Wednesday, April 29, 2020

दुःख सबको मांजता है


स्कॉटलैंड की सडकों पर घूमते हुए मिली थी वह स्त्री. वो शदीद दुःख से भरी थी. उसने हाल ही में अपना बच्चा खोया था. वो खाली बच्चा गाड़ी के पास उदास बैठी थी. हम सड़कों पर यूँ ही घूम रहे थे. हम दोनों एक दूसरे के लिए अनजान थे. उसने भीगी पलकों से मुझे देखा और मुस्कुरा दी. मैंने उसके चेहरे पर दुःख, शांति और अपनेपन की मिली जुली छाया देखी. उस स्त्री की उस भीगी हुई मुस्कुराहट ने मुझे आज तक थाम रखा है. दुःख बहुत गाढ़ी चीज़ होता है. यह हम सबको मांजता है, ज्यादा मनुष्य होने की तरफ प्रेरित करता है. हाथ थामता है, अपनेपन से भर देता है. आज पूरी दुनिया एक से दुःख, एक से भय और पीड़ा से गुजर रही है. लेकिन क्या हम ज्यादा अपनेपन से भर उठे हैं. क्या हमारे रिश्ते पहले से ज्यादा मीठे हुए हैं? क्या हमने उन्हें जी भरके याद किया जो हमसे नाराज हुए बैठे हैं, क्या हमने अपने तमाम पूर्वाग्रहों को छोड़, तमाम गिले शिकवे भुलाकर लोगों को अपनेपन से भर दिया है?

हम ऐसे हालात में हैं जिसकी किसी ने कल्पना में भी कल्पना नहीं की थी. हममें से किसी को कुछ पता नहीं है कि क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए. ये किसी को की जद में दुनिया भर की सरकारों, डाक्टरों समेत हर व्यक्ति आता है. मैं भी आती हूँ, इसे पढ़ते हुए आप भी आते हैं.

त्रासदी का समय है. हम सबकी मेंटल हेल्थ एकदम डिस्टर्ब है. लेकिन हम इसे समझ नहीं पा रहे हैं. कभी खुद को खुश रखने के लिए गार्डनिंग करने लगते हैं, गाने सुनने लगते हैं. वर्क फ्रॉम होम में खुद को पहले से ज्यादा झोंककर महसूस करते हैं कि भला हुआ काम ने हमें बचा लिया. कभी रसोई में एक्सपेरिमेंट करने लगते हैं, कभी योगा, एक्सरसाईज, पढ़ना-लिखना. दोस्तों से बात करते हैं. उन दोस्तों के हाल चाल पूछते हैं जो स्लीपिंग मोड में पड़े थे. किसी का टूट रहा था हौसला तो उसे हिम्मत बंधा रहे होते हैं. फिर...अचानक...सब बिखरने लगता है. और शाम तक आते आते फूट फूट कर रो पडते हैं. सब लोग तो हैं आसपास फिर भी एक अजीब सा अकेलापन काटने को आता है.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं यह बिलकुल अलग अनुभव है. हर किसी के भीतर बहुत से बदलाव हो रहे हैं. बहुत मंथन चल रहे हैं. लोग बाहर के काम, व्यवहार, सेहत आदि पर तो काम कर रहे हैं लेकिन भीतर की दुनिया में चल रही इस हलचल को दुनिया में कभी स्पेस नहीं मिला, आज भी नहीं मिल पा रहा. हमारी समझ ही नहीं है कि इस बात की कि अगर व्यक्ति के भीतर की दुनिया ठीक नहीं होती तो टेक्निकली तो सब ठीक हो भी जाता है लेकिन असल में कुछ भी ठीक नहीं होता. यह टेक्निकली ठीक होना है किसलिए, इंसानों के लिए ही न, इंसानों के स्वस्थ रहने और खुश व शांत रहने के लिए, एक दूसरे को महसूस करने के लिए. लेकिन ऐसा हो क्यों नहीं रहा? जब हम किसी से पूछते हैं ‘तुम ठीक हो न? सब ठीक है न?’ तो उत्तर में प्रतीक्षा होती है कि सामने वाला हाँ ही कहे, कहीं दुखड़े लेकर न बैठ जाए. और उस हाँ में सैनिटाइज़र होना, तबियत ठीक होना, घर में रहना, घर में पर्याप्त राशन होना भर होता है.

एक रोज मुझसे किसी ने पूछा, ‘सब ठीक है न?’ और ‘हाँ’ कहने के बाद मैं फफक कर रो पड़ी. जानती हूँ सुनने वाले को सिर्फ हाँ में दिलचस्पी थी. भीतर ही भीतर हम सब टूट रहे हैं, जैसे कुछ खो रहा है. हम सबको सबसे पहले एक दूसरे के प्रति संवेदनाएँ बढानी थीं, महसूस करना बढ़ाना था लेकिन हमने तकनीकी तौर पर हालचाल भर लेकर काम चला लिया.

काम तो हो जाते हैं सारे, घर के भी बाहर के भी लेकिन हम जो लगातार अकेले पड़ते जा रहे हैं उसका क्या? हम जो एक दूसरे को महसूस नहीं कर पा रहे हैं उसका क्या? बस कि एक आवाज की दूरी पर तो थे हम लेकिन यह जो हमारे बीच सदियों का सा फासला गहराता जा रहा है इसका क्या? बुखार होता तो बता देती लेकिन इस उदासी को कैसे बताऊँ, किसे बताऊँ? कैसे बताऊँ कि नींद खुल जाती है रात में, कि काम करते करते रोती जाती हूँ. काम वक्त पर पूरा हो जाता है, मैं टूटकर बिखर जाती हूँ.

जिस समाज में लोग भूख से बिलख रहे हों, जिस दौर में पूरी दुनिया मौत के एक वायरस से लड़ने की खातिर घरों में कैद हों उस दौर में कोई भी व्यक्ति सामान्य मनस्थिति में तो नहीं होगा...क्या हम अपने होने से एक दूसरे को हील (भर) कर पा रहे हैं. क्या बिना किसी को जज किये कह पा रहे हैं एक दूसरे से कि जरा तुम अपना हाथ देना...कि हम साथ हैं परेशान न हो.

