Saturday, April 30, 2011

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म



दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म
जैसे जंगल में शाम के साये 
जाते-जाते सहम के रुक जाएँ 
मुडके देखे उदास राहों पर 
कैसे बुझते हुए उजालों में 
दूर तक धूल धूल उडती है...
- गुलज़ार 



Thursday, April 28, 2011

कितनी कम हैं तुम्हारी ख्वाहिशें...



कोई शब्द नहीं उगे धरती पर,
किसी भी भाषा में नहीं,
जिनके कंधों पर सौंप पाती
संप्रेषण का भार
कि पहुंचा दो
सब कुछ वैसा का वैसा
जैसा घट रहा है मेरे भीतर,
कोई भी जरिया नहीं 
जिससे पहुंचा सकूं 
अपना मन पूरा का पूरा.
उदास हूँ
ये सोचकर कि
न जानते हुए भी
मेरे दिल का पूरा सच,
न जानते हुए भी कि 
सचमुच कितना प्यार है
इस दिल में
कितने खुश हो तुम
कितनी कम हैं तुम्हारी ख्वाहिशें
और कितना विशाल
मेरी चाहत का संसार...

Sunday, April 24, 2011

इक तमन्ना सताती रही रात-भर...



आपकी याद आती रही रात-भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

फिर सबा साय-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर

एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर

- फैज़ अहमद फैज़ 

Wednesday, April 20, 2011

मैं सीख रही हूँ 'नहीं' कहना...

पिछले दिनों सिद्धेश्वर  जी ने वेरा पाव्लोवा की कुछ कवितायेँ पढने को दीं. उन कविताओं में से ये एक अटक सी गयी है दिमाग में. तो इसे यहाँ अपने ब्लॉग पर निकालकर रखे दे रही हूँ  (सिद्धेश्वर जी की अनुमति से) ताकि इसे सहेज भी लूं और शेयर भी कर लूं...


आईने के सामने

मैं सीख रही हूँ 'नहीं' कहना :
ना - ना - ना।  
प्रतिबिम्ब  दोहराता है :
हाँ -हाँ - हाँ। 
(अनुवाद-सिद्धेश्वर सिंह)

Monday, April 18, 2011

साधना है प्रेम का राग...


जब देखती हूँ तुम्हारी ओर 
तब दरअसल 
मैं देख रही होती हूँ अपने उस दुःख की ओर 
जो तुममें कहीं पनाह पाना चाहता है.
जब बढाती हूँ तुम्हारी ओर अपना हाथ
तब थाम लेना चाहती हूँ
जीवन की उस  आखिरी उम्मीद को 
जो तुममे से होकर आती है .
जब टिकाती हूँ अपना सर 
तुम्हारे कन्धों पर 
तब असल में पाती हूँ निजात 
सदियों की थकन से 
तुम्हें प्यार करना असल में 
ढूंढना है खुद को इस स्रष्टि में..
बोना है धरती पर प्रेम के बीज 
और साधना है प्रेम का राग...