Sunday, January 12, 2014

आईना आँख चुराता क्यों है?



जबसे पहनी है अपने होने की महक
आईना आँख चुराता क्यों है?

तेरे आने और तेरे जाने का
फर्क मिटता सा नज़र आता क्यों है?

कोई आहट नहीं कहीं फिर भी
दिल इस तरह मुस्कुराता क्यों है

जिस तरह टूटा किये हैं ख्वाब मिरे
फिर नया ख्वाब चला आता क्यों है....


Wednesday, January 8, 2014

हरा अब हरा नहीं रहा...



ये रंगों के रंग बदलने के दिन हैं। हरे को हरा हुए बहुत दिन हो गए थे तो उसने अंगड़ाई लेकर कत्थई होने का मन बना लिया। भूरा या लाल होने के बारे में उसने सोचा नहीं। पीले के बारे में उसने सोचा जरूर था लेकिन पीले रंग पर रुकने का उसका मन नहीं किया।

आसमान से रोज एक दिन टपकता है और रंगों के आंचल में जाकर टंक जाता है....कोई दिन गुलाबी रंग का उगता है तो कोई धानी रंग का। कोई दिन सुर्ख लाल तो कोई दिन सतरंगी भी होता है....कभी-कभी कोई दिन बेरंग भी होता है। पर इधर कुछ रोज से खिले रंगों वाले दिन आसमान से उतर रहे हैं।

वैसे ये रंगों के रूप बदलने के दिन भी हैं। वो लाल, पीले, हरे, नीले नहीं रहे वो संख्या होने लगे हैं। 300, 400, 500, 600...जब से रंग संख्या होने लगे हैं तबसे संख्याओं से प्यार होने लगा है। अब संख्या में रंग दिखने लगे हैं। शाखों पर अंक मुस्कुराते हैं। कैनवास पर दौड़ लगाते फिरते हैं दिल लुभाने वाले रंग....

अरे हां, मैं बताना ही भूल ही गई पिछले कुछ दिनों से रंगों ने सुरों से दोस्ती कर ली है। रियाज के वक्त रंग बजते हैं इन दिनों। सुर चुपचाप कभी कैनवास पर सजते है तो कभी शाखों पर झूमते नजर आते हैं...वो आकृतियां भी धारण करते हैं। कभी चांद बन जाते हैं तो कभी सूरज, कायनात के हर अक्स में ढलते हैं रंग  बस एक इंद्रधनुष ही कबसे खाली पड़ा है.  रंग सब भागते फिरते हैं यहां-वहां। ये रंगों की शरारतों के दिन हैं।

उफ्फ,  ये रंगों को क्या हो गया है इन दिनों देखो तो कैसे नन्ही किलकारियों में जा छुपे हैं, गालों पे ठहरता कोई रंग तो कोई आंखों में जाकर बैठा है। कोई रंग चुप की चादर ओढ़कर सर्द रातों के लिहाफ में जा दुबका है तो कोई रंग आवाजों के दरीचों से झांकता फिरता है...सर्द रातों में फुटपाथों पर सिकुड़े हुए करवटें बदलता है एक स्याह रंग तभी चुपके से बंद आंखों में जाकर छुप जाता है उम्मीद का खुशनुमा सा रंग...

ये क्या हो गया है इन दिनों रंगों को कि सब के सब उठकर चल दिये हैं अपने आशियाने से। वो कहीं भी मिलते हैं हमसे बस कि वहीं नहीं मिलते जहां उन्हें हम ढूंढने जाते हैं...

सुनो...हरा अब हरा नहीं रहा...कुछ शब्द टकराते हैं कानों से...सुर्ख रंग के शब्द...


Wednesday, December 25, 2013

चलो, अब ये सलीब उतार भी दें...

हमारे जिस्म और ज़ेहन में भी
ठोंकी गयीं
सेवा और समर्पण कीलें

मुंह पर बांध दी गयी
चुप की मजबूत पट्टी 

आँखों में भर दिए गए
तीज त्योहारों वाले
चमकीले रंग

लटका दिया गया
रिवाजों और परम्पराओं की
सलीब पर

चलो, अब ये सलीब उतार भी दें...


Saturday, November 16, 2013

जीवन आयेगा क्या ....?


हां, मैंने दुःख को ठिकाने लगा दिया है।
एकदम ठीक से।

अब वो जीवन में कभी लौटकर नहीं आयेगा....
कभी नहीं...

पर जीवन आयेगा क्या ....?

Friday, November 8, 2013

दिल के धड़कने की वजह कोई नहीं...



वैसे ही उगता है दिन
हथेलियों के ठीक बीचोबीच
और उसी तरह ढलक जाता है
उंगलियों की पोरों से

ज्वर के ताप को कम करने को
शरद की चांदनी रात भर
माथे पर रखती है पट्टियां

लाल चोच वाली चिड़िया
हर डाल पर ढूंढती फिरती है
वजह दिल के धड़कने की...

कि उससे कहा था किसी ने
दिल के धड़कने की वजह कोई नहीं...