Sunday, April 11, 2021

एक कारवां मोहब्बत का





- प्रतिभा कटियार
सोचती हूँ तो पुलक सी महसूस होती है कि पांच बरस हो गये एक ख़्वाब को हकीक़त में ढलते हुए देखते. पांच बरस हो गए उस छोटी सी शुरुआत को जिसने देहरादून में पहली बैठक के रूप में आकार लिया था और अब देश भर को अपनेपन की ख़ुशबू में समेट लिया है उस पहल ने. एक झुरझुरी सी महसूस होती है. आँखें स्नेह से पिघलने को व्याकुल हो उठती हैं. फिर दोस्त कहते हैं कि सपना नहीं है यह, सच है.

आँखें खुली हुई हैं और प्रेम चारों तरफ बिखरा हुआ है. कविताओं के प्रति प्रेम. पाठकीय यात्रा के रूप में शुरू हुआ यह सिलसिला असल में अपने मक़सद में कामयाब हुआ. मकसद क्या था सिवाय अपनी पसंद की कविताओं की साझेदारी के साथ एक-दूसरे की पसंद को अप्रिशियेट करने के. अपने जाने हुए को विस्तार देने के और लपक कर ढूँढने लग जाना उन कविताओं और कवियों को जिन्हें अब तक जाना नहीं था हमने.

शुरुआत हुई तो नाम था 'क से कविता'. फिर तकनीकी कारणों से नाम हो गया 'कविता कारवां'. जब तकनीकी कारणों से नाम में बदलाव करना पड़ा तो मन में एक कचोट तो हुई कि उस नाम से भी तो मोह हो ही गया था लेकिन यहीं जीवन का एक और पाठ पढ़ना था. मोह नाम से नहीं काम से रखने का.

अपनी नहीं अपनी पसंद की कविताओं को एक-दूसरे से साझा करने की यह कोई नयी या अनोखी पहल नहीं थी. ऐसा पहले भी लोग करते रहे हैं अपनी-अपनी तरह से, अपने-अपने शहरों में साहित्यिक समूहों में. कविता कारवां की ही एक सालाना बैठक में नरेश सक्सेना जी ने कहा था कि बीस-पचीस साल पहले ऐसा सिलसिला शुरू किया था उन्होंने भी जिसमें कवि एक अपनी कविता पढ़ते थे और एक अपनी पसंद की. तो ‘कविता कारवां’ ने नया क्या किया. नया यह किया कि इस सिलसिले को निरन्तरता दी. बिना रुके ‘कविता कारवां’ की बैठकें चलती रहीं. उत्तराखंड में ही करीब 22 जगहों पर हर महीने कविता प्रेमी एक जगह मिलते और अपनी पसंद की कविता पढ़ते रहे. कुछ बैठकें मुम्बई में हुईं, कुछ लखनऊ में और दिल्ली में निशस्त दिल्ली के नाम से यह सिलसिला लगातार चल रहा है.

'कविता कारवां' के बारे में सोचती हूँ तो तीन बातें मुझे इसकी यूनीक लगती हैं जिसकी वजह से इसकी पहचान अलग रूप में बनी है. पहली है इसे पाठकों की साझेदारी के ठीहे के तौर पर देखना जिसमें कॉलेज के युवा छात्र, गृहिणी, स्कूल के बच्चे, डाक्टर, इंजीनियर बिजनेसमैन सब शामिल हुए कवि कथाकार पत्रकार भी शामिल हुए लेकिन पाठक के रूप में ही. कितने ही लोगों ने अपने भीतर अब तक छुपकर रह रहे कविता प्रेम को इन बैठकों में पहचाना और पहली बार यहाँ अपनी पसंद की कविता पढ़ी. दूसरी बात जो इसे विशेष बनाती है वो है बिना ताम-झाम और बिना औपचारिकता वाली बैठकों की निरन्तरता. कोई दीप प्रज्ज्वलन नहीं, कोई मुख्य अतिथि नहीं, कोई मंच नहीं, कोई विशेष नहीं बल्कि सब मुख्य अतिथि, सब विशेष अतिथि. और तीसरी और अंतिम बात जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसके चलते पहली दोनों बातें भी हो सकीं वो यह कि ‘कविता कारवां’ की एक भी बैठक में शामिल व्यक्ति इसके आयोजक मंडल में स्वतः शामिल हो जाता है. ज्यादातर साथी जो किसी न किसी बैठक में शामिल हुए थे अब इसकी कमान संभाले हुए हैं पूरी जिम्मेदारी से.

