Thursday, August 22, 2019

कहा न प्यार है !

क्रिसमस की तैयारियों ने पूरे कारमोना को दुल्हन सा सजा रखा था. लेकिन इस धज में शोर नहीं था, शांति थी. किसी सजे हुए घर से गिटार पर बजती हुई धुन सुनकर रुक ही गये कदम, कहीं नारियल के पेड़ पर अटके चाँद से आँख लड़ा बैठे. ऐसी शांति अरसे बाद मिली थी. ऐसी बेफिक्री तो शायद पहली बार ही. लम्बे सफर की थकान और अधूरी नींदों का असर था या जिन्दगी की आपाधापियों से निजात का असर जल्द ही गहरी नींद ने जकड़ लिया. याद नहीं इतनी गहरी, बेफिक्र नींद आखिरी बार कब हिस्से आई थी. सुबह एकदम खिली हुई थी. सुबह मैं जल्दी से जल्दी समन्दर के पास जाने की हड़बड़ी में थी लेकिन अजय जी की नींद उन्हें छोड़ नहीं रही थी. वो विदेशी क्लाइंट्स के साथ डील करते हैं इसलिए उन्हें देर रात तक जागने की और सुबह देर तक सोने की आदत है यह वो बता चुके थे. उनकी बायोलॉजिकल क्लॉक विदेशों के हिसाब से सेट थी. मैंने उनसे इतना भर पूछा कि क्या मैं अकेली चली जाऊं? इस पूछने में कई तरह की हिचक, संकोच सब था लेकिन जिस सहजता से उन्होंने कहा, ‘इसमें पूछने की क्या बात है, तुम्हें जाना ही चाहिए.’ मैं खुश हो गयी और जल्दी से नाश्ता ठूंसकर समन्दर की ओर भागी. बीच तक ले जाने के लिए होटल की एक गाडी जाती थी मैने झट से उसमें जगह बना ली. मेरे बगल में एक जोड़ा बैठा था. लड़की बिकनी में थीं. लड़की सहज थी, मुझे सहज होने में दो मिनट लगे. हंसी भी आई खुद पर, कितना कुछ है टूटने को अपने भीतर, कितना कुछ बाकी है उगने को. मैं हर पल बदल रही थी. हर पल मुझे मुझमें कुछ नया होता महसूस हो रहा था. सबसे ज्यादा बदल रहा था सहज होना सीखना. जेंडर के पूर्वाग्रह से मुक्त होना. दोस्त सिर्फ दोस्त होता है वो स्त्री या पुरुष नहीं होता यह समझना. इन बातों को कहना आसान है, इन्हें विमर्श बनाना आसान है लेकिन जीना इतना भी आसान नहीं होता. कंडिशनिंग आड़े आती ही है कभी चेतन में कभी अवचेतन में. उस कंडिशनिंग का टूटना सुखद होता है. 

सुबह का समन्दर रात के समन्दर से अलग होता है. बहुत अलग. अब मैं और समन्दर आमने-सामने थे. मुझे अब कहीं नहीं जाना था. समूची यात्रा जिस मुलाकात के लिए थी वो अब होने को थी. जालोर बीच शहर से दूर है, यहाँ ज्यादा भीड़ नहीं, बहुत कम टूरिस्ट हैं यहाँ वह भी तब जबकि क्रिसमस करीब है. मुझे ऐसी ही शांति तो चाहिए थी. नंगे पाँव गीली रेत पर चलते हुए मैं कहीं दूर निकलती जा रही थी. लहरों के बीच से होते हुए मैंने एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चलते जाना शुरू किया. रास्ते भर लहरें मुझसे खेलती रहीं, लुभाती रहें, ललचाती रहीं. टखने से घुटने तक घुटने से कमर तक और कमर से चेहरे तक आने में कहाँ वक्त लगा था उन्हें. जिस तेज़ बहाव से वो मेरी ओर आतीं भीतर से सीत्कारी सी फूटती. मेरी आँखें लगातार बह रही थीं. लहरें जिस दबाव के साथ जकड़ रही थीं वह कितना निर्मल कितना अद्भुत था. यही तो है प्रेम की जकडन जिससे छूटने को जी नहीं चाहता. मेरे कानों ने मेरे होंठों को कहते सुना, ’हाँ हाँ आई लव यू’. समन्दर के इसरार ने आखिर मेरा इकरार सुन ही लिया.

