Tuesday, August 29, 2017

उठो न शहर गोरखपुर


सुनो गोरखपुर,

कब तक उठाते रहोगे अपने कन्धों पर
मासूमों की लाशें
कब तक अव्यवस्थाओं को
अपना चेहरा बना रहने दोगे

कब तक 'गोरख्पुरिये' शब्द को
अजीब तरह से इस्तेमाल होते देखते रहोगे
और कब तक कुछ भी हो जाने पर भी
चैन से करवट लेकर सोते रहोगे
कब तक मासूमों की मौतों को
आंकड़ों में तब्दील होते देखते रहोगे

बोलो शहर,
क्या तुम्हारे सीने में कोई दर्द की लहर नहीं उठती
कोई ज्वालामुखी नहीं फूटता
क्या सचमुच तुम्हारा जी नहीं करता कि
मासूमों की सांसों को तोड़ देने वाली सरकारों की
धज्जियाँ उड़ा दी जाएँ

बोलो शहर
अगस्त को बच्चों की मौत का महीना कहकर
पल्ला झाड़ने वालों से तुम्हें कोई शिकायत नहीं

सुनो फ़िराक गोरखपुरी के शहर के वाशिंदों
जरा अपनी आत्मा में अकुलाहट भरो
जरा निवाला तोड़ने से पहले
उन मासूमों के चेहरे याद करो जो
बरसों से वक़्त से पहले विदा होते जा रहे हैं
जरा चैन से अपने घरों में चादर ओढकर सोने से पहले
उन माओं की आँखों को याद कर लो
जो बरसों से सोयी नहीं हैं

उठो न शहर गोरखपुर
कि तुम्हारी चुप्पी अब असहनीय है....


(यह कोई कविता न समझी जाय. यह कुछ न कर पाने की कुंठा है और जो हो रहा है उसके प्रति गुस्सा है )

Sunday, August 20, 2017

चलो न जी लेते हैं....


घर की दहलीज़ लांघना आसान नहीं होता, जाने कितनी पुकारें रोकती हैं, जाने कितने दर्द, कितनी जिम्मेदारियां. कैसा कच्चा पक्का सा होता है मन. लेकिन शो मस्ट गो ऑन की तर्ज़ पर निकलना ज़रूरी होता है और निकलने का उपाय निकलना ही होता है सो चल पड़े थे सफर को फिर एक बार...छतीसगढ़, रायपुर.

ऐसा हड़बड़ी का दिन था कि दवाइयां रखना तो याद रहा लेकिन बहुत कुछ छूट भी गया, एयरपोर्ट जाकर याद आया कि मोबाइल भी छूटा है...एक ही मिनट की बेचैनी थी बस....उसके बाद से असीम शांति है...पहली बार इतने दिन बिना मोबाईल के हूँ.

सुबह बिटिया को स्कूल छोड़ने जाते वक़्त एक्सीडेंट होते-होते बचने से शुरू हुआ वो दिन मोबाईल घर पर छूटने भर पर नहीं रुका. रायपुर पहुँच कर पता चला कि मेरा सामान भी जाता रहा. एक जैसे ट्रैवेल बैग थे तो एयरपोर्ट पर बेल्ट से कोई और सज्जन मेरा बैग अपना समझ के ले गए. (हालाँकि तमाम लिखत पढ़त और पड़ताल के बाद सामान अगले दिन वापस मिल गया)

दोस्तों के होते जिन्दगी में कभी कुछ कमी रही ही नहीं, देवयानी का सामान उसके कपडे सब उससे पहले मेरे हो गए एक पल भी न लगा.

सुबह की हथेलियों में सारी परेशानियों का ईनाम था.आँख खुली और खुद को किसी गहरे हरे समंदर के बीचोबीच पाया.....इतना हरा, इतना हरा...उफ्फ्फ.

धमतरी में हमारा ऑफिस किसी ख़्वाब सा मालूम होता है, ऑफिस होते हुए भी ऑफिस लगता नहीं. कोना-कोना जिस लाड़ से जिस स्नेह से सजाया गया है, जिस तरह हर कोना अपने पास रोक लेता है वह एहसास कमाल है. नवनीत बेदार और उनकी टीम ने इसे काम की तरह नहीं इश्क की तरह अंजाम दिया है...दे रहे हैं...हम उनके इश्क को महसूस कर रहे हैं.