इतिहास है इस बात का कि ऐसी महामारियों के दौर में लोगों की टूटन बढ़ी है, अकेलापन बढ़ा है. जब टूटन बढती है तो बढती है असुरक्षा, अविश्वास. शायद इस दौर में सबसे पहले और सबसे ज्यादा हमें अपनेपन को बढ़ाने पर, एक-दूसरे को महसूस करने पर काम करना चाहिए. सोचन चाहिए कि क्या हम इतने निर्मल, इतने मीठे हो सके हैं कि हमारा होना ही हमारे आसपास के लोगों को अच्छा महसूस कराये, राहत दे. हम सबको ज्यादा मनुष्य होने की जरूरत है... अभी यह लम्बी लड़ाई है. लॉकडाउन खत्म भी हो जायेगा लेकिन जंग जारी रहेगी.

तकनीक ने तो हमें जोड़ रखा है लेकिन एक-दूसरे से मन से जुड़ने की तकनीक तो हमें खुद ही ईजाद करनी होगी.
(आज द क्विंट में- https://hindi.thequint.com/readers-blog/coronavirus-lockdown-effect-on-mental-health-anxiety-loneliness)

सुनना सीख रही हूँ


इन दिनों कुछ भी नया पढने में मन रुच नहीं रहा. पुराने की ही फिर-फिर पलट रही हूँ. रिल्के, निर्मल वर्मा, लोर्का और वॉन गॉग ज्यादा साथ रहते हैं. गॉग अपने भाई को लिखे खत में कहते हैं, क्या हम पढ़ना जानते हैं? सचमुच हमेशा यही तो सोचती रही कि क्या हम पढ़ना जानते हैं? क्या हमने सुनना सीखा है? क्या हमने देखना सीखा है? सब कुछ तो सीखना बाकी ही है. हम जिन चीज़ों को पढकर खुश हुए, उनमें रम गये, आहलादित हुए, दिल दे बैठे उन्हें खोलकर देखा तो पाया कि इसमें तो हजार दिक्कतें थी. दिक्कतें दिखीं क्यों नहीं? जिन बातों से प्रभावित हुए जिन लोगों से उनमें भी हजार दिक्कते थीं. जिन बातों को सुन-सुनकर बड़े हुए, जो रगों में लहू के साथ दौड़ने लगीं उनको कभी परखा ही नहीं. ये सब देखना, सुनना, पढना जो जो बचपन से जारी है जिसने हमें गढा है उसमें हजार दिक्कतें रहीं. बस दिखी नहीं. क्योंकि हमें तो सिर्फ आँख भर देखना, शब्द भर सुनना, और पढना सिखाया गया था. वो भी वैसे,जैसे बताया गया है.

हम खुद से सवाल करने वाले लोग नहीं हैं, अपने कार्य, व्यवहार को पलटकर देखने और उसे तराशने के लिए कोशिश करने वाले लोग नहीं हैं. हम खुद को खुदा समझने वाले लोग हैं. व्यक्ति के तौर पर, समूह के तौर पर. पिछले दिनों कुछ साथियों से पढने लिखने ख़ासकर साहित्य पढने को लेकर बात कर रही थी. और सोच रही थी कि अभी तो पढने की बात भर है कि साहित्य पढना हमें निखारता है, संवेदनशील बनाता है. वो बात तो हुई ही नहीं कि साहित्य में भी काफी घपलेबाजी है. उसे अलग से देख पाने के लिए बहुत पैनी नजर और नाजुक नजरिया चाहिए. कि अभी तो सवाल वहीं तक पहुंचे कि क्या कुछ भी जो छप गया वो साहित्य है, सेल्फ हेल्प किताबें भी साहित्य हैं क्या? कितनी लम्बी है वो यात्रा जब सवाल आएंगे कि देवदास हीरो क्यों था? शरतचन्द्र, रविन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों की नायिकाएं ऐसी ही क्यों हैं? कविताओं में स्त्रियाँ दुःख और करुणा की इमेज में ही क्यों कैद हैं. समर्पण का सुख ही क्यों है स्त्री का सुख और क्यों नायिकाओं के सौन्दर्य पर इतना ध्यान दिया गया है. क्यों प्रेमिकाओं और पत्नियों के बीच एक जंग छिड़ी रहती है कहानियों में और पाठकों को जोड़े रखती है. क्यों नख शिख वर्णन इतना स्पेस घेरता है, जुझारूपन क्यों नहीं जगह घेरता.

हमें क्या पढ़ाया जा रहा है, क्या दिखाया जा रहा है, कैसा साहित्य, कैसा सिनेमा और उसे अलग से पहचान पाना हम कब सीख पायेंगे आखिर? बहुत दूर लगता है यह सब. सोचती रहती हूँ लेकिन शायद मैंने अब तक अपनी बात को ठीक से कहना सीखा नहीं.

इन दिनों मोनिका कुमार को पढ़ रही हूँ. मोनिका मेरे मन की वो सारी बातें लिख रही हैं जिन्हें मैंने अब तक कहना सीखा नहीं. जितना मैं सोचती हूँ, सोच पाती हूँ उससे भी आगे की बात लिख रही हैं मोनिका. लिखे हुए को, पढ़े हुए को, देखे हुए को वो उधेड रही हैं. हमें यह उधेड़ना सीखना है. हाँ जरूर है किसी बात को ख़ारिज करने के लिए उस बात को तफसील से जानना बहुत जरूरी है.ऐसा मालूम होता है जिन्दगी की कक्षा में पहले दर्जे की विद्यार्थी हूँ. हूँ ही. 

मुझे चिड़ियों की आवाज सुनना अच्छा लगता है. मैं उनकी आवाज में आवाज मिलाना सीखना चाहती हूँ. मुझे झरने की आवाजें पसंद हैं मैं झरने की आवाज को झरने के संग पीना चाहती हूँ. इन आवाजों से हमें भिड़ना नहीं पड़ता, सवाल नहीं करने पड़ते. ये प्रकृति की पवित्र आवाजें हैं. काश हम प्रकृति जैसे हो पाते.