समन्दर के किनारे मछुवारों का संगीत बज रहा था और एक चिड़िया मेरी ही तरह लहरों के संग खेल रही थी. मैंने उस चिड़िया के खेल को कैमरे में कैद किया अपनी छाया समेत. वह चिड़िया मानो मैं ही थी और वह लहर भी मैं ही थी. और अंत में सारे मैं विलीन हो गये थे सिर्फ असीम शांति बची थी. यह अकेलापन इतना भरपूर था कि इसे जी लेने के बाद कोई इच्छा शेष नहीं रहती. पूरे बीच का चक्कर लगाने के बाद मैं लहरों के बीच धूनी जमाकर बैठ गयी थी. लहरें मुझे पूरा ढंक लेती थीं और दूर तक अपने साथ लिए चली जाती थीं. उस लम्हे में मैं कहाँ थी पता नहीं. वो लम्हे जिन्दगी थे, वो लम्हे सुख थे, वो लम्हे निर्वाण भी थे. इन्हीं लम्हों में जिन्दगी के वो तमाम झमेले जो हमें पूरी तरह जकड़े होते हैं बौने लगने लगते हैं. यही पल यात्रा का हासिल होते हैं. 
पूरे चार घंटे बीत चुके थे. होटल वापस ले जाने वाली गाडी जा चुकी थी. मैंने एक्टिवा की तलाश शुरू की जो काफी कोशिश करने के बाद भी नहीं ही मिली क्योंकि क्रिसमस के कारण सारी एक्टिवा बुक हो चुकी थीं. मेरे सामने सवाल यह था कि समन्दर में चार घंटे रहने के बाद की थकान के बाद 3 किलोमीटर पैदल चलकर कैसे जाऊं. गोवा में लिफ्ट लेकर चलने के बारे में खूब सुना था. आज मेरे सामने उस सुने हुए को आजमाने का मौका था. मैंने एक अनजान से लिफ्ट ली. उसकी एक्टिवा ने मुझे आधे रास्ते तक लिफ्ट दी. यह अनुभव भी काफी रोमांचक था. मुझे लगा जो सुना था वो मैं भी कर सकी. अच्छा लग रहा था. बाकी का आधा रास्ता मैंने पैदल तय किया. आखिर अपने कमरे तक पहुँच चुकी थी मैं. मुझे जोरों की भूख लगी थी. खाने के बाद मुझे भयंकर नींद ने जकड़ लिया. नींद खुली तो शाम के 5 बज रहे थे. फिर से समंदर पुकार रहा था, इस बार अजय जी भी साथ गए. उनके एजेंडे में मछली खाना था मेरे एजेंडे में था समन्दर में डुबकी लगाना जो सुबह बाकी रह गया था.

जारी...

Monday, August 19, 2019

महबूब की एक झलक जीने का सामान


जिस पुकार पर गोवा आई थी उसे ठीक से सुन लिया था, गुन लिया था. एक मुक्कमल शाम के बाद प्यारी सी सुबह को जी लेने के बाद अब सिर्फ इन हवाओं के हवाले करना बाकी था. मन गिलहरी हुआ जाता था. हर सडक पर भागने को व्याकुल, हर कोने में खड़े होकर गहरी सांस लेने को बेताब, बीच सडक पर खड़े होकर चिल्लाकर कहने को बेकरार कि आई लव माइसेल्फ़. ये सेल्फ न बहुत खूबसूरत होता है. इसी गोवा में अंजना, बाघा और वागातोर बीच ने मुझे खुद से मिलवाया था. लहरों ने थपकी देकर सुलाया था, कहा था खुद से प्यार करो. और आज मैं खुद के प्रेम में हूँ. यह प्रेम सेल्फ अप्रिसिएशन सेल्फ से अटैचमेंट तो हो लेकिन सेल्फ ऑब्सेशन न हो इसका ख्याल रखना होता है जिसका जिम्मा भी कुछ दोस्तों को ही दे रखा है. जैसे ही गडबड करूँ अनजाने ही सही वो थप्पड़ लगाकर सुधार लें. 

