Sunday, July 29, 2018

असफल प्रेमिकाएं- असीमा भट्ट




वो प्रेतात्माएं नहीं थीं
वो प्रेमिकाएँ थीं
वो खिलना जानती थीं फूलों की तरह
महकना जानती थीं खुशबू की तरह
बिखरना जानती थीं हवाओं की तरह
बहना जानती थीं झरनो की तरह
उनमें भी सात रंग थे इंद्रधनुषी
उनमें सात सुर थे
उनकी पाज़ेब में थी झंकार .
वो थीं धरती पर भेजी गयी हब्बा की पाकीज़ा बेटियां
जिन्हें और कुछ नहीं आता था सिवाय प्यार करने के
वो बार बार करती थीं प्यार
असफल होती थीं.
टूटती थीं
बिखरती थीं
फिर सम्हलती थीं
जैसे कुकनूस पक्षी अपनी ही राख से फिर फिर जी उठता है
फिर प्यार करती थीं
उसी शिद्दत से और उसी जुनून से
दिल ओ जान लुटाना जानती थीं अपने प्रेमियों पर
दे देना चाहती थीं उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ
बचा लेना चाहती थीं दुनिया की हर बुरी नज़र से
कोई भी बला आये तो पहले हमसे होकर गुज़रे
अपने रेशमी आंचल को बना देती थीं अपने प्रेमियों का सुरक्षा कवच
बन जाती थीं उनके लिए नज़रबट्टू लगा कर आँखों में मोटे मोटे काजल
उनके लिए बुनती थीं स्वेटर और सपने दोनों
गुनगुनाती रहती थीं हर वक़्त अपने अपने प्रेमी की याद में
खोयी खोयी अनमनी
अपनी ही धुन में
न किसी का डर
न दुनिया की परवाह
करती थीं रात रात भर रतजगा
और
ऊपर से कहती थी - ख्वाब में आके मिल
उनींदी आँखें लाल होती हैं असफल प्रेमिकाओं की
जैसे रात भर किसी जोगी ने रमाई हो धुनी

असफल प्रेमिकाएँ करती हैं व्रत, रखती है उपवास
बांधती हैं मन्नत का धागा
लगाती हैं मंदिरों और मज़ारों के चक्कर
देती हैं भिखारियों को भीख और मांगती हैं दुआँ में अपने प्यार की भीख
‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए’ कहते हुए गाती थी
‘हम इंतजार करेंगे तेरा क़यामत तक’
वो भूल जातीं दिन, महीने और तारीख
भूल जातीं खाना खाना
बेख्याली में कई बार पहन लेतीं उलटे कपड़े
लोग कहते - कमली है तू
और वो खुद पर ज़ोर ज़ोर से हँसतीं
बहाने बनातीं
जल्दी में थी
कमरे में अन्धेरा था
क्या करती, ठीक से दिखा ही नहीं
असफल प्रेमिकाएँ बचाये रखती हैं हर हाल में अपना विश्वास
बचाए रखती हैं अपने प्रेमी के प्रेमपत्र और उनकी तस्वीरें
गीता और कुरआन की तरह .

असफल प्रेमिकाएँ जब जब रातों को अकेली घबरा जाती हैं, रोती हैं तकिये
में मुंह रख कर
सोचती
नितांत एकांत रात में
सन्नाटे को चीरती हुई
उनकी चीत्कार ज़रूर पंहुचती होगी उनके प्रेमी के कानों में
वो अच्छा हो, वो भला हो
सब ठीक हो उनके साथ
कोई आफत न आयी हो उनके पास
जहाँ भी हो सुखी हो
मन ही मन बस यही कामना करती हैं असफल प्रेमिकाएँ
असफल प्रेमिकाएँ लगने लगती हैं असमय बूढ़ी
आ जाती है बालों में समय से पहले सफ़ेदी
और गालों पर झुर्रियां
वो झेल जाती हैं सबकुछ
नहीं झेल पातीं तो अपने प्रेमी द्वारा दी गयी पीड़ा, यातना, उपेक्षा और अपमान
लम्बी फेहरिश्त है असफल प्रेमिकाओं की
जो या तो पागल हुईं
या कुछ ने अपना लिया अध्यात्म
आश्रम या मेंटल एसालम बना उनका घर
वो जिसने खा ली नींद की गोलियां
या काट ली कलाई
किसी से न बर्दाश्त हुआ सदमा और रुक गयी दिल की धड्कन
बहुत उदास और अपमानित हो कर गयीं दुनिया से
वो मरी नहीं
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
हत्या हुई उनकी
वो लोग जो उनसे प्यार का नाता जोड़ कर देने लगे समझदारी भरा बौद्धिक तर्क
कहने लगे - प्यार का कतई यह मतलब नहीं कि हमेशा साथ रहें.
हम दूर रह कर भी साथ रह सकते हैं
खुश रह सकते हैं
दूर हैं, दूर नहीं
वो कहती रहीं - एक झलक देखना चाहती हूँ
छूना चाहती हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारी साँसें
तुम्हारी मजबूत बाहों में पहली बार जो गरमाहट और सुरक्षा महसूस किया
था फिर से करना चाहती हूँ वैसा ही मह्सूस
और तुम ज़ोर से हँसते हुए कहते - ‘क्या बचपना है, यह सब बकवास है.’
ले ली उनकी जान इस बकवास ने
तुम्हारे आपराधिक प्रवृति ने
तुम्हारी कुटिल हंसी ने
तुम उड़ाने लगे उनका मज़ाक
खेलने लगे मासूम भावनाओं से
खेलने लगे उनके दिल से
कहती रहीं - खेलो न मेरे दिल से
पूछती रहीं - यह तुम्हीं थे
कौन था वो जो पहरों पहर मुझसे फोन पर करता था बातें
हरेक छोटी छोटी बातें पूछता
अभी कैसी लग रही हो
क्या पहना है
क्या रंग है
बताओ