पता है, आज पूरे 32 दिन बाद घर के बाहर कदम रखे. सड़क पर. खामोश सड़क पहले कब देखी थी याद नहीं. हैवलॉक की याद आई. ऐसी ही ख़ामोशी थी वहां. हरियाली और खुशबू में लिपटी हुई सड़कें. पीले, गुलाबी, बैंगनी और लाल फूलों से सजी हुई सड़कें. एक पेड़ के नीचे से गुजरते हुए मेरी पलकें भीग गयीं. जानते हो क्यों...धरती पूरी लाल फूलों से पटी पड़ी थी. मैं कुछ फूल चुनने लगी. कुछ फूल मेरे ऊपर भी गिरे. मैंने आज फूलों के गिरने की आवाज सुनी.

तुमने कभी सुनी है आवाज? फूलों के गिरने की आवाज? मैं सुनना सीख रही हूँ इन दिनों...

Monday, April 27, 2020

दृश्य बदलने से दृश्य बदलते हैं.


हालात बदलने के लिए
बदलना पड़ता है खुद को

दृश्य बदलने से
तो सिर
दृश्य बदलते हैं.
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भूख पेट में थी
खाना मदद के इश्तिहारों में
और रास्ता लम्बा

भूख ने दम तोड़ दिया
इश्तिहार चमकते रहे.
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अनाज उगाने वाले हाथों का
अनाज मांगने वाले हाथों में बदलना
इतिहास की त्रासदी है

अगर उनके हाथों तक
पहुंचाते हुए राशन
अकड़ती है गर्दन
तो लाजिम है टूटना
मनुष्यता का..
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लॉकडाउन में खोलनी थीं
मन की गांठे
लेकिन हमने कसे ही
अपने पूर्वाग्रह
और भी मोटे ताले डाले अपनी अक्ल पर

कि वायरस से ज्यादा बड़ी थी
जाहिलता की मार.

पढ़ने की आदत से क्या होता है



- मोनिका भंडारी

दैनिक जीवन मे पढ़ने लिखने की आदत निजी और पेशेवर तौर पर आज की टेली कान्फ्रेंस की बातचीत इसी पर आधारित थी और इस बातचीत को हमारे बीच रखने के लिए दो उम्दा शख्सियतें आई थी. प्रतिभा कटियार जी और रेखा चमोली जी. बातचीत की शुरुआत अशोक जी ने की तथा आज की बातचीत का संदर्भ रखा. इसके बाद श्वेता जी ने दोनों लेखिकाओं का स्वागत किया. श्वेता ने कहा कि पढ़े लिखे शिक्षक होने के साथ साथ पढ़ते लिखते शिक्षक होना जरूरी है. इसके बाद दोनों लेखिकाओं के परिचय के लिए जाने माने साहित्यकार एवं शिक्षक मनोहर चमोली मनु को आमंत्रित किया गया. मनु सर ने प्रतिभा जी का परिचय देते हुए बताया कि ये गंगा जमुनी संस्कृति को जीने वाली लेखिका हैं. वर्तमान में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़ी हुई हैं. ये हिंदी, इंग्लिश दोनों भाषाओं की कलम कार हैं. ये डायरी, ब्लॉग लिखती हैं तथा संपादन भी करती हैं. ये विचारवान हैं तथा दुनिया को संवारना चाहती हैं.
वहीं रेखा जी का परिचय देते हुए मनु सर ने कहा कि वे कर्णप्रयाग में जन्मी हैं तथा इनकी लेखनी मे मिट्टी, पानी, पहाड़ का यथार्थ झलकता है. ये वर्तमान में नौनिहालों के बीच उत्तरकाशी मे बहुत बढ़िया काम कर रही हैं.
परिचय को समेटते हुए मनु सर ने कहा कि दोनों ही अपने क्षेत्र में संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ी हैं बराबरी और समानता के सपने बुनती हैं और साकार करना चाहती हैं.
परिचय सत्र के बाद प्रतिभा जी सबसे मुखातिब हुईं. लगभग 92 लोग इस कॉन्फ्रेंस मे शामिल थे.4:30 बजे से शुरू हुई ये बातचीत अब प्रतिभा जी आगे बढ़ा रही थी. प्रतिभा जी ने अपनी बातचीत आज के चुनौती पूर्ण समय को लेकर शुरु की. उन्होंने कहा कि आज के लॉक डाउन के समय में पढ़ने लिखने पर बातचीत करना एक अच्छा विषय है. लेकिन वो कहती हैं की पढ़ने लिखने की बातचीत अलग से क्यों की जाए? यह तो हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए. सबसे जरूरी है कि हम क्या और कैसे पढ़ते हैं? उन्होंने कहा कि आजकल उन्होंने फिर से पहले पढ़ी हुई किताबें पढ़ी हैं और हर बार उन्हे पिछली बार से अलग लगता है अपना पढ़ा हुआ. उनका मानना था कि पढ़ने से हर बार कुछ नया महसूस होता है. प्रतिभा बड़ी गहरी बात कहती हैं कि पढ़ना हर बार खुद को जानने और तराशने जैसा है. प्रतिभा की विशेषता है कि वो बहुत गहरी बात भी सहजता से कह जाती हैं. कहती हैं कि हर शब्द की एक अलग यात्रा है. उन्होंने जोड़ा कि आजकल मदद, परोपकार, संवेदना जैसे शब्द प्रचलन मे बहुत हैं लेकिन इसका अर्थ सिर्फ एक हाथ देने वाला तथा एक हाथ लेने वाला सा लगता है. यह सिर्फ आर्थिक मसला नही है, क्यों नहीं हम उनके साथ खड़े हो जाते? प्रतिभा कहती हैं ये संवेदना भी साहित्य पढ़ने से आती है. साहित्य हमें बदलना सिखाता है. पाठक के तौर पर साहित्य हमे समृद्ध करता है. प्रतिभा का मन प्रकृति मे भी रमता है जब हम उनको पढ़ते हैं तो हम महसूस कर सकते हैं कि वो प्रकृति के बहुत करीब हैं. नदी, बारिश, पेड़, सब उनके दिल से होकर गुजरता है. वे कहती हैं कि हमारे अंदर जो नदी है साहित्य उसे सूखने नहीं देता. कहती हैं साहित्य और प्रकृति कभी भेद nhi करती. शिक्षा मे भी भेद नहीं होने चाहिए. उन्होंने लाल बहादुर वर्मा जी का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी एक बात उन्हे बड़ी अच्छी लगी कि धरती उन शिक्षकों को ज्यादा प्यार करती है. जो धरती से प्यार करते हैं क्योंकि जो बच्चे इन शिक्षकों के बीच से होकर गुजरेंगे वो सही मायनों मे मनुष्य होंगे.
साहित्य पढ़ने की आदत कैसे हो इस बात पर प्रतिभा जी ने कहा कि आजकल कई लोगों को फेसबुक और whatsaap पर पढ़ना पसंद होता है लेकिन वो कहती हैं कि ये पसंद का क्षेत्र होता है. कुछ और कहीं पढ़ने मे मजा आता है कहीं नहीं भी आता.ये चस्का लगने जैसा है कहती हैं मुझे विरासत मे अपने पापा से पढ़ना लिखना मिला है और कई लोग हैं जिनको पढ़ने की आदत मे शामिल करने के लिए हाथ बढ़ाने की जरुरत है. उन्होंने अपना अनुभव बताया कि उनके पापा किताबें घर पे लाया करते थे. कोई रूसी किताब और पिता के पत्र पुत्री के नाम जैसी किताबें बचपन में पढ़ ली थी और उनके पिता उन किताबों पर बातचीत किया करते थे. वो मानती हैं कि यही बात जरूरी है कि बच्चों के साथ बातचीत करें, सवाल जवाब करें.पढ़ने के बाद यदि बच्चे हमें कहीं पर गलत साबित करते हैं तो ये बहुत अच्छा है. वो कहती हैं कि किताबों से प्यार करना जरूरी है. उनको साहित्य से प्यार था और आज तक चल रहा है.
वो ये भी कहती हैं कि किताबें हमें बदलती है. साहित्य हमें नजरिया देता है. चित्रलेखा किताब का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये सबको पढ़नी चाहिए. यदि हम किसी चीज को नहीं मानते तो उसको ना मानने के जो कारण हैं उसको जानने के लिए हमें और ज्यादा उसे पढ़ना पड़ेगा.उन्होंने उन शिक्षकों के बारे मे भी बात की जो अपनी कक्षाओं मे साहित्य के साथ शिक्षण कर रहे हैं. और बच्चों को प्यार के साथ सिखा रहे हैं. यहीं पर प्रतिभा जी ने अपनी बात समाप्त की और रेखा जी को अपनी बात रखने के लिए कहा.