कल से जो समन्दर झलक दिखा रहा था, अब उसके करीब जाने का समय आ चुका था. इस दफे भीतर भी सुख का समन्दर था और बाहर भी. यह जो भीतर का सुख था ‘यह कोई उफान तो नहीं था,’ खुद से पूछती हूँ. आवाज आती है ‘नहीं यह अपने होने का सुख है मात्र.’ जिन्दगी का बड़ा हिस्सा दूसरों को महसूस करते हुए, समझते हुए बिताने के बाद यह खुद को महसूस करना सच में सुंदर था. बिना जिया हुआ बचपन हमेशा हाथ थामे चलता है. जिन्दगी के किसी भी मोड पर अपने जिए जाने की इच्छा लिए. शायद आज उसी बचपन को जिए जाने का समय था. मुझे नहीं पता मैं क्या होने लगी थी. मैं रूई से भी हल्का महसूस कर रही थी. कहीं भी जाने को, कुछ भी करने को, कैसे भी चलने को, कैसे भी बात करने को आज़ाद. यहाँ कोई मुझे जज नहीं कर रहा था. अजय जी साथ थे लेकिन उनका होना इस आज़ादी को बढ़ा ही रहा था. वो जज नहीं करते, दखल भी नहीं देते, टोकते भी नहीं. उनकी अपनी दुनिया है वो उसमें रहते हैं. साथ होते हैं लेकिन साथ होने के भाव से मुक्त भी करते हैं. यह बिलकुल नया अनुभव था कि ऐसे भी हुआ जाता है क्या? सडक के किनारे खड़े होकर आइसक्रीम खाना हो, अनजाने लोगों से समन्दर किनारे तस्वीर खिंचवाना हो या नंगे पाँव गार्डन में भागते फिरना. कितना आसान है अपने जीवन को अपने लिए महसूस करना लेकिन कितना मुश्किल बना दिया गया है इसे. इसी उछलकूद के दौरान मन हुआ कि ओमकार से बात की जानी चाहिए. उसका नम्बर शुभा जी ने दिया था. उससे मिलना था लेकिन उसकी फ्लाईट थी इसलिए वो सुबह जल्दी ही निकल चुका था. मैंने उसे फोन लगाकर जैसे ही कहा मैं प्रतिभा कटियार बोल रही हूँ वो इतना खुश हुआ कि क्या कहूँ. उसने कुछ भी कहने की बजाय ‘ओ अच्छी लड़कियो’ गुनगुनाना शुरू कर दिया. अब हम दोनों हंस रहे थे. मैं उससे कह रही थी तुमने बहुत अच्छे से गया उसे और वो मुझसे कह रहा था कि मैंने बहुत अच्छा लिखा. जो भी हो पणजी की हवाओं में हमारी हंसी घुल रही थी, संतुष्टि से भरी हुई हंसी. संतुष्टि कि हम दोनों मिलकर एक सन्देश को ठीक से दूर तक ले जा पाए. 

अब हमे कारमोना जाना था. जहाँ हमने दो दिन रहने के लिए बुकिंग की थी. पंजिम से 4 घंटे की दूरी पर है यह. हमने तय किया कि हम लंच करने के बाद ही निकलेंगे. क्योंकि पहुँचते हुए शाम हो ही जानी थी. मेरा मन था कि सूरज डूबने से पहले मैं समन्दर के पास पहुँच सकूँ. रास्ते भर मैं पिछली गोवा यात्रा और इस गोवा यात्रा के दरमियाँ डोलती रही. जिन्दगी के सफर के बारे में सोचती रही. उन जगहों के बारे में भी जहाँ मैं और माधवी एक्टिवा दौड़ाया करते थे. जिन्दगी पर भरोसा करना चाहिए. यह सीख मुझे जीकर मिली है. इधर हमारी कैब रुकी, उधर मैं समन्दर की तरफ भागी. कहाँ सामान है, कहाँ दस्तखत करने है, किसे आईडी देनी है मुझे कोई मतलब नहीं था. सब जिम्मेदारी एक जिम्मेदार दोस्त के हवाले थी और इतनी सी देर में यह समझ में आ चुका था कि अपनी इस हरकत के लिए मुझे कोई डांट नहीं पड़ने वाली थी. इतना सहज साथ कम ही मिलता है जो आपको मुक्त तो करता ही है इस बात का कोई बोझ आपको नहीं देता. वो साथ तो होता है लेकिन बिना आपके स्पेस में जरा भी हस्तक्षेप किये. 

