Wednesday, October 23, 2013
Friday, October 4, 2013
रोशनी बहुत चाहिए, सच्ची...
सुबह से तीन बार अखबारों को उलट-पुलटकर रख चुकी हूं। पढे़ हुए अखबारों में भी हमेशा कुछ न कुछ पढ़ने को छूट ही जाता है। हालांकि न पढ़ो तो भी कुछ नहीं छूटता ये अलग बात है। हर छूटी हुई चीज अपनी ओर शिद्दत से पुकारती है। शायद इसीलिए सुबह से तीन कप चाय से कलेजा जला चुकने के बाद भी घूमफिर कर अखबार उठा लेना किसी ढीठता सा ही लगता है।
कभी-कभी कैसे हो जाते हैं हम, जो एकदम नहीं करना चाहते उसमें ही खुद को झोंक देते हैं। जी-जान से। फिर उस न चाहने वाले काम में उलझे-उलझे भीतर ही भीतर कुछ रिसने लगता है। बाहर से काम के नतीजे तो अच्छे आ रहे होते हैं लेकिन अंदर से जो रिसाव है वो उस अच्छे को चिढ़कर देखता है। उस चिढ़कर देखने के बाद हम खुद को और ज्यादा झोंकने लगते हैं।
इस लड़ाई में हमें मजा आने लगता है। इस चिढ़ने में भी। सफलता और चिढ़ एक साथ बढ़ने लगती हैं। मुस्कुराहटों की तादाद एकदम से बढ़ जाती है कभी-कभी खिलखिलाहटों और कभी तो ठहाकों तक जा पहुंचती है। चिढ़ संकुचित होने लगती है। उसका आकार छोटा होता जाता है और गहनता बढ़ती जाती है। उसका कसाव मुस्कुराहटों के एकदम अंदर वाली पर्त में अपनी जगह बनाने लगता है। धीरे-धीरे उसका कसाव संपूर्ण जीवन में अपना कसाव बढ़ाने लगता है। यह तरह-तरह से दिखता है। कभी ज्यादा खुशियों, ज्यादा काम के बीच। कभी कुछ न करने या न कर पाने के आलसीपन या तकलीफ के बीच और कभी-कभार लंबे मौन के बीच खिंची किसी स्याह लकीर की तरह।
लकीरें... आजकल कागज पर भी खूब दौड़ती फिरती हैं। ठीक उसी तरह जैसे बचपन में पेंसिल लेकर पूरे कागज को गोंचने के लिए दौड़ती फिरती थीं। वो शायद पढ़ने का मन न होने पर होता होगा। या फिर किसी से नाराज होने पर। या अपनी कोई इच्छा पूरी न होने पर भी शायद। हमारे बचपन को नाराजगियां जाहिर करने की आजादी कहां थी। खैर, आजकल चिढ़ को थोड़ी रिसपेक्ट दे रखी है मैंने। उसकी सुनती हूं, कहती कुछ नहीं। कोशश करती हूं उसकी वजह समझ सकूं। काम करती हूं लेकिन उसे पलटकर देखने का मन नहीं करता। कुछ भी पलटकर देखने का मन नहीं करता। यहां तक दोपहर आते-आते सुबह की तरफ देखने का मन नहीं करता।
कोरे कागजों पर ढेर सारी लकीरें उगा रखी हैं। एक लकीर दूसरी को काटती है। दूसरी तीसरी को। तीसरी लकीर चौथी को काटती और इस तरह कोई लकीर सौवीं लकीर को भी काटती है।
इन कटी हुई लकीरों में बहुत सारी नई लकीरों का अक्स उभरता है। वो अक्स जाना-पहचाना सा लगता है। हालांकि उन नई लकीरों को मैंने नहीं बनाया उन्होंने खुद जन्म लिया है।
खूबसूरत मौसम जिस तरह आहिस्ता-आहिस्ता करीब आ रहा है, उसे छूने को जी चाहता है। ढेर बारिषों के बाद धूप के टुकड़े पकड़ने को जी चाहता है। बहुत सीलन भर गई है हर तरफ, अंदर बाहर, अखबारों के अंदर भी....बहुत धूप चाहिए। तरह-तरह की धूप चाहिए। बहुत उजाला चाहिए....ढेर सारा उजाला। खिड़की के सारे पर्दे हटा देने पर कमरे रोशनी से नहा जाते हैं....काश हर अंधेरे को दूर करने के लिए कुछ पर्दे होते, जिन्हें इतनी ही आसानी से हटाया जा सकता। अखबार को फिर से टेबल से उठाकर सोफे पर रख देती हूं। रोशनी बहुत चाहिए सच्ची...
