Monday, April 27, 2020

दृश्य बदलने से दृश्य बदलते हैं.


हालात बदलने के लिए
बदलना पड़ता है खुद को

दृश्य बदलने से
तो सिर
दृश्य बदलते हैं.
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भूख पेट में थी
खाना मदद के इश्तिहारों में
और रास्ता लम्बा

भूख ने दम तोड़ दिया
इश्तिहार चमकते रहे.
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अनाज उगाने वाले हाथों का
अनाज मांगने वाले हाथों में बदलना
इतिहास की त्रासदी है

अगर उनके हाथों तक
पहुंचाते हुए राशन
अकड़ती है गर्दन
तो लाजिम है टूटना
मनुष्यता का..
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लॉकडाउन में खोलनी थीं
मन की गांठे
लेकिन हमने कसे ही
अपने पूर्वाग्रह
और भी मोटे ताले डाले अपनी अक्ल पर

कि वायरस से ज्यादा बड़ी थी
जाहिलता की मार.

पढ़ने की आदत से क्या होता है



- मोनिका भंडारी

दैनिक जीवन मे पढ़ने लिखने की आदत निजी और पेशेवर तौर पर आज की टेली कान्फ्रेंस की बातचीत इसी पर आधारित थी और इस बातचीत को हमारे बीच रखने के लिए दो उम्दा शख्सियतें आई थी. प्रतिभा कटियार जी और रेखा चमोली जी. बातचीत की शुरुआत अशोक जी ने की तथा आज की बातचीत का संदर्भ रखा. इसके बाद श्वेता जी ने दोनों लेखिकाओं का स्वागत किया. श्वेता ने कहा कि पढ़े लिखे शिक्षक होने के साथ साथ पढ़ते लिखते शिक्षक होना जरूरी है. इसके बाद दोनों लेखिकाओं के परिचय के लिए जाने माने साहित्यकार एवं शिक्षक मनोहर चमोली मनु को आमंत्रित किया गया. मनु सर ने प्रतिभा जी का परिचय देते हुए बताया कि ये गंगा जमुनी संस्कृति को जीने वाली लेखिका हैं. वर्तमान में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़ी हुई हैं. ये हिंदी, इंग्लिश दोनों भाषाओं की कलम कार हैं. ये डायरी, ब्लॉग लिखती हैं तथा संपादन भी करती हैं. ये विचारवान हैं तथा दुनिया को संवारना चाहती हैं.
वहीं रेखा जी का परिचय देते हुए मनु सर ने कहा कि वे कर्णप्रयाग में जन्मी हैं तथा इनकी लेखनी मे मिट्टी, पानी, पहाड़ का यथार्थ झलकता है. ये वर्तमान में नौनिहालों के बीच उत्तरकाशी मे बहुत बढ़िया काम कर रही हैं.
परिचय को समेटते हुए मनु सर ने कहा कि दोनों ही अपने क्षेत्र में संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ी हैं बराबरी और समानता के सपने बुनती हैं और साकार करना चाहती हैं.
परिचय सत्र के बाद प्रतिभा जी सबसे मुखातिब हुईं. लगभग 92 लोग इस कॉन्फ्रेंस मे शामिल थे.4:30 बजे से शुरू हुई ये बातचीत अब प्रतिभा जी आगे बढ़ा रही थी. प्रतिभा जी ने अपनी बातचीत आज के चुनौती पूर्ण समय को लेकर शुरु की. उन्होंने कहा कि आज के लॉक डाउन के समय में पढ़ने लिखने पर बातचीत करना एक अच्छा विषय है. लेकिन वो कहती हैं की पढ़ने लिखने की बातचीत अलग से क्यों की जाए? यह तो हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए. सबसे जरूरी है कि हम क्या और कैसे पढ़ते हैं? उन्होंने कहा कि आजकल उन्होंने फिर से पहले पढ़ी हुई किताबें पढ़ी हैं और हर बार उन्हे पिछली बार से अलग लगता है अपना पढ़ा हुआ. उनका मानना था कि पढ़ने से हर बार कुछ नया महसूस होता है. प्रतिभा बड़ी गहरी बात कहती हैं कि पढ़ना हर बार खुद को जानने और तराशने जैसा है. प्रतिभा की विशेषता है कि वो बहुत गहरी बात भी सहजता से कह जाती हैं. कहती हैं कि हर शब्द की एक अलग यात्रा है. उन्होंने जोड़ा कि आजकल मदद, परोपकार, संवेदना जैसे शब्द प्रचलन मे बहुत हैं लेकिन इसका अर्थ सिर्फ एक हाथ देने वाला तथा एक हाथ लेने वाला सा लगता है. यह सिर्फ आर्थिक मसला नही है, क्यों नहीं हम उनके साथ खड़े हो जाते? प्रतिभा कहती हैं ये संवेदना भी साहित्य पढ़ने से आती है. साहित्य हमें बदलना सिखाता है. पाठक के तौर पर साहित्य हमे समृद्ध करता है. प्रतिभा का मन प्रकृति मे भी रमता है जब हम उनको पढ़ते हैं तो हम महसूस कर सकते हैं कि वो प्रकृति के बहुत करीब हैं. नदी, बारिश, पेड़, सब उनके दिल से होकर गुजरता है. वे कहती हैं कि हमारे अंदर जो नदी है साहित्य उसे सूखने नहीं देता. कहती हैं साहित्य और प्रकृति कभी भेद nhi करती. शिक्षा मे भी भेद नहीं होने चाहिए. उन्होंने लाल बहादुर वर्मा जी का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी एक बात उन्हे बड़ी अच्छी लगी कि धरती उन शिक्षकों को ज्यादा प्यार करती है. जो धरती से प्यार करते हैं क्योंकि जो बच्चे इन शिक्षकों के बीच से होकर गुजरेंगे वो सही मायनों मे मनुष्य होंगे.
साहित्य पढ़ने की आदत कैसे हो इस बात पर प्रतिभा जी ने कहा कि आजकल कई लोगों को फेसबुक और whatsaap पर पढ़ना पसंद होता है लेकिन वो कहती हैं कि ये पसंद का क्षेत्र होता है. कुछ और कहीं पढ़ने मे मजा आता है कहीं नहीं भी आता.ये चस्का लगने जैसा है कहती हैं मुझे विरासत मे अपने पापा से पढ़ना लिखना मिला है और कई लोग हैं जिनको पढ़ने की आदत मे शामिल करने के लिए हाथ बढ़ाने की जरुरत है. उन्होंने अपना अनुभव बताया कि उनके पापा किताबें घर पे लाया करते थे. कोई रूसी किताब और पिता के पत्र पुत्री के नाम जैसी किताबें बचपन में पढ़ ली थी और उनके पिता उन किताबों पर बातचीत किया करते थे. वो मानती हैं कि यही बात जरूरी है कि बच्चों के साथ बातचीत करें, सवाल जवाब करें.पढ़ने के बाद यदि बच्चे हमें कहीं पर गलत साबित करते हैं तो ये बहुत अच्छा है. वो कहती हैं कि किताबों से प्यार करना जरूरी है. उनको साहित्य से प्यार था और आज तक चल रहा है.
वो ये भी कहती हैं कि किताबें हमें बदलती है. साहित्य हमें नजरिया देता है. चित्रलेखा किताब का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये सबको पढ़नी चाहिए. यदि हम किसी चीज को नहीं मानते तो उसको ना मानने के जो कारण हैं उसको जानने के लिए हमें और ज्यादा उसे पढ़ना पड़ेगा.उन्होंने उन शिक्षकों के बारे मे भी बात की जो अपनी कक्षाओं मे साहित्य के साथ शिक्षण कर रहे हैं. और बच्चों को प्यार के साथ सिखा रहे हैं. यहीं पर प्रतिभा जी ने अपनी बात समाप्त की और रेखा जी को अपनी बात रखने के लिए कहा.