रेखा जी ने अपनी बात शुरु करते हुए कहा कि प्रतिभा को सुनना किसी लंबी "प्रेम कविता "को सुनने जैसा है. उन्होंने अपनी चिर परिचित अंदाज में संवाद से जुड़ने के लिए सबका शुक्रिया अदा किया और कहा कि उन्हे प्रतिभा की बातों से सहमति है.. रेखा जी ने कहा कि एक शिक्षिका होने के नाते मै शिक्षकों के पढ़ने लिखने की बातें करूँगी.रेखा जी भी बहुत सहज शब्दों मे अपनी बातें रखती हैं जो कि हमें अक्सर अपने दिल के करीब लगता है. उन्होंने कहा कि जैसे किसी दुकान या व्यवसाय को सजाने सँवारने के लिए कुछ टूल्स की जरूरत होती है उसी तरह कक्षा शिक्षण मे भी नई चीजें, आनी चाहिए जैसे किताबें, साहित्य, जो कुछ भी देश, दुनिया मे लिखा या बुना गया है उसे बच्चों के बीच मे आना जरुरी है. वो कहती हैं कि मैं किसी विषय विशेष की नहीं बल्कि व्यापक रूप से इस बात को देखती हूँ. बच्चा हमारे पास आता है और कुछ समय बाद जब वो जाता है उस पूरी प्रकिया मे उसके बीच हम क्या करते हैं ये जरुरी है.रेखा बच्चों के साथ बहुत शिद्दत से जुड़ी हुई हैं उनकी छोटी सी बात को भी महसूस करती हैं. उन्होंने कहा कि जिस शिक्षक ने तोतोचान पढ़ी होगी, यदि उसकी कक्षा मे कोई ऐसा अलग सा बच्चा आता है तो वो उसको शरारती और बिगड़ा हुआ घोषित करने से पहले रुककर सोचेगा कि ये बच्चा क्या कहना चाहता है?. इसी तरह जिसने पहला अध्यापक पढ़ी है वो खुद से सवाल करना सीखता है. वो सीखता है कि क्या नये तरीके हैं सीखने और सिखाने के? वो सहजता से कहती जाती हैं कि जरुरी नही कि 100 लोगों द्वारा किया जाने वाला काम सही है और 10 लोगों द्वारा किया जाने वाला गलत.
कहती हैं कि आज की शिक्षा प्रणाली सही नही है कहीं ना कहीं इसमें गड़बड़ है वरना आज हम ऐसी दुनिया ना तैयार कर रहे होते. साहित्य के बारे मे उनका कहना था कि कोई शिक्षक जब पढ़ता है तो वह सवाल करना सीखता है. पढ़ना सीधे हाँ या ना को नही उसके बीच की तमाम बातों को जगह देता है. फेसबुक और सोशल मीडिया की सामग्री को एकदम से आत्मसात करने पर उन्होंने असहमति जातायी. कहा कि इस तरह की सामग्री पर सोच समझ कर विश्वास करने की जरुरत है.. वो कहती हैं की यदि हम पढ़ते लिखते शिक्षक होंगे तो कक्षा मे हमारा नजरिया बिल्कुल अलग होगा. हम चीजों, लोगों और घटनाओं को लेकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होंगे.
अपनी बेबाक शैली मे उन्होंने अपने अनुभव भी सुनाए. अपनी 9 वी कक्षा में पढ़ी गयी किताब अपने अपने राम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी किताब की कहानी, पात्र, कथानक का प्रभाव आपको बदल देता है. और आप पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाते हैं. कोई आपके बारे मे क्या सोचता है फिर आपको कोई फर्क नहीं पड़ता. आप खुद पर भरोसा करने लगते हैं. कुल मिलाकर आप एक स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले शिक्षक बन जाते हैं. यह बात मुझे भी महत्वपूर्ण लगी. बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हमारे बच्चों को पढ़ने की सामग्री और अवसर कम मिलते हैं. घरों में कोई ऐसी छपी हुई सामग्री नहीं होती जिसे वो पढ़ सकें. ऐसे में हमारी और जिम्मेदारी बन जाती है कि बच्चों को पढ़ने लिखने से जोड़ा जाए. हमें ऐसा माहौल बनाना होता है कि बच्चे खुद पढ़ने लग जाएं. बच्चों के साथ चित्र, चित्रकथा अनुभव खेल पर बात करना जरुरी है.
