Thursday, May 31, 2018

जिन्दगी की कश्मकश से रू-ब-रू कराती कवितायें



- प्रतिभा कटियार

यूँ तो समूचा जीवन ही कविता है लेकिन जीवन में कविता कहाँ टकराएगी पता नहीं. यह कविताओं का तूफानी दौर मालूम होता है. पलक झपकते ही अनगिनत कविताएँ नज़रों से गुजरती हैं, लेकिन ठहरती कुछ ही कवितायेँ हैं. पिछले दिनों ऐसी कुछ कविताओं से वास्ता पड़ा जो ज़ेहन में ठहरी हुई हैं. ये कवितायेँ हैं श्रुति कुशवाहा की. श्रुति के संग्रह ‘कश्मकश’ से गुजरते हुए महसूस होता है कि कहीं अपने ही भीतर की किसी पगडंडी से गुजर रही हूँ. अपने ही सवालों को श्रुति की मार्फत दोबारा पढ़ रही हूँ और दुनियादारी के शोर में बचाकर रख रही हूँ थोड़ी सी उम्मीद.

यह श्रुति का पहला संग्रह है. कई मायने में यह संग्रह अपनी विशेषताओं की ओर ध्यान खींचता है. इस संग्रह में जिन्दगी की छुअन महसूस होती है. जिन्दगी के सारे रंग बिना किसी तरह के कॉस्मेटिक प्रभाव के यहाँ मिलते हैं, संवेदना की तमाम परतें स्वाभाविक ढंग से खुलती हैं. रिश्तों के प्रति जीवन के प्रति, समाज के प्रति कवि की संवेदना ने इस संग्रह को गढ़ा है. इन कविताओं में जहाँ समाज की तमाम विद्रूपताओं के प्रति एक सजग नजर और नाराजगी का भाव दीखता है वहीँ नकारात्मकता से लड़ने का माद्दा भी दीखता है. इन कविताओं में बदलाव की मध्धम-मध्धम आंच में पकती जिद दिखती है और दिखती है आने वाले कल को लेकर एक उम्मीद.

संग्रह की पहली कविता ‘सही वक़्त’ कवि के मिजाज़ को खोलती है जहाँ वो कहती है ‘दिखने में आदमी जैसा/जब नहीं रह जाता आदमी/जब चारों ओर मंडराता है संकट/ वही होता है/कविता लिखने का सबसे सही वक़्त.’

लिखने की भूख, से परे लिखने को जीवन की जरूरत में तब्दील होने के रूप में देखती श्रुति अपनी कविता ‘लिखना लाज़मी है’ लिखती हैं. दुनिया किस तरह कृत्रिम होती जा रही है और उस कृत्रिमता के शोर में किस तरह सच्चाई और सरलता पीछे छूटती जा रही है इसे ‘सब महफ़ूज हैं’ में देखा जा सकता है ‘ इधर भेडिये को सौंप दी गयी है चौकीदारी/अब डरने की कोई वजह नहीं/ सब महफूज हैं.’

इन कविताओं के स्वर कवि की चेतना और सजगता को इंगित करते हैं. वह जो एक पूर्वानुमान अक्सर बन जाता है किसी स्त्री के संग्रह को खोलते वक़्त कि स्त्री विषयक स्वर होगा ही मुख्य स्वर, वह टूटता है क्योंकि संग्रह की रेंज काफी ज्यादा है. ‘निर्ममता’ नामक कविता में ऐसे ही स्वर को इस तरह दर्ज किया है कवि ने, ‘अपनी कौम और देश/ खुद नहीं चुनते बच्चे/लेकिन/ कौम और देश के नाम पर/मारे जाते हैं वो’.

कविता में बहुत सारी पर्तें खुलती हैं समय की, भीतर की बेचैनी की और वो हमें खंगालती भी हैं, मुक्तिबोध की याद आती है कविता ‘सवाल’ पढ़ते हुए जहाँ वो लिखती है ‘ये दुनिया उतनी ही बुरी है/जितनी हमने सुनी है/ ये दुनिया उतनी ही भली है/जितनी हमने देखी है/ सवाल दुनिया का नहीं/ सवाल तो यह है/कि हम किस ओर खड़े हैं.’

