Wednesday, July 6, 2022

यह सदियों की उदासी है- रूह

'तुम लोग तो चले गये थे, उसके बाद हम बचे हुए कश्मीरियों के बहुत बुरे हाल हुए थे...'

कल जब पेज 94 पर बुकमार्क लगाकर किताब बंद की थी तब आसमान साफ़ था बाहर लेकिन भीतर ढेर सारा कुहासा घिर आया था. मेरी पढ़ने की गति काफी अच्छी है. यूँ माँ कहती हैं कि तुम्हारे हर काम में बहुत गति है, सामान्य से काफी ज्यादा. यह बात मुझे भी लगती है. तो गति के मुताबिक 175 पेज की यह किताब एक सिटिंग में पढ़ना आसान था मेरे लिए. लेकिन गति भी एक नियम चाहती है, उसकी भी एक इच्छा होती है. आखिर बात रूह की है तो जल्दबाजी कैसे काम करती. सच कहूँ तो किताब के आने में जितनी देर हो रही थी मुझे ठीक ही लग रहा था. इस बात को ठीक-ठीक मैं समझ पायी रूह पढ़ते हुए ही. कि जिस जगह आप असल में शिद्दत से पहुंचना चाहते हैं वहीं जाने से कन्नी काटते रहते हैं लेकिन उसके आस पास घूमते रहते हैं और वहां पहुँचने की इच्छा को जीने का सुख च्विंगगम की तरह चुभलाते रहते हैं. 

आज की सुबह भीगी हुई है. रात भर बरस चुकने के बाद बारिश अपनी बूंदों भरी ओढ़नी धरती को ओढ़ाकर सुस्ताने लगी है. मैंने रूह उठा ली है. कुछ ही पन्ने पढ़ पायी हूँ. आगे बढ़ नहीं पा रही. फिर कल पढ़े हुए पन्नों को जिन्हें कल सारा दिन चुभलाती रही दोबारा पलटती हूँ. रोकती नहीं आंसुओं को. बहने देती हूँ...

मुश्ताक कहना जारी रखते हैं... 'तुम लोग तो चले गये थे, उसके बाद हम बचे हुए कश्मीरियों के बहुत बुरे हाल हुए थे. मुझे लगता है कि मेरी उम्र के जो लोग उस वक्त इस वादी में बड़े हो रहे थे उनका मानसिक संतुलन अगर अच्छा है तो यह बहुत बड़ी बात है.' (पेज 83) मुश्ताक कहना जारी रखते हैं मैं उनकी ज़ानिब से सुनती हूँ उन सबकी आवाज़, उन सबकी पीड़ा जिन्होंने सदियों से सिर्फ सहा है. उन्हें न सुना गया ठीक से, न समझा गया.

इतिहास...सबका अपना इतिहास है. और सबके अपने सच. कब और कैसे एक के सच को दूसरे के सच के प्रतिपक्ष में खड़ा करना है यह राजनीति का काम है जो वो बखूबी कर रही है. इतिहास में क्या दर्ज होना है, कैसे दर्ज होना है यह भी राजनीति बखूबी जानती है. हमारे सामने कुछ आधा सच लिए हुए कहानियों को अलग ढंग से अलग तरह के इतिहास में लपेटकर परोस दिया जाता है. हम उसे ही पूरा सच मान लेते हैं. यह हमारी मासूमियत ही है जो राजनीति की खुराक है.

मुश्ताक का सच पन्नों में सिमटने वाला सच नहीं है, वो कोई किस्सा नहीं है. 

'हमारा गांव तीन तरफ से घिर गया था. एक तरफ जेकेएलएफ, दूसरी तरफ हिज़बुल और तीसरी तरफ मुस्लिम मुजाहिदीन.' 

 'मैंने अपने दोस्त को जलते हुए देखा था'

एक बार हिज़बुल ने गाँव में पर्चे बंटवा दिए कि कोई भी गाँव में बत्ती बंद नहीं करेगा. एमएम ने भी पर्चे बंटवाए कि कि किसी के घर से रौशनी नहीं दिखनी चाहिए. मेरे पिता ने सारी खिड़कियों में ईंटें लगवाकर उन्हें चुनवा दिया था, हवा के लिए एक ईंट की जगह ख़ाली छोड़ी थी जिस पर भी जाली लगा दी थी. हम रातों में बत्ती जलाकर रखते पर घर चारों तरफ से बंद था इसलिए रौशनी बाहर नहीं जाती थी. आम कश्मीरी को दोनों से बचने के उपाय करने होते थे.'