बताओ ओ प्रेमी !
क्या तुम्हें नहीं लगता
वो बनी ही थीं प्यार करने के लिए
और तहस नहस करके रख दी उनकी जिंदगी
तुमने ले ली उनकी जान
अब डर लगता है तुम्हें
वो कहीं से प्रेतात्माएं बन कर आयेगीं और तुम्हें डरायेंगी
डरो मत
वो प्रेमिकाएँ हैं
प्रेतात्माएं नहीं
वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ती
वो तो क़ब्र में भी गाती हैं अपने प्रेमी के लिए शगुनों भरी कविता
देखना वो अगले बसंत फिर से निकलेंगी अपनी अपनी कब्र से बाहर
और करेंगी प्यार
और यह धरती जब तक अपनी धूरी पर घूमती रहेगी
तब तक वो करती रहेंगी प्यार
और पूरी दुनिया को सिखाती रहेंगी प्यार ...
https://www.youtube.com/watch?v=LhzBPGTydSs

Thursday, July 19, 2018

आपके साथ बीडी पीना तो रह ही गया नीरज जी


(एक पुराना लेख जो उनके जन्मदिन पर लिखा था.)



'आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी’ - नीरज

एक- एक नन्ही सी लड़की चुपचाप अपनी फ्रॉक के किनारी पर लगी फ्रिल को कुतरा करती थी. वो खामोश रहती थी. उसके कोई दोस्त नहीं थे. स्कूल में अपने हम उम्र बच्चों के बीच भी वो अकेली ही थी. क्लास में बैठकर क्लास के बाहर ताका करती और घंटी बजने का इंतजार करती. घन्टी बजते ही सब बच्चे खेल के मैदान की ओर दौड़ जाते और वो धीमे क़दमों से मैदान के किसी कोने में अकेले टिफिन खाती और अकेली घूमती रहती. वो टीचर्स की फेवरेट नहीं थी. घर में उससे यह पूछने वाला कोई नहीं था कि ड्रेस चेंज की या नहीं, खाना खाया या नहीं. ऐसे में भला ये कौन पूछता कि स्कूल में दिन कैसा रहा? क्योंकि उसके माँ बाप जीवन के दूसरे संघर्षों में उलझे थे. उस कक्षा एक में पढ़ने वाली नन्ही लड़की का अकेलापन भांप लिया एक शिक्षक ने जिनका नाम था गोपी सर. गोपी सर भी शायद स्कूल में, या हो सकता है जीवन में ही उस नन्ही बच्ची की तरह अकेले थे. उन्होंने स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए उस नन्ही बच्ची के तरह अकेले और उपेक्षित रह गए बच्चों की ओर हाथ बढ़ाया. ये वो बच्चे थे जिन्हें स्कूल के किसी कार्यक्रम में जगह नहीं मिलती थी, ये सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनते और ताली बजाते. गोपी सर ने उन सारे छूट गए उपेक्षित बच्चों का हाथ थामा और उनके लिए एक कार्यक्रम की योजना बनाई. कार्यक्रम तैयार हुआ ‘कवि सम्मेलन का’. कक्षा एक में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों को सुंदर-सुंदर कविताओं की कुछ छोटी-छोटी लाइने दी गयीं. उन्हें बाकायदा ड्रेसअप किया गया. अब वो बच्चे भी उत्साहित थे. उन बच्चों ने पहली बार मंच पर उन कवियों की कवितायेँ पढ़ीं जिनका शायद नाम भी नहीं सुना था. जिन्हें कविता होती क्या है यह भी पता नहीं था. ये 32 बरस पुरानी बात है. वो ‘इंडियन आइडियल’ और ‘सुपर डांसर’ जैसे कार्यक्रमों का समय नहीं था. उन बच्चों के जीवन में यह छोटी सी प्रतिभागिता बहुत महत्वपूर्ण थी. गोपी सर ने उस रोज न सिर्फ उन बच्चों का हाथ थामा था बल्कि उनकी जिन्दगी में हमेशा के लिए कविता का एक बीज बो दिया था. वो नन्ही सी लड़की मैं थी. उस रात मैंने जिस कवि की कविता पढ़ी थी उनका नाम है गोपालदास नीरज. यह मेरे जीवन में कविता की पहली आहट थी. वो लाइनें टूटी फूटी सी ही याद रहीं, ‘कोई कैसे जिए अब चमन के लिए, शूल भी तो नहीं हैं चुभन के लिए’.

