Thursday, December 31, 2009

ये साल अच्छा है...

यूं ही
कोई उसके सिरहाने
उम्मीदों की
एक शाख छोड़ जायेगा,
यूं तो
कुछ भी नहीं बदलेगा
लेकिन सच में
सब कुछ बदल जायेगा।

नदी के किनारे से उगे आज के सूरज में नये साल की मासूमियत भी है और ढेर सारा उत्साह भी. जैसे इसकी किरणें छू-छूकर हमें पूरे जोश के साथ खड़ा होने की ताकीद कर रही हैं. कह रही हैं कि सिर्फ कैलेण्डर को मत बदलो, अपनी तकदीर भी बदल लो. हर वो खुशी का लम्हा जो तुम्हारा हो सकता था, किन्हीं कारणों से कहीं अटक गया, इस बरस वो लम्हा खींचकर अपने करीब कर लो. मुंह मोडऩा है तो क्यों न उन चीजों से मोड़ा जाए जो परेशान करती हैं।

जाने कैसी फितरत होती है हम सबकी, जो चीजें ज्यादा परेशान करती हैं उन्हें ही हम सबसे ज्यादा याद करते हैं, अपने करीब आने देते हैं. इस बरस ऐसा कुछ भी नहीं होने देना है. जब उम्मीदों का समंदर हमारे चारों ओर लहरा रहा हो तो क्यों न हम इसमें से आशा के मोती चुनें. पार्टी, मस्ती, धूम धड़ाका इन सबके $जरिये भी आता है नया साल बहुतों की जिंदगी में. इनकी अपनी अहमियत है लेकिन एक झुग्गी के बाहर लगे गुब्बारे और अंदर से उठता शोर ज्यादा रोमांचित करता है. किसी भी फाइव स्टार होटल में हुई न्यू इयर की पार्टी से किसी भी मायने में कम नहीं होती यहां की पार्टी. एक टाइम का पूरा खाना बनता है, भरपेट खाने को मिलता है, कुछ मीठा भी।

अगले साल ज्यादा कमाई करके पड़ोसी के यहां टीवी न देखने पड़े इसलिए अपना टीवी खरीदने का रिजोल्यूशन है यहां. ये सब नये साल के चलते है. बागीचों में खिले फूलों की एक-एक पंखुरी मानो मुस्कुराकर कह रही है, अब तो कर लो दुनिया मुट्ठी में, अब तो भर लो आसमान को बाहों में, अब तो निकाल सको वक्त किसी के दामन से दर्द को पोंछकर मुस्कान सजाने का. क्या सारी ख्वाहिशें सिर्फ डायरी में रखी रह जायेंगी. ये एक अलार्म है जो हर बारह महीने बाद हमारे लिए बजता है. रोजमर्रा की जिंदगी में वो ढेर सारे काम जो हम दिल से करना चाहते थे कर नहीं पाये, उनकी याद दिलाने का. वो बातें जिन्हें हम कह नहीं पाये, उन्हें कह सकने की हिम्मत दिलाने का, वो अहसास जिन्हें महसूस करते हुए हम घबराते रहे और जो लगातार हमारा पीछा करते रहे, उनसे रू-ब-रू होने का, वो सपने जिन्हें देखते आंखें घबराती थीं उन्हें पलकों में सजाने का।

कहते हैं कि दुनिया वैसी ही दिखती है जैसी हम उसे देखना चाहते हैं. तो क्यों न हम इसे पॉजिटिव विजन से देखें. जो नहीं है वह देखने की बजाय जो है उसे देखें और जो नहीं है उसे हासिल करने के प्रति कटिबद्ध हों. दुनिया अच्छे लोगों से भरी पड़ी है, अच्छी चीजों की कमी भी नहीं है यहां फिर भी जाने क्यों और क्या तलाशते फिरते हैं सब. अरसा हो गया एक फुरसत का लम्हा खुद के साथ बिताये, इस नये साल में क्यों न यह काम भी कर लिया जाए. क्यों न इस नये साल में ख्वाबों को छूट देकर देखा जाए. चिडिय़ा, नदी, पेड़ होकर देखा जाए. वो सब करने की कोशिश की जाए जो दिल में है, जिसके लिए कभी वक्त ही नहीं मिला. करियर की आपाधापी और परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए अपना-अपना जो हिस्सा हमसे कहीं छूट गया क्यों न उस हिस्से को सहेजा जाए. खुश रहा जाए. खुश रहने की ढेरों वजहें हमारे आस-पास हैं लेकिन हम न जाने क्यों उदासी को ओढ़े घूमते हैं. क्यों न इस बार इस नये साल में उदासी, अपने भीतर की एक अनमनी सी चिढ़, झुंझलाहट को विदा किया जाए. हो सकता है ऐसा करते ही हम मुस्कुराहटों, खिलखिलाहटों के लिए जगह बना सकें. हो सकता है इस तरह जीने के बाद यह नया साल जब पुराना होकर हमारे सामने आये तो हमें बेहद अ$जीज लगे।
सबको नया साल मुबारक!
- प्रतिभा

Saturday, December 26, 2009

चाँद से दोस्ती

चांद से मेरी दोस्ती
हरगिज न हुई होती
अगर रात जागने
और सड़कों पर फालतू भटकने की
लत न लग गई होती
मुझे स्कूल के ही दिनों में
उसकी कई आदतें तो तकरीबन
मुझसे मिलती-जुलती सी हैं
मसलन वह भी अपनी कक्षा का
एक बैक बेंचर छात्र है
अध्यापक का चेहरा
ब्लैक बोर्ड की ओर घूमा नहीं
कि दबे पांव निकल भागे बाहर...
और फिर वही मटरगश्ती
सारी रात सारे आसमान में...
- राजेश जोशी

Thursday, December 24, 2009

मासूम से कुछ सवाल

बचपन में देखी गई फिल्मों में से मुझे कुछ ही याद हैं. उनमें से एक फिल्म मासूम भी है. मासूम फिल्म बचपन में देखे गये के हिसाब से तो लकड़ी की काठी के लिए याद होनी चाहिए लेकिन जाने क्यों जेहन में शबाना आजमी की वो तस्वीर चस्पा है जब उसे नसीर की जिंदगी की दूसरी औरत के बारे में पता चलता है. वो शबाना की खामोशी...और दु:खी, गुस्से में भरी, तड़पती ढेरों सवाल लिए खड़ी आंखें...उन आंखों में ऐसी मार थी कि उन्हें याद करके अब तक रोएं खड़े हो जाते हैं।
खैर, फिल्म सबने देखी होगी और यह भी कि नसीर किस तरह माफी मांगता है शबाना से, किस तरह शर्मिंदा है अपने किए पर और शबाना उसे लगभग माफ कर ही देती है. इसके बाद कई सारी फिल्मों में पुरुषों की गलतियां और उनके माफी मांगने के किस्से सामने आते रहे. समय के साथ स्त्रियों के उन्हें माफ करने या न करने के या कितना माफ करना है आदि के बारे में राय बदलती रही. वैसे कई फिल्मों में बल्कि ज्यादातर में पुरुष अपनी गलतियों के लिए माफी नहीं भी मांगते हैं बल्कि अपनी गलतियों को कुछ इस तरह जस्टीफाई करते हैं कि उसकी गल्ती के लिए औरत ही जिम्मेदार है, लेकिन आज बात माफी मांगने वाले पुरुषों की ही।
इसी माफी मांगने वाले फिल्मी पुरुषों की कड़ी में पिछले दिनों फिल्म 'पा' का एक पुरुष भी शामिल हो गया. पुरुष यानी फिल्म का नायक अमोल अत्रे. अमोल और विद्या का प्रेम संबंध बिना किसी फॉमर्ल कमिटमेंट के एक बच्चे की परिणिति का कारण बनता है. अमोल बच्चा नहीं चाहता, इन फैक्ट शादी भी नहीं करना चाहता. देश की सेवा करना चाहता है. करता भी है. उसे पता भी नहीं है कि उसका कोई बच्चा है, वह इस इंप्रेशन में है कि उसका बच्चा विद्या ने अबॉर्ट कर दिया है. लेकिन तेरह साल बाद जब ऑरो के रूप में उसे अपनी संतान का पता चलता है तो अमोल (अभिषेक) तुरंत अपनी पिछली से पिछली गलती को समझ जाता है. उसे एक्सेप्ट कर लेता है और पूरे देश के सामने एक रियलिटी शो में विद्या से माफी मांगता है और बच्चे को अपनाता भी है. अमोल एमपी है, उसका शानदार पॉलिटिकल करियर है. फिर भी वह माफी मांगता है इन चीजों की परवाह किये बगैर. विद्या का गुस्सा इस सबसे शांत नहीं होता. वह उसे माफ भी नहीं करती. वह अमोल के गले की हिचकी नहीं बनना चाहती।
कहां गए माफी मांगने वाले पुरुष मेरे दिमाग में इस दौरान एक बात घूमती रही कि असल जिंदगी में इस तरह से माफी मांगने वाले पुरुष कहां गायब हैं. हां, गलतियां करने वाले पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है. लेकिन जैसे-जैसे वे समझदार हो रहे हैं, उनकी तार्किक शक्ति बढ़ रही है. अपनी चीजों को जस्टीफाई करने के तर्क भी. यथार्थ में माफी मांगने वाले पुरुष नदारद हैं. रिश्तों में माफी का बड़ा महत्व होता है. कोई भी माफी मांगने से छोटा नहीं होता. यह गुरुमंत्र जब मांएं अपनी बेटियों को दे रही होती हैं, तब उन्हें नहीं पता होता कि इसकी ध्वनि कुछ इस तरह जा रही है कि गलती कोई भी करे तुम माफी मांग लेना और सब ठीक हो जायेगा. ऐसा होता भी रहा है।
इसी मंत्र ने परिवारों की बुनियाद को मजबूत बनाये रखा. दूसरों की गलतियों का इल्जाम अपने सर लेकर, खुद ही माफी मांगने के बावजूद, पिटने के बावजूद रिश्ता बचाने की जद्दोजेहद में औरतों ने अपने वजूद से ही लगभग किनारा कर लिया है. आत्म सम्मान वाली औरतें पुरुषों को लुभाती हैं, लेकिन वे घर की औरतें नहीं होतीं.आखिर क्यों है ऐसा? दुनिया बदल रही है. समझदारियां भी बढ़ रही हैं. रिश्तों में स्पेस, डेमोक्रेसी जैसे शब्दों ने भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. लेकिन यहीं कुछ गड़बड़ा रहा है. वो माफियां जो पुरुषों की जानिब से आनी थीं, उनका स्पेस खाली पड़ा है. स्त्रियों को उनका स्पेस मिले न मिले लेकिन माफियों का वो स्पेस रिश्तों के दरमियान लगातार बढ़ रहा है. जीवन फिल्म नहीं होता. जीवन में पुरुषों के पास माफी से बड़ा अहंकार होता है. जिसे पालने-पोसने में ही वे पुरुषत्व मानते हैं. जहां समझदारियां थोड़ी ज्यादा व्यापक हैं वहां माफियां आ तो जाती हैं लेकिन कुछ इस रूप में कि वे भी किसी सजा से कम नहीं होतीं. क्या इतना मुश्किल होता है पुरुषों का माफी मांगना. रिश्तों को संभाल लेने की सारी जिम्मेदारी स्त्रियों के मत्थे मढ़कर कब तक परिवारों के सुरक्षित रहने की खैर मनायी जा सकती है।
- प्रतिभा कटियार
इस लेख को यहाँ भी देखा जा सकता है....
http://thatshindi.oneindia.in/cj/pratibha-katiyar/2009/why-is-it-so-hard-men-say-sorry.html

Friday, December 18, 2009

इक बार कहो तुम मेरी हो

हम घूम चुके बस्ती-बन में
इक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो।
जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो ।
हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो ।
क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो।
- इब्ने इंशा

Friday, December 11, 2009

कुछ सूखी, कुछ गीली हँसी

तुम्हें सरगम का कौन सा सुर सबसे ज्यादा पसंद है? लड़के ने पूछा. लड़की मुस्कुराई...ठहर गई...फिर कुछ सोचते हुए आगे की ओर बढ़ चली।
नहीं बताऊंगी...कहकर खिलखिलाते हुए वह भागती गई...भागती गई...
उसकी आवाज में तमाम शोखी, शरारत हसरतें घुलने लगीं. उसकी हंसी में पलाश खिलने लगे...सरसों फूलने लगी...नदियां लहराने लगीं...उस हंसी में कोयलों की कूक थी...पपीहे की पीऊ थी...मौसम टुकुर-टुकुर लड़की को देख रहा था। लड़की का बचपन भी उसकी हंसी में जा मिला था. किलकारी सी मालूम होती थी वो हंसी. हंसी ही हंसी....चारों तरफ हंसी के फूल खिल उठे थे। लड़का बड़े असमंजस में था. वहीं खड़ा रहा वो देर तक. उस हंसी के अर्थ ढूंढने की कोशिश में।
उस नहीं बताऊंगी...में उसने क्या बताना चाहा यह जानने के फेर में. लेकिन उसे कुछ खास समझ में नहीं आया. सर खुजलाते हुए, पलकें झपकाकर वह बस इतना बुदबुदाया, पागल ही होती हैं सारी लड़कियां....इन्हें कोई समझ नहीं सकता. कभी तो खूब हंसने वाली बात पर भी ऐसी मरियल सी हंसी आती है चेहरे पर, जैसे एहसान उतार रही हों और कभी बिना बात के ही हंसी का खजाना लुटाया जा रहा है. लड़के को समझ में नहीं आता कि कब लड़कियों की चुप्पी आवाज बन जाती है और कब दर्द हंसी...कब वह बोल बोलकर अपनी खामोशी को सुरक्षित कर लेती हैं और कब रो-रोकर मन को खाली कर रही होती हंै. बड़ी पहेली है यह तो।
अचानक लड़का चौकन्ना हो उठा. उसे लगा लड़की को इस तरह हंसते देख कोई न$जर न लगा दे उसे. वह तेज कदमों से बढ़ा उसकी ओर।
ठहरो...अरे, सुनो तो...रुक जाओ ना...वो आवाजें दे रहा था।
लड़की भागती जा रही थी...लड़का भी भागता जा रहा था...
लड़की की खिलखिलाहटें बढ़ती ही जा रही थीं. लड़की कभी-कभी ही हंसती है और तब उस हंसी में न जाने कितना खालीपन, दर्द, अवसाद सब तैर जाते हैं. कभी भीगती, कभी सूखती, गुमसुम कभी तो कभी लगता हरसिंगार अकोर के बिखरा दिये गये हों उस हंसी के बहाने. आज उसकी हंसी हरसिंगार बनके बिखर रही थी...लड़का उसके पीछे भागते-भागते अब थकने लगा था।
तभी आसमान बादलों से भरने लगा. न जाने कैसे बेमौसम बरसात शुरू हो गई. लड़की आसमान की ओर मुंह करके मुक्त होकर नाच रही थी कि टप्प से एक बूंद पड़ी उसके माथे पर. वह मुस्कुरा उठी. लड़का घबरा गया. बारिश आ गई...भागो...जल्दी...भीग गई तो बीमार पड़ जाओगी...
लड़का बूंदों से बचने के लिए भाग रहा था।
बच्चे भाग रहे थे...
गैया भी चल पड़ी थी पेड़ की तलाश में...
बछड़ा भी...
सड़क पर चलते लोग भी...
सब भाग रहे थे।
लेकिन लड़की...वो अब ठहर गयी थी. बूंदों को वो अपने आंचल में भर रही थी कि बारिश उसे अपने आगोश में ले रही थी कह पाना मुश्किल था. लड़की बारिश हो गई थी...बारिश लड़की हो गई थी. टिप्प...टिप्प...टिप्प...वह भीग रही थी. तन से...मन से... उसका शरीर पिघल रहा था. बारिश की बूंदों के साथ उसने खुद को भी बहते हुए महसूस किया।
लड़का अब घबराने लगा था. ये सुन क्यों नहीं रही।
वापस आ जाओ...घर जाना है...देर हो रही है... अब मत भीगो...तुम्हें सर्दी लग जाएगी...बीमार पड़ जाओगी...लड़का बोले जा रहा था।
लड़की सुन रही थी, टिप..टिप...टिप...थोड़ी देर में बारिश थम गई. लड़के ने लड़की की बांह जोर से पकड़ते हुए गुस्से में पूछा, पागल हो गई हो...? कोई ऐसे भीगता है क्या॥?
लड़की मुस्कुरा दी।
नहीं भीगता तभी तो जीवन भर सूखा ही रहता है. किसी भी चीज को पाने के लिए उससे एकसार होना पड़ता है। अब मैं बारिश बन चुकी हूं. पानी ही पानी...मेरे मन का कोना-कोना भीग चुका है. और तुम? लड़का अचकचाया. क्या बेवकूफी है? चलो घर चलो. लड़के ने कहा।
सुनो...लड़की ने कहा. तुम्हारे सवाल का जवाब देती हूं. सरगम के सातों स्वरों में से मुझे सबसे ज्यादा पसंद है पंचम. प से पंचम, प से प्राण, प से प्यास, प से पानी प से प्यार...स से नी तक जाते हुए पंचम पर ठहर ही जाता है मेरा मन. सबसे सुंदर सुर है पंचम...लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी।
लड़का अब तक अपने सवालों के षडज यानी स में उलझा खड़ा था.

