Monday, April 13, 2020

स्याह सन्नाटे के दौर में गुब्बारों की आमद


- प्रतिभा कटियार

लॉकडाउन का चौथा दिन था. सड़को पर सन्नाटा पसरा हुआ था. वही सड़कें जो किसी वक़्त ट्रैफिक जाम से कराहा करती थीं. इतनी शांति चारों ओर जैसे किसी और ही जहाँ में आ गए हों. लेकिन इस शांति में उदासी है. अफरा-तफरी वाली, भागमभाग वाली जिन्दगी से कुछ पलों को निजात तो चाही थी लेकिन वो ऐसे मिलेगी सोचा नहीं था. उदासी से घिरे मन के साथ उस रोज जब खिड़की से खाली सडक को देख रही थी तब अचानक साइकल पर एक गुब्बारे वाला आता दिखा. सुबह नौ बजे का वक़्त था. मुझे उस गुब्बारे वाले का चेहरा नहीं दिखा लेकिन गुब्बारों में उम्मीद दिखी जैसे रोज खिलते फूलों में दिखती है. वो गुब्बारे वाला जानता तो होगा कि कितना भला होगा उसका कुछ गुब्बारे बेचने से. जब लोग राशन सब्जी लेने को परेशान हों ऐसे में भला गुब्बारों के बारे कौन सोचता है फिर भी वो निकला है गुब्बारे लेकर. कुछ घंटो की छूट में उसे यही सूझा? उसे नहीं सूझा राशन की दुकान तक दौड़ जाना, उसके मन में क्या होगा…क्या जाने. गुब्बारे वाला चला गया लेकिन मुझे उम्मीद से भर गया. जब एक गुब्बारेवाला अपने लिए रास्ते बना रहा है तो हम क्यों सिर्फ उदासियों को ओढ़े बैठे रहें.

उसी रोज उदासी को किनारे लगाकर बच्चों को फोन लगाती शिक्षिका के चेहरे पर चमक लौट आई. बहुत सारे शिक्षक साथियों के पास वक़्त नहीं है दिया और थाली पर फेसबुक पर विमर्श करने का. उनके पास अब पहले से ज्यादा काम है. वो बच्चों से फोन पर सम्पर्क में हैं. उनके परिवारीजन की खैरियत ले रहे हैं. और यथासंभव मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले बहुत सारे शिक्षकों से बात करते हुए महसूस हुआ कि असल में शिक्षक होना असल में होता क्या है. शिक्षक न सिर्फ समुदाय की मदद के लिए रास्ते निकाल रहे हैं, उस मदद में प्रशासन को सहयोग कर रहे हैं बल्कि बच्चों को चारों तरफ छाई नकारात्मकता से बचाने की कोशिश ही कर रहे हैं.

चूंकि ये बच्चे जिस समुदाय से आते हैं वहां ज्यादातर रोज कमाने और रोज खाने जैसे हालात हैं और शिक्षकों से ये लोग सीधे सम्पर्क में होते हैं इसलिए इनके लिए आसान होता है सही व्यक्ति तक पहुँच पाना. कुछ शिक्षकों ने बच्चों से रोज बात करने का और उन्हें फोन पर कहानियां सुनाने, कवितायेँ सुनाने का काम शुरू किया है. कुछ शिक्षकों ने उन्हें फोन पर कुछ काम देना शुरू किया है. स्मार्ट फोन सबके पास नहीं होते हैं यह जानते हैं शिक्षक इसलिए शिक्षक साथियों ने टेक्स्ट मैसेज के जरिये, पहेलियाँ, सवाल आदि भेजकर उन्हें हल करने को बच्चों को प्रेरित किया है. शुरू-शुरू में तो बच्चों और उनके अभिभावकों को यह समझ में नहीं आया लेकिन टीचर्स ने जब फोन करके उन्हें इस प्रक्रिया के बारे में समझाया तो उन्हें अच्छा लगा. सबसे ज्यादा उन्हें अच्छा लगा कि मैडम, सर लोग उन्हें याद कर रहे हैं. अपनेपन के रिश्तों में ढले बिना भला कौन सी शिक्षा हुई है यही वो वक़्त है जब शिक्षक और शिक्षार्थी के रिश्तों को निखरना है. इसी समय में शिक्षक बच्चों से कह पा रहे हैं कि हम सचमुच आपके साथ हैं, सिर्फ कहने के लिए नहीं.