दो- जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तब पापा टेपरिकॉर्डर लाये थे. घर में बेलटेक का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी था, फिलिप्स का रेडियो भी था जिसका इस्तेमाल ‘बीबीसी की ख़बरें’ या ‘बिनाका गीतमाला’ और ‘हवा महल’ सुनने के लिए होता था, कभी-कभी ‘फौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम’ भी. कब कौन सा कार्यक्रम रेडियो पर सुना जायेगा यह तय करने का हक बच्चों का नहीं होता था. ऐसे में टेप रिकॉर्डर आना सुखद घटना थी. चूंकि टेप रिकॉर्डर पापा लाये थे तो जाहिर है अपनी ही पसंद की चार कैसेट भी लाये थे. महीनों वो चार कैसेट ही मेरी खुराक बने रहे. उन चारों कैसेटों में से जिनमें एक थी ‘लता के सुपरहिट गीत’, दूसरी थी ‘मेरा नाम जोकर’, तीसरी थी ‘मुकेश के गीत’ और चौथी थी ‘नई उमर की नई फसल.’ मैंने पहली बार इस फिल्म का नाम सुना था. धीरे धीरे यह कैसेट मेरी फेवरेट हो गयी. ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे’ तो मुझे अच्छा लगता ही था इस कैसेट का एक और गीत मुझे बेहद पसंद था, आज भी बहुत पसंद है ‘आज की रात बहुत शोख बहुत नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी, अब तो तेरे ही यहाँ आने का ये मौसम है, अब तबियत न ख्यालों से बहल पाएगी...’ इस तरह कोई कैसेट जो मेरी प्रिय कैसेट के रूप में और कोई कवि या गीतकार मेरी फेवरेट लिस्ट में पहली बार शामिल हुआ वो थे गोपालदास नीरज.

पत्रकारिता के दिनों की मेरे सबसे गाढ़ी कमाई यही है कि इस दौरान ढेर सारे प्यारे लोगों से मुलाकातें हुईं, उनसे स्नेह हासिल हुआ, दुलार मिला. इसी गाढ़ी कमाई में शामिल है गोपालदास नीरज का नाम भी.

अब तक मैं उन्हें काफी पढ़ चुकी थी. उनसे मेरी पहली मुलाकात थी. अख़बारों में जिस तरह की अफरा-तफरी के माहौल में काम होता है उसमें महसूस करने की स्पेस बहुत कम होती है. उनका इंटरव्यू लेना एक असाइनमेंट भर था. यह उन दिनों की बात है जब मेरी नयी-नयी शादी हुई थी और जैसा कि नयी शादी के बाद का तमाशा होता है पार्टीबाजी, सोशलाइज़िंग वगैरह तो उसका दबाव भी था. तो मुझे ऑफिस से रात नौ बजे निकलकर इंटरव्यू लेना था और साढ़े नौ बजे साड़ी पहनकर किसी पार्टी में जाना था (तब तक ‘न’ कहना सीखा नहीं था).

बहरहाल, जल्दी-जल्दी में इंटरव्यू हुआ और अच्छा हुआ. अगले दिन हिंदुस्तान अख़बार में ‘नीरज खड़े प्रेम के गाँव’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ. मैंने साड़ी लपेटकर, लिपस्टिक पोतकर पार्टी भी अटेंड की लेकिन मन उखड़ा ही रहा. मुझे लगा मैं मिली ही नहीं नीरज जी से, इसे क्या मुलाकात कहते हैं, इसे क्या बात होना कहते हैं. स्टोरी भले ही सफल रही हो लेकिन मन खिन्न ही रहा लम्बे समय तक. हालाँकि इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी प्रेम कहानी सुनाई थी, बहुत मन से.

खैर, वक़्त ने न्याय किया. इसके बाद मेरी नीरज जी से कई मुलाकातें हुईं. कुछ अख़बारों में दर्ज हुईं कुछ नहीं भी क्योंकि अब तक मेरी उनसे दोस्ती हो चुकी थी. वो शहर में होते तो हम जरूर मिलते. ढेर सारी बातें करते. मैं उन्हें सुनती ज्यादा, सवाल कम करती. पूछकर जानना मुझे सूचनात्मक ही लगता है, महसूसने की आंच में पकते हुए यात्रा करना असल में जानने की ओर जानना लगा हमेशा सो कोशिश भर यही किया, और असाइनमेंट के बोनस में खूबसूरत दोस्तियाँ और स्नेह हासिल किया.