एक अनुभव सुनाते हुए कहा कि एक बच्ची चीनी के लिए दस रुपए ले कर आई है पर वो चुप है कि पैसे लाने पर डांट ना पड़े. लेकिन जब उससे इस बारे मे बात की तो उसे महसूस हुआ कि उसकी दस रुपए की चीनी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी और की. कविता छह साल की छोकरी पर भी उन्होंने अपनी बात रखी. बोली कि बच्चों को चयन का अधिकार होना चाहिए. बच्चों को स्वतन्त्र छोड़ना जरुरी है लेकिन पहले उनसे बात करना जरूरी है. फिर वे चीजों को अपना समझते हैं और तोड़ फोड़ नहीं करते. पढ़ने के बाद प्रस्तुतिकरण भी जरूरी है. बच्चों ने क्या पढ़ा कितना पढ़ा उसे अपने साथियों से साझा करना भी जरूरी है. पढ़ने की खुशी बच्चे बांटना चाहते हैं और ये टीचर के लिए प्रेरणा हो सकते हैं. इसके बाद रेखा जी ने दीवार पत्रिका पर भी बात की. कहा कि विषय का चयन चित्र बनाना लिखना यदि बच्चे सीख गए तो बड़ी बात है. अंत मे उन्होंने अपनी बात को समेटा और कहा कि शिक्षक के काम मे निरंतरता जरूरी है.रेखा जी की बात समाप्त होने के बाद सवाल जवाब का दौर शुरू हुआ.
शिक्षक साथियों की तरफ से आये सवालों को मुदित जी ने रखा. एक प्रश्न था कि बच्चों मे पढ़ने की आदत कैसे डालें? जवाब मे रेखा जी ने कहा कि यदि हमारे घर मे खूब सारी किताबें हैं तो बच्चों को उनके साथ जोड़ा जा सकता है. उनसे बात करके किताबों के कुछ पन्ने पढ़के किताब के प्रति रुचि जगाई जा सकती है.
दूसरा प्रश्न था कि एक ही तरह का साहित्य पढ़ना सही है या नहीँ ? उत्तर था कि नही हमे अलग अलग तरह का साहित्य पढ़ना जरुरी है. प्रतिभा जी ने कहा कि हमें एक ही विचार का साहित्य ना पढ़कर बहुत तरह का पढ़ना चाहिए. जैसे यदि मुझे धर्म मे विश्वास नही तो उसको सिद्ध करने के लिए मुझे और ज्यादा पढ़ना होगा जिससे हम उन चीजों को और अच्छे से जान पाएँ. अगला प्रश्न था कि बहुत से लोग पढ़ने को एकाकी प्रक्रिया मानते हैं जबकि ये समाज मे सीखा जाता है. और हमारी जिम्मेदारी है कि हम सीखे हुए को समाज को वापिस करें तो कैसे ये समाज का हिस्सा ban सकता है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल था लेकिन रेखा जी ने अपने धैर्य वान सहज शब्दों मे उत्तर दिया कि भले ही हम स्वयं की रुचि से एकांत में पढ़ना पसंद करते हैं लेकिन पढ़ने के बाद हम जैसे मनुष्य बनते हैं उसी सोच और समझ के साथ हम समाज मे व्यवहार करते हैं. फिर एक प्रश्न था कि पढ़ने लिखने में कैसे सब्जेक्विटी और जजमेंटल होने से बचा जा सकता है? तो रेखा जी ने जवाब दिया कि हमारी सजगता ही हमें इनसे बचा सकती है.. इसके बाद समूह मे शिक्षण पर प्रश्न पूछे गए जिनका जवाब रेखा जी ने अपने कक्षा शिक्षण के अनुभव और उदाहरण दे कर दिया. इसी रोचक बातचीत के साथ समय सीमा भी खत्म होने पर थी. सभी साथी ध्यान से संवाद सुन रहे थे. पूरी बातचीत कहीं ना कहीं दिल के करीब थी क्योंकि हम ऐसी शिक्षिकाओं को सुन रहे जो हम जैसे ही बच्चों के बीच काम कर रहीं थीं और उन्हीं चुनौतियों को बीच जो हम सबके सामने होती हैं.. आज के इन दोनों मेहमानों को सुनना बहुत सुखद रहा. पढ़ते लिखते रहना क्यों जरुरी है एक शिक्षक के तौर पर ये जान पाना मेरे और मेरे ही जैसे अनेक शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण रहा.
पूरी बातचीत को अंत मे जगमोहन कठैत जी ने समेकित किया.6:15 बजे तक पूरी वार्ता चली और सबने सुनी.
कठैत सर ने सबका धन्यवाद किया और कहा कि कक्षा के ये अनुभव बहुत काम के रहे.
इसी के साथ सबने विदा ली.