Tuesday, December 8, 2009

जब हम प्यार करते हैं

जब हम प्यार करते हैं
तब यह नहीं कि
आकाश अधिक दयालु हो जाता है
या कि सड़कों पर
अधिक खुशी चलने लगती है
बस यही कि कहीं किसी बच्ची को
अपनी छत से उगता सूरज
और पड़ोस की बछिया देखना
अच्छा लगने लगता है
कहीं कोई भीड़ में बुदबुदाते होठों में
प्रार्थना लिए
एक जनाकीर्ण सड़क
सकुशल पार कर जाता है
कहीं कोई शांत मौन जल
कंकड़ से नही, अपने संगीत से
जगाता बैठा रहता है।
जब हम प्यार करते हैं
तो दुनिया को
छोटे-छोटे अंशों में सिद्ध करते हैं
और सुंदर भी, और समृद्ध भी...
हम वसंत को आसानी से काट देते हैं
और उसे एक ऐसे संयोग में गढ़ देते हैंजो
जो न ऋतुगान होता है न टहनियां
और न कोई स्पष्ट आकारन काव्य
और न फूलों, चिडिय़ों का कोई सिलसिला
हम उसे दुनिया के हाथों में फेंक देते है
और दुनिया जब तक उसे देखे-परखे
हम चल देते है
छिप जाते हैंऋतु में या काव्य में
या टहनियों के आकाश में...
अशोक वाजपेयी

Saturday, November 21, 2009

चुप का पहाड़

पार किए
विन्ध्य से लेकर हिमालय तक
न जाने कितने पहाड़,
पार की गंगा से वोल्गा
और टेम्स तक
न जाने कितनी नदियां.
बड़ी आसानी से
पार हो गए सारे बीहड़ जंगल,
मिले न जाने कितने मरुस्थल भी
राह में
लेकिन कर लिए पार वे भी
प्यार से...
बस एक चुप ही
नहीं हो पा रही है पार...

Saturday, November 14, 2009

समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा...

कहते हैं कि अगर जिंदगी का एक सुर भी ठीक तरह से लग जाए तो जिंदगी महक उठती है. एक बूंद अमृत अगर सच्चे सुर का पीने को मिल जाए तो उसके बाद बाकी कुछ नहीं रह जाता. और अगर एक शाम ऐसी बीते जहां सुरों का पूरा काफिला हो तो सोचिए स्थिति क्या होगी. गूंगे का गुड़ वाली कहावत याद आती है...बेचारा स्वाद ले तो सकता है लेकिन उसे बयान नहीं कर सकता।

कल की शाम ऐसी ही खुशनुमा शाम थी. जो सुर सम्राज्ञी गिरिजा देवी के सानिध्य में बीती. यूं उनसे मिलना हर बार ही अनूठा अनुभव होता है. और इस बार तो हम जल्दी ही मिले थे. तकरीबन महीने भर के अंदर ही. लेकिन इस बार उन्होंने एक जुल्म किया...जुल्म ऐसा लगा कि बढ़ा के प्यास मेरी उसने हाथ छोड़ दिया...वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह...शाम से उनके गले की मिश्री के कानों में घुलने का इंत$जार था. यह सिलसिला शुरू हुआ काफी देर बाद...राग केदार में ख्याल की रचना जोगिया मन भावे... और चांदनी रात मोहे ना सोहावे...के साथ ही समां बंध गया।
बाहर का खुशगवार मौसम...हल्की बंूदाबांदी...गोमती का किनारा और...इसी बीच शुरू हुई ठुमरी...
संवरिया को देखे बिना नाहीं चैन...
सुरों को दुलराना, सहेजना, उन्हें छेडऩा...उनके साथ शरारत करना...कभी-कभी छोड़ देना विचरने के लिए...न जाने कितने निराले अंदाज सभागार में बिखर रहे थे।
संवरिया को देखे बिना नहीं चैन...
दिन नहीं चैन...
रैन नहीं निंदिया...
का से कहूं जी के बैन...
संवरिया को देखे बिना नहीं चैन...
ठुमरी का रस कानों में घुल ही रहा था कि झूला शुरू हो गया...
आज दोऊ झूला झूले...
श्यामा...श्याम...
रत्नजडि़त को बनो है हिन्दोलवा
पवन चलत पुरवाई रे...
आज दोऊ झूला झूले...
श्यामा झूले...
श्याम झुलाएं...
सुंदर कदम्ब की छाईं रे...
बीच-बीच में उनके ठेठ बनारसी अंदा$ज में बतियाने का क्रम भी जारी रहता है. वो हर तरह से सभागार में बैठे हर व्यक्ति पर अपनी पकड़ का कसाव बढ़ाती जाती हैं. सुरों की प्यास बढ़ाती जाती हैं. वे कहती हैं कि मैं हूं 81 साल की लेकिन जब मैं मंच पर आती हूं मैं 18 की हो जाती हूं. इस बतकही में श्रोताओं को उलझाकर वे शुरू करती हैं दादरा...
तोहे लेके संवरिया....
निकल चलिबे...
निकल चलिबे...
निकल चलिबे...
ढाल तलवरिया कमर कस लेइबे...
कमर कस लेइबे...
कमर कस लेइबे...
ढाल तलवरिया...
बदनामी न सहिबे....
निकल चलिबे...
सभागार के बाहर ठंडी हवाओं के बीच रिमझिम फुहारों ने सुंदर समां सजा रखा था और अंदर सुरों की अमृत वर्षा ने लोगों की रूह को भिगो रखा था. सुरों की प्यास अपने चरम पर थी कि गिरिजा जी ने अनुमति मांग ली...ये क्या...यह सिलसिला इतनी जल्दी थमेगा किसी ने सोचा नहीं था. लेकिन आज उनका मूड इतना ही गाने का था. तमाम मनुहार, इसरार सब बेकार...मैंने वहां मौजूद लोगों के चेहरे पर कुछ मिले-जुले से भाव देखे. सुख के भी, अतृप्ति के भी. मानो समंदर में उतरने के बावजूद प्यास न बुझी हो...

Tuesday, November 10, 2009

एक मौसम खिल रहा है..

एक मौसम आसमान से उतर रहा था। एक मौसम शाखों पर खिल रहा था। एक मौसम पहाड़ों से उतर रहा था। एक मौसम रास्तों से गुजर रहा थाएक मौसम शानों पर बैठ चुका था कबका। एक मौसम आंखों में उतर रहा था आहिस्ता-आहिस्ता।
एक मौसम दहलीज पर बैठा था अनमना सा, एक मौसम साथ चल रहा था हर पल। न धूप... न छांव...न बूंदें... न ओस...न बसंत...न शरद बस एक याद ही है जो हर मौसम में ढल रही हैऔर लोग कह रहे हैं कि मौसम बदल रहे हैं...

Saturday, October 31, 2009

मरने की तुम पे चाह हो

सुनना मेरी भी दास्तां, अब तो जिगर के पास हो,
तेरे लिए मैं क्या करूं, तुम भी तो इतने उदास हो.

कहते हैं रहिए खमोश ही, चैन से जीना सीखिए
चाहे शहर हो जल रहा, चाहे बगल में लाश हो।

खूं का पसीना हम करें, वो फिर जमायें महफिलें,
उनके लिए तो जाम हो, हमको तड़पती प्यास हो।

जंग के सामां बढ़ाइये, खूब कबूतर उड़ाइये,
पंखों से मौत बरसेगी, लहरेगी जलती घास हो।

हाथों से जितने जुदा रहें, उतने ख्याल ठीक हैं,
वरना बदलना चाहोगे, मंजर ये बदहवास हो।

धरती समंदर आसमां राहें, जिधर चले, खुली
गम भी मिटाने की राह है, सचमुच अगर तलाश हो।

है कम नहीं खराबियां, फिर भी सनम दुआ करो,
मरने की तुम पे चाह हो, जीने की सबकी आस हो।
- गोरख पांडे

Thursday, October 22, 2009

तेरी जीत में मेरी हार है

कैसे अपने दिल को मनाऊं मैं,
कैसे कह दूं कि तुझसे प्यार है,
तू सितम की अपनी मिसाल है,
तेरी जीत में मेरी हार है।

तू तो बांध रखने का आदी है,
मेरी सांस-सांस आजादी है,
मैं जमीं से उठता वो नग्मा हूं,
जो हवाओं में अब शुमार है।

मेरे कस्बे पर, मेरी उम्र पर,
मेरे शीशे पर, मेरे ख़्वाब पर
ये जो पर्त-पर्त है जम गया,
किन्हीं फाइलों का गुबार है।

इस गहरे होते अंधेरे में,
मुझे दूर से जो बुला रही,
वो हंसी सितारों की जादू से भरी,
झिलमिलाती कतार है।

ये रगों में दौड़ के थम गया,
अब उमडऩे वाला है आंख से,
ये लहू है जुल्म के मारों का
या फिर इंकलाब का ज्वार है।

वो जगह जहां पे दिमाग से
दिलों तक है खंजर उतर गया,
वो है बस्ती यारों खुदाओं की,
वहां इंसा हरदम शिकार है।

कहीं स्याहियां, कहीं रोशनी,
कहीं दोजख़ और कहीं जन्नतें
तेरे दोहरे आलम के लिए,
मेरे पास सिर्फ नकार है।
- गोरख पांडे

Thursday, October 15, 2009

रिश्ता रोशनी से

क्या यह अजीब बात नहीं है कि जिंदगी के तमाम दर्द लेकर भी पूरा देश एक साथ रोशनी बिखरने का इंतजार करता है. अपने कंधे पर न जाने कितने घायल दिन और रात लिए उस एक शाम जब हर कोई हर दीये से रोशन करता है सूरज. और समय के आर-पार झिलमिलाने टिमटिमाने लगती हैं मानवीय संवेदनाएं. क्या यह बात चौंकाती नहीं कि जब रोज रात का अंधेरा फुंफकारता हो, समय पर कुंडली मारकर बैठा हो तब एक शाम, सारी शाम, एक रात, सारी रात सूर्य की अंतिम किरण का सूर्य की पहली किरण का सूर्य की पहली किरण तक हरी भरी इंसानियत दीये से कुछ उजाला और ऊष्मा मांगकर रोशनी की लकीर खींच देती है. कैसी है यह इमोशनल बॉन्डिंग? शायद, बहुत बड़े रिश्ते की गाथा है-नेचर और ह्यूमन इमोशंस के बीच।

एक घटना शेयर करने को जी चाहता है. इसे विश्वविख्यात नाट्य निर्देशक पीटर ब्रुक ने थियेटर क्रिटिक जयदेव तनेजा को सुनाया था. बात उन दिनों की है जब वियतनाम युद्ध चल रहा था. ब्रिटेन के लोग खुद को अलग-थलग उदास हीन अनुभव कर रहे थे. उन दिनों पीटर ब्रुक जो महाभारत नाटक के लिए भी दुनिया भर में बहुचर्चित रहे हैं, ने ब्रिटेन के लोगों को वियतनाम पर आधारित एक नाटक दिखाया, किसी उद्देश्य को $जाहिर किए और बिना किसी उत्तेजना के, एकदम खामोशी से. नाटक के अंत में एक दृश्य था जिसमें एक पात्र सेंटर स्टेज पर आता है और एक बॉक्स खोलता है. उस बॉक्स में से अचानक ढेरों रंग-बिरंगी तितलियां निकल-निकलकर पूरे ऑडिटोरियम में इधर-उधर कूदने लगती हैं. पूरे ऑडिटोरियम में दर्शकों की खुशी और हंसी तैर जाती है. तभी अचानक, वह ऐक्टर एक हाथ में एक तितली के पंखों को पकड़कर खड़ा हो जाता है और दूसरे हाथ से जेब में रखा लाइटर निकालता है. वह जलता हुआ लाइटर तितली के नजदीक ले जाने लगता है. दर्शक खामोश हो जाते हैं, ज़रा भी आवाज़ नहीं. लोग चुपचाप तितली को जलता हुआ देखकर हतप्रभ रह जाते हैं और धीरे-धीरे ऑडिटोरियम से बाहर निकल जाते हैं. मन पर न जाने कितना बोझ और अवसाद लिए. यह दृश्य कई प्रदर्शनों में दोहराया जाता रहा लेकिन एक दिन अचानक वहां विचित्र घटना घटी. यह दृश्य चल ही रहा था कि दर्शकों के बीच से एक महिला तेजी से निकली और तितली को मंच पर खड़े हुए एक्टर के हाथों से मुक्त कराते हुए बोली आपने देखा, खराब से खराब हालात में कुछ तो किया ही जा सकता है।