देवयानी लम्हों को सहेजना जानती है, मेरे पागलपन के सुर में सुर लगाना जानती है. धान के खेतों में हवा से बनती लहर को देखना किसी जादू को देखने सा मालूम होता है..घंटों ताकते रहने को जी चाहता है, बहुत सारा चुप रहने को जी चाहता है, बोलने से हवा की लय न टूट जाए कहीं...हम उसे छेड़ना नहीं चाहते...बस जीना चाहते हैं...अभी इस हरे समंदर में डुबकियां ले रही हूँ...आवाज कोई नहीं है आसपास...एक ख़ामोशी तारी है...भीतर कुछ खाली हो रहा है, कुछ भर रहा है...

छुटपुट बतकहियाँ भी हैं, किस्से हैं, जेएनयू के किस्से ऐसे कि आँखें भीग जाएँ...और प्यार हो जाए जेएनयू से, उन सब दोस्तों से जो हैं आसपास और जो हैं जिक्र में...

जिन्दगी कितनी खूबसूरत तो है...चलो न इसे जी लेते हैं....इन खूबसूरत लम्हों में तनिक मर ही लेते हैं....

(धमतरी डायरी, 19 अगस्त 2017 )

झूम रहे हैं धान हरे हैं- जन्मदिन मुबारक कवि त्रिलोचन

हरा भरा संसार है आँखों के आगे
ताल भरे हैं, खेत भरे हैं
नई नई बालें लहराए
झूम रहे हैं धान हरे हैं
झरती है झीनी मंजरियाँ
खेल रही है खेल लहरियाँ
जीवन का विस्तार है आँखों के आगे

उड़ती उड़ती आ जाती है
देस देस की रंग रंग की
चिड़ियाँ सुख से छा जाती हैं
नए नए स्वर सुन पड़ते हैं
नए भाव मन में जड़ते हैं
अनदेखा उपहार है आँखों के आगे

गाता अलबेला चरवाहा
चौपायों को साल सँभाले
पार कर रहा है वह बाहा
गए साल तो ब्याह हुआ है
अभी अभी बस जुआ छुआ है
घर घरनी परिवार है आँखों के आगे
(रचना-काल - 28-10-48)


Saturday, August 19, 2017

वो देर से पहुंचा था लेकिन वक़्त पे पहुंचा



आपके सारे जन्मदिन हमारे ही जन्मदिन हैं न गुलज़ार साहब....कि चाँद पुखराज ही तो था जिसके एवज में आपका पहला रूमानी ख़त सा खत मेरे नाम का. वो कच्ची सी उमर में लफ़्ज़ों की नरमी को महसूसने की शुरुआत ही थी शायद. वो महसूसने के समन्दर में उतरने की अल्हड उमर थी और था चाँद पुखराज का. वो आपसे हुई पहली मुलाक़ात...कमरे के बाहर से झांकती दो कच्ची उमर की ख्व़ाब भरी आँखें थीं...जिनमें आपसे मिलने की ख्वाहिश थी, आपको एक नज़र देख लेने की चाहत. कैसी चहकती सी अदा में आपने इशारे से अंदर आने को कहा था....नायकीनी सा यकीन था...कि सामने गुलज़ार बैठे थे...मेरे वाले गुलज़ार, चाँद पुखराज वाले गुलज़ार, बल्लीमारान की गलियों का पता मुठ्ठियों में लिए घूमने वाले गुलज़ार और मुझे मेरे जीवन का पहला ख़त भेजने वाले पहले इन्सान गुलज़ार...मैं ज़ार-ज़ार रो रही थी..सिर्फ आंसू थे, हिचकियाँ थीं, सिसकियाँ थीं...और आप अपने शफ्फाक कुरते पाजामे में दोनों हाथ ऊपर उठाकर शायद कोई दुआ पढ़ रहे थे...जितना मैं रो रही थी उतना ही आप शुकराना कर रहे थे शायद. आप मुझे पानी पिला रहे थे...सर पर हाथ फेर रहे थे, चुप करा रहे थे...लेकिन मेरा रोना था कि सिमटने को न आता था...हालाँकि दिन सिमटने को आ पहुंचा था...