कल पढ़े हुए पन्ने आज भी खड़े हुए रोयें में शामिल हैं अपनी तमाम पीड़ा के साथ. क्या जानते हैं हम कश्मीर के बारे में वहां के लोगों के बारे में. कुछ भी तो नहीं. कश्मीर हमारा है तो ये सब लोग भी तो हमारे हैं, मुश्ताक, बशीर ये सब भी तो हमारे हैं. उनका जिया हुआ सच भी तो हमारा ही होना चाहिए न? क्यों नहीं है...यह सवाल सबसे बड़ा है. हालाँकि जवाब से अनजान कोई नहीं.

'क्या हम दूसरे के डरों को छू सकते हैं? मुश्ताक के किस्सों में कहीं भी लड़कियों का जिक्र नहीं था. कुछ रेप के वाकये थे पर लड़कों के साथ बड़ी हो रही लड़कियों के किस्से क्यों नदारद थे?' ' मैं जानना चाहता हूँ कि तुम्हारे आसपास बड़ी हो रही लड़कियों का क्या हुआ होगा?'  लेखक की जिज्ञासा असल में हम सबकी जिज्ञासा है. 

'असल में वे औरते ही थीं जिन्होंने मिलिटेंटस को घर में घुसने नहीं दिया था. पर उन औरतों पर बहुत कम लिखा गया.'
 
'मैंने लड़कियों को अपने चेहरे पर चूल्हे की राख मलते हुए देखा है ताकि वो अपना गोरापन छुपा लें. उन्हें किसी ने नहीं छोड़ा न हिज़बुल ने, न एमएम ने, न आर्मी ने.'

एक गहरी ख़ामोशी पसरी हुई है...बिना किसी सिसकी के आँखें लगातार बह रही हैं. फराह बशीर की किताब 'रूमर्स ऑफ स्प्रिंग' विश लिस्ट में शामिल हो गयी है. मिलिटेंसी के दौरान वादी में बड़ी होती एक लड़की की निजी दास्तान जिसका लेखक ने जिक्र किया है.

आज की सुबह में कल की उदासी है...असल में यह सदियों की उदासी है...

(जारी...)

Tuesday, July 5, 2022

कौन सा कश्मीर हमारा है- रूह



'ठीक है, एक दिन लिखूंगा...' कहकर लेखक ने रूह के कश्मीर पर लिखने के इसरार को थाम लिया है. पेज 92 पर ठीक इसी जगह मेरा सब्र टूट गया है. अब तक जो आँखों में नमी पिछले पन्नों को पढ़ते हुए साथ चल रही थी अब वह भभक कर फूट पड़ी है. घर का खालीपन मुझे जी भरके रोने के लिए खूब पनाह देता है.

मैं किताब के बारे में नहीं लिख रही. उन सवालों, उन एहसासों के बारे में लिख रही हूँ जो किताब से गुजरते हुए जन्मे. किताब के बारे में लिखने के मेरे मन के अभी हालात नहीं.  

तो कश्मीर की बात करते हैं. सबसे पहले मेरे मन में सवाल आता है कि हम बचपन से 'कश्मीर हमारा है' सुनते हुए बड़े हुए. तबसे, जबसे हमें यह भी नहीं पता था कि आखिर यह बात कहने की जरूरत क्या है. जो चीज़ अपनी होती है वो तो होती है यानी कुछ गड़बड़ तो थी जो तब समझ नहीं आई थी अब भी कितनी समझ आई है पता नहीं.

'कश्मीर हमारा है' के भीतर देशप्रेम की जो आग सुलग रही है उसे समझना चाहती हूँ. जब हम कहते हैं कि कश्मीर हमारा है तो कश्मीर से हमारा आशय क्या होता है. वहां की सड़कें, पेड़, झीलें, पहाड़? बस इतना ही? यही है कश्मीर? फिर धारा 370 लागू होने के वक़्त के सस्ते चुटकुले और टिप्पणियाँ याद आयीं....और याद आया कैसे कश्मीरी लड़कियों को लेकर बात करते थे देशभक्त शोहदे.