थियेटर और समाज की संवेदनशीलता को लेकर इस घटना के कई मायने हैं लेकिन उस लाइटर की आग से तितली को बचाने की पहल एक रोशनी की लकीर खींच देना इस बेरुखे और बेजान होते जा रहे समय में.ऐसे किसी उजाले की तलाश या उजाले की पहल या पटाखों-मिठाइयों के बहाने खुशियां लुटाने के अवसर ढेरों उलझनों एवं तनावों से मुक्ति का रास्ता बनकर आता हे- दीवाली पर. साथ ही, जाति, म$जहब, नस्ल के पार जाकर सामूहिकता और सामूहिक प्रसन्नता के सुर में सुर मिलाना भी है. भारतीय लोक जीवन की इस चरम सामूहिक उपलब्धियों में दीपावली का ही पर्व है जिसमें जन समुदाय अपने रीति रिवाज एग्जॉटिक लाइफ स्टाइल के साथ वृहत्तर सामाजिक जीवन के उत्सवधर्मी पहलुओं को उजागर करता है.दीपोत्सव, भारतीय मन के लिए, कठिन से कठिन परिस्थितियों में जीवन जी रहे लोगों के लिए रंगारंग जीवन संसार रचने का पर्व है. सपनों, फैंटेसी, खुशियों का एक प्रकार का बाईपास है जिस पर गुजरकर लोग सुखद सुकून हासिल करते हैं जीवन के साथ दीपावली का रिश्ता बनाते हैं रोशनी अच्छी लगती है इंसान को भी और धरती को भी. चांद-सूरज की रोशनी धरती के प्रभावित करती है. इंसान को दीयों की रोशनी में चैन मिलता है, रूह को आराम मिलता है. यही सुकून देने का काम दीपक करते हैं. यह जलते हुए यह दीपों से रोशनी हासिल करने का पर्व है. रोशनी और इंसान का रिश्ता न जाने कब से सदियों की छाती में धड़क रहा है.हमारे गांव में एक पागल थे रामजतन. गांव के बच्चों के लिए राम जतन खिलौना थे, जीता-जागता खिलौना और बड़ों के लिए पागल, सिर्फ पागल. छोटे डिब्बे, टूटी टोकरी, फटे कनस्तर, रद्दी की किताबें, मोरपंख, चिथड़ा कोट, पतलून, फटी टोपी, बेकार लोटा आदि बहुतेरी चीजों से लदे-फंदे. गांव की गलियों में उनकी आउटफिट्स की आवाज़ से लोगों को पता चल जाता था कि रामजतन गुजर रहे हैं. पुरानी हिंदी फिल्मों के गीतों से वह अपने होंठों को सजाया करते थे लेकिन छेड़छाड़ करने वालों के लिए मौलिक किस्म की ढेरों गालियां राम जतन की डिक्शनरी में थीं. बच्चों के वह खिलौना थे और कौन बच्चा चाहता है कि उसका खिलौना टूट जाए, सो कोई बच्चा राम जतन को परेशान नहीं करता था. यह काम बड़े और समझदार खेतों बाग-बगीचों में दीये जलाते थे ताकि लक्ष्मी की किरपा बनी रहे और घर अन्न फल-फूल से भरा रहे. भोर होते ही, जब सारा गांव रात भर दीपावली मनाने एवं पटाखों से खेलने के बाद मीठी नींद में डूबा होता, राम सारे खेत के जल चुके सूखे दीये बीन लाते. अगले दिन वह उन दीयों में गांव से ही बटोरे टॉफी के रैपर व ऐसी कुछ और चीजों को रखकर बच्चों को गिट (गिफ्ट) देते थे. रामजतन जिसकी जिं़दगी में अंधेरों के सिवा कभी कुछ रहा ही नहीं, वह बच्चों के लिए खुशियां बुनता था, बीनता था ख्ेातों से, बागों से. रामजतन रोशनी और किरणों से मोहब्बत बुनते थे, जिसे वह बच्चों में भर देते थे।
ऐसी सुकोमल स्मृतियां आज भी दीपावली को जग मग कर देती हैं।
- प्रवीण शेखर

Saturday, October 10, 2009

मालगुड़ी की याद में

आर.के.नारायन - जन्मदिन पर
हिन्दुस्तान के नक्शे में भले ही नदारद हो मगर मालगुड़ी और उसके बाशिंदों से दुनिया भर के लोग वाकिफ़़ हैैं। मालगुड़ी के लोगों की जि़न्दगी की बेशुमार कहानियां उन्हें याद भी हैैं। मालगुड़ी का स्टेशन, वहां के बाज़ार, स्कूल, सैलून, डाकख़ाना, हलवाई, नानबाई, मोची, मोटर मैकेनिक, टीचर, पेंटर, बुक सेलर और ऐसे ही तमाम पात्र पढऩे वालों के ज़ेहन में इस क़दर पैवस्त हैैं कि वक़्त की गर्द में भी उनकी याद कभी धुंधलाई नहीं। दूरदर्शन के ज़माने वाली पीढ़ी की स्मृति में ये ही पात्र 'ताना न ताना नाना न...Ó की धुन के साथ और जुड़ गए।

दूरदर्शन के लिए बनाए गए शंकर नाग के सीरियल 'मालगुड़ी डेज़Ó का यह कास्ंिटग म्यूजि़क आज भी मालगुड़ी के मुरीदों के मोबाइल फोन पर रिंग टोन के तौर पर बजता सुनाई देता है। इस काल्पनिक क़स्बे के सर्जक आर।के. नारायन ने अपने 50 सालों के लेखकीय जीवन में 14 उपन्यासों के साथ ही कई कहानी संग्र्रह, ट्रेवेलॉग लिखे, रामायण व महाभारत जैसे एपिक का पुनर्पाठ किया. मगर मालगुड़ी के लोगों के जीवन का जो संसार उन्होंने रचा, वह किसी क्षेत्र, भाषा या उम्र की हदबंदी के बाहर समान रूप से पढ़ा-गुना गया. इन कहानियों की पृष्ठभूमि भले ही दक्षिण भारत की हो मगर पढऩे वालों को यह आम हिन्दुस्तानी की जि़न्दगी के आख्यान के सिवाय कुछ और नहीं लगता. आख्यान भी ऐसा कि जिसमें डूबा हुआ पाठक कहानी ख़त्म होने के बाद अपनी दुनिया में लौटते हुए एक बार यह ज़रूर सोचता है कि कहानी और आगे जाती तो अच्छा होता.

नारायन की कहानियां हों या उपन्यास-भाषा की सादगी, उसकी रवानी और ह्यïूमर के फ्लेवर का तिलिस्म पाठकों पर छा जाता है. उनकी कहानियों के पात्र ऐसे आम लोग हैैं, जो ख़ामोशी और सादगी भरी जि़न्दगी के क़ायल हैं. अपने आसपास के बदलते परिवेश में परंपरा और आधुनिकता के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश में कई बार वे विचित्र परिस्थितियों में फंसे दिखाई देते हैैं. ऐसी परिस्थितियां जो हास्य पैदा करती हैैं मगर करुणा का भाव भी जगाती हैैं. गज़़ब की किस्सागोई है उनकी. आम जन के बीच भारी लोकप्रियता के बावजूद उनके कहन की यही सादगी साहित्य में भाषाई अभिजात्य के हामी लेखकों को कभी नहीं सुहाई. उनकी सादी ज़बान और क़स्बाई जीवन के चित्रण को उनकी कमी बताया जाता रहा. इस सबसे इतर देखें तो आमफ़हम ज़बान में किस्सागोई का यह तत्व ही उन्हें अंग्र्रेजी में लिखने वाले दूसरे भारतीय लेखकों से अलग क़तार में खड़ा करता है. तब भी जब हिन्दुस्तान और इंग्लैण्ड के तमाम पब्लिशर्स के अस्वीकार के बाद उनके पहले उपन्यास 'स्वामी एण्ड फ्रेंड्सÓ को पढ़कर ग्र्राहम ग्र्रीन इस क़दर प्रभावित हुए थे कि उन्होंने इसे छापने के लिए इंग्लैण्ड के एक पब्लिशर से सिफारिश की. यह बात 1935 की है. और तब भी जब आर.के.नारायन अपने उपन्यास 'गाइडÓ की पाण्डुलिपि के साथ विलायत में थे और अख़बार में छपी सूचना के आधार पर यह उपन्यास छापने के लिए तमाम पब्लिशर्स उनके होटल के कमरे के बाहर जुट गए थे. 'माई डेटलेस डायरीÓ में उन्होंने इस प्रसंग का बेहद दिलचस्प ब्योरा दिया है. बाद में देवानंद ने इस उपन्यास पर 'गाइडÓ नाम से हिन्दी और अंग्र्रेज़ी में फिल्म भी बनाई. फिल्म ख़ूब चली मगर आर.के.नारायन अपने उपन्यास के इस फिल्मी अडॉप्शन से ख़ुश नहीं थे. वजह साफ है, फिल्म के कथानक में वे तत्व नदारद थे, जो उनकी कहानी की आत्मा थे. आर्टिफिशियलिटी उन्हें सख्त नापसंद थी. चाहे उनकी कहानियों पर फिल्में-सीरियल हों या फिर बुक रिलीज़ के भव्य आयोजन. कहते थे कि कि़ताबें रिलीज़ के लिए नहीं होतीं, कि़ताबें तो बुक स्टोर या लाइब्रेरी में शेल्फ से उठाने के लिए हैैं. वह मानते थे कि हिन्दुस्तानी संस्कृति इतनी वैविध्यपूर्ण है कि कहानी लिखने वालों के लिए विषय की कोई कमी नहीं. हर शख़्स दूसरे से अलग है, सिर्फ आर्थिक दृष्टि से नहीं बल्कि अपने बात-व्यवहार, दृष्टिकोण और रोज़मर्रा की जि़न्दगी के दर्शन के लिहाज़ से भी. ऐसे समाज में कहानी का विषय ढूंढने के लिए लेखक को कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, घर की खिड़की से बाहर देखने की आदत डाल लेने से भी कहानी के चरित्र मिल जाते हैैं. उनकी कहानियां उनके इस विश्वास का साक्ष्य bhi हैं।

आर
.के.नारायन की साहित्यिक उपलब्धियों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि आधुनिक भारत के वह पहले अंग्र्रेज़ी लेखक थे, जिन्होंने लेखन को कॅरियर के तौर पर चुना. यह वो दौर था जब अंग्र्रेज़ी में इंडियन फिक्शन खरीदने-पढऩे वाले बहुतायत में नहीं थे. अख़बारों में छपने वाली कहानियों का पारिश्रमिक भी बहुत मामूली होता. शुरुआती दिनों के संघर्ष को याद करते हुए ही वह मज़ाक करते, 'पता नहीं यह क्रेज़ी फैसला मैैंने कैसे किया मगर फिर से चुनने का मौक़ा मिले तो सोचूंगा.Ó एक तरह से यह अच्छा ही है कि आर.के.को यह मौक़ा नहीं मिला वरना कौन कहता मालगुड़ी के किस्से।
- प्रभात

Friday, October 9, 2009

चे को सलाम!

पिछले दिनों एक चैनल पर विनोद दुआ पुरी की सैर करा रहे थे. रिमोट वहीं रुक गया. पुरी घूमने के लिए नहीं, न ही विनोद दुआ के कारण बल्कि उस बैग के कारण जो विनोद जी के हाथ में था. वह एक मामूली शॉपिंग बैग था. उस मामूली से शॉपिंग बैग पर चे की तस्वीर बनी थी. चे यानी चे ग्वेरा. चे ग्वेरा यानी युवा सोच का चेहरा. विनोद दुआ भी उस शॉपिंग स्टोर में चे ग्वेरा के कारण ही रुके थे. उन्होंने भरे उत्साह से दुकान वाले से पूछा कि ये किसकी तस्वीर है? दुकान वाले ने बताया चे गुवेरा. यह चे की पॉपुलैरिटी है. चे फैशन स्टेटमेंट भर नहीं हैं कि बाइक पर उनकी तस्वीर चस्पा करना, उनकी टी-शर्ट पहनना, कैप लगाना भर काफी हो. वे एक विचार हैं, एक लाइफस्टाइल हैं. वे यूथ आइकॉन हैं. चे यानी युवा, ऊर्जा, नई सोच, तूफानों से टकरा जाने का माद्दा, पहाड़ों का सीना चीर देने का हौसला, आसमान को अपनी मुट्ठी में समेट लेने का जज़्बा और अपनी जान से किसी खिलौने की तरह खेलने की बेफिक्री।

चे ग्वेरा ऐसा युवा चेहरा है जिसका नाम भर रगों में सनसनी भर देता है. कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों के कैम्पस चे ग्वेरा के संदेशों से यूं नहीं पटी पड़ी हैं. भले ही कुछ लोग उनके बारे में ज्यादा जानकारी न रखते हों लेकिन अधिकांश युवा चे को अपना आइडियल मानते ही हैं. बावजूद इसके कि वे जानते हैं कि चे होने के जोखि़म भी कम नहीं हैं. क्या था इस युवक में कि यह युवक अपनी मौत के कई सालों बाद भी अतीत नहीं भविष्य के रूप में देखा जाता है. उसका वह ठोस सपाट चेहरा, चौड़ा माथा, और ढेरों सपनों से भरी आंखें. उन आंखों के वही सपने हमारे सपने हैं. युवा पीढ़ी के सपने. 39 वर्ष की उम्र में क्यूबा की क्रांति का यह महान नायक साम्राज्यवादियों का शिकार हुआ और 9 अक्टूबर 1967 को. लेकिन मारने वालों को कहां पता था कि ऐसे लोगों को मारना आसान नहीं होता. वे देह को मार सकते थे सो मार दिया लेकिन चे एक विचार था, एक तरीका था जीने का जो पूरी दुनिया में बिखर गया. कुछ इस कदर कि युवा का अर्थ ही चे होना मान लिया जाने लगा।

विद्वानों का कहना है कि चे शब्द अर्जेंटाइना वालों ने गौरानी इंडियनों से सीखा है, जिसका तात्पर्य होता है, मेरा. लेकिन पांपास के निवासी चे शब्द का उपयोग संपूर्ण मानवीय भावनाओं-मसलन आश्चर्य, प्रमोद, दुख, कोमलता, स्वीकृति और प्रतिरोध को व्यक्त करने के लिए लय और संदर्भ के अनुसार कर सकते हैं. इस विस्मयकारी शब्द से इतना स्नेह होने के कारण ही क्यूबा के विद्रोहियों ने डॉन अर्नेस्टो के बेटे अर्नेस्टो ग्वेरा को चे का उपनाम दिया जो युद्ध के दौरान उसका छद्म नाम बन गया और उनके नाम के साथ पक्के तौर से जुड़ गया. क्यूबा और पूरी दुनिया में वह अर्नेस्टो चे ग्वेरा के नाम से प्रसिद्ध हुए. क्रांति के नायक के जीवन में प्रेम जैसी नाजुक भावना ने भी अलग ही अंदा$ज में दस्तक दी।

चे को चिनचीना नामक लड़की से अगाध प्रेम था. चिनचीना बेहद खूबसूरत और नाजुक लड़की थी. वह सभ्य, सुसंस्कृत सामंती परवरिश में पली थी. जबकि चे को हमेशा अपने पुराने फटे कोट और खस्ताहाल जूतों से रश्क रहा. उसने एक दिन चिनचीना से कहा कि वह अपने पिता का घर छोड़ दे, धन-दौलत के बारे में भूल जाए और उसके साथ वेनेजुएला चले, जहां वह अपने मित्र अल्बर्टो ग्रैनडास के साथ कोढिय़ों की बस्ती में रहकर उनकी सेवा करेगा. चिनचीना एक सामान्य लड़की थी और उसका प्यार भी सामान्य ही था. वह इस प्रस्ताव को मान नहीं सकी।

चे को कविताओं से बहुत प्यार था. वह बादलेयर, गार्सिया लोर्का और एंतोनियो मचाडो की कृतियों का अच्छा जानकार था. पाब्लो नेरूदा की कविताओं से बेपनाह मोहब्बत थी. उसे पाब्लो की बहुत सारी कविताएं जबानी याद थीं. उसने खुद भी कविता लिखने की कोशश की लेकिन माना खुद को असफल कवि ही. चे का छोटा सा जीवन बेहद रोमांचक था. हर युवा दिल के साथ चे के विचार भी धड़क रहे हैं. यही होता है सचमुच जीना. चे को सलाम!
- प्रतिभा कटियार

Thursday, October 8, 2009

शरद में बसंत

इतनी आसानी से जीवन में बसंत आता नहीं
पहले पत्ता-पत्ता झरने का सलीका सीख लो...
- विवेक भटनागर