रेखा जी ने अपनी बात शुरु करते हुए कहा कि प्रतिभा को सुनना किसी लंबी "प्रेम कविता "को सुनने जैसा है. उन्होंने अपनी चिर परिचित अंदाज में संवाद से जुड़ने के लिए सबका शुक्रिया अदा किया और कहा कि उन्हे प्रतिभा की बातों से सहमति है.. रेखा जी ने कहा कि एक शिक्षिका होने के नाते मै शिक्षकों के पढ़ने लिखने की बातें करूँगी.रेखा जी भी बहुत सहज शब्दों मे अपनी बातें रखती हैं जो कि हमें अक्सर अपने दिल के करीब लगता है. उन्होंने कहा कि जैसे किसी दुकान या व्यवसाय को सजाने सँवारने के लिए कुछ टूल्स की जरूरत होती है उसी तरह कक्षा शिक्षण मे भी नई चीजें, आनी चाहिए जैसे किताबें, साहित्य, जो कुछ भी देश, दुनिया मे लिखा या बुना गया है उसे बच्चों के बीच मे आना जरुरी है. वो कहती हैं कि मैं किसी विषय विशेष की नहीं बल्कि व्यापक रूप से इस बात को देखती हूँ. बच्चा हमारे पास आता है और कुछ समय बाद जब वो जाता है उस पूरी प्रकिया मे उसके बीच हम क्या करते हैं ये जरुरी है.रेखा बच्चों के साथ बहुत शिद्दत से जुड़ी हुई हैं उनकी छोटी सी बात को भी महसूस करती हैं. उन्होंने कहा कि जिस शिक्षक ने तोतोचान पढ़ी होगी, यदि उसकी कक्षा मे कोई ऐसा अलग सा बच्चा आता है तो वो उसको शरारती और बिगड़ा हुआ घोषित करने से पहले रुककर सोचेगा कि ये बच्चा क्या कहना चाहता है?. इसी तरह जिसने पहला अध्यापक पढ़ी है वो खुद से सवाल करना सीखता है. वो सीखता है कि क्या नये तरीके हैं सीखने और सिखाने के? वो सहजता से कहती जाती हैं कि जरुरी नही कि 100 लोगों द्वारा किया जाने वाला काम सही है और 10 लोगों द्वारा किया जाने वाला गलत.
कहती हैं कि आज की शिक्षा प्रणाली सही नही है कहीं ना कहीं इसमें गड़बड़ है वरना आज हम ऐसी दुनिया ना तैयार कर रहे होते. साहित्य के बारे मे उनका कहना था कि कोई शिक्षक जब पढ़ता है तो वह सवाल करना सीखता है. पढ़ना सीधे हाँ या ना को नही उसके बीच की तमाम बातों को जगह देता है. फेसबुक और सोशल मीडिया की सामग्री को एकदम से आत्मसात करने पर उन्होंने असहमति जातायी. कहा कि इस तरह की सामग्री पर सोच समझ कर विश्वास करने की जरुरत है.. वो कहती हैं की यदि हम पढ़ते लिखते शिक्षक होंगे तो कक्षा मे हमारा नजरिया बिल्कुल अलग होगा. हम चीजों, लोगों और घटनाओं को लेकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होंगे.
अपनी बेबाक शैली मे उन्होंने अपने अनुभव भी सुनाए. अपनी 9 वी कक्षा में पढ़ी गयी किताब अपने अपने राम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी किताब की कहानी, पात्र, कथानक का प्रभाव आपको बदल देता है. और आप पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाते हैं. कोई आपके बारे मे क्या सोचता है फिर आपको कोई फर्क नहीं पड़ता. आप खुद पर भरोसा करने लगते हैं. कुल मिलाकर आप एक स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले शिक्षक बन जाते हैं. यह बात मुझे भी महत्वपूर्ण लगी. बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हमारे बच्चों को पढ़ने की सामग्री और अवसर कम मिलते हैं. घरों में कोई ऐसी छपी हुई सामग्री नहीं होती जिसे वो पढ़ सकें. ऐसे में हमारी और जिम्मेदारी बन जाती है कि बच्चों को पढ़ने लिखने से जोड़ा जाए. हमें ऐसा माहौल बनाना होता है कि बच्चे खुद पढ़ने लग जाएं. बच्चों के साथ चित्र, चित्रकथा अनुभव खेल पर बात करना जरुरी है.
एक अनुभव सुनाते हुए कहा कि एक बच्ची चीनी के लिए दस रुपए ले कर आई है पर वो चुप है कि पैसे लाने पर डांट ना पड़े. लेकिन जब उससे इस बारे मे बात की तो उसे महसूस हुआ कि उसकी दस रुपए की चीनी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी और की. कविता छह साल की छोकरी पर भी उन्होंने अपनी बात रखी. बोली कि बच्चों को चयन का अधिकार होना चाहिए. बच्चों को स्वतन्त्र छोड़ना जरुरी है लेकिन पहले उनसे बात करना जरूरी है. फिर वे चीजों को अपना समझते हैं और तोड़ फोड़ नहीं करते. पढ़ने के बाद प्रस्तुतिकरण भी जरूरी है. बच्चों ने क्या पढ़ा कितना पढ़ा उसे अपने साथियों से साझा करना भी जरूरी है. पढ़ने की खुशी बच्चे बांटना चाहते हैं और ये टीचर के लिए प्रेरणा हो सकते हैं. इसके बाद रेखा जी ने दीवार पत्रिका पर भी बात की. कहा कि विषय का चयन चित्र बनाना लिखना यदि बच्चे सीख गए तो बड़ी बात है. अंत मे उन्होंने अपनी बात को समेटा और कहा कि शिक्षक के काम मे निरंतरता जरूरी है.रेखा जी की बात समाप्त होने के बाद सवाल जवाब का दौर शुरू हुआ.
शिक्षक साथियों की तरफ से आये सवालों को मुदित जी ने रखा. एक प्रश्न था कि बच्चों मे पढ़ने की आदत कैसे डालें? जवाब मे रेखा जी ने कहा कि यदि हमारे घर मे खूब सारी किताबें हैं तो बच्चों को उनके साथ जोड़ा जा सकता है. उनसे बात करके किताबों के कुछ पन्ने पढ़के किताब के प्रति रुचि जगाई जा सकती है.
दूसरा प्रश्न था कि एक ही तरह का साहित्य पढ़ना सही है या नहीँ ? उत्तर था कि नही हमे अलग अलग तरह का साहित्य पढ़ना जरुरी है. प्रतिभा जी ने कहा कि हमें एक ही विचार का साहित्य ना पढ़कर बहुत तरह का पढ़ना चाहिए. जैसे यदि मुझे धर्म मे विश्वास नही तो उसको सिद्ध करने के लिए मुझे और ज्यादा पढ़ना होगा जिससे हम उन चीजों को और अच्छे से जान पाएँ. अगला प्रश्न था कि बहुत से लोग पढ़ने को एकाकी प्रक्रिया मानते हैं जबकि ये समाज मे सीखा जाता है. और हमारी जिम्मेदारी है कि हम सीखे हुए को समाज को वापिस करें तो कैसे ये समाज का हिस्सा ban सकता है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल था लेकिन रेखा जी ने अपने धैर्य वान सहज शब्दों मे उत्तर दिया कि भले ही हम स्वयं की रुचि से एकांत में पढ़ना पसंद करते हैं लेकिन पढ़ने के बाद हम जैसे मनुष्य बनते हैं उसी सोच और समझ के साथ हम समाज मे व्यवहार करते हैं. फिर एक प्रश्न था कि पढ़ने लिखने में कैसे सब्जेक्विटी और जजमेंटल होने से बचा जा सकता है? तो रेखा जी ने जवाब दिया कि हमारी सजगता ही हमें इनसे बचा सकती है.. इसके बाद समूह मे शिक्षण पर प्रश्न पूछे गए जिनका जवाब रेखा जी ने अपने कक्षा शिक्षण के अनुभव और उदाहरण दे कर दिया. इसी रोचक बातचीत के साथ समय सीमा भी खत्म होने पर थी. सभी साथी ध्यान से संवाद सुन रहे थे. पूरी बातचीत कहीं ना कहीं दिल के करीब थी क्योंकि हम ऐसी शिक्षिकाओं को सुन रहे जो हम जैसे ही बच्चों के बीच काम कर रहीं थीं और उन्हीं चुनौतियों को बीच जो हम सबके सामने होती हैं.. आज के इन दोनों मेहमानों को सुनना बहुत सुखद रहा. पढ़ते लिखते रहना क्यों जरुरी है एक शिक्षक के तौर पर ये जान पाना मेरे और मेरे ही जैसे अनेक शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण रहा.
पूरी बातचीत को अंत मे जगमोहन कठैत जी ने समेकित किया.6:15 बजे तक पूरी वार्ता चली और सबने सुनी.
कठैत सर ने सबका धन्यवाद किया और कहा कि कक्षा के ये अनुभव बहुत काम के रहे.
इसी के साथ सबने विदा ली.