एक शाम जब वो मंच पर थे तो मुशायरे की स्तरहीनता से मेरा मन बहुत उदास हुआ था. उस शाम नीरज जी ने याद किये थे वो तमाम मुशायरे जब मंच पर साहिर, शैलेन्द्र, कैफ़ी वगैरह हुआ करते थे. वो उन सोने सी दमकती रातों का जिक्र करते हुए बहुत खुश थे, उनकी आँखों में चमक थी. उन्होंने गीतों की यात्रा पर बात की. किसी बात के अर्थ किस तरह खुलते हैं, गीत किस तरह दार्शनिक यात्रा तय करते हैं और सुनने वालों को न सिर्फ सुकून देते हैं बल्कि उनका परिमार्जन भी करते हैं, एक अलग यात्रा पर ले जाते हैं यह लिखने वालों और सुनने वालों दोनों को समझने की जरूरत है. साहिर और शैलेन्द्र को वो काफी याद करते.

मैंने उनसे एक मुलाकात में जिक्र किया अपने बचपन वाले कवि सम्मेलन का और उनकी उस कविता भी जो मुझे ठीक से याद भी नहीं रही...वो हंस दिए थे उस बचकाने से किस्से पर. उन्हें भी कविता याद नहीं थी. वो हमेशा खूब पढ़ने को कहते, जिन्दगी जीने को कहते. उनकी कविताओं को उनके कमरे में चाय पीते हुए सुनना किसी ख़्वाब को जी लेने जैसा होता था...उनका कविता पढ़ने का ढंग मुझे बहुत म्यूजिकल लगता. हालाँकि उनकी आवाज कांपने लगी थी. लखनऊ में चारबाग के पास के एक होटल में उनसे अब तक की आखिरी मुलाकात हुई थी, उस रोज उन्हें चलने में काफी दिक्कत हो रही थी. मेरा मन बहुत उदास था. आयोजकों ने उनके सम्मान के साथ इन्साफ नहीं किया था. उनके रहने की व्यवस्था बहुत सामान्य थी. जबकि उसी कार्यक्रम के लिए आये प्रसून जोशी सरीखे लोगों के लिए दिव्य व्यवस्था थी.

हम बुजुर्गों के सम्मान का भाषण देना जानते हैं, उनके नाम उनकी शोहरत को कैश कराना भी जानते हैं लेकिन उनके साथ इन्साफ नहीं करते. सचमुच मेरा मन बहुत उखड़ा था, वो शायद मेरा मन पढ़ चुके थे. बीड़ी पी चुकने के बाद उन्होंने मेरा मन हल्का करने को कहा ‘एक फोटो तो खिंचवा लो हमारे साथ.’ मैंने छलक आये अपने आंसुओं को सहेजते हुए कहा था, ‘अरे आपसे तो मिलना होता ही रहता है, अभी आप आराम करिए, फोटो फिर कभी खिंचवा लेंगे.’ वो हंस दिए थे...’क्या पता अगली बार हो ही नहीं’. मेरी आंसुओं को सहेजने की सारी मेहनत वो बेकार कर चुके थे...तस्वीर खींची जा चुकी थी...मन की उदासी कायम ही रही...आज उनका जन्मदिन है...उन्हें बहुत बहुत याद करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर रही हूँ. दुआ कर रही हूँ कि सेल्फियों और फेसबुक के लाइक्स की भीड़ में बदलता यह समाज, तमाम सामाजिक खांचों में बंटा समाज, हिंसा और आत्ममुग्धता से तृप्त होता समाज, नकली संवेदनाओं का नया मार्केट बनता यह समाज अपनी इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों को सहेजना सीख सके...काश!

प्यारे नीरज जी, आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपसे मिलना है जल्दी ही फिर से और सुननी हैं बहुत सी कवितायेँ...इस बार आपकी बीड़ी भी पियूंगी...पक्का. लव यू ऑलवेज, हैपी बर्थडे!


Sunday, July 15, 2018

आइये चलें विदेश बिना पासपोर्ट वीजा

हेम पन्त रचनात्मक ऊर्जा से भरे उन युवाओं में से हैं जो अपने हर लम्हे को भरपूर जीने में और उस जिए से समाज को जोड़ने में यकीन करते हैं. पेशे से इंजीनियर हेम क्रिएटिव उत्तराखंड मंच से शुरुआत से जुड़े हैं. उन्होंने पढ़ने लिखने की संस्कृति के विकास के लिए एक सृजन पुस्तकालय बनाया है. वो 'क' से कविता से जुड़े हैं. थियेटर करते हैं. घुम्म्क्कड़ी, संगीत, साहित्य पढ़ने में खूब रूचि रखते हैं और हर काम में कुछ नया करने को बेताब रहते हैं. पिछले दिनों वो नेपाल यात्रा पर गए तो उन्होंने 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए कुछ संस्मरण लिखे।आइये पढ़ते हैं उनके संस्मरण- प्रतिभा 