दिन में किसी बच्चे ने धूप के कुछ टुकड़े दिए थे। प्राइम टाइम देखते हुए उन्हें अपने पर्स में तलाश रही हूं...
Sunday, September 29, 2013
Tuesday, September 24, 2013
किसी से न कहना
सुनो, अरे सुनो तो....राघव हांफते हुए काजल के पीछे भाग रहा है.
काजल पलटकर देखती है. खिलखिलाकर हंसती है और फिर भागने लगती है. दम है तो जीतकर दिखाओ. वो चिल्लाकर कहती है. राघव पेट पकड़कर बैठ जाता है.
जा तू, मैं तुझसे नहीं बोलता. तू ही जीत जा. सर की चमची.
मैं सर की चमची....मैं सर की चमची....गुस्से में चिल्लाते हुए काजल राघव के पास आती है और उसे एक तमाचा मारती है. राघव दर्द से कराह उठता है. काजल और मारती है.
माफ कर दे रे काजल, तू नहीं मैं सर का चमचा...
ठीक से माफी मांग. काजल कमर पे हाथ रखकर खड़ी हो जाती है.
राघव कान पकड़कर माफी मांगता है.
सुन....राघव काजल से कहता है
तू ना, किसी को बताना मत कि तूने मुझे मारा है.
क्यों...काजल उसे घूरकर देखती है. तेरी इज्जत घट जायेगी ये बताने से कि मुझसे पिटा है, इसलिए.
राघव धीरे से कहता है हां....
जिनके सामने तेरी इज्जत घट जायेगी तू मुझे बताइयो मैं उन्हें भी एक रहपटा लगा दूंगी. फिर सबकी इज्जत एक सी हो जायेगी. ठीक?
राघव मन ही मन सोच रहा है कि कैसे काजल को मनाये....
अच्छा सुन, अगर तू किसी को नहीं बतायेगी तो मैं तुझे इमली वाली गोलियां दूंगा.
अच्छा....और?
काजल चलते-चलते पूछती है.
और बिस्कुट....
और? काजल फिर पूछती है...
और ऑरेंज वाली टॉफी. देख इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं दे सकता. हां...राघव खिसिया गया.
अबे, तेरी इज्जत का सवाल है. इमली की गोली, ऑरेंज वाली टॉफी और बिस्किुट भर की है तेरी इज्जत? काजल ने व्यंग्य किया.
राघव ने मुंह फुला लिया.
अच्छा चल नहीं बताउंगी. तू घर जाते वक्त मेरा बस्ता भी उठायेगा.
ठीक. राघव ने कहा.
मेरी बात मानेगा. काजल कहती है
ठीक. राघव कहता है.
अब से तेरी इज्जत मेरे हाथ में सुरक्षित है. काजल मुस्कुराती है.
गुरू जी ने विज्ञान की कक्षा हेतु जिन बच्चों से जंगल से किसी खास पेड़ की पत्ते मंगवाये थे उनमें काजल सबसे पहले लौटी थी.
राघव, कपिल, घुग्घू तो वहां तक गये ही नहीं.
सौरभ पहुंचा जरूर लेकिन देर से.
गुरू जी काजल को देखकर मुस्कुराए....
शाबास! लाओ पत्तियां यहां रख दो.
राघव, तुम भी यहां रख दो अपनी पत्तियां.
ना...गुरूजी हम ना लाये...हम ना...गिर पड़े रस्ते में सो ला ना पाये...जो गिरते ना तो पक्का ले आते. देखो कपड़ा भी मैले हो गये गिरने से.
काजल फिस्स...से हंस दी. राघव ने उसे घूरा...
गुरूजी अगली बार हम पक्का लेकर आयेंगे. तब तक सौरभ, कपिल और घुग्घू भी कक्षा में आ गये. सिर्फ सौरभ के हाथ में पत्ते थे.
गुरूजी ने काजल के सबसे पहले काम पूरा करने के लिए पूरी कक्षा को तालियां बजाने को कहा. साथ ही उन्होंने राघव को बुलाकर कहा, बेटा मुझे पता है तुम गिरे नहीं थे. तुम्हें काजल ने मारा था.
पूरी कक्षा के सामने एक लड़की के हाथ पिटने की बात स्वीकार करते हुए राघव को आंसू आ गये. उसने काजल की ओर देखा. काजल ने इशारे से कहा कि उसने नहीं बताया गुरूजी को.