अपने भ्रमों को टटोलती है कवि की नज़र और ‘आज़ादी’ कविता में ढलती है कुछ इस तरह ‘ आज़ादी का जश्न मनाने का सोचती हूँ/कि याद आ जाती है मणिपुर की ईरोम चानू शर्मिला/अरुणा शानबाग, सोनी सोरी, थान्गजाम मनोरमा/ निलोफर, आसिया जान, निर्भया, प्ररेति राठी/कानों में गूंजते हैं ढेरों नाम/शिकारी घूम रहा है खुलेआम’ इसी कविता में वो आगे लिखती है, ‘ सावधान! आवाज उठाना सख्त मना है/आवाज़ उठाने की एवज में होंगे बलात्कार’. एक और कविता ‘क्या तुम जानते हो’ का जिक्र इसी संदर्भ में ज़रूरी है जहाँ कविता सवाल करती है, ‘क्या तुम जानते हो डाऊआला की जूली की कहानी/सोलह की उम्र में/मर्दों की गन्दी नज़र से बचाने के लिए/जिसके वक्षों को गर्म पत्थर से दागा गया था/कैमरून में अरसे से हो रही है ब्रेस्ट आयरनिंग’ यह कविता अपने समय और समाज में स्त्रियों के प्रति आई क्रूरता की कलई खोलते हुए सवाल करती है. इसकी रेन्ज में पूरी दुनिया की स्त्रियाँ हैं, उनके दर्द हैं, उनकी तकलीफें हैं और इन सबको जोडती है दुनिया की हर एक स्त्री की पीड़ा से, उसके प्रति की गयी उपेक्षा से और अंत में कविता कुछ यूँ कहती है, ‘चलो ये सब छोड़ो/बताओ क्या तुम जानते हो/ सालों से अपने घर के भीतर रहने वाली/अपनी पत्नी के बारे में/जो हर रात सोती है तुम्हारे बाद/हर सुबह उठती है तुमसे पहले/क्या उसने नींद पर विजय पा ली है?’

इन कविताओं को स्त्री विमर्श के खांचे में डालकर देखा जाना कविताओं को कम करके आंकना है. क्योंकि स्त्री भी कवि की कविताओं में उसी तरह आती है जिस तरह अन्य विषय आते हैं और उन सबका आना एक ही बात का सूचक है कि कवि की चिंता में यह समूची दुनिया है जिसे वो हंसी से, ख़ुशी से, मोहब्बत से भर देना चाहती है. इसके लिए वो तमाम वर्जनाओं को तोड़ने से भी गुरेज नहीं करती.

‘और हंसो लड़की’ ‘बुरी औरत’ ‘लाल रंग की लड़की’ ‘स्कूल जाती लड़की’ ‘लड़कियां’ आदि कवितायेँ इस समूची धरती को सुंदर बनाने की कामना की कवितायेँ हैं, स्त्रियों को भी इन्सान समझे जाने की बात कहती कवितायेँ हैं. इन कविताओं के ज़रिये स्त्रियों के लिए भी इस दुनिया और समाज में जगह बनाने की, उनकी अस्मिता को सहेजने की बात तो है लेकिन यह किसी किस्म के आरोप, प्रत्यारोप, और पुरुषों से किसी किस्म के भेद या उनके प्रति औफेंसिव कवितायेँ नहीं हैं.

श्रुति की कवितायेँ शोर नहीं मचातीं, वो चुपचाप असर करती हैं. सोशल मीडिया पर इन कविताओं का कोई शोर नहीं, न ही सर पर कविताओं को लेकर घूमने की कोई हड़बड़ी. कवि के संजीदा और संकोची मिजाज़ की मुनादी सी हैं ये कवितायेँ कि भोपाल शहर से एक आत्मीय रिश्ता भी खुलता है संग्रह की एक कविता में जहाँ भोपाल शहर के नाम एक खत आता है. प्रेम कवितायेँ हौले से सटकर आ बैठती हैं बिना किसी लाग लपेट के और आसपास प्रेम महकने लगता है.