नेपाल का एक दृश्य 
एक दृश्य जहाँ हम ठहरे गये 

प्राकृतिक विविधता और हर तरह के पर्यटक के अनुसार मनोरंजन साधनों के कारण नेपाल फिर से तेजी के साथ घुमक्कड़ों की पसन्द बनता जा रहा है। सीमा पार करने की सुगम सुविधाओं के कारण भारत से हर साल भारी संख्या में लोग नेपाल घूमने जाते हैं। लम्बे समय तक राजनैतिक अस्थिरता के बाद अब उथल-पुथल रुक गई है, संविधान का निर्माण हो चुका है और अब नेपाल के लोगों को उम्मीद है कि देश में तेजी से विकास होगा।

पिछले दिनों साथी सुनील सोनी के साथ उनकी कार से नेपाल के दो राज्यों में घूमने का मौका मिला। रविवार दिन में लगभग 4 बजे रुद्रपुर से निकलने के बाद हम दोनों लोग बनबसा (गड्डाचौकी) बोर्डर से होते हुए उसी शाम 7 बजे महेन्द्रनगर पहुंचे। अब रुद्रपुर से बनबसा तक सड़क की स्थिति बहुत अच्छी है। नेपाल की सीमा में प्रवेश करने के बाद कार का शुल्क (लगभग 300 भारतीय रुपये प्रतिदिन) देकर आसानी से रोड परमिट बन जाता है। हम लोगों का रात का विश्राम धनगढ़ी में था। महेन्द्रनगर से धनगढ़ी तक शुक्लाफांटा नेशनल पार्क के बीच से गुजरते हुए बहुत ही सुगम सड़क है। नेपाल में हर जगह सड़कों का काम बहुत तेजी से हो रहा है।

रात लगभग 9.30 बजे हम लोग धनगढ़ी शहर पहुंचे जहाँ हमारे मेजबान श्री केदार भट्ट जी हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मूल रूप से पिथौरागढ़ के निवासी श्री केदार भट्ट धनगढ़ी शहर के प्रतिष्ठित शिक्षक हैं। लगभग 40 साल से नेपाल में रहते हुए उन्होंने शहर में विज्ञान शिक्षक के रूप में बहुत नाम कमाया है, अभी भी धनगढ़ी में कई स्कूलों के साथ जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। श्रीमती भट्ट भी योग प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रही हैं।

नेपाल में संविधान निर्माण के बाद 7 राज्यों का निर्माण किया गया है और अब वहां भारत की तरह ही त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था स्थापित हो चुकी है। धनगढ़ी शहर को राज्य-7 की राजधानी बनाया गया है। यह एक तेजी से उभरता हुआ शहर है। शहर के आसपास ही भारतीय मूल के लोगों द्वारा संचालित कृषि आधारित औद्योगिक प्रतिष्ठान भी हैं। सड़कों के चौड़ीकरण का काम चल रहा है और बाजार-दुकानों में आधुनिकता की झलक दिखाई देने लगी है। एक अच्छी बात ये भी है कि नेपाल में अधिकांश दुकानें महिलाओं द्वारा चलाई जाती हैं। धनगढ़ी में कई उच्चस्तरीय पेशेवर शैक्षिक संस्थान भी हैं। यहां नॉर्वे की सहायता से स्थापित चेरिटेबल 'गेटा नेत्र अस्पताल' में आधुनिक मशीनों की मदद से सस्ती चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। इस अस्पताल में यूपी-बिहार की तरफ से भी लोग आंखों के ऑपरेशन करवाने आते हैं। दिनभर धनगढ़ी घूमने के बाद अगले दिन हमने नेपालगंज जाने का विचार बनाया।

अगली सुबह 6 बजे हम दोनों लोग कार से नेपालगंज शहर की तरफ निकले जो धनगढ़ी से लगभग 200 किमी दूर है। इस रास्ते पर लगभग 20 साल पहले भारत ले सहयोग से 22 पुलों का निर्माण किया गया है। सड़क बहुत ही अच्छी है। एक पहाड़ी श्रृंखला अधिकांश रास्ते में सड़क के समानांतर चलती है। सड़क के किनारे हरियाली भरे खेत, छोटे कस्बे और ग्रामीण जीवन के खूबसूरत नजारे दिखते हैं। जगह जगह धान की रोपाई लगाते हुए नेपाल के लोग पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर और खुशहाल नजर आते हैं। बीच रास्ते में 'घोड़ा-घोड़ी ताल' नामक एक सरोवर है जहां खूब कमल के फूल खिलते हैं। आगे जाकर चिसापानी नामक स्थान पर 'करनाली नदी' के ऊपर जापान के सहयोग से एक भव्य पुल बना हुआ है। इस पुल को पार करते ही 'बर्दिया नेशनल पार्क' का इलाका शुरू हो जाता है।