हमने जिन भी शिक्षकों से बात की, जो समुदाय के लिए मदद की और बच्चों के साथ शिक्षा को लेकर कुछ कर रहे हैं सभी ने उनके कामों का जिक्र न करने की बात कही. इसमें उतरकाशी, चमोली, बागेश्वर, देहरादून समेत कई जगहों के शिक्षक शामिल हैं. यह उनके काम का जिक्र न करने की बात उन शिक्षकों के प्रति सम्मान को और बढ़ा देता है.

कौन कहता है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक सिर्फ आराम पसंद होते हैं. कम से कम उत्तराखंड के शिक्षक तो उनसे की जा रही तमाम अपेक्षाओं से कहीं आगे तक करने की सोच भी रहे हैं और कर भी रहे हैं.

कहीं औनलाइन क्लासेस चल रही हैं, कहीं फोन पर इमला बोला जा रहा है, कहीं आधी कहानी सुनाकर उसे पूरा करने को कहा जा रहा है और कहीं बच्चों को कुछ मजेदार सवालों में, पहेलियों में उलझाया जा रहा है. मुहावरों और कहावतो को ढूंढकर लाने को भी कहा जा रहा है, पहेलियों में मम्मी पापा को भी शामिल करने को कहा जा रहा है.

इस बुरे वक्त से लड़ने का यह तरीका भी तलाश रहे हैं उत्तराखंड के कुछ शिक्षक साथी. शिक्षक संगठन भी समुदाय की सहायता में पूरी तैयारी और सकारात्मकता से जुटे हैं. यह वक़्त बीत जाएगा, हम काम पर लौटेंगे और जब इस दौर के दिनों को याद करेंगे तो ये कहानियां भी याद आएँगी और वो गुब्बारे वाला भी…

(नैनीताल समाचार में प्रकाशित-https://www.nainitalsamachar.org/corona-aur-gubbare-wala/?fbclid=IwAR2DaaMGmq2Ucac26rdIrZxQa9cJcizPEjDHJl2cBFsbSZipZc4YcdlqiCg)

तेरी खुशबू उगी है...


देखो, खुशबू उगी है...तुम बो गये थे इंतजार के जो बीज वो खिल रहे हैं. महक रहे हैं. ये खुशबू मुझसे हर वक़्त बात करती है. हर वक्त मैं इस खुशबू को ओढ़े फिरती हूँ. बौराई सी रहती हूँ. कल एक चिड़िया खिड़की पर आई देर तक मुझे देखती रही. मैंने उससे पूछा, 'क्या देख रही हो?' वो हंस के उड़ गयी...

वो क्या देख रही होगी, क्यों उड़ गयी होगी भला? क्या उसने तुमसे सीखा है यूँ  देखने का ढब कि जब जी भर के देखने का जी चाहे अपनी नजरें फेर लेना.

तुम्हारे प्यार में प्यार के सिवा सारी बातें होतीं हैं..ये ढब इतना सुन्दर है, इतना नायाब कि सारा कहा फिजूल लगता है. सुनो, तितलियों का एक जोड़ा देर से सूरजमुखी के फूलों पर मंडरा रहा है. वो गुलाब पर क्यों नहीं मंडरा रहा होगा, बोलो? हंसो मत मैं जानती हूँ इन तितलियों ने सीखे हैं ढब सब तुमसे...