26 अप्रैल 2020.

Sunday, April 26, 2020

किताबें बदलती हैं हमारे जीवन को

ऑनलाइन सेमिनार: प्रतिभा कटियार एवं रेखा चमोली के साथ*********************
-मनोहर चमोली ‘मनु’
आज की बातचीत की औपचारिक शुरूआत अशोक प्रसाद जी एवं जगमोहन कठैत जी ने की । जैसे-जैसे साथी जुड़ते रहे, साथी सभी का स्वागत करते रहे। आरम्भ से पहले ही 64 साथी जुड़ गए थे। श्वेता जी ने सन्दर्भ रखा। कहा, ''दैनिक जीवन में पढ़ने-लिखने की आदत को विकसित करने और बच्चों में कैसे पढ़ने की आदत विकसित करें? इस पर बात करेंगे। पढ़े लिखे शिक्षक और पढ़ते-लिखते शिक्षक दोनों की आवश्यकता है।''

दोनों के परिचय के बाद प्रतिभा जी हमारे सामने आई। प्रतिभा जी ने कहा,‘‘यह माध्यम हमें एक अवसर के साथ मिला है कि हमारे भीतर सीखने की ललक रहे। मैं आज भी बहुत कुछ सीखकर जाऊँगी। पढ़ना क्यों जरूरी है? जब इस सवाल को साझा करती हूं तो पता चलता है कि जवाब ऐसे आता है। पढ़ा है। पर ज़रूरी तो नहीं कि साहित्य सभी पढ़ें। हर दिन लगता है कि क्या पढ़ना है? कैसे पढ़ना है? सालों से पढ़ रहे हैं पर क्या हमें पता है कि हमें कैसे पढ़ना है? यह भी क्या हमें सुनना आता है? क्या हम अच्छे पाठक हैं? जब मैं अठारह-उन्नीस साल की थी तब शेखर एक जीवनी पढ़ा। अब दोबारा पढ़ रही हूं तो लगता है कि जाने हुए को और जानना है। फिर से पढ़ना लगता है कि नए तरीके से पढ़ना हो रहा है। मैं जो सोचती हूँ क्या मैं लिख पाती हूं। आजकल हम देख रहे हैं कि हम खूब मदद करते हैं। कृपा, मदद खूब हो रही है। क्या हैं ये शब्द। साहित्य को बरतना ज़रूरी है। मदद करना,कृपा करना होना चाहिए कि साथ में खड़ा होना चाहिए? मैं फिर कह रही हूं कि क्या हम पढ़ना जानते हैं। मैं तो पढ़ना सीख रही हूं। हम सबके भीतर एक नदी है। साहित्य हमें सूखने नहीं देता। साहित्य हमारे भीतर के जंगल को,हरे-भरे को सूखने नहीं देता। हमें मरने नहीं देता। साहित्य जो करता है, प्रकृति जो करती है शिक्षा जो करती है उनका स्वभाव क्या है? पूरी दुनिया का साहित्य क्या करता है? सबके लिए है न? कोरोना के समय में पूरी दुनिया इस बीमारी से लड़ रही है। पूरी दुनिया एक हो गई है। साहित्य भी भेद नहीं करता।''
कवयित्री प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘हम मनुष्य होंगे। समाज को क्या चाहिए? साहित्य और शिक्षा क्या करती है। शिक्षक खास है। वह सबको जोड़ता है। पढ़ने की आदत कैसे हो? हमें समझना होगा कि जहां मज़ा आता है तो क्यों? नहीं आता है तो क्यों? मुझे घर में पढ़ने की आदत मिली। जिन्हें घर से यह आदत नहीं मिली उन्हें हाथ बढ़ाना पड़ता है। यह स्वाद है। लत है। चस्का है। यदि इसकी शुरुआत हो जाए तो फिर छूटेगी। हमें यह आदत नहीं मिली तो हम बच्चों को यह आदत तैयार कर सकते हैं। ऐसे में शिक्षक की बड़ी जिम्मेदारी है। वह इसे करते हैं। कर सकते हैं।’’ प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘मैं बचपन को याद करती हूँ तो पाती हूं कि पापा बहस कराते थे। सवाल करने और जूझने की आदत बढ़ाई उन्होंने। क्या हम बच्चों के साथ कर सकते हैं। बच्चों से बात करें। बहस में शामिल हों। बच्चों से सवाल-जवाब करने चाहिए। हमें बच्चे गलत साबित करते हैं तो समझिए कि वे सही जा रहे हैं। घर में बच्चे जब टोकते हैं तो समझिए कि सही जा रहा है। यही तो चाहते हैं हम। घर में भी और स्कूल में भी। हिन्दी की किताबें देखें तो वह बहुत खूबसूरत हैं। भाषा की किताबों के सारे पाठ इतने खास हैं। यदि इसे ही बरत लें,सहेज लें तो बात बने। शिक्षक को ही यदि किताबों से प्रेम नहीं है तो कैसी विरासत बना रहे होंगे हम? क्या स्कूल में बच्चे संवाद करते हैं? सवाल उठाते हैं? मैंने साहित्य में ज़्यादा पढ़ाई नहीं की। पीजी के समय में मैंने देखा कि साहित्य को पढ़ाने वाले शिक्षक मुझे रुला देते थे। ऐसे साहित्य पढ़ा जाता है? पढ़ाया जाता