नेपाल में सभी संरक्षित वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना के हाथों में है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरती हुई शानदार सड़क पर भी सेना लगातार गश्त करती है। इस सड़क से गुजरते हुए कहीं भी रुकने की मनाही है। गाड़ी से प्लास्टिक या अन्य गन्दगी फेंकने पर भारी जुर्माना लगता है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरने वाले East-West National Highway पर वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए एक अनूठा तरीका है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' में प्रवेश करते ही वनचौकी पर रुककर वाहन का टाइम कार्ड बनता है। एक चौकी से दूसरी चौकी की दूरी के बीच 40किमी/घण्टा की स्पीड से दूरी तय करनी होती है। 13किमी दूरी के लिए लगभग 20-22 मिनट तय है। रास्ते मे कहीं भी गाड़ी रोकने की अनुमति नहीं है। जल्दी पहुंचने का मतलब है कि आपने गाड़ी तेजी से चलाई है और देरी से पहुंचने का मतलब आप रास्ते में कहीं रुके थे। दोनों स्थितियों में जुर्माना हो सकता है। जंगल से बाहर निकलते समय सेना द्वारा गाड़ी की एक बार फिर से अच्छी तरह जांच की जाती है। गाड़ी से जंगली जानवर को चोट पहुंचाने पर 6 महीने की सजा और एक लाख नेपाली रुपये जुर्माना।

नेपाल में ज्यादातर लोग बस-मैटाडोर से सफर करते हैं। रोड पर ट्रैफिक बहुत ज्यादा नहीं है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि 200% कस्टम ड्यूटी के कारण कार और बाइक बहुत महंगी हैं। भारत में जो कार ₹5 लाख की है वो नेपाल में ₹15 लाख में आएगी (लगभग 23-24 लाख नेपाली रुपये) बड़े और मध्यम स्तर के शहरों के बीच Air Connectivity भी बहुत अच्छी है। सड़कों की स्थिति ठीकठाक है और भारतीय गाड़ियों के लिए बहुत सुगमता है। हमारे साथी मुकेश पांडे और उमेश पुजारी पिछले साल इसी रास्ते बाइक पर पूरा नेपाल लांघते हुए भूटान तक गए थे।

भारत के लोगों के साथ नेपाल के निवासी बहुत मित्रवत व्यवहार करते हैं। भाषा सम्बन्धी कोई खास समस्या भी नहीं होती। अकेले घूमने के शौकीन लोगों के लिए नेपाल में कई सुविधाएं उपलब्ध हैं और पारिवारिक भ्रमण के लिए भी नेपाल एक सुरक्षित स्थान है।

तो अगर आप दुनिया घूमने का शौक का शौक रखते हैं तो नेेेपाल से शुरुआत कीजिए, बिना पासपोर्ट और वीजा

Saturday, July 14, 2018

‘नहीं, कभी नहीं’ के उस पार



इन दिनों वॉन गॉग साथ रहते हैं. सुबह की चाय हम साथ पीते हैं, शाम को हम एक साथ देखते हैं थके हुए सूरज का घर जाना और आसमान पर रंगों का खेल. रात हम बारिशों की धुन सुनते हैं. हम साथ होते हैं लेकिन खामोश रहते हैं.

मुझे यूँ चुप होकर साथ रहने वाले दोस्त अच्छे लगते हैं. रात भर बारिश हुई. गॉग और मैं इस बारिश की बाबत खामोश रहे. वो इस वक़्त प्रेम पर अटके हुए हैं, शायद मैं भी. ‘इस वक़्त’ के बारे में सोचकर ‘किस वक़्त नहीं’ मुस्कुरा रहा है.

यूँ प्रेम पर अटके होने का अर्थ है, उदासी के निकट होना. उदासी बरस जाए तो राहत हो, शायद इसीलिए मुझे बरसना पसंद है, गॉग को रंग बनकर बिखरना. हम दोनों एक दीवार के इस पार हैं जिसे उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार का नाम दिया है. वो बोल रहा है, मैं चुप हूँ. प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार चाइना वॉल से भी बड़ी और मजबूत लगती है. लेकिन दीवार के इस पार खड़ा प्रेम, हमेशा उस पार के ‘नहीं, कभी नहीं’ के आगे सजदे में रहता है. पीसा की मीनार ने क्या पता इन प्रेमियों से झुककर रहना सीखा हो.

वॉन गॉग थियो को लिखी अपनी चिठ्ठियों में लिखते हैं, ‘‘तुम बतलाओ कि क्या तुम्हें यह विस्मित नहीं करता कि कोई प्रेम इतना गंभीर और भाव-प्रवण हो सकता है कि कैसे भी बर्फीले ‘नहीं, कभी नहीं’ के बावजूद निष्कम्प जलता रहे? मुझे तो लगता है कि यह अत्यंत ही स्वाभाविक और सामान्य है.’’

यह स्वाभाविक और सामान्य होना सबके हिस्से नहीं आता, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रेम सबके हिस्से नहीं आता. तो इस प्रेममय उदासी के अपने जीवन में आने के प्रति आभारी होना चाहिए हमें. लेकिन हम तो शिकायत से भर उठते हैं.