भाषाई चमत्कार से कतई दूर इन कविताओं की सरलता और सहजता इनका मूल तत्व है जिसके चलते इन कविताओं से रिश्ता जल्दी ही कायम हो जाता है.

चूंकि यह पहला संग्रह है तो जाहिर है छुटपुट जगह बिखरा हुआ सा अनगढ़पन भी दिख जाता है. वह अनगढ़पन दीखता है कविताओं के चयन में. कुछ कविताओं को इस संग्रह में शामिल करने से बचा जा सकता था हालाँकि ऐसी कवितायेँ कम ही हैं. अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित यह संग्रह प्रोड्क्शन के लिहाज से भी काफी अच्छा है.

मेरे लिए आजकल के ‘मेरी कविता तेरी कविता’ के शोर के बीच एक सजग, संवेदनशील, संकोची मिजाज़ की कवि की समय से मुठभेड़ करती, सवाल उठाती और नए रास्ते बनाने में यकीन करती कविताओं से रू-ब-रू होना सुखद अनुभव है. ये कवितायेँ पेज पलटते ही पलट नहीं जातीं बल्कि जेहन में रह जाती हैं. कविताओं के सैलाब के बीच ऐसी कविताओं का होना उम्मीद का होना है.

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Wednesday, May 30, 2018

रेखा चमोली की डायरी के साथ एक यात्रा


यह 2012 की याद को पलट के देखना है. उस रोज जब मुठ्ठियों में 20 मई का दिन था और सामने उत्तरकाशी का रास्ता. अगर स्मृति दोष नहीं है तो संभवतः वह 25 मार्च 2012 का दिन था, मैं पहली बार उत्तरकाशी के रास्तों पर थी. फ्योली के फूलों से भरा रास्ता खूबसूरत पहाड़ और एक नयी दुनिया में जाने का नए लोगों से मिलने का बहुत कुछ नया जानने सीखने का उत्साह सफ़र को खुशनुमा बना रहा था. मैं बावरी सी सब कुछ देख सुन रही थी, महसूस कर रही थी.

पहले भी कई बार उत्तरकाशी गयी हूँ, वहां के शिक्षक साथियों से मुलाकातें की हैं, स्कूलों में जाना हुआ है, नदियों से दोस्ती हुई है, लोगों से प्यार हुआ है. उत्तराखंड में देहरादून के बाद उत्तरकाशी से ही पहले पहल की दोस्ती हुई. आज जब कई बरस बाद उत्तरकाशी के रास्ते पर हूँ तो लग रहा है स्मृति के वो पन्ने भी साथ हैं.

मैं रास्तों में बादलों की लुका-छिपी, फूलों की बहार ढूंढ रही थी लेकिन यह मौसम कोई और था. पहाड़ों में आग लगी हुई मिली. बादलों की लुका-छिपी की जगह धुआं नज़र आ रहा था. रास्तों में हरियाली कम नदियों में पानी कम लेकिन मन में उत्साह जरा भी कम नहीं. उत्साह की मुख्य वजह थी शिक्षिका रेखा चमोली की डायरी 'शिक्षक की स्कूल डायरी' जिसे अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने प्रकाशित किया है का विमोचन और डायरी पर शिक्षकों से बातचीत का अवसर.