फिर आई 'कश्मीर फ़ाइल' और एक बार फिर कश्मीरी पंडितों पर हुए जुल्मों को लेकर देशभक्ति उबाल लेने लगी. बहुत बुरा हुआ कश्मीरी पंडितों के साथ...वहां के मुसलमानों ने बड़े जुल्म किये. इस सबमें प्रतिशोध बजबजाता हुआ साफ़ दिख रहा था, दिख रहा है.

सवाल यह है कि हम किस कश्मीर के बारे में बात कर रहे हैं. क्या उस कश्मीर में वहां के लोग शामिल नहीं हैं? लोग शामिल हैं तो उनमें से कौन से लोग शामिल नहीं हैं? और उनके न शामिल होने का आधार क्या है?

रूह...को यह सब समझने के लिए पढ़ा जाना चाहिए. कि जिन कश्मीरी पंडितों के दर्द से भावनात्मक होने का ड्रामा करते हुए प्रतिहिंसा को अपनाकर देशभक्ति का नाटक ओढा हुआ है सबने उसके भीतर झांककर देखिये कि उन्हीं कश्मीरी पंडितों के साथ हमने क्या किया है. हिन्दू होते हुए भी हमने इन कश्मीरी पंडितों को भी नफरत की नजर से ही देखा, उनके दर्द को समझा नहीं उनका साथ दिया नहीं लेकिन उनके हिस्से का बदला लेने को आतुर हैं.

कश्मीर से विस्थापित एक परिवार होशंगाबाद में अपनी जगह बनाने की कोशिश करता नजर आता है. बच्चे दोस्त तलाश रहे हैं, माँ बाप अपने डरों से निकलने की और लोगों पर भरोसा करने की कोशिश कर रहे हैं कि एक रोज जब दसवीं में पढ़ने वाला एक कश्मीरी विस्थापित लड़का शहर में एक फैशन शो कराना चाहता है तो पूरे शहर की दीवारों पर लिखा मिलता है 'कश्मीरियों, वापस जाओ.' ये कश्मीरी हमारी 'संस्कृति' और 'सभ्यता' को खत्म कर देना चाहते हैं. 'तुम तो कश्मीरी हो न, वहां से भगाए गए, अब यहाँ से भी भगाये जाओगे. जाओ अपने कश्मीर. इस शहर को क्यों गंदा कर रहे हो?'

ये सब कहने वाले हिन्दू थे, देशभक्त थे और यह सब सुनने वाले कश्मीरी पंडित. जिनकी चिंता में कश्मीर फ़ाइल सुलग रही है. कितनी असभ्य है वो सभ्यता जिसकी चिंता में इंसानियत ही शर्मसार हुई जा रही है. कितनी अश्लील है वो संस्कृति जो क्रूर और हिंसक होना सिखाती है.

इन दिनों सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, देशभक्ति जैसे शब्दों से डर लगने लगा है सचमुच.

मेरी आँखें नम हैं और गर्दन झुकी हुई.  

(जारी...)

Sunday, July 3, 2022

रूह


कल सारा दिन बारिश होती रही...मैं नीम हरारत में रूह को सिरहाने रखे बारिश देखती रही. किताब के कवर को देखती, पढ़ी हुई भूमिका को फिर-फिर पलट लेती लेकिन पहले ही वाक्य पर अटकी रही. 'यही वह किताब थी जिसे कभी लिखना न था...' यह एक वाक्य भर नहीं है. लम्बी यात्रा है. इसके भीतर कितनी उथल-पुथल, कितनी बेचैनी, कितनी तलाश, कितना अपनापन और एक ख़ोज शामिल है.

मैं अपने घर पर नहीं रहता हूँ
मैं उसे अपने साथ लिए फिरता हूँ...

कविता के साथ संवाद करते हुए घर शब्द के मायने ढूँढने लगती हूँ. पढ़ने की इच्छा को पढ़ने से ऊपर रखने का सुख अलग ही होता है. मैं इस सुख के साथ खेलती हूँ अक्सर. मानव को मैंने वैसे भी बहुत संभलकर पढ़ा है, कि थोड़ा पढ़ना बचाये रखूं कि कोई ऐसी जगह है जहाँ कभी भी जाया जा सकता है और वो जगह निराश नहीं करेगी.