गॉग कहता है, ‘’प्रेम इतना सुदृढ़, सच्चा और सकारात्मक भाव है कि इसमें अपनी भावनाएं वापस लेना उतना ही असम्भव है जितना अपने प्राण ले लेना.’ मेरा जीवन और मेरा प्रेम दोनों एक हैं. मेरे लिए फ़िलहाल यह ‘नहीं, कभी नहीं’ बर्फ की एक सिल्ली है, जिसे मैं अपने सीने के ताप से पिघलाने में जुटा हूँ.’

गॉग की तरह शायद बहुत सारे प्रेमी अपने सीने के ताप से ‘नहीं, कभी नहीं’ की बर्फ की सिल्ली को पिघलाने की कोशिश में होंगे. शायद न भी हों. गॉग ने अपने रंगों और लकीरों को जीवन से लिया है. उसने जिन रंगों का प्रयोग किया वो दुकान से लिए भले ही गए होंगे लेकिन उन्हें जीवन के, महसूसने के पानी में घोलकर उसने रचा वो अद्भुत है. उसने बिना जिए एक लकीर भी नहीं खींची, यूँ ही सांसों को आने-जाने का क्रम होने से बचाकर रखा, जिया उसने शायद तभी उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार के आगे ‘वही और दूसरी कोई नहीं’ की लकीर खींच दी. उसने थियो को लिखा, ‘मैं इसे कमजोरी न मानकर ताकत मानता हूँ. वह मेरा एकमात्र आधार है जिससे मैं हटना नहीं चाहता.’

‘नहीं, कभी नहीं’ का विलोमार्थी क्या होता होगा. गॉग ने इस विलोमार्थी को ‘वही, और कोई नहीं’ से गढ़ा. उसने भाई को लिखा कि, ‘अगर तुम्हें कभी प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ सुनने को मिले तो उसे चुपचाप स्वीकार मत करना.’

तो चुपचाप न स्वीकार करने का क्या अर्थ है आखिर, युद्ध करना, किससे, ‘नहीं कभी नहीं’ से या ‘वही और कोई नहीं’ से. अक्सर लोगों को इन दोनों के ही आगे घुटने टेकते पाया है. आज जो ‘वही, और कोई नहीं’ है कल वह ‘कोई और’ किस तरह हो जाता होगा मालूम नहीं. कभी-कभी लगता है, ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार से टकराना हमारे भीतर का कोई ईगो तो नहीं. तब तक उससे टकराना जब तक वो टूट न जाए. एक बार जो वो टूट गया तब? इसके आगे एक गहन शांति है. इस ‘नहीं, कभी नहीं’ का होना असल में हमारे होने को बचाए हुए है. यही उम्मीद है. गॉग कहते हैं कि, ‘’हम हमेशा यह बतलाने की स्थिति में नहीं होते कि वह क्या है जिसने हमें ढांप रखा है, बंदी बना रखा है. जो हमें दफन किये देता है, हालाँकि हम उन चट्टानों, उन दरवाजों, उन दीवारों को बखूबी महसूस करते हैं. क्या यह सब हमारी कल्पना या फंतासी है? मुझे नहीं लगता और मैं पूछता हूँ, हे ईश्वर! यह कितनी देर चलेगा, क्या आजीवन ऐसा ही कोहरा बना रहेगा? तुम जानते हो इस कारावास से मुक्ति कहाँ है? केवल एक सच्चे और गहरे प्रेम में.’’

सच्चा और गहरा प्रेम. क्या इसके अलावा भी कोई प्रेम होता है. प्रेम है तो उससे बड़ा सच कोई नहीं और उसकी गहराई आपको उदास सागर में डुबो देगी. ऐसे ही आता है प्रेम, सब ध्वस्त करते हुए. यही निर्माण की प्रक्रिया है. बिना प्रेम में पड़े हुए लोगों को कभी मालूम नहीं होता कि उन्हें प्रेम नहीं हुआ है, उन्हें उम्र भर मालूम नहीं होता इसलिए वो उदासी को प्रेम नहीं पढ़ पाते और प्रेमियों को ‘दुखी आत्मा’ कहते हैं. जबकि असल में वो सुखी आत्माएं ही हैं.

गॉग लिखते हैं, ‘’इस प्रेम की शुरुआत से जैसे यूँ लग रहा था कि इसमें मुझे खुद को पूरा झोंक देना है. बिना आगा पीछा सोचे, यूँ कूद पड़ने में ही थोड़ी उम्मीद है. पर फिर मैं थोड़ी या अधिक उम्मीद के बारे में क्यों सोचूं. प्रेम करते वक्त क्या मुझे यह सब फालतू बातें याद रखनी चाहिए. हरगिज नहीं. हम प्रेम करते हैं क्योंकि हम प्रेम करते हैं. बस. कल्पना करो कि एक स्त्री क्या सोचेगी यदि उसे पता चले कि सामने वाला उससे प्रेम निवेदन तो कर रहा है किन्तु एक हिचक के साथ. क्या तब उसका उत्तर ’नहीं, कभी नहीं’ से अधिक कठोर न होगा? ओह थियो, छोड़ो. कुछ और बात करते हैं. प्रेम तो सिर्फ प्रेम है, उसके आगे पीछे कुछ नहीं. उसमें डूबा हमारा मन एकदम साफ़ चमकीला और खुला होता है, न भावनाएं छुपाई जाती हैं न आग बुझाई जाती है. केवल एक सहज स्वीकार- खुदा का शुक्र है यह मोहब्बत है!”