धूप और छाया का खेल देखते बनता है. धूप धीरे धीरे जगह बदलती जाती है...टिकती नहीं यह न टिकना
ही तो शाश्वत है. किसी मौसम में धूप की ओर भागना और किसी मौसम में धूप से बचकर भागना. धूप शाश्वत है...प्रेम शाश्वत है, मृत्यु शाश्वत है...बाकि सब नश्वर...

इन दिनों सारी दुनिया मौत के भय से जूझ रही है मैं अपने भीतर और घना प्रेम उगते हुए महसूस करती हूँ. जो प्रेम जी चुका, जो प्रेम में हो उसे मृत्यु का भय नहीं रहता. मुझे भय बस इस बात का है कि उनका क्या जो प्रेम में नहीं हैं, जो धूप को मुठ्ठियों में बांधना चाहते हैं, जो छाया को कसकर बांधकर रख लेना चाहते हैं. जो खुशबू को लॉकर में छुपाकर रख आना चाहते हैं...बिना जिए मर जाने वाले लोग कितने निरीह होंगे न?

आओ चलें, बहुत काम बाकी है...प्रेम का जन्म तो संसार के घावों पर मरहम रखने को हुआ है न? 

Sunday, April 12, 2020

तुम सोते हुए मुस्कुराना मत...


क्या तुमने मुझे अभी-अभी इसी पल याद किया है. मुझे ऐसा क्यों महसूस हुआ? 'मैं तुम्हें कब याद नहीं करता' की तुम्हारी बात मेरी सुबह की चाय में मिठास बनकर घुली हुई है.

क्या तुमने सुबह की चाय पी ली होगी? या चाय पीने की इच्छा को समेटकर करवट बदल कर फिर से सो गये होगे? क्या तुम थोडा और सोकर उस सपने को बचा रहे हो जिसमें हम दोनों साथ में चाय पी रहे थे?

एक बेहद मुक्कमल सुबह को तुम्हारा ख्याल महका रहा है. इस ख्याल में मैं तुमसे झगड़ रही हूँ. तुम कभी कोई काम ठीक से क्यों नहीं करते? कुछ भी नहीं. न आये ठीक से, न गए ठीक से. न याद किया ठीक से न भूले ही ठीक से...तुम मेरे झगड़ने को मुग्ध होकर देखते हो, 'ठीक क्या होता?' तुम पूछते हो?

ह्म्म्मम...जो हथेलियों पर रखा होता है वो अक्सर ठीक नहीं लगता, वो ठीक लगता है जो छिटक कर दूर चला जाता है. तुमने ठीक कहा था, तुम्हारा जिन्दगी में न रह जाना असल में जिन्दगी में तुम्हारा ढेर सारा बिखर जाना ही तो है.

एक रोज तुम्हारी सिगरेट बुझाते हुए थोड़ी सी सुलग भी गयी थी मैं....वही आंच जिन्दगी की आंच बनी है अब तक. जानती हूँ तुमने सिगरेट पीना छोड़ दिया है, सोचती हूँ कभी मिलोगे तो हम साथ में पियेंगे...सिगरेट नहीं जिन्दगी.

'जितना तुम्हारे साथ हूँ, उतना तो खुद के साथ भी नहीं...' कहीं से आवाज आती है. यह तुम्हारी ही आवाज है. फोन की घंटी की बजी नहीं. कोयल जरूर बजे  सौरी बोले जा रही है.

तुम सोते हुए मुस्कुराना मत, पकडे जाओगे मेरी याद के साथ...

तुम चाय पीना कब सीखोगी कहकर जो शक्कर बढ़ा देते थे न मेरी चाय में...वो मीठा जिन्दगी में घुला हुआ है.

Saturday, April 11, 2020

कुछ कह रहा है यह जीवन...