रेखा शैक्षिक अनुभवों से समृद्ध शिक्षिका हैं. यह समृध्धि उनके काम के बरसों से नहीं उनके काम की गहराई से मापी जा सकती है. मैं उनसे कई बार मिली हूँ, औपचारिक व अनौपचारिक हर स्तर पर बातचीत की है, उनकी कवितायें पढ़ी हैं और रेखा को महसूस किया है. मैंने पाया है कि रेखा अपने लिखे में, अपने दिखे में और अपने जिए में एक सी हैं. मेरे तईं यह बात बेहद मूल्यवान है. शायद यही वजह है कि रेखा मैम अब प्यारी रेखा यानि सहेली रेखा में बदल चुकी है. रेखा की डायरी पर विस्तार से अलग से बात करनी होगी लेकिन यह तय है कि अब तक जितने भी पन्ने पलटे हैं उनके भीतर एक पॉजिटिव अनरेस्ट दिखा है, कुछ करने की शदीद इच्छा, बहुत कुछ जानने की, सीखने की इच्छा. मैं इन इच्छाओं का बहुत सम्मान करती हूँ इसलिए जहाँ भी ये इच्छाएं हैं वहां होना चाहती हूँ. क्योंकि कुछ भी करने से पहले इच्छा का होना जरूरी है. वरना बिना इच्छा के, बिना बेचैनी के, बिना सीखने की कोई चाह के भी कई किताबें लिखने वालों को, भाषण देने वालों को भी जानती ही हूँ.

मेरे लिए यह बेहद खूबसूरत अवसर था कि मैं भावनाओं, काम और अभिव्यक्ति में ईमानदार रेखा चमोली की किताब के विमोचन में उनके साथ रही. ऐसे साथ हमेशा आपको कुछ सिखाते हैं, परिमार्जित करते हैं. इसी अवसर पर मुझे डायरी पर शिक्षकों के साथ संवाद करने का भी अवसर मिल रहा था. कोई भी बाहरी संवाद असल में पहले भीतरी संवाद ही होता है इस लिहाज से शिक्षकों के साथ संवाद असल में मेरे ही सीखने, जानने, महसूसने और कुछ अब तक के जाने हुए को साझा करना था. यह बातचीत 3 अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग शिक्षक समूहों के साथ होनी थी. सबसे पहले हम बडकोट पहुंचे.

बड़कोट- बडकोट एक क़स्बा है. पहाड़ों को मसूरी या नैनीताल में ढूँढने वालों के लिये इसका नाम न सुना होना लाजिमी हो सकता है. लेकिन यह पहाड़ों से घिरा सुंदर सा शहर है. छोटा, सादा, सुंदर. छोटी-छोटी सब्जी की दुकानें, फलों की दुकानें, छोटी-छोटी रोजमर्रा की ज़रूरत के सामान की दुकानें. छोटी सी मार्किट जिससे गुजरना भला लगता है. बहुत सारे अजनबी लोग जो अजनबी नहीं प्यारे लगते हैं. किसी पर भी भरोसा करने को जी चाहता है. कमरों में ताला लगाने की जरूरत नहीं लगती. लोग झिड़कते नहीं किसी बात पर. हर कोई अपने काम में व्यस्त है लेकिन किसी को कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं है. मैं यहाँ पहली बार आई हूँ और महसूस कर रही हूँ कि ऐसी ही तो किसी जगह की तलाश थी. कितनी शांति है यहाँ. अजनबियत से भी ऐसा अपनापन जो कई बार अपनों के बीच भी मिसिंग लगता है.

मैं और रेखा दोनों डायट बडकोट समय से पहले ही पहुंचकर लोगों से मिलना चाहते थे. रेखा की काफी यादें जुडी हैं बडकोट से. उसके लिए यह नया नहीं है. रेखा ने यहीं डायट बडकोट से बीटीसी की ट्रेनिंग ली है. यह शहर उसके लिए पहचाना है, लोग पहचाने हैं. मैं उसके पहचाने हुए के बीच अपना अजनबी होना छुपा रही हूँ. रेखा जिस प्यार से, सहजता से लोगों से मिलती है वह मुझे बहुत विरला सा लगता है. उसमें सचमुच का अपनापन होता है. यहाँ लोग भी रेखा को खूब प्यार करते हैं, सम्मान करते हैं.