आखिर कारमोना का खूबसूरत जालोर बीच सामने था, डूबता सूरज था, मैं थी और था समन्दर. विस्मित, अवाक, मंत्रमुग्ध. इन दुर्लभ पलों के लिए कितना इंतजार किया है. ओह समन्दर...मेरे पाँव आगे बढ़ते ही जा रहे थे और समन्दर करीब आता ही जा रहा था. देर तक लहरों ने मुझे सहलाया, मेरे बीते तमाम जख्मों पर मरहम रखा. मेरे भीतर की नदी सामने के समन्दर में विलीन होने को व्याकुल होने को थी कि फोन की घंटी बजी. मुझे वापस लौटना था. मैंने समन्दर के कान में कहा, कल से हर वक्त तुम्हारे साथ ही हूँ.’ उसने हंसकर विदा किया.

जारी...

Saturday, August 17, 2019

पंजिम की सुबह और शुभा जी का जादू


अगली सुबह में बीती शाम की खुशबू थी. ढेर सारा उत्साह, सुख और शांति. हमें शुभा जी के साथ ब्रेकफास्ट के लिए जाना था. कितनी ख़ुशी थी बता नहीं सकती. यकीन नहीं हो रहा था कि शुभा जी अब हमारी दोस्त हो चुकी थीं. इसमें उनकी ही सहजता, उनकी ही विनम्रता और जीने के ढब को क्रेडिट है. होटल ताज हमारे होटल मांडवी से ज्यादा दूर नहीं था इसलिए हमने पैदल जाना ही चुना यह सोचकर कि सुबह की सैर भी हो जाएगी और सुबह की ताजा हवा में पणजी शहर की देखने का आनंद भी मिलेगा. यूँ भी मौसम और साथ अच्छा हो, सड़कें साफ हों तो पैदल चलने का मजा ही कुछ और है. पणजी हमें मुस्कुराता हुआ मिला. हम वक़्त पर पहुंचे थे. शुभा जी इंतजार में थीं वो हमें लॉबी में ही मिल गयीं. बीती रात की चमक उनके चेहरे पर भी थी. लोकल के सभी अख़बार कल की शाम की खबर से सजे हुए थे.

शुभा जी और अनीश जी खूब भले लोग हैं. शुभा जी ने हमसे हमारे बारे में पूछा और बताया कि किस तरह उन्होंने इस प्ले लिस्ट के लिए तमाम कविताओं की तलाश की और उसी तलाश में उन्हें ‘ओ अच्छी लड़कियो’ मिली. उन्हें और उनकी पूरी टीम को कविता बहुत अच्छी लगी. किस तरह इस कविता की बाबत मुझे सम्पर्क किया. मैंने उन्हें बताया कि किस तरह पिया तोरा कैसा अभिमान, अली मोरे अंगना और, पिया हाजी अली मैं रिपीट में सुना करती थी. उन्हें अजय जी से यह जानकर कि वो फिल्मों के लिए गाने लिखते हैं और उनका लिखा एक गीत लता जी गा चुकी हैं वो बहुत खुश हुईं. अनीश जी ने बताया कि वो हिंदी कविताओं पर कुछ काम करना चाहते थे. उनके मन में काफी दिनों से यह सब चल रहा था. सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के लिए मेवरिक प्ले लिस्ट बनाने का अवसर उनकी उस इच्छा को साकार करने का जरिया बना. उन्होंने ओमकार जिसने इस कविता को आवाज दी थी के बारे में भी बताया कि किस तरह वो कविता पढकर एक-एक शब्द में डूब गया था. उसका वह डूबना उसकी कल की परफौर्मेंस में दिख रहा था. मैं सोच रही थी कि यही होती है शब्दों की ताकत, विचारों की ताकत जो दुनिया एक कोने में बैठे व्यक्ति को दूसरे कोने में बैठे व्यक्ति से जोड़ देती है. लिखने वाला पढने वाले से पीछे छूट जाता है और इस बात का उसे सुख होता है. इस वक़्त मैं उसी सुख में थी. सब उस कविता में डूबे हुए लोग थे और मैं उन्हें देखने के महसूस करने के सुख में. जब यह कविता लिखी थी तब सिर्फ इतना था मन में कि यह बात मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक काश पहुंचा सकूँ कि लड़कियों को अच्छे होने के बोझ से मुक्त करो अब. और यह बात दूर तक पहुँच रही थी. यह बात जीकर जानी थी कि अच्छा होने का बोझ अनजाने चुपचाप हमें भीतर ही भीतर खोखला करता रहता है, बांधता रहता है. एक किस्म की सोशल कंडिशनिंग है यह जो बहुत गहरी है. पीढ़ियों से स्त्रियाँ इसकी शिकार भी हैं और जानती भी नहीं कि वो शिकार हैं.