इतवार की सुबह में भी हरारत बनी हुई है लेकिन बारिश थमी हुई है. मैं कश्मीर यात्रा पर निकल चुकी हूँ और किताब के दूसरे पन्ने पर ही मानव का देहरादून आना दर्ज पाकर खुश हो गयी हूँ. एक निजी सुख गुंथ गया है इस पाठकीय यात्रा में.

चेरापूंजी होते हुए कश्मीर पहुंचना, मिलना शब्बीर और बशीर से, मिलना गुल मोहम्मद से, मिलना उस नीले आसमान से, उस मंडराते चीलों से, नून चाय, कहवा, लवास की ख़ुशबू में डूबना चल ही रहा था कि सामने रूह आकर बैठ गयी है. मैं रूह से मुत्तास्सिर हूँ. ऐसी स्पष्टता, ऐसा आत्मविश्वास और ऐसी सहजता इसमें एक अलग सा आकर्षण है. 

लेखक को वाज़वान खाता छोड़कर मैं बालकनी में चक्कर काट रही हूँ.

मुझे राज्यपाल कुरैशी के दफ्तर के बाहर दो छोटे बच्चों के साथ बैठी रोती हुई औरत का चेहरा नज़र आता है. अपनी देह के उजले रंग को न नहाने से छुपाकर यहाँ के बच्चों में घुल जाने की तरकीब लगाते दो छोटे बच्चे दिखते हैं. एक चुप पिता हैं जो तमाम संवादों के ऊपर खिंची रेखा सरीखे हैं. एक डर है जिसे भीतर धकेलकर 'सब ठीक है' मन्त्र का जाप करते से मुस्कुराते लोग हैं. अनंतनाग, पहलगाम, श्रीनगर इन सब जगहों पर जा चुकी हूँ, वहां के लोगों से मिली हूँ कश्मीरी घरों में जाकर कहवा पिया है, कश्मीरी खाना खाया है, कुछ सवाल भी किये हैं कश्मीर की बाबत वहां के लोगों से और फिर पछताई हूँ सवाल करने पर कि उन सवालों के जवाब में मुस्कुराहटें पकड़ाई हैं लोगों ने.

लेखक की बेचैनी मुझे कम बेचैन करती है, ज्यादा बेचैन करती है कश्मीर को लेकर होने वाली वो तमाम राजनीति जिसने इस कदर लहूलुहान करके रख दिया है सब कुछ.

कश्मीर पर सूचनात्मक दस्तावेज तो खूब लिखे गये, पढ़े गये, चर्चा में आये लेकिन उन सूचनात्मक दस्तावेजों से इतर एक इनसाइडर स्टोरी के सामने खड़े होना आपको रुला देगा. वहां (कश्मीर में)एक बड़ा सा घर था से हम एक कमरे के छोटे से घर में रहने लगे तक को समझना. और इस समझने में कोई आक्रोश नहीं, हिंसा नहीं, किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं. यह संभव कर पाना असल में इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है. यह उस माँ की बाबत है जिसने अपने बच्चों को ऐसी तरबियत दी कि कश्मीर से आ गये फिर भी कश्मीर से प्यार नहीं कम हुआ बच्चों में, संघर्ष किये, संघर्षों की आंच में तपे लेकिन राजनीति की चतुराई के झांसे में नहीं आये कभी मोहरा नहीं बने किसी खेमे का. क्योंकि माँ और पिता दोनों जानते थे कि असल में दोनों एक ही हैं...'जिगरा तुम मुसलमान हो जाओ मैं हिन्दू हो जाता हूँ फिर देखते हैं कौन आता है हमें यहाँ से निकालने...'

बस एक बार, सारे हिन्दू मुसलमान होकर देखें और सारे मुसलमान हिन्दू होकर. बस एक बार हम अपनी चस्पा कर दी गयी पहचानों के खोल से बाहर निकलकर उन पहचानों में ढलकर देखें जिनके प्रति मन में गुस्सा है, जिनसे सवाल हैं...एक बार बस...

पेज 71 पर बुकमार्क लगाकर मैं अब तक के पढ़े हुए को चुभला रही हूँ. माया आंटी बहुत याद आ रही हैं. कि इसमें लिखे न जाने कितने किस्से उनसे सुने थे, पढ़ते हुए लगा वो ही हैं अक्षरों के बीच बैठी हुई कहीं. 