कार्यक्रम ठीक-ठीक हो जाने का सुख हमारे साथ शाम से हो लेता है. यह ठीक से होना क्या है आखिर? तालियाँ, प्रशंसा या कुछ अकुलाहट, कुछ सवाल. कार्यक्रम के अंत में शिक्षकों के सवालों ने मुझे मोहा. वो सवाल कि कैसे लिखने के दौरान आती हैं अडचनें, कैसे दूर किया जा सकता है? नियमित कैसा हुआ जाय? क्या हर कोई लिख सकता है सचमुच? रेखा कैसे वक़्त निकालती होंगी लिखने का? डायरी को बेस्ट फ्रेंड के रूप में पाना और पलटकर खुद को देखना, अपने भीतर कुछ सुधार कर पाना आदि.

सफल होना असल में सवालों से भर जाना ही तो है. अगर पुराने सवाल थे तो नए सवालों से उन्हें बदल लेने से भी है. अगर भीतर शांति थी अब तक तो उसे एक बेचैनी, एक अकुलाहट से भर देना और शुरू करना सोचना कि कुछ न कुछ तो अब करना होगा. कि जब आप जैसे आये थे वैसे ही वापस न जा रहे हों. मैं तो वैसी ही वापस नहीं जा रही थी लेकिन देख पा रही थी कि काफी शिक्षक साथी अपनी अकुलाहट को लेकर बात कर रहे थे. कुछ भावों में डूबे हुए थे . कुछ ठान चुके थे कि आज से ही शुरू हो जायगा डायरी लेखन.

उत्तरकाशी- उत्तरकाशी खूबसूरत शहर है. इस शहर की नदी के किनारे मैंने अकेले काफी वक़्त बिताया है. यहाँ पहुँचते ही फिर वही कल कल कल का शोर पुकारने लगा था. हर्षा रावत जी से मिलने का तय हुआ और नदी का किनारा पकडकर चल पड़ी उनके घर. सारे रस्ते नदी बात करती रही. वो कोलाहल, वो नदी का रौद्र रूप जो आपदा बन आया होगा. मैंने पूछा नदी से, 'क्यों तुमने रुलाया इतने लोगों को? स्वभाव से तो तुम ऐसी नहीं हो? ' नदी खामोश रही. इस ख़ामोशी में उसकी भी पीड़ा दर्ज है, ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ों से उठते धुंए में पहाड़ों की पीडा दर्ज है, पक्षियों का दर्द दर्ज है. इस दर्द की जिम्मेदारी हमारी ही है, उत्तरकाशी में पसीना पोछते लोगों का दुःख समझा जा सकता है, जहाँ कभी पंखे होते ही नहीं थे ,अब एयरकंडिशन लगे हुए है. हर्षा जी का घर नदी के ठीक सामने है. यहाँ इसी नदी की धार के बीच पत्थरों पर बैठकर मैंने और हर्षा जी ने घंटों बात की थी. यह और बात है कि बाद में वह बात एक साक्षात्कार बना था. आज हम फिर उसी जगह थे, चाय थी, शाम थी हर्षा रावत का स्नेहिल साथ था. वापसी में हमें रस्ते में तीर्थयात्रियों का सैलाब मिला ऐसा सैलाब कि पैदल व्यक्ति भी जाम में अटक जाय. हमारे धर्म हमारी आस्थाएं हमारे रास्ते आसान तो कभी नहीं करते, हाँ रोकते कई बार हैं. ऐसा क्यों होता होगा भला. शायद हमारे ही धर्मों को देखने समझने और अपनाने का कोई दोष होगा.

अगले दिन कार्यक्रम समय से तनिक देर से शुरू हुआ लेकिन चला पूरी धुन में. यहाँ काफी शिक्षक मुझे भी जानते थे लेकिन यह कार्यक्रम रेखा के शहर में हो रहा था. यह उसकी शाम थी. वो उन लोगों के बीच थी जिनके बीच पली, बढ़ी और बड़ी हुई है. अपनी दूसरी किताब के साथ इन सबके बीच होना रेखा को उत्साह से भी भर रहा था और संकोच से भी. वो सबसे मिल रही थी. लोग उसे प्यार कर रहे थे, बधाई दे रहे थे. वो संकोच को छुपाने के प्रयास में और खूबसूरत लग रही थी. यहाँ भी डायरी लेखन पर बातचीत हुई, रेखा ने अपने अनुभव साझा किये डायरी के कुछ अंश पढ़े भी गए. इन कार्यक्रमों की आत्मीयता मोह लेती है.