है? एक शिक्षक के पास कितने बच्चे आते हैं। वे बच्चे यदि मनुष्य हो जाएं तो दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाए। मैं कक्षा 4 में पढ़ती थी। पुस्तकालय में एक किताब मिली। सार यह है कि नक्सली मूवमेंट में युवक पड़ गया। पकड़ा जाना और पुलिस की कार्रवाई में 5 साल निकल गए। मैंने इसे पढ़ा। कैसे किताब हमारे जीवन को बदलती है? साहित्य हमें नज़रिया देता है। परखने का अवसर देता है। चित्रलेखा पढ़ी। जिन शिक्षकों को साहित्य से प्रेम है उनकी कक्षाओं में कुछ अलग होता है। यू ंतो सभी शिक्षक अपनी कक्षाओं में कुछ न कुछ होता है। शिक्षक का व्यवहार कक्षाओं में जाएगा। बच्चों के जीवन में जाएगा।''

प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘शिक्षक होना, बच्चों से प्यार करना। बच्चों को सवालों को तैयार करना अपने आप में अनूठा है।’’ पांच बजकर दस मिनट पर रेखा चमोली जी ने अपनी बात शुरू की। रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘प्रतिभा को सुनना लंबी प्रेम कविता को सुनना जैसा है। प्रतिभा जी से सहमति ज़ाहिर करते हुए मैं यह कहना चाहती हूँ कि यह मेरी ही बात है। मैं जानती हूं कि जो इस संवाद में शामिल हैं वह भी अपनी कक्षा में खूब बेहतर काम कर रहे हैं। शिक्षकों के पढ़ने-लिखने की बात पर बात आगे बढ़ाते हैं। मुझे लगता है कि हर व्यवसाय में कुछ खास होता है। शिक्षा में भी किताबें ज़रूरी हैं। हमें किताबें एक औजार के तौर पर दिखाई देती हैं। विषयवार शिक्षक और विषय की किताबों से नहीं पूरी प्रक्रिया में हमें बच्चों के सारे पढ़ाई के दिनों के तौर पर देखना होगा। जैसे जिस शिक्षक ने तोत्तोचान पढ़ी होगी। वह किसी भी तरह का शिक्षक है किसी भी विषय का शिक्षक है। वह बच्चों की उलझनों को समझेगा। पहला अध्यापक किताब भी शिक्षक के व्यवहार को दिखाती है। किताबें सवालों को सुनने-समझने का माध्यम बनती हैं। किताबों और किताबों में निहित शिक्षा प्रणाली के बारे में हम सही-गलत पर सवाल किए जा सकते हैं। मतलब यह है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। जो भी गड़बड़ हो रही है हमारी कक्षाओं में कुछ गड़बड़ है। देखा जाए तो अब तो नियमित कक्षाएं चल रही हैं। यदि कोई शिक्षक किताबें पढ़ता है तो उसके भीतर का मनुष्य सवाल करता है। हां या नहीं वाला नहीं होता। शिक्षक का पढ़ना जरूरी है। व्हाट्स एप या फेसबुक में चीजें जो आ रही हैं। जिसे एक तरह से पढ़ना माना जाए तो क्या हम उस पर सवाल करते हैं। सही-गलत पर विचार करते हैं? हम फाॅरवर्ड कर देते हैं। यदि हमने किताबें पढ़ी हुई होती तो शायद हम सोचते। क्या करना है क्या नहीं करना चाहिए। हमें पढ़ना चाहिए। देर से ही सही पर पढ़े। यदि हम शिक्षक हैं। पढ़ते-लिखते शिक्षक है तो हमारी कक्षा कैसी होगी। मुझे लगता है कि ऐसे शिक्षक के पूर्वाग्रह नहीं होंगे। मैं अपना उदाहरण देती हूं। अपने-अपने राम। ये भगवान सिंह जी किताब है। बचपन में पढ़ी थी। मुझे वह तर्कपूर्ण किताब लगी। पाठकों का नजरिया बदल देती है किताब। आप जो पढ़ने से पहले होते हैं पढ़ने के बाद बदलते हैं। शिद्दत से पढ़ाने वाला शिक्षक संकोची नहीं होता। उसकी कक्षा में वह निडरता से पढ़ा रहा होता है। वह सवालों का जवाब देता है। घर में यदि बच्चों को माहौल मिलता है तो असर होता ही है। हमारे स्कूलों में जो भी बच्चे आ रहे हैं उनके पास घर में पढ़ने के लिए स्कूली किताबों से इतर बहुत कुछ नहीं होता। छपी हुई चीज़ों से वे दूर हैं। ऐसे माहौल में हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। उन बच्चों को खुद से पढ़ने के लिए तैयार करने के लिए किताबें चाहिए। जिन बच्चों को पढ़ने के लिए किताबें मिलती हैं तो उन्हें घर में अलग से पढ़ाना सिखाना नहीं करता। हम शिक्षक कक्षा में चित्रों में बात कर रहे होते हैं। घरेलू बातें होंगी। घर जैसी बातें होंगी।’’