सुबह की चाय के साथ ढेर सारे सवाल लिए लॉन के उस कोने में बैठी हूँ जो मुझे दिन भर ललचाता है. फूलों से भरा कोना. मुझे यहाँ बैठना असीम सुख से भरता है. फूलों से भरी क्यारियों के बीच बैठना, चाय पीना, पंछियों की तस्वीरें खींचना, फिर कुछ देर अख़बार पलट चुकने के बाद वॉन गॉग से गप्पें लगाना. गॉग कहता है 'हमें पढ़ना सीखना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे हमें देखना चाहिए.' वो ठीक कहता है. हमें साँस लेना भी सीखना चाहिए, भूख को महसूस करना भी. जो है के उस पार देखना उसे जो नहीं है...या ठीक इसके उलट भी.

बहुत सारा लालच रहता है इन दिनों ज्यादा जी लेने का. कि जिन्दगी का भरोसा तो कभी नहीं रहा लेकिन इन दिनों अविश्वास बढ़ गया है. हर दिन को आखिरी दिन की तरह जीना चाहती हूँ, जीते हुए सुख से भर उठती हूँ फिर अचानक गालों पर कुछ बहता हुआ महसूस करती हूँ. कुछ पिघल रहा है भीतर.

संगीत सुनने जाती हूँ तो मेहँदी हसन, जगजीत सिंह, किशोरी अमोनकर, कुमार गन्धर्व सबको सुन लेना चाहती हूँ, मालकोश, भैरवी, तिलक कामोद , सारंग सारे राग फिर से जीवन में घोल लेना चाहती हूँ कि अचानक प्रहलाद टिपनिया कबीर गुनगुनाने लगते हैं. सुबह जल्दी से बीत जाती है....इसे न जाने कहाँ जाने की जल्दी है.

पढ़ने की कोशिश में लोर्का, ब्रेख्त, अन्ना अख्मतोवा, फहमीदा रियाज, निर्मल वर्मा, लाल बहादुर वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, वॉन गॉग सब आपस में गुंथ जाते हैं. इन सबके बीच से निकलकर चुपचाप किसी पेड़ के नीचे बैठकर सामने वाले पेड़ पर बैठे शरारती कबूतरों के खेल देखने लगती हूँ.

आजकल दिन के खाने की छुट्टी है. यह बेटी का बनाया हुआ नियम है. उसे बहुत सारे लोगों की भूख महसूस होती है. उसने एक वक़्त का खाना स्थगित किया है. उसका नियम मुझे पसंद है. वो कहती है इसी देश में कितने लोग भूख से लड़ रहे हैं और हम...चारों पहर ठूंस रहे हैं. मैं चुप रह जाती हूँ. यूँ एक वक़्त के खाने का गायब होना काफी राहत लेकर आया है. घरेलू काम घटे हैं और इस बचे हुए समय में जेहनी उथल पुथल बढ़ गयी है.

ज्यादा देख पा रही हूँ अपने ही विचारों पर पड़ी धुंध को. कितनी परतें हैं अभी जो अस्पष्टता बनाये हुए हैं. हमारे विचार भी कहाँ साफ हैं. बस इतना ही समझ सकी हूँ खुद से, ईमानदारी से कि बहुत सीखना, बहुत जानना शेष है, जिन्दगी की पहली कक्षा की विद्यार्थी हूँ...थोड़ी कन्फ्यूज़, थोड़ी बेशऊर...

कितना कुछ कह रहा है यह जीवन...

Friday, April 10, 2020

तो आज मारीना मारीना नहीं होती...