ह्म्म्म खुदा का शुक्र है कि मोहब्बत है. खुदा का शुक्र है कि है ‘नहीं, कभी नहीं’ भी. क्या हमने प्रेम में पड़े हुए लोगों के साथ पेश आना सीखा है. क्या हमने मनुष्य के तौर पर किसी दूसरे मनुष्य के साथ पेश आना भी सीखा है? हम लोगों के सुखों को दुखों में बदल देने में माहिर लोग हैं शायद इसीलिए प्रेमी अपना एकांत गढ़ लेते हैं. दुःख का एकांत. जहाँ प्रेम, उदासी, ईश्वर, सब साथ रहते हैं. गॉग का यह कहना विभोर करता है कि, ‘’तुम मुझे इस ‘नहीं, कभी नहीं’ पर बधाई दो.’’

हम सांत्वना देते हैं इश्क में दुःख को जीते व्यक्ति को, हम उसे बधाई नहीं देते, गॉग सिखाता है हमें कि प्रेम में डूबे व्यक्ति से किस तरह पेश आना चाहिए. क्योंकर सोचना विचारना, क्या हो जाएगा उससे. कि प्रेम तो मृत्यु की तरह अनपेक्षित है. आपका बस तो उस पर चलना है नहीं तो आने दो उसे यूँ ही अपने बहाव में. सुनो ध्यान से कि ‘’जब भी प्रेम में पड़ो- बिना किसी हिचक के उसके साथ बह जाना. या फिर यूँ कहें कि जब तुम प्रेम में पड़ोगे तो तुम्हारी सारी हिचकिचाहट अपने आप ही दूर हो जाएगी. इसके अलावा जब तुम प्रेम करोगे तुम पहले से ही अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त तो नहीं होओगे पर बावजूद इसके मुस्कुराओगे.’

‘’कुछ भी हमें जीवन के यथार्थ के उतना करीब नहीं ले जाता, जितना सच्चा प्रेम. सच मानो, प्रेम के छोटे-छोटे दुःख भी मूल्यवान हैं.’’ इसलिए किसी की सिसकियों पर आंसुओं में डूबे चेहरे पर कभी तरस मत खाओ उसे प्रेम से देखो और उसके सुख को महसूस करो.

एक जन्म माँ बाप देते हैं, दूसरा जन्म देता है प्रेम. कि जीवन के अर्थ बदलने लगते हैं समूची सृष्टि को प्रेम और सद्भाव से भर देने की इच्छा प्रेम ही तो है. कि ‘’जबसे मैंने प्रेम के असली स्वरूप को जाना है, मेरे काम में सच्चाई बढ़ी है.’’

यह सच्चाई सिर्फ काम में नहीं जीवन में भी बढ़ी है शायद, इसे बढ़ना ही है और...और..और... बस कि प्रेम पर भरोसा रखना!

(पढ़ते हुए वॉन गॉग के खत, भाई थियो के नाम)

पुस्तक- मुझ पर भरोसा रखना
अनुवाद- राजुला शाह
प्रकाशक- सीज़नग्रे

https://www.prabhatkhabar.com/news/novelty/diary-of-a-writer-pratibha-katiyaar/1182628.html

Friday, July 13, 2018

यह बारिश नहीं प्रेम है...


उस लड़की को भीगते देख 
मत होना नाराज उस पर 
न भागना उसकी मदद को 
न ताकीद देना उसे 
जल्दी घर पहुँचने की 
बुखार से बचने की 
कि उसने जान-बूझकर 
अपनी छतरियां गुमाई हैं 

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बहुत सारे कामों की लिस्ट जेहन में लिए
तेज़ क़दमों से सड़कें नापते हुए 
जिन्दगी की भागमभाग को सहेज पाने में 
सिरे से नाकाम होते हुए 
झुंझलाते हुए 
जब आप हों कहीं पहुँचने की जल्दी में  

मौसम साफ़ देख न रखा हो छाता ही साथ 
न रेनकोट ही 

कि अचानक आ जाए तेज़ बारिश 
संभलने का मौका न दे रत्ती भर 
तर-बतर कर दे सर से पाँव तक 
किसी दुकान में 
किसी बस स्टैंड में ठहरकर
बारिश से बचा लेने की 
गुंजाईश तक न मिले 

तो समझ लेना 
यह बारिश नहीं प्रेम है...