इस सफर का हासिल है ढेर सारे नए कवियों और कविताओं से पहचान होना और एक-दूसरे को जानना. आज पूरे उत्तराखंड और दिल्ली लखनऊ व मुम्बई में कविता कारवां की टीम काम कर रही हैं. हम सब एक सूत्र में बंधे हुए हैं. एक-दूसरे से मिले नहीं फिर भी पूरे हक से लड़ते हैं, झगड़ते हैं और मिलकर काम करते हैं. एक बड़ा सा परिवार है 'कविता कारवां' का जिसे स्नेह के सूत्र ने बाँध रखा है. वरना कौन निकालता है घर और दफ्तर के कामों, जीवन की आपाधापियों में से इतना समय. और क्यों भला जबकि अपनी पहचान और अपनी कविता को मंच मिलने का लालच तक न हो.

अक्सर लोग पूछते हैं कविता कारवां की टीम इसे करती कैसे है? कितने लोग हैं टीम में? खर्च कैसे निकलता है? तो हमारा एक ही जवाब होता है हमारी टीम में हजारों लोग हैं वो सब जो एक भी बैठक में शामिल हुए या इस विचार से प्यार करते हैं और हम इसे करते हैं दिल से. जब किसी काम में दिल लगने लग जाए फिर वो काम कहाँ रहता है. हम इसे काम की तरह नहीं करते, प्यार की तरह जीते हैं.

इस सफर में कई अवरोध आये, कुछ लोग नाराज भी हुए कुछ छोड़कर चले भी गए लेकिन 'कविता कारवां' उन सबसे अब भी जुड़ा है उन सबका शुक्रगुजार है कि उनसे भी हमने कितना कुछ सीखा है. हमें साथ चलना सीखना था, वही सीख रहे हैं. साथ चलने के सुख का नाम है 'कविता कारवां', कविताओं से प्रेम का नाम है 'कविता कारवां',

अपने 'मैं' से तनिक दूर खिसककर बैठने का नाम है 'कविता कारवां.'

हम पांचवी सालगिरह से बस कुछ कदम की दूरी पर हैं. उम्मीद है यह कारवां और बढ़ेगा...चलता रहेगा...नए साथी इसकी कमान सँभालते रहेंगे और दूसरे नए साथियों को थमाते रहेंगे... यह तमाम वर्गों में बंटी, तमाम तरह की असहिष्णुता से जूझ रही दुनिया को तनिक बेहतर तनिक ज्यादा मानवीय, संवेदनशील बनाने का सफर है जिसमें कविताओं की ऊर्जा हमारा ईंधन है

Wednesday, April 7, 2021

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

-कृष्ण बिहारी नूर 

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रस्ता ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूट की कोई इंतिहा ही नहीं

ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिस के कारन फ़साद होते हैं
उस का कोई अता-पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैग़मबर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो
आईना झूट बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो ज़िंदा है
'नूर' संसार से गया ही नहीं.

Monday, April 5, 2021

वो न समझा है, न समझेगा...


सुबह में ढेर सारी रात अब तक घुली हुई है. शुष्क मौसम सुर्ख लिबास में दाखिल हुआ है. उसकी हथेलियों पर इन्द्रधनुष खिला हुआ है. जैसे फूलों में कोई होड़ हो खिलने की. रास्तों से गुजरते हुए मालूम होता है जैसे किसी ड्रीम सीक्वेंस में हों, पीले, गुलाबी, लाल फूलों से पटे पड़े रास्ते हवा के झोंकों के साथ उड़कर काधों पर आ बैठते हैं....हाँ हाँ...रास्ते फूलों के साथ एक अलग ही ठसक लिए.