मिस कटियार अब चुप हो जाइए न...ऐसा ही कहा था आपने...और मेरी डायरी में एक शेर दर्ज किया था मेरे लिए...उसके बाद अगले दिन जब होटल ताज की लौबी में आपसे सामना हुआ था तो आपकी भीड़ को चीरती आवाज़ ने कहा था, ‘मिस कटियार, अब मत रोइयेगा’ और मैं और आप दोनों ही हंस दिए थे...वो लम्हे अब भी वैसे ही ताजे हैं...वक़्त के आले में वैसे ही सजे हुए हैं...

उसके बाद आपसे कई बार मिलना हुआ ऑस्कर वाली रात के ठीक पहले भी...वैलेंटाइन डे के रोज़ भी...आपका दिया पीला गुलाब अब भी सहेजा हुआ है, आपका वो मिस कटियार कहकर पुकारना अब भी कानों में मुस्कुराता है. हर मुलाकात में आपके हाथों से उर्दू में दर्ज एक शेर मेरे साथ रहता है...

आपके जन्मदिन पर मेरे दोस्त जब मुझे बधाई देते हैं तो लगता है कुछ ख़ास है मेरा और आपका रिश्ता...

सनसेट प्वाइंट की यह कहानी अब भी सुनती हूँ, तब भी सुनती थी जब कैसेट की रील घिसकर टूट जाया करती थी...जानते हैं मेरे घर की बालकनी भी सनसेट प्वाइंट ही है इन दिनों...

(18 अगस्त, एक क़तरा याद )

Thursday, August 17, 2017

कमजोर - अंतोन चेखव

आज मैं अपने बच्चों की अध्यापिका यूलिमा वार्सीयेव्जा का हिसाब चुकता करना चाहता था।

''बैठ जाओ, यूलिमा वार्सीयेव्जा।'' मेंने उससे कहा, ''तुम्हारा हिसाब चुकता कर दिया जाए। हाँ, तो फैसला हुआ था कि तुम्हें महीने के तीस रूबल मिलेंगे, हैं न?''

''नहीं,चालीस।''

''नहीं तीस। तुम हमारे यहाँ दो महीने रही हो।''

''दो महीने पाँच दिन।''

''पूरे दो महीने। इन दो महीनों के नौ इतवार निकाल दो। इतवार के दिन तुम कोल्या को सिर्फ सैर के लिए ही लेकर जाती थीं और फिर तीन छुट्टियाँ... नौ और तीन बारह, तो बारह रूबल कम हुए। कोल्या चार दिन बीमार रहा, उन दिनों तुमने उसे नहीं पढ़ाया। सिर्फ वान्या को ही पढ़ाया और फिर तीन दिन तुम्हारे दाँत में दर्द रहा। उस समय मेरी पत्नी ने तुम्हें छुट्टी दे दी थी। बारह और सात, हुए उन्नीस। इन्हें निकाला जाए, तो बाकी रहे... हाँ इकतालीस रूबल, ठीक है?''

यूलिया की आँखों में आँसू भर आए।

"कप-प्लेट तोड़ डाले। दो रूबल इनके घटाओ। तुम्हारी लापरवाही से कोल्या ने पेड़ पर चढ़कर अपना कोट फाड़ डाला था। दस रूबल उसके और फिर तुम्हारी लापरवाही के कारण ही नौकरानी वान्या के बूट लेकर भाग गई। पाँच रूबल उसके कम हुए... दस जनवरी को दस रूबल तुमने उधार लिए थे। इकतालीस में से सताईस निकालो। बाकी रह गए चौदह।''

यूलिया की आँखों में आँसू उमड़ आए, ''मैंने सिर्फ एक बार आपकी पत्नी से तीन रूबल लिए थे....।''

''अच्छा, यह तो मैंने लिखा ही नहीं, तो चौदह में से तीन निकालो। अबे बचे ग्यारह। सो, यह रही तुम्हारी तनख्वाह। तीन,तीन... एक और एक।''

''धन्यवाद!'' उसने बहुत ही हौले से कहा।

''तुमने धन्यवाद क्यों कहा?''

''पैसों के लिए।''

''लानत है! क्या तुम देखती नहीं कि मैंने तुम्हें धोखा दिया है? मैंने तुम्हारे पैसे मार लिए हैं और तुम इस पर धन्यवाद कहती हो। अरे, मैं तो तुम्हें परख रहा था... मैं तुम्हें अस्सी रूबल ही दूँगा। यह रही पूरी रकम।''

वह धन्यवाद कहकर चली गई। मैं उसे देखता हुआ सोचने लगा कि दुनिया में ताकतवर बनना कितना आसान है।