नाश्ते की टेबल पर शुभा जी के कुमाऊनी घर की स्मृति भी खुली. मैंने उनसे पूछा आपका मन नहीं करता कि आप कुछ पहाड़ी लोक गीत गायें. उन्होंने मुस्कुराकर कहा, बहुत मन करता है लेकिन बहुत मुश्किल है इसमें. जैसे ही मैं पहाड़ का राजस्थान का कोई लोकगीत गाना चाहती हूँ यह बात होने लगती है कि हम लोक का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन लोक के लिए कुछ कर नहीं रहे. मैं गायिका हूँ, संगीत दे सकती हूँ आवाज दे सकती हूँ मेरी भी सीमा है. मैं कोई विवाद नहीं चाहती, शांति से जीना चाहती हूँ. इसलिए किसी भी ऐसे काम को नहीं करती जिसमें कोई भी द्वंद्व हो. उन्होंने बताया कि उन्हें विद्यापति पसंद हैं. रेनकोट के समय विद्यापति को पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही गयी. मीरा बहुत पसंद है, पलटूदास उन्हें पसंद हैं. केदारनाथ सिंह, दुष्यंत, साहिर, फैज़ आदि को पढ़ा है उन्होंने.

एक मजेदार बात उन्होंने बताई, हर साल दिसम्बर में वो पणजी में म्यूजिकल फेरी चलाती हैं. खुले आसमान के नीचे और समन्दर के बीचोबीच संगीत. यह पूर्णिमा के आसपास होता है. सुनकर ही सुख हो रहा था. हमारी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं. लेकिन वक़्त है न मुस्तैद पहरेदार उसने याद दिलाया कि ब्रेकफास्ट को लंच तक नहीं ले जा सकते. आखिर हमने एक मुक्कमल, भरपूर मुलाकात के बाद विदा ली.

अब सामने था पंजिम और एक नन्हा सा उन्मुक्त मन.

जारी...

Thursday, August 15, 2019

पणजी में 'ओ अच्छी लड़कियों' से मुलाकात



फाइनली हम पणजी में थे. खिड़की का पर्दा हटाया तो सामने समन्दर मुस्कुराता मिला. जैसे वो मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहा हो. शाम करीब थी और समन्दर सामने. मैं लहरों का उछाल देख पा रही थी, आवाज सुन पा रही थी बस हाथ बढ़ाने की देरी थी...लेकिन अभी हाथ बढ़ाने का वक़्त नहीं था कि गोवा ने जिस वजह से पुकारा था आज शाम तो उसी के नाम थी. कभी सोचा न था कि कोई कविता यूँ हाथ पकड़कर गोवा तक घुमाने ले आएगी. जबसे 'ओ अच्छी लड़कियों' को शुभा जी द्वारा संगीतबद्ध करने की बात सुनी थी तबसे शुभा जी के तमाम गीत साथ चलते रहते थे. एक ही बात मन में थी कि किस तरह वो इस कविता को संगीतबद्ध करेंगी भला. दूसरा उत्साह था शुभा जी और अनीश जी से मिलने का. मुझे नहीं मालूम कैसी मुलाकात होने वाली थी. एक मन हुआ चुपके से भीड़ में छुपकर बैठ जाऊं और होते देखूं सब कुछ. लेकिन यह मौका शायद कुछ और था. शाम के उत्सव में शामिल होने लिए हमने पैदल ही चलना चुना ताकि थोड़ा शहर भी तो देखें, उसे हैलो तो बोलें. एक तरफ कार्यक्रम का समय हो चला था दूसरी तरफ पेट में भूख गुडगुडा रही थी. मेरा मन हुआ कि भूख को इग्नोर कर दिया जाय लेकिन अजय जी इसके लिए तैयार नहीं थे. फाइनली हमने शॉर्ट कट वाली पेट पूजा की और उसके बाद पहुंचे कार्यक्रम की जगह. सच कहूँ तो यहाँ आने के पहले तक मुझे इस फेस्टिवल की ऊंचाइयों का पता नहीं था. यहाँ आकर देखा पूरा शहर सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के पोस्टरों बैनर से पटा पड़ा था. अब मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी थी. लेकिन ज्यादा देर घबराहट के रुकने को वक़्त नहीं मिला. गेट पर पहुँचते ही प्रेरणा लेने आ गयी. और पलक झपकते ही मैं शुभा मुदगल, अनीश प्रधान और उनकी टीम के साथ थी. शुभा जी मिलकर इतनी खुश हुईं उन्होंने तुरंत गले लगा लिया.अनीश जी ने बहुत विनम्रता के साथ स्वागत भी किया और शुक्रिया कहा इस कविता को लिखने के लिए. ऐसे मौकों पर कुछ समझ नहीं आता कि क्या कहूँ बस कि आँख भर आती है.  शुभा जी और अनीश दोनों बहुत सहज, सरल लोग हैं. यह विनम्रता ही उनके संगीत को अलग आयाम देती होगी. हमारी मुलाकात ग्रीन रूम में हुई थी. कार्यक्रम शुरू होने को था और हम कार्यक्रम स्थल की ओर ले जाए गये.