शीला पुनेठा द्वारा लिखी एक समीक्षा। किताब है-मारीना। जीवनीकार हैं- प्रतिभा कटियार। शीला ने न केवल खुद पढ़ी बल्कि पाठ कर मुझे भी सुनाई। मैं तो लिखने की हिम्मत नहीं कर पाया लेकिन उन्होने लिख डाली।किताब बेचैन करने वाली है। पढ़ने वाला प्रतिक्रिया दिये बिना अपने आपको नहीं रोक सकता है। जीवनी को जिस उतार-चढ़ाव के साथ प्रस्तुत किया गया है ,वह पढ़ने वाले को उपन्यास का आस्वाद प्रदान करती है। इस किताब को तैयार करने में निसन्देह प्रतिभा को बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी।सच में उन्होने इस किताब को लिखते हुए मारीना को जिया है। वह खुद रोयी हैं। गहरा आत्मलाप किया है। वह मारीना के बाहर और भीतर, दोनों को उजागर करने में सफल रही हैं। केवल मारीना ही नहीं उन तमाम लोगों ,जो उनके समकालीन थे, को चित्रित कर पाई हैं। जिसके चलते मारीना का पूरा समय और समाज जीवन्त हो उठा है। मारीना के व्यक्तित्व व कृतित्व से हमारा गहरा परिचय कराती हैं। उनको और अधिक पढ़ने को प्रेरित करती हैं। मारीना का बहुत सारा साहित्य है जो अभी तक हिंदी के पाठकों के सामने नहीं आ पाया है।आशा है प्रतिभा इस काम को करेंगी ,उनमें ऐसी प्रतिभा है। एक अच्छी किताब के लिये उनको बहुत-बहुत बधाई। संवाद प्रकाशन का धन्यवाद।-  महेश पुनेठा 


- शीला पुनेठा 
रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा की प्रतिभा कटियार द्वारा लिखी जीवनी इसी वर्ष की शुरुआत में संवाद प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इस बीच, इस किताब को पढ़ना संभव हुआ। प्रतिभा जी ने इतनी अच्छी सामग्री पाठकों तक पहुंचाई जिसके लिए वह साधुवाद की पात्र हैं। इस किताब को पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था कि मारीना का जन्म दुःख झेलने को ही हुआ है। जीवन मे इतने संघर्ष कि पढ़ते हुए लग रहा था कि अब ठहराव आएगा लेकिन दुखों का अन्त नहीं हुआ।

उन्नीसवीं सदी में जब रूस के हालात बहुत खराब थे उसी दौर में मारीना का जन्म हुआ। रूस की इस महान कवयित्री ने पूरी उम्र जिंदगी के प्रति आस्था और प्रेम को बचाए रखने के लिए संघर्ष किया। कैसी भी विषम परिस्थिति हो, मारीना का लिखना नहीं छूटा। यह किताब हमें यह दिखाती है कि एक लेखिका जो अपने सारे दायित्वों को निभाते जाती है और उसके बदले वह सबसे प्यार ही तो चाहती है लेकिन एक देश से दूसरे देश भटकते रहने पर भी उसे कहीं स्थायी ठिकाना नहीं मिलता। एक बार ऐसे ही फ्रांस पहुंचने पर मारीना को पता चला कि वहां लेखकों,साहित्यकारों, कलाकारों, को मुफ्त राशन दिया जाता है लेकिन मारीना को वह राशन नहीं मिल पाया। वजह थी उसका नाम रजिस्टर्ड लोगों की सूची में नहीं था। रजिस्टर्ड ना होने के चलते, खाना ना मिल पाने वाली घटना को पढ़ते हुए मुझे लगा कि अभी हमारे देश के हालात भी ठीक वैसे ही हैं।

बचपन में ही मारीना की माँ की मृत्यु हो गई थी। यही से उसके दुखों की शुरुआत हो गई थी।पिता के होते हुए भी वह हमेशा उनकी कमी महसूस करती थी।उसके पिता की गिनती रुस के बौद्धिक लोगों में हुआ करती थी। उनके पास बच्चों के लिए समय नहीं होता था। इसी अधूरेपन के कारण वह प्रेम के लिये जीवन पर्यंत भटकती रही।