रामेश्वरी लिंगवाल मैडम से कई सालों बाद मिलना हो रहा था. वो बार बार गले लग रही थीं फिर चुप होकर देख रही थीं. मैं उस भीतर घट रहे को सहेज रही थी ठीक वैसे ही जैसे रेखा सहेज रही थीं सबसे मिलना. उनकी दोनों प्रधानाध्यापिकाएं, साथी शिक्षक, दोस्त, सीनियर्स सब थे. रेखा ने कुछ बहुत कमाल की बातें कहीं मसलन यह किताब या कुछ भी लिखना एक स्त्री के लिखने और पुरुष के लिखने में जो अंतर है उसे अभी समाज नहीं पाट पाया है. स्वीकार्यता का भी मसला है. एक शिक्षक को सिर्फ स्कूल आकर पढाना और घर जाने से ज्यादा कुछ करना होता है. यह डायरी किसी सफलता की कहानी नहीं बल्कि शिक्षक के सफर की दास्ताँ हैं.

कार्यक्रम बीत चुका था, सूरज ढल रहा था ठीक आँखों के सामने और नदी की पुकार बढती ही जा रही थी.

चिन्यालीसौड- यहाँ भी पहली बार आई हूँ. रेखा आज खुद अपनी गाडी ड्राइव करके आई हैं. मैं उसकी हिम्मत को देखकर दंग हूँ. संकोच के साथ हिम्मत का मिश्रण गजब का सौन्दर्य लेकर आता है. एक संयुक्त परिवार में रहते हुए सबको साथ लेकर चलना और अपने मन को भी न छोड़ने का संकल्प सामान्य बात तो नहीं. जीवन के हर लम्हे को सुंदर और सार्थक तरह से जीने की जिद रेखा को भीड़ से अलग करती है. मुझे हैरत और सुख इस बात का हुआ कि मुझे यहाँ भी खूब जानने वाले शिक्षक साथी मिले. पहचानी आखों में खुद के लिए स्नेह देखना बताता है पिछली मुलाकातों का असर. यहाँ भी हमने शिक्षकों से शिक्षक डायरी की बाबत कुछ ज़रूरी बातें कीं मसलन क्या हो जाता है लिखने से, क्या लिखना किसी समस्या का हल है, शिक्षक की जिन्दगी में क्या बदलता है डायरी लिखने से, उसकी कक्षाओं में क्या बदलाव आता है. बात एक ही थी कि डायरी लेखन पहले खुद से रिश्ता बनाने में मदद करता है फिर बच्चों से. इससे हमारा और बच्चों का सीखना कुछ हद तक आसान होने लगता है. रेखा ने अपने अनुभवों को यहाँ भी साझा किया. उसने कहा, हम कैसे शिक्षक के तौर पर याद किये जाना चाहते हैं. हमें क्या याद है कि किस शिक्षक ने विज्ञान का कौन सा सूत्र समझाया था, किसने गणित का कोई सवाल समझाया था? नहीं, हमें वही शिक्षक याद रहते हैं जो हमारे मन को छू पाते हैं, जो हमारे टूटते हौसले पर विश्वास का मरहम रखते हैं. जो सर पर हाथ फेरकर कहते हैं कोई बात नहीं, तुमसे हो जाएगा यह काम. शिक्षक को किस तरह अपने जाति धर्म, ऊंच-नीच के पूर्वाग्रहों से मुक्त होने की जरूरत है, स्कूल संस्था में किस तरह इनका नकारात्मक असर पड सकता है, जो बच्चों के साथ सारी जिन्दगी के लिए पैबस्त हो जाता है इस बारे में सोचने की जरूरत है.

