Wednesday, September 18, 2013

प्रतिरोध



मौन की जमीन पर
भी उग ही आते हैं प्रतिरोध के बीज

आसमान के पल्लू में बांधकर रखी गयी
तमाम खामोशियाँ
लेने लगती हैं आकार

धरती से आसमान तक
बरपा होने लगता है
चुप्पियों का शोर
अब नहीं, अब और नहीं

नहीं चलेगी अब कोई संतई
नहीं सेंकने देंगे सत्ता की रोटियां
हमारे जिस्मों की आंच पर

नहीं बहने देंगे एक भी बूँद खून
न सरहद पर, न सरहद पार

न, कोई सफाई नहीं देंगे हम

दुनिया के हाकिमों,
खोलो अपनी जेलों के दरवाजे
ठूंस दो दुनिया की तमाम हिम्मतों को
जेलों के भीतर
आम आदमी की चेतना का सीना
तुम्हारे आगे है.…

रंग कोई नहीं है हमारे झंडों का
बस कि रगों में दौड़ते खून का रंग है लाल.….

Thursday, September 5, 2013

हथेलियां...जो आजकल खुली रहती हैं...



इन दिनों आंखों में कोई दृश्य ठहरता नहीं. कानों में कोई बात नहीं रुकती, जेहन की डायरी पर कोई लम्हा दर्ज नहीं होता...हर रोज कोरे पन्नों का शोर मौन के पानी में किसी की कंकड़ी सा पड़ता है. वो मौन को सधने नहीं देता.

संगीत की दहलीज पर किये गये सजदों में भी मानो सर ही झुक पाता है. ऊंचे पहाड़ों, खूबसूरत मंजर, सर्द हवाओं के दरम्यान न जाने कौन सी बदली आंखों से टकराती है और अतीत का कोई टुकड़ा गालों पर रेंगते हुए हथेलियों की पनाह में जा छुपता है. हथेलियां...जो आजकल बंद नहीं होतीं. खुली रहती हैं. सूरज की कोई किरन हथेलियों पर खेलते हुए किसी शातिर खिलाड़ी की तरह अतीत की नमी को चुरा लेना चाहती है. जैसे नया प्रेमी चुरा लेना चाहता है प्रेमिका की स्मतियों में दर्ज पुराने प्रेमी के बिछोह के सारे दर्द.

इस चाहना में इतनी मासूमियत है, इतनी पवित्रता कि इसके पूरे होने न होने के अर्थ बेमानी होने लगते हैं. हथेलियों पर सूरज की किरनों को खेल जारी है दूर...कहीं बहुत दूर से शहनाई की आवाज आ रही है...उदास शहनाई...

वादियों में कोहरे का खेल जारी है... खूबसूरत खेल. उदासी का अपना सौन्दर्य होता है जो बेहद आकर्षक होता है. वादियों में बादलों का खेल उसी उदासी के सौन्दर्य को बढ़ा रहा था. पहले की तरह अब किसी दृश्य को देखकर हथेलियां खिलखिलाकर आगे नहीं बढ़तीं. वो किसी दृश्य को मुट्ठियों में कैद करने को बेताब नहीं होतीं. न बारिश, न हवाएं, न बादल, न खुशबू न कविता, यहां तक कि नन्हे बच्चे की मुस्कुराहट भी नहीं. बस कि इन तमाम खुशनुमा दृश्य के सर पर हाथ फिराने की इच्छा जागती है. ये दृश्य शाश्वत रहें ये दुआ देने को जी चाहता है.

इन दृश्यों की नज़र उतारने को कुछ तलाशती हूं तो उम्र के दुपट्टे में बंधे स्म्रतियों के कुछ सिक्के ही हाथ आते हैं. इस दुनिया के निजाम ने ऐसे खोटे सिक्कों पर पाबंदी लगा रखी है.

अपनी खुली हथेलियों को देखती हूं. लकीरें कोई नहीं हैं बस कि एक खुशबू है जो लगातार झरती रहती है. हथेलियां अब बंद नहीं होतीं...हथेलियों का बंद न होना बड़ा संकेत है...इतना बड़ा संकेत कि उस पर आंखें नहीं ठहरतीं...कुछ छूटता सा महसूस होता है...कुछ टूटता सा महसूस होता है...ग़म की डली अपने नमकीन स्वाद के साथ...सांसों के साथ सरकती रहती है...

शाम की ओढ़नी में खुद को लपेटते हुए उम्र के कंधे पर सर टिका देती हूं...


Sunday, August 18, 2013

तुमसे ही होती है गुलज़ार जिंदगियां...




प्यार के आँगन में गिरा था जो पहला ख़त
वो तुम्हारा था
ज़ेहन के दरीचों में ज़ज्ब हुई थी जो आवाज
वो तुम्हारी थी
सिरहाने झरती थीं जो शबनमी रातें
वो सौगात तुम्हारी थी
चाँद से दिल लगाना
हवाओं को पहनना कानों में
बांधना ख्वाबों की पाजेब,
उड़ते फिरना आसमान के आखिरी छोर तक
सब सिखाया तुमने
गुलज़ार कहते हैं लोग तुमको

कि तुमसे ही होती है गुलज़ार जिंदगियां
जन्मदिन मुबारक हो गुलज़ार साब!

Wednesday, August 14, 2013

फिर भी बचा रहता है कुछ


टूटते हैं कांच के बर्तन,

फर्श पर फेंके जाते हैं
मोबाईल, कैमरे
घडी, रिमोट
शो पीस, महीन कारीगरी वाले बुध्ध

खींच के फेंक दिए जाते हैं
परदे , बेडशीट

फिर भी बचा रहता है कुछ
बचाने को

बचे रहते हैं बर्तन
मोबाईल, रिमोट
परदे, महंगी पेंटिंग

और सब कुछ

लेकिन बचाने को
नहीं बचता कुछ भी....


तो कहना...


ये आसमां तेरे कदमों में न झुक जाये तो कहना
समंदर तेरी आंखों में न सिमट आये तो कहना

मुस्कुरा के देख ले इक बार तू जिस तरफ
वो रास्ता कदमों में न बिछ जाए तो कहना

नाउम्मीदियों को चादर को एक बार झटक तो दे
उसमें से ही एक सूरज न निकल आये तो कहना

सदियों संभाला है तूने इस धरती को बेतरह
ये धरती तेरे कदमों में न बिछ जाये तो कहना

खूबसूरत हैं वो ख्वाब जिन्हें देखा नहीं तूने
वो ख्वाब हकीकत न बन जाये तो कहना

तू चल तो मेरी जान जरा दो कदम सही
फूल ही फूल न खिल जाये राहों में तो कहना

बहुत दिया है जमाने को तुमने, सचमुच बहुत
अब जमाना न लौटाये तेरा कर्ज तो कहना

बस सोच ले एक बार कि नहीं अब नहीं सहना
मिट जाये न अंधेरा तेरे मन का तो कहना...