उसके कई लेखकों, कवियों से भी गहरे सम्बन्ध रहे। जो ज्यादा समय नहीं टिक पाए। लेखकों से लम्बा पत्र व्यवहार भी चलता था। अत्यधिक गरीबी के दिनों में ये लोग काफी मदद भी करते थे। कभी कोई रहने की व्यवस्था कर देता। सेर्गेई नाम के युवक से उसने शादी की। जो पहले से ही क्षयरोग से जूझ रहा था। सेर्गेई देशप्रेम से ओतप्रोत था तो मारीना शब्द व कला से। आगे चलकर न पति का पूरा साथ मिला न कोई आर्थिक मदद। तीन बच्चों की परवरिश अकेले अपने दम पर की। भूखमरी की स्थिति में दोनों बेटियों को इस आशा मे अनाथालय में डाल दिया कि वहाँ भरपेट भोजन मिल पाएगा। बड़ी बेटी का स्वास्थ्य खराब होने पर मारीना उसको घर लायी और उसकी देखरेख की लेकिन इसी दौरान उसे खबर मिली कि छोटी बेटी नहीं रही। वह इस स्थिति में नहीं थी कि उसके अन्तिम संस्कार में जा पाए। मारीना उस समय बड़ी बेटी के सिर मे ठण्डी पट्टी रख रही थी।

कवयित्री से इतर मारीना एक माँ भी है और ऐसे समय में उस माँ पर क्या बीत रही थी इस किताब को पढ़ने से पता चलता है। पर इस सबके बावजूद भी मारीना का लेखन बराबर चलता रहा।

वास्तव में यह किताब अपने आप में अलग तरह की है। लेखिका ने काफी लगन और मेहनत से इसको लिखा है। इसे पढ़ने पर कहीं पर भी यह अहसास नहीं होता है कि लेखिका मारीना से नहीं मिली है।
लेखिका ने मारीना के साहित्य को पढ़ा ही नहीं बल्कि जिया है।बिना उसको आत्मसात किए ऐसी जीवनी लिख पाना असम्भव है। लेखिका इसे लिखने में इतना डूब चुकी है कि लगता है आमने- सामने बैठकर बात कर रही है। किताब पढ़ते हुए हमें जगह -जगह इस बातचीत के अंश मिलते हैं । जिसमें लेखिका मारीना से प्रश्न भी करती है तथा कहीँ-कहीं पर अपनी असहमति भी दर्ज करते नजर आती हैं। इस वार्तालाप को बुकमार्क नाम दिया है। इससे किताब में और रोचकता आ गई है।

डॉ. वरयाम सिंह जी द्वारा मारीना की कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया गया है। इस किताब को लिखने में भी उन्होंने सहयोग किया है। प्रतिभा जी ने काफी मेहनत और लगन से इस किताब को लिखा है। यह अपने आप में अलग तरह का काम है । वरयाम जी किताब की भूमिका में लिखते हैं कि 'अनुवाद तो बहुत हुए हैं पर किसी भारतीय ने रूसी लेखक की जीवनी लिखी है। इस तरह का काम आसान नहीं होता है और यह पहला प्रयास है। हो सकता है यह सिलसिला ही चल पड़े।'

किताब पर प्रकाश डालते हुए वह महत्वपूर्ण बात रेखांकित करते हुए कहते हैं कि 'इस किताब में दो कालखण्डों में एक पुल बनता नजर आता है. वह उस युग से चलकर इस युग में आती है,बात करती है और ऐसे में वो समकलीन जैसी लगती है। असल में, किसी से जब हम संवाद करते हैं तो असल में हम खुद से ही संवाद करते हैं, खुद को समझने का प्रयास करते हैं।'

मारीना की जीवनी हमें उस समय के साहित्य के साथ- साथ अलग-अलग समाजों से भी परिचित कराती है जैसे रूस, फ्रांस, जर्मनी। साथ ही, उस समय के समाज में साहित्यकारों की स्थिति से भी अवगत करवाती है। अपने जीवन के इतने कड़े संघर्षों के बाद भी मारीना निरन्तर लिखती रही, कभी पत्र, तो कभी डायरी या गद्य और कभी कविता। जीवन के अन्तिम क्षणों में भी वह तीन पत्र लिखकर रख गई। अगर उन सब मुश्किलों से हारकर बैठ जाती तो आज मारीना मारीना नहीं होती।