Friday, March 13, 2009

वो लम्हे...

आसमान इतना साफ़ कभी नहीं लगा। जैसे अभी-अभी धोकर सुखाया गया हो जैसे-जैसे हम शहरों से दूर जाते हैं आसमान, हवा, नहरें, सब ज्यादा साफ़ होते जाते हैं। मन भी। उस रोज का आसमान अगर ज्यादा साफ़ लग रहा था तो इसके कई पर्यावरण के कारण तो थे ही साथ ही मन का साफ़ होना भी एक कारन था। दूर-दूर तक फैले गेहूं के खेतों के बीचोबीच खड़े होकर आसमान देखने का मौका ही कितना मिलता है। अब इस आसमान में एक और द्रश्य था जो इसे कमाल का बना रहा था। इस छोर से उस छोर तक फैले आसमान पे चाँद और सूरज को आमने सामने आते देखना खूबसूरत था। मानो सूरज जाने को तैयार न हो और चाँद पहले से आ धमका हो। उनकी इस लडाई का गवाह बन रहा था ख़ुद आसमान और वो नहर जिसमे चाँद और सूरज का अक्स झांक रहा था। पूरनमाशी का ये चाँद होली का चाँद था। खूब ujla ....खूब साफ ....

Sunday, March 8, 2009

हम हैं तो जग है....

किस तरह भरूं मैं अपनी उड़ान
ये आसमान तो बहुत कम है....

Saturday, March 7, 2009

मेरे हुए सारे पलाश!

मेरे घर से ऑफिस के बीच कई सारे पलाश के पेड़ पड़ते है। इन दिनों पलाश के पेड़ फूलों से जिस कदर लदे नजर आते हैं, मन वहीँ कहीं अटक सा जाता है। ऐसा लगता है हम तो वहां से चले आते हैं पर हमारा एक हिस्सा वहीँ कहीं ठहर जाता है। दिल में रोज ये ख्याल आता की कभी तो कोई पलाश टूटकर मेरे ऊपर गिरे। मन तो ये भी करता की गाड़ी किनारे खड़ी करुँ और ढेर सारे पलाश अपने आँचल में भर लूँ। लेकिन एक झूठमूठ का वहम घेर लेता की लोग क्या कहेंगे। लेकिन मेरी उन फूलों से रोज बात होती थी। मैं उनसे मन ही मन शिकायत करती की तुम्हें मेरे पास आने से किसने रोका है, तुम्हें कोई कुछ भी नहीं कहेगा.... मन में कितनी ही बेचैनिया हों इन रास्तों से गुजरते हुए इन दिनों मन अपने आप महक उठता है । कितनी छोटी-छोटी सी होती हैं ख्वाहिशें और उससे भी छोटी होती हैं उन तक पहुँचने के दरमियाँ की वजहें। हम उन्हें पार ही नहीं कर पाते। इसीलिए जिंदगी इतने करीब होते हुए भी हमसे दूर चली जाती है। खैर, अब तक जो मेरी बात होती थी उन पलाश के फूलों से, वो जाया नहीं गई। कल जैसे ही मैं उन फूलों के करीब से गुजर रही थी एक प्यारा सा फूल, पलाश का फूल मेरे सर पर गिरते हुए आँचल में ठहर गया। यकीन नहीं आता न, लेकिन सचमुच कभी-कभी ऐसा हो जाता है। बात बहुत जरा सी है लेकिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कोई सपना पूरा हो जाना, जैसे कोई खजाना मिल जाना, जैसे जिंदगी से मुलाकात हो जाना, जैसे किसी ने मौसम भेज दिया हो तोहफे में। ऐसा लगा की अब से दुनिया के सारे पलाश के फूल मेरे हुए। मानने में क्या हर्ज है, खुश होने में क्या हर्ज है? जाने क्यों पलाश के फूल मुझे बचपन से ही बड़े अच्छे लगते हैं। बचपन में कोई कहानी सुनी थी की एक लड़की का प्रेमी उसे वादा करके गया था की जब पलाश का पेड़ फूलों से भर जाएगा तब वो जरूर लौटेगा। वो लड़की पूरे साल, एक-एक दिन पलाश के पेड़ को बड़ी उम्मीद से ताकती है, उसके लिए वो फूल नहीं, जिंदगी थी.....फूल खिले....खूब खिले.....प्रेमी लौटा की नहीं....ये तो अब याद नहीं लेकिन उस लड़की का इंतजार, और पलाश के फूलों की अहमियत मेरे साथ हो ली। जब भी इन फूलों को देखती हूँ लगता है कहीं किसी का इंतजार फल रहा है....पलाश के फूल बहुत कम समय के लिए ही खिलते हैं। अब तक जल्वेरा या रेड रोजेस की तरह इन्हें फूलों की दुकानों पर बिकते भी नहीं देखा। भला इतनी अनमोल नियामत कोई कैसे खरीद पायेगा। इसकी कीमत तो सदियों के इंतजार में, जन्मों की मोहब्बत पिरोकर ही अदा की जा सकती है। वो लड़की अपने इंतजार में गाया करती थी की जब जब मेरे घर आना तुम, फूल पलाश के लिए ले आना तुम.....
बहरहाल, कल की एक छोटी सी बात ने बड़ी सी खुशी दी....ऐसी ही तो है जिंदगी.....छोटी-छोटी बातों में बड़ी-बड़ी-बड़ी खुशियाँ.....