रेखा चमोली ने कहा,‘‘एक ओर हम कहते हैं कि बच्चे रुपए लेकर नहीं आने हैं। एक बच्ची के बैग में दस रुपए निकलते हैं। बच्चों को सुना जाता है तो पता चलता है कि बच्ची घर के लिए 10 रुपए की चीनी लेकर जाएगी। जब यह पता चलता है तो कितनी बातें,अनुभव मिलते हैं। एक शिक्षक की बात और एक बच्ची की बात दोनों महत्वपूर्ण है। इसी तरह जब हम किसी कक्षा में कुछ पढ़ा रहे होते हैं तो हम सिर्फ भाषण नहीं होता। कहानी नहीं होता। कहानी के चित्रों,चरित्रों पर बात होती है। हमारे व्यवहार करने पर भी बहुत सारे मूल्य स्वतः आ जाते हैं।’’

रेखा चमोली जी ने छःह साल की छोकरी कविता पर खूब बात की। बहुत सारी सामग्री यानि छपी सामग्री जब बच्चों को पढ़ने के लिए दी जाती है तो बात आगे बढ़ती है। कक्षा के नियम होते हैं। पर यदि हम बच्चों से अच्छे बात करते हैं तो सामग्री बच्चे संभालते हैं। बच्चे अपने मन से चयन करते हैं। पढ़ते हैं। पढ़ने के मौके देते हैं। हम स्वयं भी पढ़ें। बच्चों को समय देना पड़ता है। बच्चे पढ़े हुए या सुने हुए पर बात करें। उन्हें मौका दिया जाना चाहिए। बच्चों का पढ़ा हुआ सुना जाए। वे खुश होते हैं। सुनना,बोलना और पढ़ना का अवसर देते हैं और हम बच्चों को लिखने के लिए प्रेरित करते हैं तो उसके लिखे हुए पर रुचि दिखाते हैं तो अलग बात है। बच्चों का रुझान बढ़ता है। प्रातःकालीन सभा में वह बोलते हैं तो बात ही अलग होती है। दीवार पत्रिका में उनके साथ शामिल होना बड़ी बात है। दीवार पर चिपकने के बाद नहीं। दीवार पत्रिका के शुरू होने,बनाने में तो वह प्रेरित करने वाला काम है। बच्चे मिलकर जो खोजते हैं,पढ़ते हैं लिखते हैं। यह बड़ा काम है। समझकर पढ़ना-लिखना आ गया तो बच्चे भूलते नहीं हैं। शिक्षक को भरोसा हो जाए कि वह सही दिशा में काम कर रहा होता है तो वह करता है। वह अपना काम करता रहता है।


5 बजकर 38 मिनट पर सवालों का सिलसिला आरम्भ हुआ। अशोक जी ने मुदित जी की सहायता से सवालों का समेकन किया। कक्षा कक्ष से जुड़े हुए सवालों से इतर भी सवाल आए। सवालों के जवाब में पहले रेखा जी ने कहा,‘‘यदि घर में बहुत सारी किताबें हैं तो बच्चों को पढ़ने के लिए कहा जा सकता है। बच्चों को प्रेरित किया जा सकता है। बच्चों के साथ पढ़ी जाएं तो बच्चे पढ़ते हैं। अभिभावक किताबें ले आएं। बच्चे खुद पढ़े। सहजता से हो। दबाव में नहीं पढ़ाया जा सकता। माहौल दें बस। पढ़ने-लिखने से तार्किकता का जो मामला है तो किताबें जगाती हैं। जब हम देखते,सुनते और समझते हैं। माना किसी गांव का उपन्यास पढ़ रहे हैं तो हमें गांव का जीवन,रहन-सहन समझ में आता है। किताबें हमारा भ्रम भी तोड़ती हैं। जब हम बहुत सारे संदर्भों को पढ़ते हैं तो एक ताना-बाना बुनते हैं। फिर हम किसी एक पक्ष पर ही अपनी समझ नहीं बनाते। हमारे अनुभव और दूसरो के अनुभव से हम अपना रास्ता खोजते हैं। सोचने का नया आयाम मिलता है। फिर हम किसी का कहा हुआ यूं ही नहीं मान लेते। हमारा सोचना और मानना बनता है।’’


अन्य सवाल के जवाब में रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘एक ही तरह का पढ़ना संकुचित बना सकता है। लेकिन एक ही विषय पर अलग-अलग किताबें पढ़ंे तो समझ विस्तारित हो सकती है। लेखन के लिए कोई सलाह क्या हो सकती है? जब भीतर से सलाह आती है कि अब लिखना ही है तो लिखना हमारे विचार,भावानाएं और दर्द सामने आते हैं। शिक्षक के तौर पर लिखना तो अलग है। हम अपने शिक्षण को लिखें। हमारी सोच और समस्याएं रेखांकित हो सकती है। वह काम आती हैं। मुझे लगता है कि बच्चों को उनकी उम्र और रुचि के हिसाब से किताबें देनी चाहिए। फिर धीरे-धीरे चयन का अधिकार बच्चों को मिलना चाहिए। बच्चे बड़े की किताब भी पढ़ सकते हैं। पढ़ने की ललक पैदा हो चुकी है तो बड़ों की किताबें पढ़ी जा सकती हैं। पढ़ना-लिखना एकाकी प्रक्रिया भले ही है पर पढ़ने के बाद जब हम खुद में बदलाव महसूस होता है। हमारा पूरा बना हुआ इंसान जब सामने आता है तो समाज में हम जाते हैं तो हमारा व्यवहार बदला हुआ होगा। सकारात्मक होगा। फर्क तो आएगा ही। पढ़ते-लिखते हैं तो समाज के साथ व्यवहार में परिलक्षित होता है।’’