26 अप्रैल 2020.

Sunday, April 26, 2020

किताबें बदलती हैं हमारे जीवन को

ऑनलाइन सेमिनार: प्रतिभा कटियार एवं रेखा चमोली के साथ*********************
-मनोहर चमोली ‘मनु’
आज की बातचीत की औपचारिक शुरूआत अशोक प्रसाद जी एवं जगमोहन कठैत जी ने की । जैसे-जैसे साथी जुड़ते रहे, साथी सभी का स्वागत करते रहे। आरम्भ से पहले ही 64 साथी जुड़ गए थे। श्वेता जी ने सन्दर्भ रखा। कहा, ''दैनिक जीवन में पढ़ने-लिखने की आदत को विकसित करने और बच्चों में कैसे पढ़ने की आदत विकसित करें? इस पर बात करेंगे। पढ़े लिखे शिक्षक और पढ़ते-लिखते शिक्षक दोनों की आवश्यकता है।''

दोनों के परिचय के बाद प्रतिभा जी हमारे सामने आई। प्रतिभा जी ने कहा,‘‘यह माध्यम हमें एक अवसर के साथ मिला है कि हमारे भीतर सीखने की ललक रहे। मैं आज भी बहुत कुछ सीखकर जाऊँगी। पढ़ना क्यों जरूरी है? जब इस सवाल को साझा करती हूं तो पता चलता है कि जवाब ऐसे आता है। पढ़ा है। पर ज़रूरी तो नहीं कि साहित्य सभी पढ़ें। हर दिन लगता है कि क्या पढ़ना है? कैसे पढ़ना है? सालों से पढ़ रहे हैं पर क्या हमें पता है कि हमें कैसे पढ़ना है? यह भी क्या हमें सुनना आता है? क्या हम अच्छे पाठक हैं? जब मैं अठारह-उन्नीस साल की थी तब शेखर एक जीवनी पढ़ा। अब दोबारा पढ़ रही हूं तो लगता है कि जाने हुए को और जानना है। फिर से पढ़ना लगता है कि नए तरीके से पढ़ना हो रहा है। मैं जो सोचती हूँ क्या मैं लिख पाती हूं। आजकल हम देख रहे हैं कि हम खूब मदद करते हैं। कृपा, मदद खूब हो रही है। क्या हैं ये शब्द। साहित्य को बरतना ज़रूरी है। मदद करना,कृपा करना होना चाहिए कि साथ में खड़ा होना चाहिए? मैं फिर कह रही हूं कि क्या हम पढ़ना जानते हैं। मैं तो पढ़ना सीख रही हूं। हम सबके भीतर एक नदी है। साहित्य हमें सूखने नहीं देता। साहित्य हमारे भीतर के जंगल को,हरे-भरे को सूखने नहीं देता। हमें मरने नहीं देता। साहित्य जो करता है, प्रकृति जो करती है शिक्षा जो करती है उनका स्वभाव क्या है? पूरी दुनिया का साहित्य क्या करता है? सबके लिए है न? कोरोना के समय में पूरी दुनिया इस बीमारी से लड़ रही है। पूरी दुनिया एक हो गई है। साहित्य भी भेद नहीं करता।''
कवयित्री प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘हम मनुष्य होंगे। समाज को क्या चाहिए? साहित्य और शिक्षा क्या करती है। शिक्षक खास है। वह सबको जोड़ता है। पढ़ने की आदत कैसे हो? हमें समझना होगा कि जहां मज़ा आता है तो क्यों? नहीं आता है तो क्यों? मुझे घर में पढ़ने की आदत मिली। जिन्हें घर से यह आदत नहीं मिली उन्हें हाथ बढ़ाना पड़ता है। यह स्वाद है। लत है। चस्का है। यदि इसकी शुरुआत हो जाए तो फिर छूटेगी। हमें यह आदत नहीं मिली तो हम बच्चों को यह आदत तैयार कर सकते हैं। ऐसे में शिक्षक की बड़ी जिम्मेदारी है। वह इसे करते हैं। कर सकते हैं।’’ प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘मैं बचपन को याद करती हूँ तो पाती हूं कि पापा बहस कराते थे। सवाल करने और जूझने की आदत बढ़ाई उन्होंने। क्या हम बच्चों के साथ कर सकते हैं। बच्चों से बात करें। बहस में शामिल हों। बच्चों से सवाल-जवाब करने चाहिए। हमें बच्चे गलत साबित करते हैं तो समझिए कि वे सही जा रहे हैं। घर में बच्चे जब टोकते हैं तो समझिए कि सही जा रहा है। यही तो चाहते हैं हम। घर में भी और स्कूल में भी। हिन्दी की किताबें देखें तो वह बहुत खूबसूरत हैं। भाषा की किताबों के सारे पाठ इतने खास हैं। यदि इसे ही बरत लें,सहेज लें तो बात बने। शिक्षक को ही यदि किताबों से प्रेम नहीं है तो कैसी विरासत बना रहे होंगे हम? क्या स्कूल में बच्चे संवाद करते हैं? सवाल उठाते हैं? मैंने साहित्य में ज़्यादा पढ़ाई नहीं की। पीजी के समय में मैंने देखा कि साहित्य को पढ़ाने वाले शिक्षक मुझे रुला देते थे। ऐसे साहित्य पढ़ा जाता है? पढ़ाया जाता है? एक शिक्षक के पास कितने बच्चे आते हैं। वे बच्चे यदि मनुष्य हो जाएं तो दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाए। मैं कक्षा 4 में पढ़ती थी। पुस्तकालय में एक किताब मिली। सार यह है कि नक्सली मूवमेंट में युवक पड़ गया। पकड़ा जाना और पुलिस की कार्रवाई में 5 साल निकल गए। मैंने इसे पढ़ा। कैसे किताब हमारे जीवन को बदलती है? साहित्य हमें नज़रिया देता है। परखने का अवसर देता है। चित्रलेखा पढ़ी। जिन शिक्षकों को साहित्य से प्रेम है उनकी कक्षाओं में कुछ अलग होता है। यू ंतो सभी शिक्षक अपनी कक्षाओं में कुछ न कुछ होता है। शिक्षक का व्यवहार कक्षाओं में जाएगा। बच्चों के जीवन में जाएगा।''