Tuesday, March 3, 2009

चारों ओर है तालिबान

उड़ने की, आसमान की ऊंचाइयों, आसमान के विस्तार को पार करने की स्ट्रांग फीलिंग किसमें होती है? उस पक्षी में जो पिंजड़े में होता है। रात-दिन, सोते-जागते उसे बस आसमान दिखता है। भूख, प्यास तक उसके लिए इंपॉर्टेट नहीं रहती. ऐसी ही कामना, उड़ने की ऐसी ही विलपावर पिछले दिनों दिखी पाकिस्तान (स्वात घाटी) की लड़कियों में. वे देश की तकदीर बदल देना चाहती हैं. पॉलिटिक्स, मेडिकल, इंजीनियरिंग, सेना हर जगह की कमान अपने हाथ में लेना चाहती हैं. आंखों में चमक है और दिल में ह़जारों ख्वाहिशें. जबकि सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान का कब्जा हो चुका है. सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया में खलबली है, अब क्या होगा? हवा में हथियार लहराते हुए अपनी विजय का पर्व मनाते उन खूंखार लोगों को देखकर न जाने क्यों लगा कि इनके इस जश्न पर उस मासूम लड़की की एक मुस्कान भारी है. दुनिया का कोई भी खौ़फ अगर सपनों को आखों में आने से रोक नहीं पाता है तो य़कीन मानिए उसकी उम्र ज्यादा नहीं है. बहरहाल, आज सवाल यह भी है कि क्या तालिबान का कब्जा सिर्फ स्वात में हुआ है, वह भी अभी? क्या होता है तालिबान? कैसे होते हैं तालिबान के नाम पर दहशत पैदा करने वाले लोग? जितना मेरी समझ में आता है उसके हिसाब से तो मुझे यह तालिबान हर जगह ऩजर आता है. हिंदुस्तान में, अमेरिका में, बांग्लादेश में, पाकिस्तान में हर जगह. हमारे घर में, घर से बाहर निकलते ही, सड़कों पर, चौराहों पर, दफ्तरों में. कहां नहीं है तालिबान? हर वक्त, हर मोड़ पर किसी न किसी रूप में शिकंजा कसने की कवायद लगातार चल रही है. मंगलौर में जो हुआ उसे भला और क्या नाम दिया जा सकता है? वैलेंटाइंस डे पर पार्को में, सड़कों पर जो होता है, वो क्या है? सौम्या विश्वनाथन के साथ जो हुआ, वो क्या था? वह तो काम के बाद घर लौट रही थी. मुझे याद है उसकी हत्या के बाद किस तरह की बातें हुई थीं. उन बातों में मुख्य बात यह थी कि एक लड़की होने के नाते उसे देर रात निकलना ही नहीं चाहिए था. एक न्यूजपेपर ने तो सौम्या के कैरेक्टर का पोस्टमार्टम करने से भी गुरेज नहीं किया था. यानी उसके साथ जो हुआ, वह ठीक ही हुआ. गोया कि कोई लड़की सिर्फ इसलिए मार दी जा सकती है क्योंकि उसका कैरेक्टर गड़बड़ है. किसी लड़की के बारे में कुछ भी अनाप-शनाप बकवास करना, क्या पत्थर मारकर घायल करने या मार डालने की सजा से कम बड़ी सजा है? हर मोड़ पर कोई न कोई कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने को तैयार खड़ा है. क्या तालिबानी सोच का ही दूसरा संस्करण नहीं हैं ये लोग? हद तो यह है कि जहां इन लोगों को घर से बाहर निकलने वाली सारी औरतों को कैरेक्टरलेस कहने में कोई संकोच नहीं है, वहीं दूसरी ओर घर में रहने वाली औरतों के बारे में भी कोई खास अच्छी राय नहीं है इनकी. पढ़े-लिखे समाज में ये चेहरे इस कदर डिजॉल्व हो चुके हैं कि इन्हें पहचानना भी मुश्किल है. एक सूडोइज़्म हर जगह है. वो कहते हैं, हम तुम्हारे साथ हैं, तुम चलो॥पर ऐसे नहीं, वैसे॥इतनी तेज नहीं ़जरा धीरे, इधर नहीं उधर..यह कैसी डेमोक्रेसी है, जहां आजादी के बाद बंदिशें और बढ़ रही हैं? मुझे लगता है कि वह दुश्मन फिर भी ठीक है, जिसका चेहरा आप पहचान सकते हैं. ऐसे दुश्मन तो और भी खतरनाक हैं, जो दोस्त बनकर गला काट रहे हैं. हर वक्त एक घुटन, उदासी, उपेक्षा और नकारेपन का अहसास करा रहे हैं. पाकिस्तान में तालिबान के घुसने के बाद हम सब कम से कम वहां के लोगों की स्थिति को समझने की कोशिश तो कर रहे हैं, कुछ हद तक ही सही लेकिन अपने आसपास के तालिबानी चेहरों को पहचान पा रहे हैं क्या? तालिबान और कुछ नहीं एक क्रूर सोच है जो हर सूरत में अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहती है. अपने नियम, ़कायदे, कानूनों में लोगों को जकड़ देती है. जिसका शिकार सबसे ज्यादा औरतें होती हैं. वक्त आ गया है खुद को समझने का, अपने भीतर जन्म लेती तालिबानी सोच को झटककर फेंक देने का. साथ ही आसपास उग आये तालिबानी चेहरों के इरादों को नाकाम करते हुए इस आसमान की ऊंचाइयों से भी पार....
- प्रतिभा कटियार

आई नेक्स्ट के एडिट पेज पर प्रकाशित लेख...

Monday, March 2, 2009

एक दिन

प्यार
पीड़ा ही छोड़ जाता है एक दिन
इस पीड़ा को अर्थ देने में
फ़िर बीतती है जिंदगी
धूप की, फूल की
हलकी उड़ती हवा की
भाषा समझ में आने लगती है
प्यार तरह-तरह से
उद्भाषित होता है
डूब जाता है शब्द
अर्थ में.....