एक घण्टा पैंतीस मिनट के बाद भी आ रहे सवालों के जवाब देने की प्रक्रिया चलती रही। रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘शुरू में लेखन में पढ़े हुए से प्रभाव रहता है लेकिन जैसे-जैसे हम पढ़ते जाते हैं तो हमारे लेखन में स्वतंत्रता आती है। समूह में पढ़ने की बात करते हैं तो हम कक्षा में इसलिए भी करते हैं कि बच्चे जब समूह में पढ़ते हैं तो वे एक-दूसरे की मदद करते हैं। पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में कक्षा में छूना,देखना क्यों प्रतिबंधित है? यदि समूह में वे बच्चे काम करें तो उसकी बात ही कुछ ओर है। बच्चे दो में छोटे-छोट समूह में पढ़ सकते हैं। चीज़ें बनाते हैं। समूह में पढ़ने के कई तरीकों से वह तेजी से पढ़ना और पढ़कर अपनी बात सुनाने की गति तेजी से सीखते है। अभिभावकों की गलतफहमी है कि साहित्य बच्चों की कोर्स को बाधित करता है। साहित्य कहीं न कहीं बच्चों की समझ को बढ़ाता है। पाठ्यक्रम को सीखने-समझने और विस्तार देने में मदद ही करता है साहित्य। किसी भी बच्चे का जो व्यक्तित्व बनता है तो स्कूली किताबों से ही नहीं बनता। किताबों का महत्व नकारा नहीं जा सकता।’’

एक घण्टा बयालीस मिनट की बातचीत के बाद रेखा जी ने अपनी कक्षाओं के अनुभव भी साझा किए। सवालों के जवाब में रेखा जी ने कहा,‘‘एकांत में मौलिक लेखन नहीं होता। हम जो बोलते,सुनते,लिखते हैं वह समाज का ही हिस्सा होता है। किसी बात को अपने तरीके से लिखना शायद मौलिक है। मैं निडरता के साथ जो लिखती हूं वह मौलिक कहलाया जाएगा। बच्चों को जानवरों से प्यार होता है। बच्चे अपनी प्रकृति को जानते हैं। कल्पनाशीलता में खिलौनों से बात होती है। जमीन को चोट कैसे लगती है। बाल मनोविज्ञान कल्पना के घोड़े दौड़ाने को सही मानता है। बच्चों को साहित्य में भी वह सब देना चाहिए जो उसके समाज में है। डायरी में बच्चों की मात्र दिनचर्या कैसे बदली जाए? लगातार और धीरे-धीरे प्रयास किए जाएं तो डायरी में दिनचर्या के साथ भाव भी आएंगे। यह बड़ों के साथ भी होता है। निरन्तर अभ्यास से यह आएगा।

अंत में प्रतिभा जी कनेक्ट हुई। उन्होंने जोड़ा,‘‘यह बात सही है कि एक ही विचार का साहित्य नहीं पढ़ना चाहिए। किसी के विरोध में या असहमति में जाने के लिए ज़्यादा पढ़ना होगा वह भी किसी पूर्वाग्रह के। हमें खुलेपन से चीज़ों को पढ़ना चाहिए। समझना चाहिए। हर तरह के साहित्य को पढ़ने से हम और खुलते हैं। माना कि मैं धर्म पर विश्वास नहीं करती तो मुझे समझना होगा कि मुझे धर्म की कितनी जानकारी है? तभी हम मुक्त होते हैं। किताबें अन्तिम नहीं होतीं। हम जीवन को भी तो पढ़ रहे होते हैं। हम सही साहित्य की ओर बढ़ते हैं हमारा जीवन भी तो है जिससे हम समझ रहे होते हैं।’’ 1 घण्टा 54 मिनट की बातचीत में अंत तक 94 साथी लगातार बने रहे। अंत में जगमोहन कठैत जी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

Saturday, April 25, 2020

बस जरा सर पर हाथ रख देना...



 प्रतिभा कटियार
स्कूल से लौटते हुए उस रोज मेरा मन इतना बेचैन था कि कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बेचैनी इतनी ज्यादा थी कि सोचा साथियो से साझा करुँगी तो शायद कुछ कम होगी लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. वो दिन बीते आज महीनों बीत चुके हैं लेकिन अब तक वह बेचैनी जस की तस है. हाँ, इस बीच उस बेचैनी में कुछ नए आयाम जुड़े जरूर हैं. उस रोज जो हुआ वो कुछ भी अनोखा नहीं था, रोज जैसा ही था फिर भी बेचैनी क्यों हुई इस कदर.

वाकया कुछ यूँ है कि उस रोज मैं एक ऐसे स्कूल से लौट रही थी जहाँ मैं पहले भी चार-पांच बार जा चुकी थी. स्कूल के लगभग सभी 22 बच्चे मुझे और मैं उन्हें नाम से जानने लगे थे. हममें दोस्ती हो चुकी थी. पक्की वाली दोस्ती. मैं उन्हें कहानियां सुनाती, बदले में वो भी मुझे कहानियां सुनाते. बातें करते. उस रोज कक्षा 5 में कुछ समय बिताया. कक्षा 5 में 9 बच्चे हैं. सभी बच्चे पोटली की किताबें पढ़ते हैं, पोटली लाइब्रेरी का रजिस्टर बच्चे ही मेनटेन करते हैं. वो कहानियों को सिर्फ पढ़ते नहीं समझकर पढ़ते हैं और उस पर बातचीत भी करते हैं. उस रोज उन पढ़ी हुई कहानियों में उन्हें क्या अच्छा लगा इस पर लिखने वाला खेल हमने खेला. अनुभव यह है कि इस तरह अपनी मर्जी से लिखने को कहने पर बच्चों को अच्छा लगता है, खासकर तब जबकि उन्हें पता हो कि उनके लिखे को जांचा नहीं जायेगा. सभी बच्चों ने लिखना शुरू किया. फिर एक-एक कर बच्चों ने अपना लिखा हुआ पढ़ना शुरू किया. कक्षा के 3 बच्चे भुवन, सोमाली और रूद्र कॉपी से सर नहीं उठा रहे थे. ऐसा मालूम हो रहा था कि वो बहुत गंभीर होकर कुछ लिख रहे हैं. जब सारे बच्चों ने अपना लिखा पढ़कर सुना दिया तब भी ये 3 बच्चे कॉपी में ही सर घुसाए बैठे थे. मैंने प्यार से पूछा, जितना लिखा है उतना ही दिखा दो...तो उनके पास बैठे बच्चों ने कहा इनो लिखना नहीं आता मैडम. ऐसा कहने वाले बच्चे के चेहरे पर उपहास का हल्का भाव था, उन बच्चों ने सर और कॉपी में छुपा लिया. मैंने मैडम की ओर देखा. मैडम ने बहुत सहजता के साथ कहा, ‘इनको नहीं आता.’ ऐसी सहजता और वो उपहास मिलकर मुझे बेचैन करने के लिए काफी थे. लेकिन इससे ज्यादा मुझे फ़िक्र थी उन बच्चों की कि उन्हें कैसा महसूस हो रहा होगा. उन्हें सहज करने के इरादे से मैंने कहा, ‘कोई बात नहीं, नहीं आता लिखना तो तुम ऐसे ही बताओ तुमने जो कहानी पढ़ी वो तुम्हें कैसी लगी.’ बच्चे खड़े तो गए लेकिन बोले कुछ नहीं. उनके हाथ में किताब थी लेकिन वो चुप थे. थोड़ी देर बाद भुवन ने कहा, ‘मैडम हमें पढ़ना भी नहीं आता.’