चिन्यालीसौड में एक और युवा शिक्षक सुंदर नौटियाल ने अपनी और अपने बच्चों की स्व प्रकाशित डायरी की बाबत जब हमें बताया तो सुखद हैरानी की बात तो थी ही. विज्ञान के शिक्षक सुंदर ने विज्ञान को कैसे खेल बनाकर सिखाना शुरू किया है क्लास में वो अनुभव भी दिलचस्प थे. यह जानना और भी सुखद आश्चर्य से भर रहा था कि इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वो छुट्टी लेकर आये थे. ऐसी भी लगन होती है शिक्षकों में.

तीनों अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग लोगों से लगभग एक सी बात करते हुए भी हम हर बार अलग थे. इस बात में शिक्षकों के संकोच, उनके सवाल, कुछ अन्य साथी शिक्षकों के डायरी के पन्ने, कुछ बच्चों की डायरी के पन्ने और बहुत सारे साथियों के प्यार के साथ थी रेखा की डायरी. इस डायरी के बहाने हुए संवाद सार्थक संवाद रहे और इस संवाद में सभी शिक्षक साथी हर लगभग हर जगह अपनी इच्छा से शामिल हुए. क्या यह सचमुच उत्साह की बात नहीं कि इतने सारे शिक्षक साथी एक जगह जमा होकर अपनी छुट्टी के समय में से समय चुराकर एक शिक्षक साथी की डायरी के पन्ने पलटते हैं, उनसे बात करते हैं और खुद भी ऐसा ही कुछ करने की इच्छा से भर उठते हैं.

शिक्षा जगत में रेखा चमोली की इस डायरी का प्रकाशित होकर आना एक बेहद सकारात्मक घटना है. 

Sunday, May 27, 2018

प्रतिरोध, शोर और जुलूस



अन्याय होगा तो प्रतिरोध भी होगा
प्रतिरोध का अपना ढब भी होगा
शोर भी मचेगा
निकलेगा जुलूस भी

जब शामिल होना उस प्रतिरोध में
अन्याय के खिलाफ मच रहे प्रतिकार के शोर में
लिखत-पढ़त में
जब थामना मशाल या मोमबत्ती
और बढ़ना आगे जुलूस में

तब ध्यान रखना कि यह शामिल होना
कहीं ‘शामिल होना भर’ बनकर न रह जाय
कहीं भोंपू भर न बनकर रह जाना तुम
घटनाओं के बाद का

कहीं अपनी ही कोई क्षुधा न पूरी हो रही हो तुम्हारी
इस शोर में
अगर ऐसा है तो चुप ही रहो दोस्त
कि कोई भी प्रतिरोध सड़कों पर बाद में आता है
पहले जन्म लेता है भीतर
और यकीन मानो,
वो तुम्हें एक लम्हा भी चैन से सोने नहीं देगा
सड़कों पर भीड़ का सैलाब उतरे न उतरे
भीतर दुःख, गुस्से और प्रतिकार का
सैलाब का उतरना जरूरी है

घटनाओं का इस्तेमाल मत करो
उन्हें जज्ब करो कि कवितायेँ कोई इंस्टेंट कॉफ़ी नहीं हैं
दर्द को सहो बूँद बूँद,
और गुस्से को पालो पोसो
'प्रतिरोध' को 'बदला' मत पढ़ो
'बदलाव' पढो
आज अगर तुम्हारी नसें नहीं फड़क रहीं
तुम्हारी आत्मा ऐसे समाज का हिस्सा होने के लिए
कुछ न कर पानी बेबसी के लिए
शर्मिंदा नहीं है
तो नहीं है कोई अर्थ किसी भी बात का.
दर्द का नहीं होता कोई मजहब नहीं होती कोई सरहद
कम से कम अपने भीतर तो
रोका ही जा सकता है इस बंटवारे को
बचाया जा सकता है खुद को हिंसक भीड़ का हिस्सा होने से.