भीतर का मौसम भी बदल रहा है. न जाने कितने पत्ते मन की शाखों से मुक्त हुए. अभी नयी कोपलों के फूटने की आहट तो कोई नहीं लेकिन कोई उदासी भी नहीं. भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस कर रही हूँ. जिन चीज़ों को देख पगलाया करती थी अब सिर्फ मुस्कुरा देती हूँ. जिन बातों पर हफ़्तों सुबकना जारी रहता था अब उन बातों पर भी मुस्कुरा देती हूँ.

सुबह पंछियों की आवाजों पर कान टिकाये हुए चाय पीना मध्धम आंच पर पकता सुख है. इंतजार कोई नहीं... फरहत शहजाद गुनगुना रहे हैं...

वो न समझा है, न समझेगा, मगर कहना उसे...

(इश्क शहर, मॉर्निंग राग)

Saturday, April 3, 2021

उम्रदराज लोगों का प्यार


बसंत के दिनों में
टहनियों को जोर से पकडे हुए पत्तों सा होता है
उम्रदराज लोगों का प्यार
संजीदा होता है जबकि
बेकरार होता है शरारती हो जाने को.

दुनिया भर की नसीहतों को जी चुका
उम्रदराज लोगों का प्यार
हर सांस सलीके से जीने
हर लम्हे को मजबूती से थाम लेने को उत्सुक होता है,

युवा प्रेमियों को देख मुस्कुराते हुए
ज़िंदगी से और सटकर बैठा होता है
बारिश में भीगने से
निमोनिया हो जाने से, डरता नहीं 
बस कि एक-दूसरे का साथ छूटने से डरता है
उम्रदराज लोगों का प्यार.

योगा क्लासेज हों, जॉगिंग ट्रैक, दवा की दुकानें, अस्पताल
या किसी की मातमपुर्सी की बैठक
इनकी निगाहें एक-दूसरे को कभी भी कहीं भी ढूंढ लेती हैं
और दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं

मधुमेह, रक्तचाप, थायरायड, घुटनों के दर्द के बीच
शाम को साथ में टहलने के लिए
वे चुनते हैं सबसे सुंदर और सलीकेदार लिबास
उन्हें आता है नफासत से पेश आना,

वो जान चुके हैं किसी को खोने का दुःख
इसलिए डरते हुए बढ़ाते हैं कदम एक-दूसरे की और
एक ही कॉटन कैंडी में ढूंढ लेते हैं
तमाम पीले लम्हों की रंगत.

झुर्रियों में सपने तलाशने की कला 
सीख लेता है उम्रदराज लोगों का प्यार.  

Sunday, March 14, 2021

उसके सपने में मेरा होना


मैं जब अपने सपने में नहीं थी
तब उसके सपने में महक रहा था मेरा होना
वो अपने सपने में सहेज रहा था
इस बड़ी सी दुनिया में मेरा एक छोटा सा कोना

मैं नींद में जब गहरे धंसी हुई थी
बारिश में तर-ब-तर हो रहा था मेरा कोना
खिलखिलाते हुए लाल फूल झाँक रहे थे खिड़की से 
मुस्कुरा रही थीं किताबें कॉफ़ी की खुशबू की संगत में
समन्दर की लहरों को छूकर आया था हवा का एक झोंका 
सहला रहा था मेरे गाल

वो मेरे चेहरे पर मुस्कुराहटें बो रहा था पूरी लगन से
और मैं नींद में धंसे हुए मुस्कुरा रही थी

मेरे सिरहाने बारिशें, हवा के झोंके, समन्दर की लहरें
चिड़िया की चहक, प्रेमिल साथ
कुल मिलाकर एक सुंदर दुनिया का सपना रखकर
वो चाय बना रहा था
और मैं इन तमाम सौगातों को समेटे
डूबने लगी थी प्रेम की नदी में...

मेरे होंठ बुदबुदा रहे थे उम्मीद
वो गुनगुना रहा था प्रेम.

मैं जब नींद में थी तब मैं उसके सपने में थी. 

(देवयानी के सुपुत्र अनि के लिए)