मेरे लिए यह समझना मुश्किल था कि इन बच्चों को अपना नाम तक लिखना नहीं आता था और न ही वे किताब का शीर्षक पढ़ पा रहे थे. जबकि अपनी पिछली 5 स्कूल विज़िट के दौरान मैंने इन बच्चों को काफी सक्रिय और सीखने को उत्सुक पाया था. ये हर गतिविधि में बराबर शरीक होते थे खासकर भुवन. वो तो क्लास का मॉनिटर भी है. मैंने उसे किताबें पढ़ते हुए भी देखा है और एक बार तो उसने किताब को पलटते हुए पूरी कहानी भी सुनाई थी. मैंने जब पूछा कि ‘तुम तो उस दिन कहानी सुना रहे थे न किताब से,’ तो भुवन ने इत्मिनान से कहा ‘वो तो मैं साथ वाले बच्चों को पढ़ते हुए सुनता हूँ तो समझ जाता हूँ कि किस पेज पर किस जगह क्या लिखा है इसलिए.’ अब भुवन मुस्कुरा रहा था. उसने और बाकी दोनों बच्चों ने, कक्षा के बाकी बच्चों ने और शिक्षकों ने यह मान लिया है कि ये तीनों पढ़ना लिखना नहीं सीख सकते. मैडम का कहना था कि ‘कुछ बच्चे नहीं ही सीख सकते, ये वही बच्चे हैं. सारे बच्चे सीख जाएँ जरूरी तो नहीं है न?’ ऐसा मैडम मुझसे कह रही थीं या खुद से पता नहीं लेकिन मैं परेशान थी यह सोचकर कि जो बच्चा दोस्त को पढ़ते देखकर यह समझ जाता है कि किस पेज पर क्या लिखा है वो खुद क्यों पढना लिखना सीख पा रहा है. ये बच्चे अनुपस्थित रहने वाले बच्चे भी नहीं हैं. भुवन की बड़ी-बड़ी आँखे और मुस्कुराकर आत्मविश्वास के साथ कहना कि ,’मैडम हमको पढ़ना भी नहीं आता, लिखना भी नहीं आता’ जैसे आत्मा को घायल कर रहा था. उसे स्कूल की व्यवस्था ने यह अच्छे से समझा दिया था कि कुछ बच्चे नहीं ही सीख पाते हैं और वो उन बच्चों में से हैं. सच कह रही हूँ महीनों बाद भी यह सब लिखते हुए भुवन की आँखें मेरे सामने हैं. ये हर उस बच्चे की आँखें हैं जो पढ़ना लिखना सीख पाने से दूर हैं, जो शिक्षा की रेल में एक अलग डिब्बे में सफर कर रहे हैं, कहीं भी कभी भी उतर जायेंगे. कोई कक्षा 3 के बाद कोई 4 के बाद कोई 5 के बाद. व्यवस्था भी इनके यूँ उतर जाने से बेचैन नहीं है क्योंकि ये बच्चे आंकड़े बिगाड़ते हैं. उसी स्कूल में भुवन ने कक्षा 1 में दाखिला लिया था. आज उसी स्कूल से कक्षा 5 पास करके जाने वाला है बिना लिखना पढ़ना सीखे. हालाँकि कि लिखने-पढने से इतर भुवन हिसाब का पक्का है, हर काम ठीक से करता है, नाटक, कविता, कहानी सबमें शामिल होता है.

अजीब मन मिला है कि हमेशा ही हार गये, पिछड़ गए, हाशिये पर छूट गए लोगों के करीब जाकर बैठ जाता है. मैंने क्या किया, कितना कर पायी और आज भुवन कुछ महीनों में अपना नाम और दोस्तों का नाम लिखने लगा है की यात्रा पर बात करना बेमानी है क्योंकि सवाल तो इससे काफी बड़ा है. ठीक इसी वक़्त मुझे राजस्थान के एक साथी द्वारा सुनाया गया ऐसा ही अनुभव याद आता है. बच्चे का नाम दिलखुश था, खूब शैतान इतना कि कक्षा में किसी को पढने लिखने न दे, सब सामान बिखेर दे, झगड़ा करे सबसे और पढ़े लिखे बिलकुल न. शिक्षक बार-बार उसके अभिभावकों को बुलाकर कुछ कहें तो अभिभावक भी उसे ही पीटना शुरू कर दें कि घर पर भी यही करता था वो. फिर कुछ महीनों तक जब फाउंडेशन की साथी ने उसके साथ काम किया तो पाया कि बच्चे का दिमाग बहुत तेज़ है और गणित में तो वो बेमिसाल है. फिर अल्मोड़ा की वो बच्ची याद आ गयी जो नीरू मैडम का पल्ला-पकडे पकड़े घूमती थी और किसी से बात नहीं करती थी, उसे भी पढने लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. फिर एक और बच्चा दिनेशपुर का याद आया जिसका स्कूल में आना व्यवस्था को खराब करने जैसा होता था. सिर्फ झगड़ा और गाली गलौज करना ही उसका काम था. वो पढता भी नहीं था और पढ़ना चाहता भी नहीं था इसलिए बाकि बच्चों की कॉपी फाड़ता था पेन्सिल छुपा देता था. बाद में उस बच्चे के शिक्षक ने पाया कि उस बच्चे को भूख भर खुराक ही नहीं मिल रही है न घर पर न स्कूल में. उसकी भूख अन्य बच्चों से ज्यादा थी और खाना उसे सबके बराबर मिलता था. फिर एक एक कर न जाने कितने उदाहरण आँखों के सामने तैरने लगे. एक बच्ची जिसे दीखता कम था, एक जिसकी माँ की मृत्यु हो गयी थी, एक जिसके पिता रोज माँ को शराब पीकर पीटते थे, एक जिसका भाई उसकी किताबें फाड़ देता था.