Sunday, October 4, 2009

आवाज़ का पैरहन

यहां...यहां...यहां...यहां भी नहीं है. वहां भी नहीं है...आखिर कहां रख दी. ऐसा तो कभी नहीं हुआ. कबसे ढूंढ-ढूंढ कर परेशान हूं. कम्बख्त मिल ही नहीं रही. मां हमेशा कहती रहीं, तुम लापरवाह हो बहुत. अपने $जेवर यूं फेंक देती हो. कहीं भी पड़े रहते हैं. गुम हो जायेंगे कभी सारे के सारे. मां की डांट के चलते ज़ेवर संभालना तो नहीं सीखा हां यह $जरूर सीखा कि कीमती चीजों को यूं ही इधर-उधर नहीं छोड़ दिया जाता, संभालकर रखा जाता है. ज़ेवर मेरे लिए कीमती थे ही नहीं, सो उन्हें संभालने की आदत नहीं ही पड़ी. लेकिन एक आवा$ज थी बेशकीमती. उसे ही संभालती फिरती थी।
जबसे वो आवा$ज जिं़दगी में दाखिल हुई कीमती चीजें क्या होती हैं यह अहसास हुआ. मां की सारी नसीहतों को सिरे सहेजना शुरू किया. उस आवा$ज को हमेशा अपने दामन में समेटकर रखा. कभी आंखों में बसाया उसे तो कभी कानों में पहन लिया. कभी माथे पर सूरज की तरह उग आती थी वो, तो कभी ओढऩी बनकर समेट लेती थी पूरा का पूरा वजूद अपने भीतर. वक्त मुश्किल हो तो कंधे पर हाथ सा महसूस होता था उसका. कभी खिलखिलाहटों में भरपूर साथ भी दिया. अकेली नहीं हुई कभी भी, जबसे उसका साथ मिला. कोई किसे ढूंढे, कहां रखे. रूठती भी वो थी और मनाती भी।

हां, यह ठीक है कि उस आवा$ज के चंद वक्$फे ही हिस्से में आये थे, तो क्या हुआ? इस बात की कोई शिकायत तो नहीं थी. सोचा था उन चंद वक्फ़ों को बो दूंगी. उग आयेंगी खूब सारी आवाजें. आवा$जें....मीठी...मीठी...मीठी...कोलाहल नहीं, आवा$ज. वो आवा$ज जिसमें रूह को विस्तार मिले. जिसे कमर में बांध लो तो आत्मविश्वास से भर जाये मन. पांव की पा$जेब बने कभी, तो कभी पवन बन उड़ा ही जाये अपने संग. आवा$जों की इस भीड़ में ऐसी कीमती आवा$जों का मिलना कितना मुश्किल है... तभी तो सारे ताले-चाभी निकाल लिये थे. कभी आंचल में बांधकर रखती तो कभी तकिये के नीचे छुपाकर. उसे सहेजकर रखने में कोई चूक नहीं की. कभी भी नहीं. लेकिन आज न जाने कैसा मनहूस सा दिन है. सुबह से ढूंढ रही हूं, मिल ही नहीं रही. घर का कोना-कोना तलाश लिया. मन की सारी पर्तें झाड़कर देख लीं. आंचल के सारे सिरे तलाश लिये. तकिये के नीचे...वहां तो सबसे पहले देखा था. क्या कहूं... क्या हुआ. आवा$जों की गुमशुदगी की तो रिपोर्ट भी नहीं लिखवाई जा सकती. थक-हार कर बैठी हूं, निराश...बेहाल......$िजंदगी से बे$जार... $िजंभी तो उसी आवा$ज में रख दी थी. क्या करूं...क्या कहूं...कहां ढूंढूं...?
न कोई रूप उस आवा$ज का...न चेहरा कोई...कैसे कोई और ढूंढ पायेगा।

Tuesday, September 29, 2009

यही है सादगी- पाब्लो नेरुदा

खामोशी है ताकत
मुझे बताते हैं पेड़
और गहराई
मुझे बताती हैं जड़ें
और शुद्धता मुझे बताता है आटा।

किसी पेड़ ने नहीं कहा मुझसे
कि मैं सबसे ऊंचा हूं
किसी जड़ ने भी नहीं कहा मुझसे
कि मैं आती हूं
सबसे अधिक गहराई से
और कभी नहीं कहा
रोटी ने
कि कुछ भी नहीं है
रोटी जैसा।
- पाब्लो नेरूदा

Sunday, September 27, 2009

क्रांति- भगत सिंह (जन्मदिन पर )

जब गतिरोध की स्थिति
लोगों को अपने शिकंजे में
जकड़ लेती है
तो वे किसी भी प्रकार की
तब्दीली से हिचकते हैं,
इस जड़ता और निष्क्रियता
को तोडऩे के लिए
एक क्रांतिकारी स्पिरिट की
$जरूरत होती है
इस परिस्थिति को बदलने के लिए
यह $जरूरी हैकि क्रंाति की स्पिरिट
ताजा की जाए ताकि
इंसानियत की रूह में
हरकत पैदा हो।
(असेम्बली में बम फेंकने के बाद अदालत ने जब भगतसिंह से पूछा कि क्रांति क्या है,
तब उन्होंने इस कविता के ज़रिये क्रांति को परिभाषित किया था.)

Friday, September 25, 2009

सीढ़ी

मुझे एक सीढ़ी की तलाश है
सीढ़ी दीवार पर चढऩे के लिए नहीं
बल्कि नींव में उतरने के लिए
मैं किले को जीतना नहीं
उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं।
- नरेश सक्सेना

Tuesday, September 22, 2009

लोहे का स्वाद- धूमिल

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में है लगाम
- धूमिल

Saturday, September 19, 2009

बीहड़ रास्तों का सफर- मार्क्स

आओ
बीहड़ और कठिन
सुदूर यात्रा पर चलें
आओ ,
क्योंकि छिछला
निरुद्देश्य जीवन
हमें स्वीकार नहीं।
हम ऊंघते,
कलम घिसते हुए
उत्पीडऩ और लाचारी
में नहीं जियेंगे।
हम
आकांक्षा, आक्रोश, आवेग
और अभिमान से जियेंगे
असली इनसान की तरह।
- कार्ल मार्क्स

Friday, September 18, 2009

चुनौती

तुम मुझे
चारों तरफ से बांध दो
छीन लो
मेरी पुस्तकें और चुरुट
मेरा मुंह धूल से भर दो
कविता मेरे धड़कते ह्रदय का रक्त है
मेरी रोटी का स्वाद है
और आंसुओं का खारापन है
यह लिखी जायेगी नाखूनों से
आंखों के कोटरों से
छुरों से
मैं इसे गाऊंगा
अपनी कैद-कोठरी में
स्नानघर में
अस्तबल में
चाबुक के नीचे
हथकडिय़ों के बीच
जंजीरों में फंसा हुआ
लाखों बुलबुले मेरे भीतर हैं
मैं गाऊंगा
मैं गाऊंगा
अपने संघर्ष के गीत।
- महमूद दरवेश

Tuesday, September 15, 2009

हम देखेंगे - फैज अहमद फैज

हम देखेंगे...
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
हम देखेंगे।
जो लाहे अ$जल में लिखा है
हम देखेंगे
ला$िजम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे .
जब जुल्मो-सितम के कोहे गरां
रूई की तरह उड़ जायेंगे
हम महरूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़केगी
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे
जब अर$जे खुदा के काबे से
सब बुत उठवाये जायेंगे
हम अहले स$फा मरदूदे हरम
मसनद पे बिठाये जायेंगे
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे .
बस नाम रहेगा अल्ला का
जो गायब भी हा$िजर भी
जो ना$िजर भी है मं$जर भी
उठेगा अनलह$क का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्के खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे.

Monday, September 14, 2009

सपने

हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को
सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुईं
हथेली के पसीने को
सपने नहीं आते
सेल्फों में पड़े
इतिहास ग्रन्थों को
सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाजिमी है
झेलने वाले दिलों का होना
सपनों के लिए
नींद की न$जर होनी लाजमी है
सपने इसलिए
हर किसी को नहीं आते।
-पाश

Saturday, September 12, 2009

हम लड़ेंगे साथी !

हम लड़ेंगे साथी
उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी
गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी
$िजंदगी के टु़कड़े।
कत्ल हुए जज़्बात की कसम खाकर
बुझी हुई न$जरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़ी गांठों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी...
जब बन्दूक न हुई
तब तलवार न हुई
तो लडऩे की लगन होगी
लडऩे का ढंग न हुआ
लडऩे की $जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी....
हम लड़ेंगे क्योंकि
लडऩे के बगैर कुछ भी नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
क्योंकि अभी तक हम लड़े क्यों नहीं .....
- पाश

Friday, September 11, 2009

एक आग तो बाकी है अभी

उसकी आंखों में जलन थी
हाथों में कोई पत्थर नहीं था।
सीने में हलचल थी लेकिन
कोई बैनर उसने नहीं बनाया

सिद्धांतों के बीचपलने-बढऩे के बावजूद
नहीं तैयार किया कोई मैनिफेस्टो।
दिल में था गुबार कि
धज्जियां उड़ा दे

समाज की बुराइयों की ,
तोड़ दे अव्य्वास्थों के चक्रव्यूह
तोड़ दे सारे बांध मजबूरियों के
गढ़ ही दे नई इबारत
कि जिंदगी हंसने लगे
कि अन्याय सहने वालों को नहीं
करने वालों को लगे डर

प्रतिभाओं को न देनी पड़ें
पुर्नपरीक्षाएं जाहिलों के सम्मुख
कि आसमान जरा साफ ही हो ले
या बरस ही ले जी भर के
कुछ हो तो कि सब ठीक हो जाए
या तो आ जाए तूफान कोई
या थम ही जाए सीने का तूफान
लेकिन नहीं हो रहा कुछ भी
बस कंप्यूटर पर टाइप हो रहा है

एक बायोडाटा
तैयार हो रही है फेहरिस्त
उन कामों को गिनाने की
जिनसे कई गुना बेहतर वो कर सकता है।

सारे आंदोलनों, विरोधों औरसिद्धान्तों को
लग गया पूर्ण विराम
जब हाथ में आया
एक अदद अप्वाइंटमेंट लेटर....

Monday, August 31, 2009

इख्फ़ा-ए-मुहब्बत


तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
हाय! ये हीर की सूरत जीना
मुंह बिगाडे हुए अमृत पीना
कांपती रूह धड़कता सीना
जुर्म फितरत को बनाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो।
दिल भी है दिल में तमन्ना भी है
तुमको अपने पर भरोसा भी है
झेंपकर आंख मिलाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
हां, वो हंसते हैं जो इंसान नहीं
जिनको कुछ इश्क का इर$फान (ज्ञान)नहीं
संग$जादों में $जरा जान नहीं
आंख ऐसों की बचाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
जुल्म तुमने कोई ढाया तो नहीं
इब्ने आदम को सताया तो नहीं
यों पसीने में नहाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
झेंपते तो नहीं मेहराबनशीं,
मक्र पर उनकी चमकती है जबीं
सिद्क पर सर को झुकाती क्यों हो?
तुम मुहब्बत के छुपाती क्यों हो?
परदा है दा$ग छुपाने के लिए
शर्म है किज़्ब (झूठ) पे छाने के लिए
इसको होठों में दबाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
आओ, अब घुटने की फुरसत ही नहीं
और भी काम हैं, उल्फत ही नहीं
है ये खामी भी नदामत (शर्म) ही नहीं
डर के चिलमन को उठाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
- कैफी आज़मी

Saturday, August 29, 2009

लाइफ इज अ सर्च

दा...दा...दा...करके बोलना शुरू भी नहीं किया कि एक तलाश साथ हो चली। पूरे घर में कुछ न कुछ ढूंढते फिरना। कभी कुछ गिराना, कुछ उठाना। कुछ चीजों को मुंह में डालकर स्वाद लेकर परखना...कान उमेठे जाना। फिर वही करना...फिर बड़े होना...तलाश जारी। अनजानी तलाश...जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल...जैसे ख्यालों में घिर जाना।
सुख...हां शायद यही होगा...सब तो इसे ही ढूंढते हैं। लेकिन ऐसा भी तो हुआ है कई बार कि जब सुख या खुशी से सामना हुआ तो दिल का कोई कोना बेतरह भीग गया। जाने किस $गम की कसक हर खुशी में घुल जाती, चुपके से।
फूल, पत्ती, नदियां, पहाड़, चिडिय़ा, संगीत कुछ भी नहीं भाता। जी चाहता रबर से मिटा ही डालूं सब कुछ। एकदम खाली हो जाये कैनवास। या फिर आसमान के उस पार झांककर देखूं, कहीं वहां मेरा कोई हिस्सा तो नहीं। वजूद का कौन सा हिस्सा न जाने कब, कहां गिर गया हो। अगर तलाश है, तो $जरूर कुछ तो होगा ना जिसकी तलाश है। इसी तलाश के दरम्यिान कभी किसी पल में जिं़दगी को बेहद करीब पाया भी है...यह तस्वीर ऐसे ही पलों में से एक है। लाइफ इज अ सर्च....
(हमारे साथी फोटोग्राफर अतुल हुंडू की एक फोटो $िजंदगी झांकती है जहाँ )

Monday, August 24, 2009

कुछ, जिसका है इंतजार


केदारनाथ सिंह
कुछ
जिसे डाकिया कभी नहीं लाता
कुछ जो दिन भर गिरता रहता है
मकानों की छतों से धूल की तरह.
कुछ-जिसे पकडऩे की जल्दी में
बसें छूट जाती हैं,
चाय का प्याला मे$ज पर धरा रह जाता है
और शहर में होने वाली हत्या की खबर
चौंकाती नहीं
न आघात देती है।

सिर्फ आदमी उठता है
और अपनी कंघी को उठाकर
शीशे के और करीब रख देता है
कुछ, जिसके लिए
सारी पेंसिलें रोती हैं नींद में
और सड़क के दोनों किनारों के मकान
बिना किसी शब्द के
बरसों तक खड़े रहते हैं
एक ही सीध में।

Saturday, August 22, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी-५ अन्तिम किश्त

काशीनाथ सिंह-
................. बुड्ढे, जब सारे लोग चले गये और कोई नहीं रह गया, तो शौक साहब बोले, तैने अपने बेटे की कीमत नहीं जानी बुड्ढे! बड़ी कीमती चीज है वो। बोल, कितना लगाएगा उसका मोल।सरकार, बूढ़े ने असमंजस में सड़क पर अपना माथा रख दिया।मैं थक गया हूं और अधिक थूकना मेर बस का नहीं. अब यह काम मेरा बेटा करे तो कैसा रहे? इसी गद्दी पर बैठकर! इसी खिड़की के पास. बूढ़ा उठ खड़ा हुआ. उसका मुंह खुला था और देर तक खुला रहा. वह अविश्वास के साथ खिड़की की ओर देख रहा था. उसने सूर्य को साक्षी करके दोनों हाथ जोड़े और आखें बंद कर लीं, पैर की धूल को चंदन बनाने वाले परवरदिगार ऐसा न करें, नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगा, मारे खुशी के मर जाऊंगा...जब उसने आंखें खोलीं, तो उसकी आंखों में आंसू थे. उसने बेचैनी से बेहाल होकर कहा, सरकार आपने अभी-अभी कहा, उसे भूल तो न जाएंगे?
बुड्ढे शौक जो कहता है, उसे कभी नहीं भूलता।अपनी बात से मुकर तो नहीं जाएंगे?बुड्ढे, शौक की बात उसके मुंह से निकली हुई पीक की तरह होती है, जो वापस नहीं लौटती। बुड्ढे की खुशी का ठिकाना न था, लेकिन उसकी घबराहट बढ़ती जा रही थी। बेटा आने में देर कर रहा था। अब तक उसे लेकर न हाथी लौटे थ, न घोड़े, न बग्घी उसे खुद पता नहीं था, वरना दौड़ा हुआ गया होता और पकड़ लाया होता।सरकार, उसने अनुरोध किया, अगर इ$जाजत दें तो मैं खुद देखूं।नहीं, तू यहंा से नहीं हिल सकता, शौक साहब ने दृढ़ता से कहा।

बूढ़ा सिर झुकाकर सोचने लगा कि उसका बेटा जो बड़ा ही बेकहा और जिद्दी था, कहां-कहां जा सकता है। ठीक इसी समय जाने कहां से उसके मन में एक संदेह पैदा हुआ।लेकिन हुजूर, वह नीच जात...दूसरों पर थूकना उसे कैसे सोभेगा? उसने शौक साहब से अर्ज किया।क्योंउसी के भाई-बंद यह कैसे बर्दाश्त करेंगे?जैसे मुझे करते हैं।बूढ़ा हंसा. आपकी बात और है सरकार.मतलब यह कि किसी और पर थूकने से पहले अपने बाप पर थूके, तो दूसरों को क्या ऐतराज? क्यों न मुझी पर थूकने से शुरू करें?बूढ़े का जी धक से रह गया. वह घबरा उठा. अनर्थ हो जाएगा सरकार. वह जान दे देगा, लेकिन यह नहीं करेगा.