प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘शिक्षक होना, बच्चों से प्यार करना। बच्चों को सवालों को तैयार करना अपने आप में अनूठा है।’’ पांच बजकर दस मिनट पर रेखा चमोली जी ने अपनी बात शुरू की। रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘प्रतिभा को सुनना लंबी प्रेम कविता को सुनना जैसा है। प्रतिभा जी से सहमति ज़ाहिर करते हुए मैं यह कहना चाहती हूँ कि यह मेरी ही बात है। मैं जानती हूं कि जो इस संवाद में शामिल हैं वह भी अपनी कक्षा में खूब बेहतर काम कर रहे हैं। शिक्षकों के पढ़ने-लिखने की बात पर बात आगे बढ़ाते हैं। मुझे लगता है कि हर व्यवसाय में कुछ खास होता है। शिक्षा में भी किताबें ज़रूरी हैं। हमें किताबें एक औजार के तौर पर दिखाई देती हैं। विषयवार शिक्षक और विषय की किताबों से नहीं पूरी प्रक्रिया में हमें बच्चों के सारे पढ़ाई के दिनों के तौर पर देखना होगा। जैसे जिस शिक्षक ने तोत्तोचान पढ़ी होगी। वह किसी भी तरह का शिक्षक है किसी भी विषय का शिक्षक है। वह बच्चों की उलझनों को समझेगा। पहला अध्यापक किताब भी शिक्षक के व्यवहार को दिखाती है। किताबें सवालों को सुनने-समझने का माध्यम बनती हैं। किताबों और किताबों में निहित शिक्षा प्रणाली के बारे में हम सही-गलत पर सवाल किए जा सकते हैं। मतलब यह है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। जो भी गड़बड़ हो रही है हमारी कक्षाओं में कुछ गड़बड़ है। देखा जाए तो अब तो नियमित कक्षाएं चल रही हैं। यदि कोई शिक्षक किताबें पढ़ता है तो उसके भीतर का मनुष्य सवाल करता है। हां या नहीं वाला नहीं होता। शिक्षक का पढ़ना जरूरी है। व्हाट्स एप या फेसबुक में चीजें जो आ रही हैं। जिसे एक तरह से पढ़ना माना जाए तो क्या हम उस पर सवाल करते हैं। सही-गलत पर विचार करते हैं? हम फाॅरवर्ड कर देते हैं। यदि हमने किताबें पढ़ी हुई होती तो शायद हम सोचते। क्या करना है क्या नहीं करना चाहिए। हमें पढ़ना चाहिए। देर से ही सही पर पढ़े। यदि हम शिक्षक हैं। पढ़ते-लिखते शिक्षक है तो हमारी कक्षा कैसी होगी। मुझे लगता है कि ऐसे शिक्षक के पूर्वाग्रह नहीं होंगे। मैं अपना उदाहरण देती हूं। अपने-अपने राम। ये भगवान सिंह जी किताब है। बचपन में पढ़ी थी। मुझे वह तर्कपूर्ण किताब लगी। पाठकों का नजरिया बदल देती है किताब। आप जो पढ़ने से पहले होते हैं पढ़ने के बाद बदलते हैं। शिद्दत से पढ़ाने वाला शिक्षक संकोची नहीं होता। उसकी कक्षा में वह निडरता से पढ़ा रहा होता है। वह सवालों का जवाब देता है। घर में यदि बच्चों को माहौल मिलता है तो असर होता ही है। हमारे स्कूलों में जो भी बच्चे आ रहे हैं उनके पास घर में पढ़ने के लिए स्कूली किताबों से इतर बहुत कुछ नहीं होता। छपी हुई चीज़ों से वे दूर हैं। ऐसे माहौल में हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। उन बच्चों को खुद से पढ़ने के लिए तैयार करने के लिए किताबें चाहिए। जिन बच्चों को पढ़ने के लिए किताबें मिलती हैं तो उन्हें घर में अलग से पढ़ाना सिखाना नहीं करता। हम शिक्षक कक्षा में चित्रों में बात कर रहे होते हैं। घरेलू बातें होंगी। घर जैसी बातें होंगी।’’


रेखा चमोली ने कहा,‘‘एक ओर हम कहते हैं कि बच्चे रुपए लेकर नहीं आने हैं। एक बच्ची के बैग में दस रुपए निकलते हैं। बच्चों को सुना जाता है तो पता चलता है कि बच्ची घर के लिए 10 रुपए की चीनी लेकर जाएगी। जब यह पता चलता है तो कितनी बातें,अनुभव मिलते हैं। एक शिक्षक की बात और एक बच्ची की बात दोनों महत्वपूर्ण है। इसी तरह जब हम किसी कक्षा में कुछ पढ़ा रहे होते हैं तो हम सिर्फ भाषण नहीं होता। कहानी नहीं होता। कहानी के चित्रों,चरित्रों पर बात होती है। हमारे व्यवहार करने पर भी बहुत सारे मूल्य स्वतः आ जाते हैं।’’

रेखा चमोली जी ने छःह साल की छोकरी कविता पर खूब बात की। बहुत सारी सामग्री यानि छपी सामग्री जब बच्चों को पढ़ने के लिए दी जाती है तो बात आगे बढ़ती है। कक्षा के नियम होते हैं। पर यदि हम बच्चों से अच्छे बात करते हैं तो सामग्री बच्चे संभालते हैं। बच्चे अपने मन से चयन करते हैं। पढ़ते हैं। पढ़ने के मौके देते हैं। हम स्वयं भी पढ़ें। बच्चों को समय देना पड़ता है। बच्चे पढ़े हुए या सुने हुए पर बात करें। उन्हें मौका दिया जाना चाहिए। बच्चों का पढ़ा हुआ सुना जाए। वे खुश होते हैं। सुनना,बोलना और पढ़ना का अवसर देते हैं और हम बच्चों को लिखने के लिए प्रेरित करते हैं तो उसके लिखे हुए पर रुचि दिखाते हैं तो अलग बात है। बच्चों का रुझान बढ़ता है। प्रातःकालीन सभा में वह बोलते हैं तो बात ही अलग होती है। दीवार पत्रिका में उनके साथ शामिल होना बड़ी बात है। दीवार पर चिपकने के बाद नहीं। दीवार पत्रिका के शुरू होने,बनाने में तो वह प्रेरित करने वाला काम है। बच्चे मिलकर जो खोजते हैं,पढ़ते हैं लिखते हैं। यह बड़ा काम है। समझकर पढ़ना-लिखना आ गया तो बच्चे भूलते नहीं हैं। शिक्षक को भरोसा हो जाए कि वह सही दिशा में काम कर रहा होता है तो वह करता है। वह अपना काम करता रहता है।