ये सब बच्चे स्कूल जाकर भी सीख नहीं पा रहे थे. दिक्कत तलब यह कि एक व्यवस्था के तहत यह मान लिया गया था कि ये कुछ बच्चे होते ही ऐसे हैं जो सीख नहीं पाते. या स्कूलों में इतना कम शिक्षक स्टाफ है और ऐसे हालात हैं कि अलग से इन बच्चों पर काम करने की सोचना भी मुश्किल है. तर्क सही हो सकते हैं, शायद होंगे भी, आंकड़ों में दर्ज सत्तर या अस्सी प्रतिशत बच्चों के सीख जाने से संतुष्ट भी हो लेंगे लेकिन वो आँखें पीछा करती रहेंगी जो सीखने की इच्छा से स्कूल में दाखिल हुई थीं.

सरकारी स्कूलों में जो बच्चे आते हैं व्यवस्था को उनके और उनके परिवेश के प्रति संवेदनशील होना कितना जरूरी है यह बात समझ में आती है. किसी भी तरह के सीखने की शुरुआत उसी संवेदना के बिंदु से होती है जहाँ सीखने की इच्छा और सिखाने में स्नेह का मिलन होता है. अपने ही एक साथी की कही बात मुझे किसी भी तरह के सीखने-सिखाने को लेकर बताया गया मन्त्र लगता है कि पहले बच्चों के सर पर हाथ रखो प्यार से, उनकी आँखों में देखो तो सही कितने सपने हैं वहां, उनसे दोस्ती तो करो फिर आ जायेया लिखना भी पढ़ना भी. सोचती हूँ कि शिक्षा का इतना बड़ा तन्त्र ऐसी भावुक बातों से तो नहीं चलने वाला तो पाती हूँ कि हमारे शिक्षा के दस्तावेजों में भी इस संवेदना की पूरी स्पेस है. यूँ ही नहीं सभी के लिए न्यायोचित शिक्षा, बच्चे पर केन्द्रित उसकी जरूरत पर आधारित शिक्षा, सीखने की प्रक्रिया में हर बच्चे की प्रतिभागिता की बात कही गयी होगी. चाहे नेशनल एजुकेशन पॉलिसी हो या एनसीएफ 2005 या नेशनल करिकुलम फॉर एलीमेंटरी एंड सेकेंडरी एजुकेशन. अभी हाल ही में, 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ) ने एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया है, जिसमें सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण समावेशी शिक्षा प्रदान करने के तरीके शामिल किए गए हैं। वह शिक्षकों द्वारा निम्नलिखित कामों को करने की जरूरत को स्पष्ट करती है:

· हर बच्चे की अनोखी जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना
· बच्चे पर केंद्रित, सामाजिक रूप से प्रासंगिक और न्यायोचित पढ़ाने/सीखने की प्रक्रिया प्रदान करना
· उनके सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों में विविधता को समझना।

यानि मामला सिर्फ भावुक होने का नहीं है उस मर्म को समझने का है जहाँ ये बातें सिर्फ दस्तावेजों में दर्ज होकर न रह जाएँ कक्षा में हर बच्चे के जीवन से संवेदना के धरातल पर जुड़ सकें. बच्चों की जरूरतों को समझे बिना, उनके और उनके परिवेश को समझे बिना, उसके प्रति सम्मान का भाव लाये बिना इसे अमल में लाना मुश्किल है.

इसलिए जब कोई शिक्षक यह कहते हैं कि इन बच्चों के अभिभावक इन पर ध्यान नहीं देते, तो मुझे ‘इन बच्चों’ से और प्यार हो जाता है. और मैं शिक्षक साथियों से कहती कि सबका सीखना जरूरी है क्योंकि सीखना हक है सबका. ठीक उसी तरह जैसे जीवन पर हक है सबका. इसकी शुरुआत की पहली पैडागौजी है कक्षा में आये हर बच्चे से मन का रिश्ता बना पाना, उनका सम्मान करना और अपनी प्रक्रियाओं में थोड़ा अतिरिक्त चौकन्नापन शामिल करना कि कहीं कोई छूट तो नहीं रहा...

बीती रात की बारिश और तुम



कल रात बारिश हुई...रात भर...तेज़ नहीं मध्धम बारिश. मैं रात भर भीगती रही...कांपती रही. सुबह को उठी हूँ तो धरती सूखी है, पत्तियों पर, फूलों पर, तितलियों पर कहीं बारिश के नामो निशान नहीं हैं. लेकिन मैं खुद को भीगा हुआ ही महसूस कर रही हूँ. काँप रही हूँ. ज्यादा चाय बनायी है. धूप के करीब बैठकर चाय पी रही हूँ. यूँ कांपना बुरा नहीं है, ठिठुरना भी नहीं अगर धूप के कुछ टुकड़े मेहरबान हो जाएँ. जो थोड़ा सुखा भी दें और थोड़ी नमी रहने भी दें.

जीवन किसी राग सा होता है. उनहू...जीवन तो वैसा ही होता है जैसा होता है. इच्छाएं किसी राग सी होती हैं. कौन सा स्वर कोमल लगना है कौन सा मध्धम, कौन सा स्वर वर्जित है किस राग में और किस पहर में गाना है कोई राग...ऐसा ही तो है इच्छाओं का संसार. कि बस एक जरा सी, बहुत मामूली सी बात से सुख तर-ब-तर कर देता है और उससे भी बेहद मामूली, बेहद जरा सी बात पे हजारों टुकड़ों में बंटकर चकनाचूर भी हो जाता है मन.

राग साधना आसान नहीं...

चिड़ियों की आवाज इन दिनों बड़ा भरोसा बनी हुई हैं. क्या तुम्हारे शहर की चिड़ियाँ भी ऐसा ही मीठा गाती हैं? तुम भागते फिरते थे हमेशा कि तुम्हारे जीवन में स्मृतियों के लिए समय नहीं था. इन दिनों कैसे टालते होगे तुम स्मृतियों को वो आती तो होंगी ही, तुम 'अभी बिजी हूँ बाद में आना' कहकर अब जा तो न पाते होगे.

जब समूची दुनिया एक साथ मृत्यु के भय से दुबककर घरों में कैद है ऐसे में क्या तुम्हारा मुझे याद करना बढ़ गया है? बीती रात बारिश क्या तुमने भेजी थी ? क्या यह बारिश हमारे भीतर की नमी को सहेजने की बारिश थी...इस भरोसे की जल्द ठीक होगा सब और हम मिलेंगे ज्यादा प्यार से भरकर. क्या इस बारिश ने समूची धरती के लोगों को भिगोया होगा?