वह क्या करेगा, क्या नहीं करेगा, यह मुझ पर छोड़। शौक साहब ने उसे डंाटकर तुरंत चुप कर दिया।शौक साहब अब कुछ भी सुनने को तैयार नहीं लग रहे थे, वे आश्वस्त हो गए थे और बड़ी तेजी से उनका मूड बदल रहा था। वे कुछ गुनगुना रहे थे और जांघ पर ताल दे रहे थे। जाने कितने दिनों के बाद जाकर काम-धाम से फुरसत मिली थी उन्हें।उन्होंने जमुहाई ली और मुंह के आगे चिटकियां बजाईं।क्या करें कि दिन कटे? यह बात उनके भीतर उठने लगी थी। उन्होंने बाहर देखा न लोग थे, न गरियाना था, न रोना था, न घिघियाना था। पान से लाल सड़क पर जानलेवा सन्नाटा था और इससे वक्त नहीं कट सकता था. उन्होंने अपना सिर खुजलाया और तब तक खुजलाते रहे, जब तक हाथ दर्द नहीं करने लगा. फिर पीठ खुजलाई, फिर हाथों की उंगलियां चटकाईं, फिर दंात खोदे और खोदते रहे. अंत में शीशा उठाकर जब चेहरा देख रहे थे, तो कोठे के दिन याद आने लगे. खासतौर से बेला की हाय-हाय. क्या गला पाया था और क्या तरन्नुम था और क्या लोच था.एक बार फिर सोचें हुजूर, यह उस पर भी जुल्म होगा और मुझ पर भी. हम किसे मुंह दिखाएंगे? बूढ़े से रहा न गया, उसने फरियाद की.शौक साहब झल्ला उठे. उन्हें गुस्सा आ गया.बेवकूफ बुड्ढे! भाग सराह अपना कि तेरा बेटा, जो तेरे ख्याल से आवारा और निकम्मा है, तुझे वह सारा कुछ मुहैय्या कराने आ रहा है, जिनके लिए हर बाप झंखा करता है, समझा? कहकर बड़ी मोहब्बत से उन्होंने नीचे झांका और थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले, देख दिमाग मत चाट, जिंदगी के मजे ले. जब बड़े आदमी की सोहबत की है तो ऐश कर. बोल, तू क्या सुनेगा-ठुमरी या दादरा? वैसे मौसम चैता का है. अहा-हा केहि ठैयां झुलनी हेरानी हो रामा... शौक साहब ने आंचों बंद कीं और गुनगुनाना शुरू किया. थोड़ी देर बाद ही रुक गए और अंदर किसी को आवाज दी, अरे कौन है उधर? बेला बाई को भेज तो!अपने कानों में बूढ़े ने उंगलियां घुसेड़ ं. उसका माथा चकराने लगा. अगर चोबदारों ने उसे सहारा न दिया होता, तो वह भहरा पड़ा होगा. उसके दिमाग में इतना तो आ रहा था कि सरकार सही कह रहे हैं. वह पका आम, जाने कब चू जाए. अब कै दिन की जिंदगानी है उसकी? लोग बाल-बच्चों के लिए ही जीते हैं और यहां बेटे को राज मिल रहा है और वह भी अपने आप. दुनिया उसे हुजूर मालिक सरकार कहा करेगी और थुकवाने के लिए तरसती रहेगी, लेकिन मन कह रहा था कि ऐसे जीने से तो मर जाना अच्छा. वह भी क्या बाप, जिस पर बेटा थूके.सहसा जाने कहां से शायद उसकी अंतरात्मा से आवाज आई कि लाख ढूंढो, वह नहीं मिलेगा.उसे गुदगुदी जैसी महसूस हुई और उसने ऊपर ताका.ग्रामोफोन का रेकॉर्ड पूरे सुर में बज रहा था और खिड़की पर बैठे-बैठे शौक साहब झूम रहे थे।

सरकार, अगर वह न आए तो? बूढ़े ने खुशी में चिल्लाकर पूछा?शौक साहब का ध्यान टूटा। उन्होंने नाक-भौं सिकोड़ी। उन्हें यह खटराग बड़ा ही बेसुरा लगा, फिर भी उन्होंने जब्ती से काम लिया, अबे उल्लू के पट्ठे, उसे बुला कौन रहा है? वह लाया जा रहा है।लेकिन वह न मिले तो?बूढ़स उसी रौ में चिल्लाया।शौक साहब ने बेला बाई या जो भी रही हों, उन्हें थोड़ी देर के लिए चुप कराया और गुस्से से बूढ़े को देखा। बूढ़ा सड़क के बीचोबीच खड़ा मिचमिचाती आंखों से मुंह बाए उनकी ओर ताक रहा था. उसके हाथ जुड़े थे और कांप रहे थे. अगल-बगल चोबदार उसकी बांह पकड़े हुए उसे दुत्कार रहे थे. गुस्से में तो बहुत थे शौक साहब, लेकिन उन्हें दया आ गईं. इधर चैता ने भी उनके दिल को कोमलता और उदारता से भर दिया था. वे विनोद में मुस्कुरा उठे, भांड़ों और लौंडों के नाच के रसिया बुड्ढे, तुझे मुजरे का मजा क्या मालूम? तभी तंग जूती की तरह बीच-बीच में काट रहा है. अच्छा, अब सारी बातों का लुब्बे-लुबाब सुन ले और यह हाय-हाय बंद कर दे. रियायत नहीं चलेगी यहां. अगर तूने थूकने वाले को बेटा जानकर गालियां देने में, रोने में, गिड़गिड़ाने में कोताही की, चूक की, तो याद रख. एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं वह तक तक थूकता जाएगा, जब तक हमें संतोष न हो. बस...हां, तो बेला रानी अब शुरू कर.ग्रामोफोन की आवाज फिर खिड़की से बाहर आई और धूप में बल खाने लगी.शौक साहब ताल ही नहीं दे रहे थे, समय-समय पर सुर में सुर भी मिला रहे थे.बूढ़े ने ऊंची आवाज में फिर कुछ कहा, लेकिन खुद नहीं सुन सका कि क्या कह रहा है्वह पालथी मारकर वहीं सड़क पर बैठ गया.

शौक साहब इंत$जार कर रहे थे आने का। बूढ़ा इंत$जार कर रहा था न आने का.यह पहला दिन था. चार दिन और बाकी थे.शौक साहब के नाम पर बने नगर के इस चौराहे पर, जिसे लो शौक न कहकर चौक कहते हैं, साल में एक बार बिरहा-दंगल होता है. जिसमें बिरहा गाने वाली दोनों पार्टियां आपस में सवाल जवाब करती हैं. हालांकि हर कोई जानता है कि छठे रोज क्या हुआ था फिर भी बिरहियों की आखिरी लडंत होती है भोर में जिसके फैसले का दारोमदार इन सवालों के जवाब पर होता है कि नौजवान मिला या नहीं, गद्दी पर बैठने के लिए कहा गया, तो बैठा या नहीं, अपने बाप पर थूका या नहीं. थूका तो बाप ने कुछ किया या नहीं?इसमें संदेह नहीं कि जवाब तो अच्छे-से-अच्छे दिए जाते हैं, मगर सुनने वालों का मन नहीं भरता.
समाप्त....

Friday, August 21, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी- 4

काशीनाथ सिंह

............इस ऐलान को करते हुए उनकी आंखों में आंसू थे और वे आंसू गालों पर ढुलक-ढुलक आ रहे थे कि वे तब तक किसी पर नहीं थूकेंगे, जब तक जुर्म करने वाला उसे भगाने वाला खुद सामने आकर कबूल नहीं करता.
इस ऐलान की बड़ी विकट प्रतिक्रिया हुई. इसे सुनते ही भीड़ के दक्खिनी छोर पर, जहां पकड़ी का पेड़ था और जिसकी डालें छोटे-बड़े अधनंगे शरीरों और सिरों से लदी हुई थीं, कोई बोला, हाय कुर्ता! दूसरे किसी छोर से एक और आवाज आई, हाय धोती, धीरे-धीरे हर कोने से आवाजें आनी शुरू हुईं और यह कीर्तन जैसा सुनाई पडऩे लगा, हाय कुर्ता, हाय धोती. हाय चावल, हाय रोटी.
कुछ जो चुपचाप खड़े थे और गा नहीं रहे थे, शक की निगाहों से आगे-पीछे ताक रहे थे और सबकी भलाई को देखते हुए आगे आने के लिए एक-दूसरे को उकसा रहे थे.
हुजूर, आखिरकार एक बूढ़ा आगे बढ़ा और दोनों हाथ उठाकर चिल्लाया, यह कसूर मेरा है.
शौक साहब ने अपनी आंखें पोंछी, कौन है तू?
उस अभागे का बाप! बूढ़ा बोला.
क्या करता है तू?
था तो हलवाहा हुजूर, लेकिन जब से जमींदारी गई, इसी नगर में रिक्शा खींच रहा हूं.
और तेरा बेटा? वह क्या करता है?
कुछ नहीं सरकार! आवारा और निकम्मा है. रात-रात भर दोस्तों से गप्पें लड़ाता है, घर से गायब रहता है और भी जाने क्या-क्या करता है?
इंकलाबी तो नहीं है?
पता नहीं हुजूर!
शौक साहब चुप-चुप उसे घूरते रहे. संतोष से उनकी आंखें चमक रही थीं, मगर ऐसा क्यों किया तैने?
हुजूर, वह मेरा खून है और मैं उसे जानता हूं. वह नहीं मरता. हरगिज नहीं मरता, लेकिन आप सरकार...वह हकलाने लगा. अगर आपको कुछ हो जाता,तो हम कहीं के न रहते.
लेकिन तैने दुनिया को जो बताया कि सरकार तेरे बेटे के मुकाबले कमजोर और बुजदिल हैं, उसके लिए क्या कहते हो?
बूढ़ा सोच में पड़ गया. उसने यह न सोचा था कि इसका मतलब ऐसा भी हो सकता है. उसने मदद के लिए उधर-उधर देखा. लोग-बाग पीछे से गर्दन उचका-उचकाकर देख रहे थे और उसे सुनने की कोशिश कर रहे थे.
सरकार, बुजदिल वह है, जो मैदान छोड़ दे, आप नहीं.
यह बात नहीं है बुड्ढे! शौक साहब कुछ देर सोचते रहे, साफ-साफ बोल, तैने किसकी जान बचाई? मेरी या अपने बेटे की?
अपने बेटे की हुजूर.
सो कैसे?
अगर आप न होते, तो ये लोग, जो चारों ओर फैले हुए हैं और कीर्तन कर रहे हैं, उसे जिंदा न छोड़ते?
पहले भी और अब भी?
अब भी?
यह भला क्यों?
यह इसलिए कि आप हैं, तो हम हैं आप नहीं तो हम कहां?
शौक साहब हंसे और बड़ी जोर की हंसी हंसे. उनका भारी शरीर जब शांत हुआ, तो बोले, बुड्ढे! बहुत चालाक है तू. मैं तेरे से खुश भी हूं और नाराज भी. खुश इसलिए कि तैने मेरी जान बचाई, लेकिन नाम मेरे बेटे का लिया और नाराज इसलिए कि तैने एक साथ सबको जलील किया. मुझे भी इस जम्हूरियत को भी और बेटे की बहादुरी को भी...तो बोल, तेरी मंशा क्या है? क्या चाहता है तू?
सरकार? बूढ़े ने सर झुका लिया.
वह चोबदारों के बीच खड़ा था और सोच नहीं पा रहा था कि क्या कहे? उसे सरकार के रुख का अंदाजा भी नहीं हा रहा था कि वे उससे क्या सुनना चाहते हैं? जब काफी देर तक बूढ़ा असमंजस में खड़ा रहा और कुछ न बोल सका, तो शौक साहब भीड़ की ओर मुखातिब हुए, लोगों उन्होंने भीड़ में ऐलान किया, वह नौजवान जहां कहीं भी हो, आकाश में हो तो आकाश से पाताल में हो तो पाताल से, धरती पर हो तो धरती से पकड़कर उसे हाजिर करो. जो हाजिर करेगा, वह बख्शीश का हकदार होगा. जाओ.
भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी. लोग दौड़ते-धूपते न$जर आने लगे. शौक साहब ने अपने ऐलान में पांच दिन की मोहलत दी थी कि इस दौरान वे यह विचार करेंगे कि थूकने का कार्यक्रम आगे भी चलाया जाए या बंद कर दिया जाए. उनकी इस धौंस ने हर आदमी को चुस्त और बेचैन कर दिया था.
देखते-देखते गली सूनी हो गई।
क्रमशा

Tuesday, August 18, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी- 3

- काशीनाथ सिंह
.......और फिर घंटों जो लड़ाई चली, उसका अब तक कोई सानी नहीं है। उसका वर्णन वही कर सकता है, जिसकी जबान में बिजली की चमक, बादलों की गरज और मूसलाधार बारिश को जज्ब करने की ताकत हो। देखते-देखते खिड़की से न$जर आने वाली सारी सड़क और दीवारें लाल होनी शुरू हो गईं। इस दौरान नौजवान उछलता रहा, कूदता रहा, नाचता रहा और गिरता-भहराता रहा। उसके कपड़े तार-तार हुए, कुहनी और घुटने फूटे, सीने पर खरोंच आईं, मुड्ढों और कंधों में मोच आई, छाती धौंकनी की तरह चलती रही, पसलियां बाहर झांकने लगीं, लेकिन उसके बदन पर एक भी छींटा नहीं पड़ा।

इसे शौक साहब के प्रति हमदर्दी कहिए या अपना लालच, भीड़ ने भी उसके साथ कोई मुरौव्वत नहीं दिखाई। उल्टे वह उसका मजाक उड़ाती रही, उस पर व्यंग्य कसती रही, बीच-बीच में कंकड़ और लकडिय़ों के टुकड़े तक फेंकती रही, लेकिन उसे डिगा न सकी.छोकरे, मेरे से तू कोई चाल तो नहीं चल रहा है? अंत में थककर खिड़की के पल्ले से अपना गाल सटाए हुए शौक साहब ने पूछा. पसीने से तर-बतर नौजवान ने सिर उठाया, कैसी चाल?घिनौनी चाल! यानी कि जादू टोना.नौजवान लंबी-लंबी सांसें लेता हुआ ताकता रहा.फिर मुझे क्यों लगता है कि तेरी गर्दन लंबी होकर खिड़की के सामने आ रही है, तेरी आंखें मेरी आंखें में घुसी आ रही हैं, मेरी पीक ऊपर ही ऊपर उड़ जा रही है. तू जहां खड़ा है, वहां न$जर नहीं आ रहा है.चाल वह चले साहब, जो अपनी मां से घात करे. नौजवान हांफते हुए बोला. शाब्बास बहादुर तो तैयार हो जा.दोपहर बाद भीड़ ने गौर किया कि शौक साहब और छोकरा दोनों बगैर खाए-पिए-सोए पस्त पड़ चुके हैं. छोकरे से न ठीक खड़ा हुआ जाता है, न उछला जाता है, न चला जाता है. इसी तरह शौक साहब के निशाने में न पहले जैसी धार है, न ताकत, न सधापन. कभी-कभी तो वह खिड़की से गर्दन बाहर करते और पीक उनके खुले मुंह से बहकर ठोढ़ी से होती हुई बूंद-बूंद करके टपकने लगती. ऐसी भी हालत आती, जब मुंह खुला रहता और कुछ भी न गिरता.