यह गोवा की यादगार शाम थी. मुझे नहीं पता था कि इस बार गोवा मुझे सर पर चढ़ाने के लिए पुकार रहा था. मुझे नहीं पता था कि गोवा ने जिन्दगी को गले लगाने, तमाम बाधाओं को पार करने के एवज में यह शाम मुझे तोहफे में देने को बुलाया था. सामने भव्य स्टेज था और पीछे शानदार ऑडियंस. इन सबके बीच मैं भी थी. मैं भी...क्या यह मैं ही हूँ. सब कुछ बहुत तेज़ था. अनीश जी ने मुझे बोला था कि 'आपकी कविता हमें इतनी ज्यादा अच्छी लगी है कि हम कार्यक्रम को इसी कविता से क्लोज करेंगे. तो मन में इतनी राहत थी कि अभी थोड़ा वक़्त था दिल को संभाल लेने को. शुभा जी मेरे बगल में बैठी थीं और उनके बगल में अनीश. मेरे दूसरी तरफ अजय जी थे. ऐसे मौकों पर दोस्तों का साथ होना कितना मायने रखता है यह सिर्फ समझा जा सकता है.


कार्यक्रम शुरू हुआ और लगातार परवान चढ़ता गया. इस शाम के लिए कुछ हिंदी कविताओं को संगीतबद्ध करने को चुना गया था. केदारनाथ सिंह, नज़ीर अकबराबादी, मीराबाई ,पल्टूदास, शुभा मुदगल और प्रतिभा कटियार की कवितायेँ थीं ये. मैं एक एक कर कविताओं की खूबसूरत प्रस्तुती देखकर मुग्ध हो रही थी. यकीन नहीं हो रहा था कि इन कविताओं को ऐसे भी प्रस्तुत किया जा सकता है. शुभा जी बीच-बीच में पूछती जा रही थीं ठीक तो है न? और मैं उनके इस विनम्र सवाल के बदले सिर्फ सर हिला पा रही थी. इन कविताओं को स्वर दिया ओमकार पाटिल और प्रियंका बर्वे ने. दोनों की ऊर्जा देखते ही बनती थी, दोनों बेहद कमाल के आर्टिस्ट हैं. ओमकार तो ऐसे हैं कि वो मानो आते ही कहते हों, खबरदार जो ध्यान रत्ती भर भी इधर-उधर किया कि जब तक मैं हूँ मैं आपका पूरा ध्यान चुरा लूँगा और धीरे से दिल भी. ऑडियंस को बांधना उसे आता है. तमाम कविताओं के बीच जब उसने केदारनाथ सिंह की कविता 'भाई मैंने शाम बेच दी है' गई तो मैं एकदम से अलग ही दुनिया में चली गयी. इतनी बार पढ़ी थी यह कविता लेकिन आज इसे शुभा जी, अनीश जी और ओमकार के जानिब से सुनना कुछ अलग ही अनुभव था.