इतने सारे शब्द उलीच चुकने के बाद शब्दहीनता की शरण की तलाश में हूँ. फिर मुझे मानव का लिखा एक वाक्य शरण देता है कि 'किसी भी वाक्य पर पहुँचने के मेरे सारे रास्ते ऊबड़-खाबड़ थे'.

जारी...

Saturday, July 2, 2022

प्यार ही बचायेगा दुनिया को


इन दिनों ज़िन्दगी जिस मोड़ पर ले आई है...वहां से पीछे छूट गये को देखना साफ़ हो गया है और आगत को लेकर बेसब्री कम हो गयी है. सवाल अब भी साथ रहते हैं लेकिन अब वो चुभते नहीं. उन्हीं सवालों के भीतर छुपे उनके जवाब दिखने लगे हैं. जैसे हिंसा जब सवाल के रूप में सामने आती है तो प्रेम उसके भीतर छुपे जवाब के तौर पर स्पष्ट दिखता है. जैसे उदासी के सवाल के भीतर नज़र आती है भीतर की वह यात्रा जो हमें लगातार मांज रही है. नज़र का चश्मा तनिक साफ़ हो गया लगता है. अब गुस्सा कम आता है सहानुभूति ज्यादा होती है.

किसी भी घटना के लिए व्यक्ति को दोषी के तौर पर देख पाना कम हुआ है दोषी व्यक्ति के निर्माण की प्रकिया को बेहतर कर पाने का दायित्वबोध बढ़ा है. एक चुप के भीतर छुपकर रहना सुकून देता है. जाने क्यों दुनिया के हर मसायल का एक ही हल नज़र आता है, वो है प्रेम. कि सारी दुनिया अगर प्रेम में डूब जाए तो सब कुछ कितना आसान हो जायेगा. फिर चारों तरफ होने वाले ज़हरीले संवादों के बाण बेधते हैं तो सोचती हूँ इस दुनिया में कितने सारे लोग प्रेम विहीन हैं देखो न...कि इनके भीतर हिंसक होने की जगह इस कदर बची हुई थी. जो होता प्रेम तो ये आरोप प्रत्यारोप के बजाय निरंकुश अट्टहास के बजाय हर दुखी उदास व्यक्ति को आगे बढ़कर गले से लगा लेते बिना पूछे जाति, धर्म देश. क्योंकि प्रेम तो ऐसा ही होता है. एक बार दिल प्रेम से भर उठे तो आप जीवन में कभी किसी से नफरत कर ही नहीं सकेंगे. अगर भीतर किसी भी किस्म की हिंसा, क्रोध, द्वेष शेष है तो यक़ीनन प्रेम दूर है आपके जीवन से. वो जिसे प्रेम समझे बैठे रहे अब तक वो कुछ भी था सिवाय प्रेम के.

ये कोई ख़्वाब नहीं था...



आज एक नदी मुझसे मिलने आई मेरे घर
फिर आया एक पूरा जंगल
आया जंगल तो आये परिंदे भी
फिर मैंने देखा खिड़की से झाँक रहा था बादल
लिए ढेर सारी बारिश
खोली खिड़की तो आ गया बादल भी बारिश समेत 

अलसाता इठलाता समन्दर आया कुछ देर बाद
राग मल्हार आया तो साथ आया मारवा भी
मीर आये बाद में पहले फैज़ और ग़ालिब आये
पीले लिबास में सजी मुस्कुराहटें आयीं आहिस्ता आहिस्ता
रजनीगन्धा आये तमाम साथ अपने लाये सूरजमुखी
तुम आये तो आज इस घर में देखो न
चला आया कुदरत का समूचा कारोबार

इस धरती को खूबसूरत बनाने का ख़्वाब जो रहता था इस घर में
ये सब आये उस ख़्वाब को बचाने की ख़ातिर
तुम आये तो आई उम्मीद, शान्ति, प्यार
तुम आये तो आई बहार
 
जब देख रही थी मैं इन सबको अपने घर में
आँखें खुली हुई थीं कि ये कोई ख्वाब नहीं था
कि मेरी हथेलियाँ जब हों तुम्हारे हाथों में
ख़्वाब कोई नामुमकिन कहाँ रह जाता है...