शाम तक तो ऐसा हुआ कि न खिड़की से पीक गिरी और न नौजवान खड़ा रह सका। वह बाईं तरफ झुका-झुका कुछ देर तक झूलता रहा, फिर लुढ़का और पेट के बल ढेर हो गया. फिर किसी तरह बड़ी मशक्कत के बाद चित्त हो सका. उसने चीभ की नोक से अपने होंठ तर किए, धीरे-धीरे पलके खोलीं, और इधर-उधर कुछ देखने की कोशिश की. अंत में उसकी आंखों ने खिड़की ढूंढ ली और वहीं टिक गईं.फिर भी सबका ख्याल था कि अगर ऊपर से पीक की एक भी बूंद गिरी, तो करवट बदलने की बात तो छोडि़ए, इसमें हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं रह गई है.

लोग तनाव और उत्सुकता से भरे हुए थे, लेकिन मौसम खुशगवार और उत्तेजक था। ठीक वैसा ही, जैसा होना चाहिए. दिन की धूप अंग-अंग को गर्मा चुकी थी और शाम की ठंड नस-नस में नींद और चैन का नशा घोले जा रही थी. नदी की ओर से आने वाली बसंत की हवा पकड़ी के बचे-खुचे पत्तों से छेड़छाड़ करती और फिर खिड़की से घुसकर शौक साहब के सफेद बालों को सहला जाती.नीले और खुले आसमान में पहले बड़ी देर तक केवल एक तारा टिमटिमाता रहा, लेकिन जैसे-जैसे अंधेरा घना होता गया, सारा नीलापन सफेद कांपते तारों से भरने लगा.लोग टकटकी लगाए खड़े रहे कि देखें, इस कत्ल की रात में क्या होता है, बूंद कब गिरती है.इसी बूंद का इंत$जार करते-करते और होते-हवाते सुबह हुई तो चारों तरफ एक सनसनी और दहशत फैल रही थी.

नौजवान वहां नहीं था, जहां पड़ा था। वह इधर-उधर भी कहीं नहीं था. भोर में थोड़ी देर के लिए लोगों को झपकी आई और उसने मौके का फायदा उठा लिया. जितने मुंह, उतनी बातें. किसी ने अंधेरे में निहुरे-निहुरे उसे भागते देखा था, तो किसी ने कुछ लोगों द्वारा उसे भगाए जाते हुए. शौक साहब के आदमी भी संदेह से बरी नहीं थे, लेकिन यह भी था कि उनके लिए उसकी औकात मक्खी से ज्यादा नहीं थी. जो काम कभी भी हो सकता था, उसके लिए चोरी की क्या $जरूरत?लोगों ने शौक साहब से बहुत कहा. उनके अपने लोगों ने भी और भीड़ ने भी कि हुजूर के आगे एक लौंंडे की क्या बिसात? वह क्या खाकर टिकता? यह क्या कम है कि इतने दिन डटा रह गया? लिहाजा, उसकी चिंता छोडें़ और दुनिया को देखें, उसके दुख-दर्द तकलीफ को सुनें लेकिन उन पर बातों का कोई असर नहीं पड़ रहा था. वे खिड़की के पास उदास और गुमसुम बैठे हुए थे. न कुछ खा-पी रहे थे और न बोल-बतिया रहे थे. उन्होंने दिशाओं में अपने हाथी, घोड़े और बग्घी दौड़ा रखे थे. कभी-कभी तो उनकी गर्दन खिड़की से बाहर आती और वे इस इत्मीनान के लिए नीचे झांकते कि नौजवान सचमुच गायब है या उनके साथ मजाक किया जा रहा है.यह ऐलान करते हुए उनकी आंखों में आंसू थे और वे आंसू गालों पर ढुलक-ढुलक आ रहे थे कि वे तब तक किसी पर नहीं थूकेंगे, जब तक जुर्म करने वाला-उसे भगाने वाला खुद सामने आकर कबूल नहीं करता.
- क्रमश:

Monday, August 17, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी-2

- काशीनाथ सिंह
ऐसे लोग जिनकी तादाद बेहिसाब थी-खिड़की के नीचे मेला जैसा हुए घूमते-घामते रहते और एक-दूसरे से जानना चाहते कि उन्हें भला गालियों से इतनी मुहब्बत क्यों है? उनके भव्य और दिव्य चेहरे पर बुर्राक मूंछें कितनी फबती हैं? हमारी इतनी मिन्नत के बावजूद सरकार दर्शन देने कभी नीचे क्यों नहीं उतरते? क्या वे सचमुच चलने-फिरने लायक नहीं हैं?

कोई तो मिलता, जिसने उन्हें खिड़की के सिवा भी कहीं देखा होता? लेकिन यह पक्का जान लो कि इतना रोबीला और खुर्राट मर्द कहीं ढूंढे न मिलेगा। जरा घनघनाती बुलंद आवाज तो सुनो, ऐ साले, हरामखोर, चिरकुट! मगर लोगों के न चाहते हुए भी, जब शौक साहब की निशानेबाजी अपने शबाब पर थी, वह दिन आ गया जिसे कभी नहीं आना चाहिए था और जिसके बारे में किसी ने सोचा तक न था। एक मरियल सा सींकिया नौजवान, जो महीनों से गली में आ रहा था और कुर्ता और धोती लेते लोगों को देखा करता था। एक रोज एक घिनौनी हरकत कर बैठा। उसने ऐसे शख्श को, जिस पर पान की पीक बस गिरने-गिरने को थी, जाने किधर से दौड़कर धक्का मार दिया, वह आदमी लुढ़कता हुआ दूर जा गिरा और पीक मोरी के पानी में छपाक करके रह गई। उस वक्त भीड़ ने उसे सिर्फ बेइज्जत करके छोड़ दिया। लेकिन उसी नौजवान ने, जब यही हरकत अगले दिन भी की और किसी दूसरे आदमी के साथ, तो भीड़ का गुस्सा बढ़ गया. वह बर्दाश्त न कर सकी. उसने उसे दस पांच हाथ मारे और समझाया कि सब्र से काम लो, इतने लोग महीनों से लटके हुए हैं, मगर अब तक बारी नहीं आई और तू आनन-फानन में हथिया लेना चाहता है. उसने जैसे ही कुछ बोलने की कोशिश की कि भीड़ दोबारा उस पर टूट पड़ी.

छोड़ दो उसे। खिड़की से शौक साहब ने ललकार कर कहा, पहले इसी हरामजादे को कुर्ता धोती ले जाने दे! ...चल बे सामने आ.जब सामने आया...तो शौक साहब ने उसका पूरा-पूरा जायजा लिया. उसकी कद काठी का, हाथ-पांव का. सब कुछ ठीक-ठाक था. उमर का अंदा$जा नहीं लग पा रहा था, क्योंकि मूंछें तो पूरी तरह आ गई थीं, लेकिन दाढ़ी के बाल सिर्फ ठोढ़ी पर ही थे. चपटी और गांठ जैसी नाक के बावजूद वह आकर्षक था. जरा सी खटकने वाली बात महज यह थी कि उसकी आंखें ठंडी थीं, उनमें किसी तरह की भूख या लालच नहीं थी.अगर उसके कपड़े गंदे होते तो शौक साहब ने उसे भगा दिया होग, क्योंकि चिथड़े और मटमैले कपड़ों पर थूकने से उन्हें घिन आती थी और लोग इसे जानते भी थे.

हां, तो आ सामने। उन्होंने आसन बदला।और फिर उन्होंने उसे नचाना शुरू कर दिया। भीड़ ने यही देखा कि शौक साहब उसे नचा-नचाकर मार रहे हैं। उधर थूक ही नहीं रहे हैं, जिधर वह उछलकर खड़ा हो रहा है। अगर वे उसे कपड़े देना चाहते, तो जाने कब थूककर विदा कर दिया होता, लेकिन वे अभी बच्चू को पढ़ा रहे हैं, हां चल वे।शौक साहब को म$जा आ गया। एक मुद्दत लंबे इंत$जार के बाद उन्हें कोई मर्द का बच्चा मिला था, जिसने अपनी चुस्ती और चालाकी से उनकी निशानेबाजी को चुनौती दी थी।

शाम के वक्त जब नौजवान ने अपने कपड़े ठीक किए, माथे का पसीना पोंछा और हांफते हुए खिड़की की ओर अपना सिर उठाया, तो उसके छरहरे बदन का जायजा लेते हुए शौक साहब ने ऐलान किया, देख, मर्द की जबान एक। न इस खिड़की से मैं हटूंगा और न सड़क से तू. चाहे रात हो, चाहे दिन. न कोई खाएगा, न पियेगा, न आराम करेगा. अगर अब सिवा मेरे घोड़ों में जो तुझे पसंद आए, ले जा. उसे तांगे में जोत, चाहे बेंच खा. जैसी तेरी मर्जी.भीड़ ने जय-जयकार किया और कहा कि सरकार इस बददिमाग लौंडे पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो रहे हैं.मुझे कुछ नहीं चाहिए. नौजवान ने पांव बदलकर खड़े होते हुए कहा.अच्छा तो यह मजाल. शौक साहब ने निशाना साधा.पहली बार गली में दरवाजे, खिड़की, छत, बारजे, पेड़ पर बैठे या खड़े सारे आलम ने पहली बार इस सवाल-जवाब से महसूस किया कि यह कोई खेल-तमाशा नहीं, कुछ दूसरी ही बात है, क्योंकि यह लौंडा न गालियां दे रहा है, न रो रहा है, सिर्फ अपना बचाव कर रहा है, जबकि सरकार सचमुच ईमानदारी से सच्चे दिल से उस पर थूकना चाहते हैं. फिर भी उसे यह खल रहा था कि इस ससुरे को कपड़े-लत्ते और अब तो घोड़ा भी लेकर किनारे होना चाहिए और दूसरों को मौका देना चाहिए. इतने लोग अपना काम-धंधा छोड़कर इतनी देर से, इतने दिन से खड़े हैं, कुछ तो सोचना चाहिए.नौजवान कायदे से पीक के दायरे में ही था. उसके बाहर नहीं और इजाजत भी यही थी, तय हुआ था कि थूके जाने के वक्त बाहर से कोई भी इशारा नहीं करेगा और इसका भी सख्ती से पालन हो रहा था. शौक साहब उसके गाफिल होने या झपकी लेने या थकने का इंत$जार करते और औचक हमला बोल देते.

नौजवान का पूर्वानुमान अद्भाुत था. वह बाएं या दाएं घूमते-घूमते उछलकर आगे या पीछे खड़ा हो जाता. कभी-कभी तो बेमतलब घंटे भर पीक की प्रतीक्षा करनी पड़ती, लेकिन मौके के समय सहसा झुककर या उछलकर अपने चौकन्नेपन का सबूत दे देता.यह सारा कुछ जितना उबाऊ और बोर था, उतना ही तनावपूर्ण भी, लेकिन वाह रे शौक साहब! वे ऊपर अपनी खिड़की के पास, बैठे-बैठे खा भी सकते थे, पी भी सकते थे. सो भी सकते थे. नीचे से कौन देखता है? और देखना भी चाहे तो किसे दिखाई पड़ेगा? लेकिन नहीं, नियम तो नियम राजा हो या रंक, वे सुस्त पडऩे लगे और इधर सुबह होने लगी. छोकरे! उन्होंने सूरज उगते-उगते अगला ऐलान किया, हालांकि आवाज थोड़ी मद्धिम और कमजोर थी. मैं तेरी हिम्मत और दिलेरी से खुश हूं. चाहता तो यही था कि तू राजी खुशी अपने घर जा, बीवी बच्चों से, मां-बाप से मिल. उन्हें घोड़ा दिखा, उनके साथ जश्न मना, लेकिन लगता है, तुझे मंजूर नहीं. अच्छा जा, अगर आज भी बच गया तो नौलखा हाथी तेरा. फीलवानी कर, चाहे बेचकर अपनी और अपनी दस पीढिय़ों की किस्मत बना.नौजवान लड़खड़ा रहा था, जैसे होश में न हो. उसने अपनी बेकाबू होती जुबान में कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए.फिर साले, किसलिए मर रहा है? भीड़ गालियां देती हुई उसे पीटने के लिए लपकी, लेकिन पहले से ही उसके सिर पर उसकी रक्षा में शौक साहब के नौकरों-चौकरों की तनी हुई लाठियां देखीं, तो आश्वस्त होकर अपनी जगह खड़ी हो गई.खबरदार, शौक साहब ने ऊपर डपटकर सबको हटाया और खिड़की से होठों को बंदूक की नली बनाकर सधी हुई पीक मारी.नौजवान उछला, खड़ा होते-होते गिरा, मगर बच गया.शौक साहब झुंझला उठे. उनका चेहरा तमतमा उठा. नथुने फड़कने लगे. उनका गोरा-चिट्टा रंग तांबे जैसा हो गया. हमेशा मुस्कुराते रहने वाले दयालु सरकार का यह भयानक रूप किसी ने देखा नहीं था. इसके बाद ही उन्होंने अविराम निर्णायक युद्ध की घोषणा कर दी.
क्रमश:

