और गंगा जी से थोड़ा और वार्तालाप किया जा सके।

जैसे ही लक्षमण झूला पुल के पास पहुंचे, पता चला पुल तो बंद है। हम हँसे, हमें वहाँ जाना भी नहीं बस कि इसी पार कुछ देर अपनी सखी के पास बैठना है। इधर सीढ़ियाँ उतर रही थी, उधर मन में चल रहा था कि यहीं कहीं होंगे शायद तृप्ति और अनुभव भी। और हैरत की बात कि सबसे पहली नज़र जिस जोड़े पर पड़ी बेसाख्ता मुंह से निकला 'अरे ये दोनों तो यहाँ हैं।' ये दोनों जिन्हें खुद की कोई ख़बर ही नहीं। प्यार है लेकिन यह पता भी नहीं, कैसे और क्या कहें यह जानते भी नहीं कि बस साथ होने की ख़्वाहिश लिए देर तक नदी किनारे बैठे हुए उस पर टिमटिम करती रोशनी की कतारों को देखते हुए जीवन का सारा सुख सोख लेने को आतुर। 

परवीन शाकिर की गज़ल के उस शेर को आज की रात तनिक बदलकर करके गुनगुनाने का दिल किया,' पूरा दुख और आधा चाँद हिज़्र की शब और ऐसा चाँद...' क्यों न इसे आज ऐसे गाऊँ कि 'पूरा सुख और आधा चाँद।' देखो न परवीन, इस लम्हे में कोई दुख नहीं, कोई इच्छा नहीं, कोई सपना नहीं, कोई हसरत नहीं। इस लम्हे में बस चाँद है, गंगा है और सुकून है।

दूर से नदी को देखना, दूर से नदी का देखना ही होता है। और वो अभागे ही होंगे जो नदी के किनारे से उसमें भीगे बिना चले जाएँ, बारिशों को देखने छतरियाँ लेकर निकले लोगों से अभागे, बिना जिये बस सांस लेते हुए दौड़ते भागते से अभागे, सामान बटोरने को जीवन का हासिल समझते से अभागे। हम वो अभागे बिलकुल भी नहीं हैं। हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए पानी में छप छप करते हुए खुद को दूर से देखा तो मेरा ही अधूरा बचपन मुझे देख  मुस्कुरा दिया। 

रात बीतती जा रही थी और दिल चाह रहा था कि काश सारी उमर इसी लम्हे में कैद होकर रह जाय। कई बार उठने को हुई पर उठ न सकी। आसान कहाँ होता है पानी और प्रेमी से निगाह तोड़कर वापस लौटना। ये नज़र लौटकर फिर फिर वहीं जा अटकती है। आखिर उठना पड़ा और उठते हुए जावेद साहब की लाइन याद आ गयी, 'लो देख लो ये इश्क़ है, ये वस्ल है, ये हिज़्र...अब लौट चलें आओ बहुत काम पड़ा है...'।

चलते चलते फिर एक कप कॉफी पीने की इच्छा ने थोड़ा और रोका उसके बाद चाँद को बालों में टाँककर वापसी की राह ली। पर ये तो सिर्फ ऋषिकेश शहर जानता है, गंगा का किनारा जानता है या मेरा मन कि जो लौट रहा है वो कोई और है....जो छूट गया है उन्हीं हवाओं में, उन्हीं फिज़ाओं में वो कोई और था।

मैं अपने खुद के छूटे हुए अक्स से मिलने फिर आऊँगी कहते हुए मैंने शहर की हवाओं का दोशाला अपने जिस्म पर कस लिया।

No comments: