Friday, May 29, 2009

उन बूढ़े पहाड़ों पर

धरती खामोश। आसमान भी चुप. कहीं कोई आवाज नहीं. न हवाओं की ज़ुम्बिश, न परिंदों की सरगोशी ही. वादियां एकदम वीरान. जैसे सदियों से रखा हो मौन. पहाड़ ऊंचे-ऊंचे. आंख के इस छोर से, उस छोर तक पहाड़ ही पहाड़. एक घबराहट ही तारी होती महसूस हुई. जैसे कोई पहाड़ टूटकर गिरेगा अभी. जैसे यह वादियों की खामोशी गला ही दबा देगी मेरा भी. तभी एक आवाज सुनाई दी। कान खड़े हो गये. आवाजों के आदी कान, उस आवाज के लिए बेसब्र हो उठे।

अरे, यह तो मेरी ही धडकनों की आवाज थी। धक...धक...धक...कितने बरसों बाद यह आवाज सुनी थी. अपनी ही धड़कनों की आवाज शहरों के शोर में, आवाजों के सैलाब में गुम सी गई थी कहीं. या सच कहूं, हमने ही छुपा दिया था इन्हें सुभीते से बहुत अंदर कहीं. ताकि ये तो सुरक्षित रह ही सकें बाहरी सैलाब से. देखो ना, आज जब शोर के सैलाब की जगह खामोशी ने ली तो धड़कनों ने अपना आकार बढ़ाना शुरू किया. इनकी कारगुजारियां बढऩे वाली थीं. मुझे समझ में आ चुका था. वादियों में इन्होंने टहलना शुरू कर दिया था. अब ये मेरे बस के बाहर थीं।

खामोश वादियों में धड़कनें ही धड़कनें...अचानक वादियां गुलजार होती मालूम हुईं. जब धड़कनें आजाद हुईं तो मन भी आजाद हुआ और न जाने कितनी यादें...पहाड़ों से डर अब जरा कम हो रहा था, लेकिन दोस्ती अब तक नहीं हुई. जाने क्यों सदियों से वैसे के वैसे खड़े पहाड़ मुझे डराते हैं हमेशा से. बहरहाल, धड़कनों की दोस्ती वादियों से हो गई थी. चलने की बेला हुई तो नन्हे बच्चों सी रूठी धड़कनें साथ चलने को राजी ही नहीं हुईं. उन्हें तो यहीं रहना था. भला बताइये, जहां मेरा मन घबराता है, इन्हें वहीं बसना है. दिल की धड़कन से बगावत. अब क्या करूं? जाना तो है....

एक रास्ता है धड़कनों की आवाज आई।
एक हिस्सा यहीं छोड़ दो हमारा।
एक हिस्सा...?
मैं अचरज में।
हां, अपने मन के कितने हिस्से कहां-कहां छोड़ती फिरती हो, कहां-कहां अपने सपने रोपती फिरती हो, एक हिस्सा अपनी धड़कनों का नहीं छोड़ सकती क्या...?
धड़कनों ने मुझे आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया था. मैं अब फंस चुकी थी. बुरी तरह से. कोई जवाब नहीं था. कोई भला अपनी धड़कनों से मुंह चुराए भी तो कैसे. तय हो गया. अपनी धड़कनों का एक छोटा सा हिस्सा मैं उन वादियों में ही छोड़ आई हूं।

मैं आ गयी हूं वापस. पता नहीं वापस कभी वहां जाऊंगी भी या नहीं लेकिन पता है कि मेरी तरह शरारती मेरी धड़कनें वादियों का सन्नाटा भंग करती रहेंगी. मैं रहूं ना रहूं जब भी कभी कोई मेरी धड़कनों की आवाज सुनना चाहेगा, उसे शिमला की वादियों में वो आवाज जरूर सुनाई देगी...
- शिमला से लौटकर प्रतिभा

Thursday, May 28, 2009

कबीर के करीब- ३

कबीर गर्व न कीजिए ऊंचा देख आवास
काल परौ भुंई लेटना ऊपर जमसी घास।

ज्यों नैनों में पुतली त्यों मालिक घट माहिं
मूरख लोग न जानहिं बाहिर ढूंढन जाहिं।

जब तू आया जगत में लोग हंसे तू रोए
ऐसी करनी न करी पाछे हंसे सब कोए।

पहले अगन बिरह की पाछे प्रेम की प्यास
कहे कबीर तब जाणिए नाम मिलन की आस।

कबीर यहु घर प्रेम का खाला का घर नाहिं
सीस उतारै हाथि करिसो पैसे घर माहिं।

माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहिं
मनुआ तो चहुं दिश फिरे यह तो सिमरन नाहिं।

कबीर माला काठ की कहि समझावे तोहि
मन न फिरावै आपणां कहा फिरावे मोहि।

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं
सब अंधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माहिं।

Sunday, May 24, 2009

kabeer ke kareeb- 2

जैसे तिल में तेल है ज्यों चकमक में आग
तेरा सांई तुझ में है तू जाग सके तो जाग.

माया मरी न मन मरा मर -मर गए शरीर
आशा तृष्णा न मरी कह गए दास कबीर।

कबिरा खड़ा बाजार मेंमांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्तीना काहू से बैर।

कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर
पाछे -पाछे हरि फिरे कहत कबीर-कबीर।

पोथी पढि़-पढि़ जग मुआपंडित भयो न कोई
ढाई आखर प्रेम के जोपढ़े सो पंडित होए।

दु:ख में सिमरन सब करें,सुख में करे न कोय
जो सुख में सिमरन करे,तो दु:ख काहे को होय।

अकथ कहानी प्रेम की कछु कही न जाय
गूंगे केरी सरकरा बैठे मुस्काय।

चिंता ऐसी डाकिनी काट कलेजा खाए
वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।

Saturday, May 23, 2009

कबीर के करीब

कबीर उनमें से हैं जिन्हें पढऩा हमेशा सुकून देता है। बेहद सामयिक, सुलझा, सरल काव्य. कबीर के करीब जाने पर ज्ञान और सुकून की गंगा बहती नज़र आती है. फिलहाल कुछ दोहे-

बुरा जो देखन मैं चलाबुरा न मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा तोमुझसे बुरा न कोए।

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घढ़ा ऋतु आए फल होए।

चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए।

काल करे सो आज कर आज करे सो अब
पल में परलय होयेगीबहुरी करोगे कब।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए
अपना तन शीतल करे औरन को सुख होए।

सांई इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाए
मैं भी भूखा न रहूं साधू न भूखा जाए।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।

Friday, May 22, 2009

ख्वाब टूटे न कोई

देखो,
आहिस्ता चलो
और भी आहिस्ता जरा
देखना, सोच समझकर
जरा पांव रखना
जोर से बज न उठे
पैरों की आवाज कहीं
कांच के ख्वाब हैं
बिखरे हुए तनहाई में
ख्वाब टूटे न कोई
जाग न जाये देखो
जाग जायेगा कोई ख्वाब
तो मर जायेगा....
- गुलज़ार