आखिर कार्यक्रम आखिरी कविता तक आ पहुंचा. यानी मेरी कविता 'ओ अच्छी लडकियों.' कविता शुरू होने से पहले अनीश जी और शुभा जी ने मेरी तरफ देखा और कहा 'उम्मीद है आपको पसंद आएगी.' स्टेज पर मेरा नाम लिया जा रहा था और मैं अपनी हथेलियाँ शुभा जी की हथेलियों में छुपाये बैठी थी. जैसे ही ओमकार ने कहा, प्रतिभा जी हमारे बीच मौजूद हैं, शुभा जी ने उत्साह में भरकर कहा, यहाँ हैं यहाँ हैं...और सारी तेज़ लाइट्स हम पर थीं. उफ्फ्फ. ऐसी चकाचौंध की आदत कहाँ हमें. घबरा से गये कुछ पल की. कविता शुरू हो चुकी थी..'ओ अच्छी लड़कियों तुम मुस्कुराहटों में समेट देती हो दुःख और ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर...'  काफी तेज़ संगीत में इसे ढाला गया था. कहाँ रुकना है, कहाँ ज्यादा रुकना है, कहाँ ऊंचा करना है स्वर ओमकार को सब पता था. मुझे लग रहा था क्या यह सच में मैं हूँ. देहरादून के किसी कोने में बहुत उलझे से मन और द्वंद्व के बीच जब लिख रही थी यह कविता तब कहाँ जानती थी कि इसे इतना प्यार मिलेगा. शुभा जी हथेलियों का दबाव मुझे कसता जा रहा था यह उनका प्यार था. शायद वो भी मेरी तरह संकोच में थीं.


कविता खत्म हुई...अँधेरे में अपने आँखों में भर आये समन्दर को संभालना आसान था. कार्यक्रम खत्म होते ही रौशनी ने हमें घेर लिया था. बधाइयों, फोटो खींचने, खिंचाने, लोगों से मिलने मिलाने के बीच गोवा की वह खूबसूरत शाम दिल में दर्ज हो गयी. शाम ने बीतते-बीतते अगले दिन की सुबह नाश्ते पर शुभा जी से आराम से मिलने, बतियाने का प्रस्ताव भी दे दिया.

हम एक बेहद खूबसूरत शाम को जीकर, समेटकर लौट रहे थे.

जारी....

Tuesday, August 13, 2019

मिलूंगी तुमसे तसल्ली से...


मुम्बई से गोवा के लिए हमें अल्सुबह तेजस एक्सप्रेस पकडनी थी. मुम्बई में मैं माधवी के घर रुकी थी. उसके घर पहले भी जा चुकी हूँ. उस मुलाकात और इस मुलाकात के बीच कई बरस बीत चुके थे. उससे मिलकर लगा कि वो और भी खूबसूरत हो गयी है, उसकी खूबसूरती में मातृत्व का नमक जो शामिल हो चुका है. उसके दो प्यारे से बच्चों से मिलना बहुत सुंदर अनुभव था. जरा सी देरी में दोनों बच्चे मासी-मासी की धुन में थे. शरारतें, मस्ती, गप्पें इन सबके बीच नींद कहाँ. ट्रेन पकड़ने के लिए सुबह चार बजे ही निकलना था. लगभग न के बराबर नींद लिए हम गोवा के लिए निकले थे. हालाँकि नींद कहीं थी भी नहीं. यह शायद उत्साह के कारण हुआ होगा..

मेरे साथ अजय गर्ग थे. वो घुमक्कड़ हैं. दुनिया भर घूमते फिरते हैं. सच कहूँ तो घूमने का चस्का अजय जी और माधवी का ही दिया हुआ है. लेकिन मैंने अजय जी के साथ कभी ट्रेवल नहीं किया था. मेरे लिए यह यात्रा कई मायनों में अलग होने वाली थी. पहली राहत की बात तो यही थी कि अजय जी के साथ होने के कारण टिकट, ट्रेवल, स्टे इन सबके इंतजाम के झंझटों से मैं मुक्त थी. यानी मुझे सिर्फ मजे करने थे. लम्बे समय बाद यह राहत मिली थी. वरना तो हर ट्रेवल चाहे परिवार के साथ हो या दोस्तों के साथ या अकेले इन सब जिम्मेदरियों का ठेका मेरा ही होता रहा है. जिम्मेदारियों से राहत भी चाहिए होती है कभी कभी. हम स्टेशन वक़्त पर पहुंचे लेकिन ट्रेन थोड़ी सी लेट हो गयी. स्टेशन की चाय हम पी सकें शायद इसलिए. किसी शहर को महसूस करना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन पर थोड़ा वक़्त जरूर बिताना चाहिए. यहाँ जीवन जैसा है, वैसा मिलता है. एक ऊंघती हुई बच्ची अपने पापा के कंधों पर झूल रही थी, गजरा बालों में टांके एक लड़की एक लड़के के कंधे से टिककर ऊंघ रही थी. एक लड़का अभी-अभी बगल में खडे अंकल को चाय देकर गया. इधर से उधर तेजी से जाती ज्यादातर औरतों ने गजरे पहने हुए थे. ये इनके गजरे हमेशा फ्रेश कैसे रहते होंगे मैंने मन में सोचा और गम्भीर मुद्रा बनाकर ट्रेन के एनाउंसमेंट पर ध्यान केन्द्रित किया. थोड़ी ही देर में ट्रेन आ गयी और गोवा का हमारा सफर शुरू हुआ.