5 बजकर 38 मिनट पर सवालों का सिलसिला आरम्भ हुआ। अशोक जी ने मुदित जी की सहायता से सवालों का समेकन किया। कक्षा कक्ष से जुड़े हुए सवालों से इतर भी सवाल आए। सवालों के जवाब में पहले रेखा जी ने कहा,‘‘यदि घर में बहुत सारी किताबें हैं तो बच्चों को पढ़ने के लिए कहा जा सकता है। बच्चों को प्रेरित किया जा सकता है। बच्चों के साथ पढ़ी जाएं तो बच्चे पढ़ते हैं। अभिभावक किताबें ले आएं। बच्चे खुद पढ़े। सहजता से हो। दबाव में नहीं पढ़ाया जा सकता। माहौल दें बस। पढ़ने-लिखने से तार्किकता का जो मामला है तो किताबें जगाती हैं। जब हम देखते,सुनते और समझते हैं। माना किसी गांव का उपन्यास पढ़ रहे हैं तो हमें गांव का जीवन,रहन-सहन समझ में आता है। किताबें हमारा भ्रम भी तोड़ती हैं। जब हम बहुत सारे संदर्भों को पढ़ते हैं तो एक ताना-बाना बुनते हैं। फिर हम किसी एक पक्ष पर ही अपनी समझ नहीं बनाते। हमारे अनुभव और दूसरो के अनुभव से हम अपना रास्ता खोजते हैं। सोचने का नया आयाम मिलता है। फिर हम किसी का कहा हुआ यूं ही नहीं मान लेते। हमारा सोचना और मानना बनता है।’’


अन्य सवाल के जवाब में रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘एक ही तरह का पढ़ना संकुचित बना सकता है। लेकिन एक ही विषय पर अलग-अलग किताबें पढ़ंे तो समझ विस्तारित हो सकती है। लेखन के लिए कोई सलाह क्या हो सकती है? जब भीतर से सलाह आती है कि अब लिखना ही है तो लिखना हमारे विचार,भावानाएं और दर्द सामने आते हैं। शिक्षक के तौर पर लिखना तो अलग है। हम अपने शिक्षण को लिखें। हमारी सोच और समस्याएं रेखांकित हो सकती है। वह काम आती हैं। मुझे लगता है कि बच्चों को उनकी उम्र और रुचि के हिसाब से किताबें देनी चाहिए। फिर धीरे-धीरे चयन का अधिकार बच्चों को मिलना चाहिए। बच्चे बड़े की किताब भी पढ़ सकते हैं। पढ़ने की ललक पैदा हो चुकी है तो बड़ों की किताबें पढ़ी जा सकती हैं। पढ़ना-लिखना एकाकी प्रक्रिया भले ही है पर पढ़ने के बाद जब हम खुद में बदलाव महसूस होता है। हमारा पूरा बना हुआ इंसान जब सामने आता है तो समाज में हम जाते हैं तो हमारा व्यवहार बदला हुआ होगा। सकारात्मक होगा। फर्क तो आएगा ही। पढ़ते-लिखते हैं तो समाज के साथ व्यवहार में परिलक्षित होता है।’’

एक घण्टा पैंतीस मिनट के बाद भी आ रहे सवालों के जवाब देने की प्रक्रिया चलती रही। रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘शुरू में लेखन में पढ़े हुए से प्रभाव रहता है लेकिन जैसे-जैसे हम पढ़ते जाते हैं तो हमारे लेखन में स्वतंत्रता आती है। समूह में पढ़ने की बात करते हैं तो हम कक्षा में इसलिए भी करते हैं कि बच्चे जब समूह में पढ़ते हैं तो वे एक-दूसरे की मदद करते हैं। पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में कक्षा में छूना,देखना क्यों प्रतिबंधित है? यदि समूह में वे बच्चे काम करें तो उसकी बात ही कुछ ओर है। बच्चे दो में छोटे-छोट समूह में पढ़ सकते हैं। चीज़ें बनाते हैं। समूह में पढ़ने के कई तरीकों से वह तेजी से पढ़ना और पढ़कर अपनी बात सुनाने की गति तेजी से सीखते है। अभिभावकों की गलतफहमी है कि साहित्य बच्चों की कोर्स को बाधित करता है। साहित्य कहीं न कहीं बच्चों की समझ को बढ़ाता है। पाठ्यक्रम को सीखने-समझने और विस्तार देने में मदद ही करता है साहित्य। किसी भी बच्चे का जो व्यक्तित्व बनता है तो स्कूली किताबों से ही नहीं बनता। किताबों का महत्व नकारा नहीं जा सकता।’’

एक घण्टा बयालीस मिनट की बातचीत के बाद रेखा जी ने अपनी कक्षाओं के अनुभव भी साझा किए। सवालों के जवाब में रेखा जी ने कहा,‘‘एकांत में मौलिक लेखन नहीं होता। हम जो बोलते,सुनते,लिखते हैं वह समाज का ही हिस्सा होता है। किसी बात को अपने तरीके से लिखना शायद मौलिक है। मैं निडरता के साथ जो लिखती हूं वह मौलिक कहलाया जाएगा। बच्चों को जानवरों से प्यार होता है। बच्चे अपनी प्रकृति को जानते हैं। कल्पनाशीलता में खिलौनों से बात होती है। जमीन को चोट कैसे लगती है। बाल मनोविज्ञान कल्पना के घोड़े दौड़ाने को सही मानता है। बच्चों को साहित्य में भी वह सब देना चाहिए जो उसके समाज में है। डायरी में बच्चों की मात्र दिनचर्या कैसे बदली जाए? लगातार और धीरे-धीरे प्रयास किए जाएं तो डायरी में दिनचर्या के साथ भाव भी आएंगे। यह बड़ों के साथ भी होता है। निरन्तर अभ्यास से यह आएगा।

अंत में प्रतिभा जी कनेक्ट हुई। उन्होंने जोड़ा,‘‘यह बात सही है कि एक ही विचार का साहित्य नहीं पढ़ना चाहिए। किसी के विरोध में या असहमति में जाने के लिए ज़्यादा पढ़ना होगा वह भी किसी पूर्वाग्रह के। हमें खुलेपन से चीज़ों को पढ़ना चाहिए। समझना चाहिए। हर तरह के साहित्य को पढ़ने से हम और खुलते हैं। माना कि मैं धर्म पर विश्वास नहीं करती तो मुझे समझना होगा कि मुझे धर्म की कितनी जानकारी है? तभी हम मुक्त होते हैं। किताबें अन्तिम नहीं होतीं। हम जीवन को भी तो पढ़ रहे होते हैं। हम सही साहित्य की ओर बढ़ते हैं हमारा जीवन भी तो है जिससे हम समझ रहे होते हैं।’’ 1 घण्टा 54 मिनट की बातचीत में अंत तक 94 साथी लगातार बने रहे। अंत में जगमोहन कठैत जी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।