Sunday, August 16, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी


काशीनाथ सिंह
लड़ाइयां ढेर सारी लड़ी गईं वीरों की इस धरती पर और धरती पर ही क्यों, पानी पर भी और आसमान में भी, यहां तक कि घर-घर में. चाहे वह राजपूतों का जमाना रहा हो, चाहे मुगलों का, चाहे अंग्रेजों का, लेकिन गली में लड़ाई केवल एक लड़ी गई है और वह भी इस नगर में, यह उसी लड़ाई की दास्तान है।
देश को आजाद हुए, मुश्किल से चार-पांच साल हुई थे, उन्हीं दिनों इस गली में कोई खानदानी रईस रहते थे, जिनका नाम राणा से शुरू होता था और चंदेल पर जाकर खत्म होता था. इतने लंबे नाम से उन्हें कोई नहीं जानता था, लोग जानते थे उनके तखल्लुस शौक से. उन्हें इस बात का बखूबी इल्म था कि उर्दू के जितने भी बड़े-बड़े शायर वगैरह हुए हैं, ज्यादातर के तखल्लुस दो हर्फों के रहे हैं-मसलन मीर, सौदा, जौक, जोश, वगैरह. इसी की देखादेखी जब उन्होंने शायरी शुरू की थी तो अपना नाम शौक रखा था और यह नाम और कहीं चला हो या न चला हो, कोठे पर खूब चला. लेकिन जब उम्र के साथ-साथ यह शौक छूटा तो उन पर ऐसा शौक चढ़ा जिसने उनकी शोहरत देश के कोने-कोने तक फैलाई. जिसे देखो, वही उसी गली की तरफ चला जा रहा है, जिधर शौक साहब का गरीबखाना है।
शौक साहब चार मरातिम वाली अपनी कोठी में तीसरी अंटारी की उस खिड़की के पास बैठे रहते थे, जो गली की तरफ खुलती थी. उनके पास सारा कुछ था लेकिन सब उनके लेखे माटी के मोल था. हाथी था, लेकिन चढ़ते नहीं थे. घोड़े थे लेकिन दौड़ाते नहीं. बग्घी और कार भी थी, लेकिन हुआ करे. यह सारा कुछ इसलिए था कि रईस कि पास होना चाहिए. ये सब कोठी के पिछवाड़े वाले बगीचे में, जहां नौकरों-चाकरों के लिए दड़बे बने हुए थे, पड़े-पड़े चिंग्घाड़ा या हिनहिनाया करते थे. कहीं दूर देहात में उनके सैकड़ों एकड़ के फार्म भी थे, जिनमें अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन शौक साहब को इन सबसे नहीं, सिर्फ पान, कत्था, सुपारी और चूने से मतलब था.शौक साहब जिस खिड़की के पास बैठते थे, उसके बगल में चांदी की पन्नियों में लिपटी पान की गिलौरियों से एक तश्तरी सजी रहती, जिसमें महंगी से महंगी खुशबूदारी जर्दे की डिब्बियां पड़ी रहतीं. वे मूड के मुताबिक गिलौरी और तंबाकू मुंह में डालते, देर तक तबियत से घुलाते और ताक-तूककर खिड़की के बाहर गली में थूक मारते.जब भी उनकी पीक खिड़की के बाहर आती, किसी न किसी के सिर और कपड़ों पर पड़ती. इतिहास बताता है कि मुंह का ऐसा सटीक निशानेबाज इस नगर में कभी नहीं हुआ. कहने वाले तो कहते हैं कि कभी-कभी लोग उनके अचूक निशाने का इम्तिहान लेने के लिए नीचे से इकन्नी या अधन्नी उछालते थे, लेकिन जब वह टनटनाती हुई सड़क पर गिरती थी, तो पीक में भीगी न$जर आती थी.तो जिस आदमी के कपड़े-कुरता और धोती लाल होते, उस पर होने वाली प्रतिक्रिया शौक साहब बड़े गौर से देखते क्या वह बाएं-दाएं ताककर चुपचाप निकल जाना चाहता है? क्या वह खिड़की की ओर सिर उठाता है, भुनभुनाता या उन्हें कोसता है? और अंत में कपड़े झाड़कर चल देता है? ऐसे शरीफ और कायर किस्म के आदमियों से उन्हें घिन आती और बची-खुची पीक की सिट्टी पीकदान में थूक देते. उन्हें ऐसे बहादुरों की तलाश रहती, जो कपड़े खराब होते ही मां-बहन की धुआंधार गालियां बकना शुरू करें, उछलें-कूदें, आसमान सिर पर उठा लें, रो-रोकर मोहल्ले और राह चलतों को अपना इर्द-गिर्द जुटा लें, फिर बिलखें-बिलबिलाएं और दया की भीख मांगते हुए, इंसाफ का वास्ता देते हुए बताएं कि अब वे क्या पहनेंगे, उनका क्या होगा?ऐन इसी वक्त, जब वे माथा पीट-पीटकर ऊपरवाले की गालियां दे रहे होते, उसी कोठी से दो नौकर निकलते और आदर के साथ उस ऊपर ले जाते, उसे चंदन के साबुन से मल-मलकर नहलाया जाता, नया कुरता और नई धोरी पहनाई जाती, इत्र से शरीर को सुवासित किया जाता, अच्छा से अच्छा खाना खिलाया जाता और अंत में उसे हाथी या घोड़े पर जो उसके लिए सपना होते-बिठाकर गली के नुक्कड़ तक विदा कर दिया जाता.ऐसे मेहमानों को पाकर नाम गांव-नगर के बाहर दूर-दूर तक पहुंचने लगा. लोग हर जगह चर्चा करते कि गरीब निवाज की एक कोठरी धोतियों से भरी हुई है और दूसरी अद्धी और तांजेब के कुरतों से. बरामदे में बराबर दो-तीन दर्जी सिलाई का काम करते रहते हैं।
इन खबरों का अंजाम यह हुआ कि लोग तरह-तरह की गालियां सीखते, रोने-कलपने की आदत डालते और फिर गली का चक्कर लगाना शुरू कर देते. पता नहीं, कब सरकार का मन बन जाए और थूक बैठें.लिहाजा अपने पर थुकवाने वालों की जो भीड़ बढऩी शुरू हुई, उसका कोई अंत नहीं था.लेकिन साहब, तारीफ कीजिए शौक साहब की, पीक की तरह उनकी नजर भी अचूक थी. आप दो चार दिन तो क्या महीनों तक उस गली में टहला कीजिए वे आप पर नहीं नहीं थूकेंगे, सो नहीं थूकेंगे. वे उस आदमी को उसकी चाल से पहचान लेते हैं-एसी काबिलियत किस शख्स में है? कौन गालियां देते-देते रो सकता है? यही नहीं, कोई लाख अनजान बनकर खिड़की को अनदेखा करते हुए नीचे से गुजरने की कोशिश करे, वे समझ जाते कि अभी कितने रोज या हफ्ते या महीने पहले यह कम्बख्त सुअर, अपने पर थुंकवा चुका है? कभी-कभी तो, जब बर्दाश्त के बाहर हो जाता, झल्लाकर बोल भी पड़ते, अबे हरामखोर, अभी महीना भी नहीं बीता कि फिर आ पहुंचा? या तैं कैसे आ गया रे? मैंने क्या कहा था? तेरे को ठीक से गालियां भी नहीं आतीं? आ गईं क्या? या अरे, यह कौन है चिथडू का बाप, ससुर नहीं तो! मैंने कोई ठेका लिया है तेरे घर-भर का. भाग यहां से.कुछ दिन तक तो कई ऐसे लोग भी जो कभी घरानेदार थे, लेकिन वक्त की मार से खस्ताहाल हो रहे थे, पगड़ी के नीचे अपना चेहरा छिपाए और सिर झुकाए उसी गली से गुजरते और पीक की उम्मीद में खिड़की के नीचे पहुंचते ही अपनी चाल धीमी कर देते. शौक साहब की पकड़ में आ जाते और वे बेमुरौव्वत होकर टोक देते, क्यों मुझे नरक में ठेल रहे हो महाराज. मैं तो ऐसे भी कुरता धोती दे देता. लेकिन क्या करूं अपने कौल से हारा हूं. या बस करो बाबू साहब. गालियां तो दे लोगे मगर रो कैसे पाओगे? आदत तो डाली नहीं. और खामखाह ऊपर से मुझे बदनाम करोगे कि शौक अपनी ही जात पर थूंकता है.इस तरह शौक साहब ने जनता को अहसास करा दिया कि उनकी पीक के सच्चे हकदार कौन हैं?
क्रमश...

Thursday, August 13, 2009

काशी कक्का की कहानियां

बचपन की यादों में बाकी स्मृतियों की तरह एक स्मृति जो जमकर बैठी है वो है अलाव. मुझे रात का खाना खाने की जल्दी सिर्फ इसलिए होती थी कि खाने के बाद अलाव का माहौल बनता था. अलाव के इर्द-गिर्द लोगों का जमावड़ा. शुरुआत कुछ गप्पबाजी से होती लेकिन हम बच्चों के इसरार के आगे जल्दी ही बड़े लोग झुक जाते और उनकी गाड़ी कहानियों के ट्रैक पर लौट आती. रोज एक से एक कहानियां. ऐसा रोचक संसार, ऐसी-ऐसी फैंटेसी कि ठंड की वे लंबी रातें न जाने कब बीततीं, पता भी न चलता. डांटे कौन, डांटने वाले खुद कहानियों के संसार में गोते लगा रहे होते थे. कई बार नींद हमें उड़ा ले जाती और हमारी कहानियां अधूरी रह जातीं. सुबह उठते ही हम घूम-घूमकर उन लोगों का सर खाते जो रात में अलाव पर थे. उसके बाद क्या हुआ...राक्षस ने क्या किया...क्या राजा मर गया...राजकुमारी ने अपनी जान कैसे बचाई...वगैरह.

आज बचपन का वही मंजर जैसे फिर से लौट आया था. मौका था काशीनाथ सिंह और अखिलेश की कहानियों के पाठ का. यूं कभी-कभार कहानी पाठ सुने हैं मैंने लेकिन आज माहौल बड़ा अपना-अपना सा लगा. हालांकि अलाव कहीं नहीं था. न उसके आसपास चाचा, ताऊ, बाबा, दादा थे. फिर भी न जाने क्यों कहानियां, उनके कहे जाने का ढंग और सैकड़ों की संख्या में वाल्मीकि रंगशाला के एयरकंडीशंड हॉल में बैठे लोग वैसे ही लग रहे थे. उनकी तन्मयता भी वैसी ही थी. बीच-बीच में हुंकार जरूर नहीं लग रही थी. लेकिन कहानियों के मूड के साथ आते लोगों के रिएक्शंस हुंकार से ही लग रहे थे. मुझे याद है कि जब नाना कहानी सुनाते थे और कोई हुंकार न लगाये तो वो बहुत नारा$ज हो जाते थे. आज वो हुंकारे भी याद आ रहे थे.

इस अपने से माहौल में जिसे साझी दुनिया ने रचा था कहानियों का रंग जमना ला$िजमी थी. कुछ कहानियों की मजबूती और कुछ उनके कहे जाने का ढंग पूरे माहौल को खुशनुमा बना रहे था. अखिलेश की कहानी अंधेरा में सांप्रदायिक दंगों के बीच प्रेम को बचाने की कोशिश का चित्रण था. धर्म कई बार सर उठाता और कई बार किनारे पड़ा न$जर आता है. सांप्रदायिक ताकतों से प्रेम को बचाने की कोशिश करते युवक की बेबसी कई सारे सवाल छोड़ती है. कहानी में कथ्य के साथ बिम्ब और रूपकों का सुंदर चित्रण है. काशीनाथ जी ने इस मौके पर दो कहानियां पढ़ीं. पहली कहानी बांस और दूसरी इस सदी का सबसे बड़ा आदमी. इन दोनों कहानियों को भी वहां बैठे लोगों ने मंत्रमुग्ध कर लिया. इस सदी का सबसे बड़ा आदमी ने जहां पूरे माहौल को बेहद हल्का-फुल्का बनाते हुए किस्सागोई का पूरा लुत्फ दिया वहीं समाज के विद्रूप चेहरे को बेनकाब भी किया.

इस कहानी पाठ का असर है या कहानियों को सहेज लेने का लालच कि काशी जी से उनकी किताब मांगने को लोभ संवरण कर पाना मुश्किल ही था. अपनी चिर परिचित सहजता और स्नेह के साथ उन्होंने किताब सौंपी तो तसल्ली हुई. उनकी कहानी इस सदी का सबसे बड़ा आदमी अगली पोस्ट में यहीं दिखेगी.
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना!

Saturday, August 8, 2009

फासले- मरीना त्स्वेतायेवा

फासले..., कोसों, मीलों लम्बे...
हमें अलग किया गया,
भेजा गया बहुत दूर
ताकि चुपचाप जीते चले जाएं हम
पृथ्वी के दो अलग-अलग हिस्सों में।
फासले..., कोसों, मीलों लम्बे...
उखाड़ा गया हमें,
पटका गया इधर-उधर
बांधे गये हाथ,
ठोंकी उन पर कीलें
पर मालूम नहीं था उन्हें
अंत:करण और धड़कती नसों का...
किस तरह होता है मिलन...
अनुवाद: डा: वरयाम सिंह

Thursday, August 6, 2009

रात भर

रात भर एक ख्याल सुलगता रहा
रात भर एक रिश्ता आंखों में पलता रहा
रात भर मन मोम सा पिघलता रहा
और रात पूरी उम्र में ढलती रही...

Sunday, August 2, 2009

जन्मदिन हमारा शुक्रिया आपका !

किसी रोज बातों-बातों में यूं ही कहा था कि काश कोई ऐसी दुनिया होती जहां सुंदर कविताएं, संगीत, प्यारी बातें, सारे मौसम, पूर्णमाशियां सारी, समंदर, पंक्षी, ढेर सारी आजादी और वो सब कुछ हो जो मुझे पसंद हो. जहां कोई नियम नहीं, कोई रोक-टोक नहीं. क्या होता भला उस दुनिया का नाम बूझो तो?
प्रतिभा की दुनिया और क्या. वह छोटा सा संवाद ब्लॉग बन गया. कुछ दोस्तों ने एक सुंदर सा ब्लॉग प्रतिभा दुनिया के नाम से बनाकर तोहफे में दिया. इस तरह प्रतिभा की दुनिया बन गई. फिर सवाल कि इस दुनिया में हो क्या? क्योंकि इस पर कोई योजनाबद्ध ढंग से काम तो हुआ नहीं था. और क्यों भला मैं अपनी दुनिया सार्वजनिक करूं. क्यों बताऊं लोगों कि मुझे फलां कविता बहुत प्रिय है. मैं बता भी दूं तो भला कोई क्यों सुने मुझे. इन्हीं सब उहापोह के बीच यह सफर शुरू हुआ. लेकिन दोस्तों ने ब्लॉग बनाने तक ही साथ नहीं निभाया लिखवा लेने का भी जिम्मा उठाया. जिस दिन पोस्ट न डालूं फोन आ जाते, मेल आने लगतीं कुछ तो लिखिये. साथियों ने हौसला दिया तो वरिष्ठजनों ने रास्ता दिखाया, बताया कि यह तुम्हारी दुनिया है इसके प्रति उदासीनता ठीक नहीं है. धीरे-धीरे ब्लॉग की दुनिया के नये दोस्त भी उत्साहवद्र्धन में शामिल होने लगे. हैरत होती मुझे कि किसी के लिखे का कोई इंत$जार भी कर सकता है. मुझे अपने लिखे को लेकर कोई मुगालता, कभी नहीं रहा. मुझे खुद पर यकीन रहा हो, न रहा हो लेकिन दोस्तों ने, गुरुजनों ने यह यकीन कभी नहीं छोड़ा. उनका यकीन ही मेरा लेखन है. आज मुड़कर देखती हूं तो पाती हूं कि पूरे एक साल से यह दुनिया बाकायदा आबाद है. कोई आंधी नहीं, कोई तूफान नहीं, कोई रुकावट नहीं. ढेर सारे साथी फॉलोअर्स के रूप में जुड़े हैं और टिप्पणीकर्ताओं के रूप में भी. आज प्रतिभा की दुनिया के जन्मदिन के मौके पर उन सबके प्रति आभार जिन्होंने हर मौके पर मेरा उत्साह बढ़ाया, लिखने के सिलसिले को रुकने नहीं दिया और मुझमें विश्वास बनाये रखा. उनका यह विश्वास ही मेरी ताकत है.

Friday, July 31, 2009

प्रेमचंद- उन अक्षरों का शुक्रिया

यूं तो मुंशी प्रेमचंद जीवन के तमाम मुश्किल वक्त में किसी न किसी बहाने हमारा हाथ थामे रहते हैं. लेकिन आज उन्हें याद करना, अब तक के हासिल को सहेजकर रखने का निश्चय भी है.

जिन शब्दों ने $िजंदगी के अर्थ समझाये. जिन अक्षरों से गुजरते हुए जाना कि शब्दों का अस्तित्व उनके आकार में नहीं उनके गहरे अर्थ में, भाव में होता है। उन अक्षरों को गढऩे वाले मुंशी प्रेमचन्द के जन्म का यह दिन मेरे लिए हमेशा महत्वपूर्ण होता है. न कोई गोष्ठी, न सेमिनार, न भाषण, न खबर बस दिल के किसी कोने में आत्मीयता का सा अहसास होता है. आभार में वे सारी पुस्तकें याद आती हैं जिन्होंने बेहद कम उम्र में हाथ थामा था. कुछ के अर्थ तो बाद में ही समझ पाई थी. लेकिन वो नासमझ यात्राएं भी $जाया नहीं गईं. वो 'मानसरोवरÓ में डुबकी लगाना अब तक याद है. अब भी जब कभी भीगने का मन करता है तो प्रेमचन्द का 'मानसरोवरÓ ही याद आता है.