ये कैसा ईश्वर है

कहाँ सोया रहता है ईश्वर
जहाँ उसे सुनाई नहीं देती मासूमों की चीखें
जहाँ नहीं पहुँचती अन्याय की ख़बरें
जहाँ से नहीं नज़र आता उसे
खड़ी फसल पर हुई बारिश की चोट से उभरा किसानों का दर्द

किस सुरम्य जंगल में या किसी ऊंची पहाड़ी पर
विराजमान है शान से
उस तक पहुँचने की व्यवस्थाएं हैं कितनी अलग
कि अमीरों के लिए मुहैय्या हैं वीआईपी दर्शन
और गरीबों को लगाना होता है कई घंटों तक लाइन में

कुंटलों के चढ़ावे को किस तरह लेता होगा ईश्वर
जिसमें शामिल होते हैं
बच्चों के हिस्से से चुराए कुछ कौर भी
ये कैसा ईश्वर है जिसने भर दिया है डर
कि वो पूजा, उपवास और चढ़ावों से होता है प्रसन्न
कि प्रसन्न होने का उसका वर्ग पूर्व निर्धारित है

ये कैसा ईश्वर है जो घन्टे घडियालों के शोर के नीचे
छुप जाने देता है दुःख का, पीड़ा सैलाब
वो अगरबत्ती और फूलों की खुशबू की चादर बिछ जाने देता है
बजबजाते नासूरों पर, घावों पर
ये कैसा ईश्वर है जो हालात कैसे भी हों
करता नहीं कुछ भी, कभी भी.

Saturday, May 26, 2018

प्रेम


बीत गयी शामों से चुरा ली थी
खाली हुए चाय के कप की खनक
उतरती शाम की उदासी
और तुम्हारे बटुए से गिरा वो एक सिक्का

तुम्हारी मेहनत की कमाई का वो सिक्का
मेरे प्रेम की कमाई उस शाम में जड़ गया है

वो शाम अब भी महक रही है
खाली हो चुके उन चाय के कपों में
तुम्हारी चुस्कियां अब भी बाकी हैं

बीत चुकी वो शाम हर रोज बीतती है
आहिस्ता आहिस्ता

मैं उसके खर्च होने से डरती हूँ


Sunday, May 13, 2018

माँ के लिए


अगर हम रोक सके हैं तुम्हें अपने हिस्से के सुख

हमारी खातिर सहेजने से
अपनी पसंद की चीज़ें
छुपाकर हमारे लिए रखने से
गर्म फुल्के खिलाने को देर रात तक जागने से

अगर तुम्हें नहीं भूलने दिया कि
खाने में क्या-क्या पसंद है तुम्हें
रंग कौन से खिलते हैं तुम पर
और गाने कौन से गुनगुनाती थीं तुम कॉलेज में
किस हीरो की फैन हुआ करती थीं तुम
तो शायद हम बचा सके हैं 'माँ' के भीतर
माँ के अलावा भी जो स्त्री है उसे

'निरुपमा राय मत बनो' कहकर
जब हम खिलखिलाते हैं न
तब असल में बदलना चाहते हैं
तमाम माँओं की त्यागमयी छवि
महिमामंडन वाली माँ के पीछे नहीं छुपाना चाहते हम
खुलकर जीने वाली,
अपनी मर्जी का करने वाली स्त्री को

तुम जब जीती हो न अपने लिए भी
तब खिलता है हमारा मन
जब तुम छीनकर खाती हो आइसक्रीम
तब लगता है कि बचा सके हैं हम अपनी माँ को
उसके भीतर भी, अपने भीतर भी

तुम रसोई से में पकवान बनाने से
ज्यादा अच्छी लगती हो, कैंडी क्रश खेलती हुए
बारिश में भीगने पर डांटते-डांटते खुद भीगते हुए
अच्छी लगती हो, गलत के खिलाफ लड़ते हुए
नाराज होते हुए कि 'चुप रहना किसने सिखाया तुम्हें
लड़ जाना हर मुश्किल से मैं हूँ अभी'

तुमने ही तो सिखाया
हर सफलता पर पाँवो को जमीं पर टिकाये रखना
जीना जी भर के और जीने देना भी
तुमने सिखाया तुमसे भी लड़ लेना कभी कभी
और मना लेना भी एक-दूसरे को

तुममें तुम्हारा बचा रहना ही हमारा होना है.