अजय जी मुझे खिड़की वाली सीट देकर यह बताकर कि 'रास्ता बेहद खूबसूरत है, देखती जाना' सो गये. उनके लिए यह रास्ता नया नहीं था और रात की नींद उनकी भी अधूरी ही रही थी. जब भी ट्रेन में कुछ खाने को आता, ब्रेकफास्ट या लंच या कुछ और वो जागते, खाते और सो जाते. जितनी देर वो जागते उनकी बातचीत बड़ी मजेदार होतीं. खूब हंसी आती मुझे और लगता कि सफर अच्छा कटने वाला है. मेरी अजय जी से दोस्ती पुरानी है लेकिन यह दोस्ती कम संवादों और इक्का-दुक्का छोटी छोटी मुलाकातों भर की है. उनसे अनौपचारिक मुलाकात का यह पहला मौका था और मुझे नहीं मालूम था कि उनकी उपस्थिति सहजता से भरपूर होगी. हमारी छुटपुट नोक-झोंक शुरू हो चुकी थी जो पूरे सफर में चलती रही.

मुम्बई से गोवा का रास्ता सचमुच बेहद खूबसूरत है. सारे रास्ते मैं चुप होकर खिड़की के बाहर देखती जा रही थी. तेजी से छूटते जा रहे पेड़, सडकें, गाँव, पानी सब मोह रहे थे. ऐसा लग रहा था सब मुझे जानते हैं और मुस्कुराकर हैलो कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इन सबसे पहली बार मिल रही थी. ट्रेन का खूबसूरत सफर मुझे सुकून से भर रहा था. सामने लगे स्क्रीन पर देखने के लिए जो फ़िल्में थीं वो भी काफी अच्छी थीं. मन में दुविधा थी कि फिल्म देखूं या दृश्य. मैंने दृश्य ही चुने. एक बैंगनी रंग के बड़े-बड़े पत्तों वाला पेड़ अब तक मेरी स्मृतियों में झूमता है.

करमाली स्टेशन आने वाला था. स्टेशन आने से पहले ही समन्दर दिखने शुरू हो गए थे. ये समन्दर के वो किनारे थे जो शायद शहर से नहीं दिखते. मन उछल-उछल जा रहा था खिड़की से समन्दर देखकर. कुछ ही देर में हम स्टेशन पर थे. स्टेशन ज्यादा बड़ा नहीं है लेकिन साफ़ और सुंदर है. मौसम गर्म था यहाँ. दिसम्बर के महीने में देहरादून से चलते समय जो ढेर सारी जैकेट लदकर आई थीं उनमें से आधी तो मुम्बई में ही पैक हो गयी थीं और बाकी के पैकअप का समय अब था.

मैं आँख भर स्टेशन देख रही थी और अजय जी कम से कम पैसे में मिलने वाला ऑटो ढूँढने में लगे थे. मुझे अजय जी से यह भी सीखना था कि यात्राएँ कैसे इकोनोमिक और अच्छे ढंग से की जाती हैं. आखिर हमें हमारे जैसे ही दो विदेशी दोस्तों के साथ शेयरिंग में ऑटो मिल गया और हम चल पड़े गन्तव्य की ओर.

पणजी बेहद खूबसूरत है. मांडवी नदी के किनारे पर बसे इस सुंदर शहर से बातें करने का जी चाह रहा था. ऑटो होटल की ओर भाग रहा था और पेड़ों से लुकाछिपी खेलते हुए समन्दर मुझे लुभा रहा था. जी तो चाह रहा रहा अभी रुक जाऊं लेकिन खुद को मैंने दिलासा दिया अब तो आ ही गयी हूँ, मिलूंगी तसल्ली से.

जारी...