आज समय बदल चुका है, हालात एकदम पहले जैसे नहीं रहे, न समस्याएं वैसी रहीं न उनसे जूझने के तरीके वैसे रहे फिर भी प्रेमचन्द की कहानियां पूरी सामयिकता के साथ हमारे सामने खड़ी हैं। जैसे इन बदले हुए हालात को उन्होंने बहुत पहले ही समझ लिया था. यही अच्छे साहित्य की खासियत है. पूरी सच्चाई, ईमानदारी के साथ लिखा गया हर वाक्य सदियों तक लोगों की मदद करता है. आज कोई भी हिन्दी भाषी खुद को प्रेमचंद से अछूता नहीं पाता है. कहीं 'ईदगाहÓ के रूप में तो कहीं 'क$फनÓ के रूप में. तात्कालिकता साहित्य में दिखती है लेकिन वह तात्कालिकता भविष्य की राह भी दिखाती है. वह आगे आने वाले समय के साथ जुड़ती चलती है.

उन्हें याद करने के लिए आज का दिन सिर्फ बहाना भर है क्योंकि उनके शब्द हर मोड़ पर हाथ थामकर चलते हैं। कभी-कभी सोचती हूं कि कितना आसान था उनके लिए सब कुछ कह पाना. सीधी, सरल, सच्ची अभिव्यक्तियां. एकदम सहज किरदार. घटनाएं जैसे हमारे ही जीवन की हों. उनकी कहानियां अपने पाठकों का हाथ पकड़कर अपने अंदर ले जातीं और न जाने कितनी यात्रायें करातीं जीवन की. शब्दों की सच्ची संवेदनाओं से ही गढ़ी जा सकती हैं ऐसी सच्ची रचनाएं. कोई गढ़ी गई कलात्मकता भी नहीं, झूठ-मूठ के प्रयोग भी नहीं बस जीवन वैसे का वैसा जैसा वो होता है.

यह शॉर्टकट का दौर है। जल्दी से जल्दी सब कुछ सीख लेने का दौर है. जल्दी से जल्दी सब कह देने का दौर है. जल्दी से जल्दी सफलता के ऊंचे पहाड़ चढ़ लेने का दौर है. क्रिएटिव राइटिंग इन दिनों कक्षाओं में सिखाई जाती है. गुरू खुद शिष्यों के पास आते हैं कि बेटा कुछ सीख लो. समय है इन बेशकीमती सलाहों को समझने का. खुशकिस्मत है आज की युवा पीढ़ी जिसने ऐसे वक्त में जन्म लिया जब राहें उतनी मुश्किल नहीं रहीं. किसी भी फील्ड में नये लोगों को खूब प्रोत्साहन मिलता है. पत्र-पत्रिकाओं की कमी नहीं है. युवा विशेषांकों की भी कमी नहीं है. ऐसा प्रवाह सबको नहीं मिलता.
यह समय है उन सारी चीजों के प्रति आभारी होने का जो हमारी राहें आसान करती हैं।

यह समय है उन अक्षरों का शुक्रिया अदा करने का जो जीवन के अर्थ समझाते हैं. यह समय है जीवन से खत्म हो रही आस्थाओं को सहेज लेने का और रचनात्मकता के नये आयाम गढऩे का. महसूस करने का उस ऊष्मा को जो इन अक्षरों से अब तक मिलती रहती है. यह समय है इस मिले हुए को व्यर्थ न जाने देने का भी।
(आज आई नेक्स्ट में प्रकाशित )

Tuesday, July 28, 2009

आदतन हमने ऐतबार किया

सब्र हर बार अख़्ितयार किया
हम से होता नहीं, ह$जार किया

आदतन तुम ने कर दिये वादे
आदतन हमने ऐतबार किया

हमने अक्सर तुम्हारी राहों में रुक के
अपना ही इंत$जार किया

फिर न मांगेंगे जिंदगी या रब
ये गुनाह हमने एक बार किया।
- गुलज़ार

Friday, July 24, 2009

इंतजार


नदियों ने छोड़ दिये रास्ते,
पहाड़ों ने मंजूर कर लिया पीछे हटना,
फूलों ने सीख लिया टहनियों पर ठहरना,
हवाओं में दाखिल हो गई शाइस्तगी
सेहरा सारे पानियों से भर गये,
आंखों में उतर आये अनगिनत सपने,
मेरी ही तरह इन सबको भी हुआ है
वहम उनके आने का...

Tuesday, July 21, 2009

अपने लिए

सूरज से चंद किरनें ली उधार. फूलों से ली खुशबू $जरा सी. गुरुओं से लिया आर्शीवाद, किताबों से एक नाता चुना, दोस्तों की शुभकामनाएं, आंखों में ढेर सारे सपने, हौसले थोड़े और जिंदगी के साज पर बज उठा एक राग मेरे होने का. यही तो था वो दिन जब हमने जन्म लिया लेकिन इस जन्मे को सार्थकता देना बाकी है अभी...आधी-अधूरी मुस्कुराहटों के नाम ही सही आज का दिन।

Sunday, July 12, 2009

बूंदों की साजिश

हवाएं रोज दरवाजा थपथपातीं। बादल का कोई न कोई टुकड़ा रोज बड़े ही करीब से होकर गुजर जाता. लगता कि अभी, बस अभी पकड़ लूं इसे. आसमान के सारे नल खोल दूं. निचोड़ ही लूं बारिश की हर बूंद. लेकिन बादल तो रूठे हैं...वे यह तो संदेशा भेजते हैं कि उनका दिल भी है बेसब्र है मिलने को लेकिन नाराजगी जो है उसका क्या करें...? धरती की मनुहार कम ही थी शायद, या बादलों का गुस्सा कुछ ज्यादा ही. धरती को बादलों के बरसने का जितना इंतजार था, उससे कम बेसब्री नहीं थी बादलों में बरसने की. धरती का एक-एक कोना भिगोने को व्याकुल बादल. बूंदों के आगोशमें धरती को समेटने का सुख सिर्फ बादलों के हिस्से ही तो आया है।

दोनों की इसी बेसब्री को खत्म करने का जो समय कुदरत ने नियत किया वही था बरसात का मौसम. सालहा इंत$जार. एक-एक बूंद जमा करते बादल और एक-एक लम्हे को इंत$जार के जवाहरात से सजाती धरती. लेकिन ये घड़ी भी अजीब है...गुस्सा पिघलता ही नहीं. बादल धरती के आसपास ही घूम रहे हैं...उनकी बेसब्री देख लगता कि दोनों हाथों से पकड़ ही लें उन्हें जाने न दें. चलो, कान ही पकड़ लेते हैं...अब न होगी कोई गलती धरती ने फुसफुसा कर कहा।

वैसे गलती क्या...उफ, इससे क्या फर्क पड़ता है? कोई भी नारा$ज हो, कोई भी बात हो कोई भी कान पकड़ सकता है, माफी मांग सकता है. है ना? धरती मंद-मंद मुस्कुरायी. बादलों ने गुस्से में ही सर घुमा लिया. गुस्से में एक भोली सी मुस्कान भी आ मिली थी. धरती को हंसी आ गई. वह जानती थी बादलों का गुस्सा. वह मानने को बेकरार है लेकिन क्या करे गुस्सा भी तो है ना।
धरती ने अपनी प्यास दिखायी... अपने $जख्म दिखाये...कान पकड़े...माफी मांगी...कहा, आ जाओ अब. बरस भी जाओ. बादलों ने बरसने से इंकार कर दिया. अपनी अकड़ पर कायम रहे...लेकिन धरती के $जख्म देखकर आंसू की कुछ बूंदें चमक ही उठीं बादलों की कोरों पर. वही आंसुओं की बूंदें आज हमारे शहर पर मेहरबान हुईं. बारिश एक झोंका शहर को भिगो गया।
उम्मीद है बादलों की नारा$जगी पिघलेगी और तरसती धरती तरबतर हो जायेगी...
चल नहीं पायेगी बूंदों की साजिश....

Saturday, July 11, 2009

मैंने चुना प्रेम



मालूम था
क्या होती है प्रतीक्षा,

कैसा होता है
दु:ख अवसाद, अंधेरा,
किस कदर

मूक कर जाता है
किसी उम्मीद का टूटना,
फिर भी मैंने चुना प्रेम!

Tuesday, July 7, 2009

सावन के बहाने

सुबह-सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई. उनींदी आखों से दरवाजा खोला तो हैरान रह गई. उम्मीदों भरी टोकरी में यादों के सिलसिले...हरियाली में डूबी पूरी कायनात, तन ही नहीं मन को भी भिगोती बूंदों की सौगात लिये जो शख्स खड़ा था उसका चेहरा जाना-पहचाना तो बिलकुल भी नहीं लगा. लेकिन ये जो भी था, न जाने क्यों मुझे अच्छा लग रहा था।
मैंने पूछा तुम कौन?
तभी बूंदों का सैलाब मुझे भिगो गया।
जवाब मिल चुका था. ये सावन था. मेरी जिंदगी में ऐसा सावन पहले कभी नहीं आया था।
ऐसा भी नहीं कि सावन के झूलों का मुझे अहसास न हो, ऐसा भी नहीं कि बूंदों ने मुझे पहले कभी भिगोया न हो. न ही ऐसा था कि मुझे सारे जहां में ऐसी हरियाली कभी न दिखी हो. अब तक यह सब आंखों से देखा था. बूंदों ने तन को ही छुआ था. लेकिन इस बार यह मौसम एक खुशनुमा अहसास बनकर भीतर तक दाखिल हो गया है।

कैलेण्डर बदलने से महीने बदलते हैं मौसम नहीं बदलते. मौसम अपनी मर्जी से बदलते हैं. ये मौसम हमारी जिंदगी में भी बदलें इसके लिए हमें अपने मन की दुनिया के उन दरवाजों को खोलना होगा, जो कबसे बंद पड़े हैं. चारों ओर देखती हूं तो सावन एक उत्सव के रूप में लोगों की जिंदगी में छाया हुआ है. कहीं तीज तो कहीं राखी की तैयारी. कहीं झूले तो कहीं रेन डांस. रिमझिम बूंदों के बीच गर्मागरम पकौडिय़ां और चाय का मजा. दोस्तों केसाथ पुरानी जींस और गिटार...गाते हुए कॉलेज के दिन याद करना, या सचमुच कॉलेज की कैंटीन में टेबल थपथपाकर कुछ भी गुनगुनाना जारी है. अगर कम शब्दों में कहें तो सावन को मुस्कुराहटों का मौसम कहा जा सकता है।

मेट्रो सिटीज में सावन उस तरह तो बिलकुल नहीं आता, जैसा गांव या कस्बों में आता है. या अब तो शायद गांवों में भी वैसा सावन नहीं आता. अब कोई लड़की नहीं गाती कि अम्मा मेरे बाबुल को भेजो री....कि सावन आया....सावन. अब मायका उतना भी दुर्लभ नहीं रहा कि वहां जाने के लिए सावन का इंतजार करना पड़े या बाबुल, भैया के आने का इंतजार करना पड़े. लड़कियां खुद बगैर बाबुल या भैया के संदेश के कार या स्कूटी ड्राइव करके मायके जा धमकती हैं. यह भी जरूरी नहीं कि वे भैया के तोहफों का इंतजार करें, अब वे भैया के लिए तोहफे लेकर भी जाती हैं. यानी अब मांगना नहीं, बांटना है, तोहफे, प्यार और एक-दूसरे के साथ होने का अहसास. त्योहारों में एक साझापन आ चुका है।

पहले मुझे हमेशा लगता था कि मौसम सबके लिए एक से क्यों नहीं होते. सबकी जिंदगी में इनका असर अलग क्यों होता है. अब समझ में आता है कुदरत भेद नहीं करती, हम खुद करते हैं. हम अपने आपको आवरणों में कैद करके रखते हैं. मुक्त नहीं करते. यही कारण है कि खुशियां, मौसम, सुख हमारे आसपास होकर भी हमसे दूर ही रह जाते हैं. हम उनकी ओर हाथ बढ़ाना ही भूल जाते हैं.मेरी एक दोस्त है. इंडिया छोड़े उसे आठ बरस हो गये। अमेरिका में रहते हुए उसे इंडिया के सारे मौसम, सारी तिथियां, सारी पूर्णमासियां याद रहती हैं. मुझे याद है पिछले बरस की उसकी वो बेसब्र सी आवाज, जब उसने फोन पर कहा था, यार, यहां तो बारिश ही नहीं हो रही है. वहां का सावन कैसा है? वहां तो खूब बारिश हो रही होगी ना? मैं सच कहती हूं उसके फोन करने से पहले तक मुझे सावन का ध्यान ही नहीं था। आज मैं दावे से कह सकती हूं कि उसकी जिंदगी में सावन बहुत पहले आ चुका होगा।

अगर आपकी जिंदगी में कोई मौसम एक बार दाखिल हो जाए तो वह वापस नहीं जा सकता. फिर आप दुनिया के चाहे जिस कोने में हों. हमें इन मौसमों को अपनी जिंदगी में आने देने का हुनर सीखना होगा. उम्मीद करती हूं हम सबकी जिंदगी में इस बार जो सावन आये उसकी महक, उसकी हरियाली, उसका मन को भिगो देन वाला स्पर्श हम सब महसूस कर सकें, जिंदगी की तमाम आपाधापियों के बावजूद. यह सावन किसी की याद में नहीं, साथ में बीते और ता-उम्र इसकी खुशबू बरकरार रहे.....
- प्रतिभा
(राजा रवि वर्मा की पेंटिंग मोहिनी झूला झूलते हुए )

Saturday, July 4, 2009

एक दिल बच गया है साबुत

हमने भी विदा कर दिया प्रेम
रुखसत कर दीं ख़ुद को टटोलने की
कोशिश करती बातें
ख़ुद पर से उतार दिया चांदनी का जादू
यह सफर यहां खत्म होता है

अब एक नाव तट से बंधी खड़ी है
एक आदमी कहीं पगडंडियों में खो गया है

पर, एक दिल बच गया है साबुत

कितना कुछ नष्ट होने के बाद भी
एक तपिश कहीं बची रही गयी है
शायद, कम ही जानते थे हम भी
गमे इश्क को।

दुख, प्रेम और समय

बहुत से शब्द
बहुत बाद में खोलते हैं अपना अर्थ

बहुत बाद में समझ में आते हैं
दुख के रहस्य

खत्म हो जाने के बाद कोई संबंध
नए सिरे से बनने लगता है भीतर
...और प्यार नष्ट हो चुकने
टूट चुकने के बाद

पुनर्रचित करता है खुद को
निरंतर पता चलती है अपनी सीमा
अपने दुख कम प्रतीत होते हैं तब
और अपना प्रेम कहीं बड़ा...
- आलोक श्रीवास्तव

Wednesday, June 24, 2009

मत बुझाओ इंतजार का चांद

तिथियों की गणना के हिसाब से तो पूर्णमाशी थी उस रोज लेकिन चांद न जाने कहां गुम था। हवाओं ने जिस्म को सहलाया तो महसूस हुआ कि हवाओं में भी तिथियों की वही गणना है जो ज़ेहन में। कैलेंडर-वैंलेंडर की बात नहीं है। दिल की बातें और वही हिसाब-किताब। न एक रत्ती कम, न एक रत्ती ज्यादा।

इंतजार की गहरी पीड़ा से डूबे, रचे-बुने एक-एक लम्हे की कीमत सोने या हीरे से कम भी तो नहीं होती। इसलिए पक्के सुनार की तरह हर लम्हे का सही-सही हिसाब रखना होता है. एक अनकहा वादा था दोनों के बीच कि पूर्णमाशी का चाँद साथ देखेंगे हमेशा. उस रात की सारी हवाओं को एक साथ पियेंगे. जख़्मों को खुला छोड़ देंगे कि हवा ही लगे कुछ. तो ये कौन सी अमावस आ गई है, जिसने तिथियों का हिसाब-किताब बिगाड़ दिया।

देखो, उस पगली को लालटेन लेकर ढूंढ रही है अपने ख्वाब का चांद...