गुरू जी ने कहा, मैंने तुम दोनों की बातें सुन ली थीं. उन्होंने काजल को भी डांट लगाई. और पूरी कक्षा से कहा,
बच्चो कोई भी काम न लड़कों का है न लड़कियों का. कोई भी क्षमता और इच्छा से सधता है. इसलिए अगर काजल जंगल में जाकर पत्तियां ला सकती है तो राघव मीठा गीत गा सकता है. और राघव, जब कपिल और सौरभ से पिटकर तुम्हारी इज्जत नहीं घटती सिर्फ दर्द होता है तो काजल से पिटकर इज्जत क्यों घटती है. क्योंकि वो लड़की है. यह गलत बात है. पीटना या पिटना अपने आप में गलत बात है, लड़का हो या लड़की. समझे? उन्होंने राघव से कहा, जी गुरू जी.
और काजल अब तुम किसी को नहीं पीटोगी.
जी गुरू जी.....काजल ने धीरे से कहा.
(उत्तराखंड के जेंडर मॉड्यूल में पठन सामग्री के तौर पर शामिल )
ठीक से माफी मांग. काजल कमर पे हाथ रखकर खड़ी हो जाती है.
राघव कान पकड़कर माफी मांगता है.
सुन....राघव काजल से कहता है
तू ना, किसी को बताना मत कि तूने मुझे मारा है.
क्यों...काजल उसे घूरकर देखती है. तेरी इज्जत घट जायेगी ये बताने से कि मुझसे पिटा है, इसलिए.
राघव धीरे से कहता है हां....
जिनके सामने तेरी इज्जत घट जायेगी तू मुझे बताइयो मैं उन्हें भी एक रहपटा लगा दूंगी. फिर सबकी इज्जत एक सी हो जायेगी. ठीक?
राघव मन ही मन सोच रहा है कि कैसे काजल को मनाये....
अच्छा सुन, अगर तू किसी को नहीं बतायेगी तो मैं तुझे इमली वाली गोलियां दूंगा.
अच्छा....और?
काजल चलते-चलते पूछती है.
और बिस्कुट....
और? काजल फिर पूछती है...
और ऑरेंज वाली टॉफी. देख इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं दे सकता. हां...राघव खिसिया गया.
अबे, तेरी इज्जत का सवाल है. इमली की गोली, ऑरेंज वाली टॉफी और बिस्किुट भर की है तेरी इज्जत? काजल ने व्यंग्य किया.
राघव ने मुंह फुला लिया.
अच्छा चल नहीं बताउंगी. तू घर जाते वक्त मेरा बस्ता भी उठायेगा.
ठीक. राघव ने कहा.
मेरी बात मानेगा. काजल कहती है
ठीक. राघव कहता है.
अब से तेरी इज्जत मेरे हाथ में सुरक्षित है. काजल मुस्कुराती है.
गुरू जी ने विज्ञान की कक्षा हेतु जिन बच्चों से जंगल से किसी खास पेड़ की पत्ते मंगवाये थे उनमें काजल सबसे पहले लौटी थी.
राघव, कपिल, घुग्घू तो वहां तक गये ही नहीं.
सौरभ पहुंचा जरूर लेकिन देर से.
गुरू जी काजल को देखकर मुस्कुराए....
शाबास! लाओ पत्तियां यहां रख दो.
राघव, तुम भी यहां रख दो अपनी पत्तियां.
ना...गुरूजी हम ना लाये...हम ना...गिर पड़े रस्ते में सो ला ना पाये...जो गिरते ना तो पक्का ले आते. देखो कपड़ा भी मैले हो गये गिरने से.
काजल फिस्स...से हंस दी. राघव ने उसे घूरा...
गुरूजी अगली बार हम पक्का लेकर आयेंगे. तब तक सौरभ, कपिल और घुग्घू भी कक्षा में आ गये. सिर्फ सौरभ के हाथ में पत्ते थे.
गुरूजी ने काजल के सबसे पहले काम पूरा करने के लिए पूरी कक्षा को तालियां बजाने को कहा. साथ ही उन्होंने राघव को बुलाकर कहा, बेटा मुझे पता है तुम गिरे नहीं थे. तुम्हें काजल ने मारा था.
पूरी कक्षा के सामने एक लड़की के हाथ पिटने की बात स्वीकार करते हुए राघव को आंसू आ गये. उसने काजल की ओर देखा. काजल ने इशारे से कहा कि उसने नहीं बताया गुरूजी को.
गुरू जी ने कहा, मैंने तुम दोनों की बातें सुन ली थीं. उन्होंने काजल को भी डांट लगाई. और पूरी कक्षा से कहा,
बच्चो कोई भी काम न लड़कों का है न लड़कियों का. कोई भी क्षमता और इच्छा से सधता है. इसलिए अगर काजल जंगल में जाकर पत्तियां ला सकती है तो राघव मीठा गीत गा सकता है. और राघव, जब कपिल और सौरभ से पिटकर तुम्हारी इज्जत नहीं घटती सिर्फ दर्द होता है तो काजल से पिटकर इज्जत क्यों घटती है. क्योंकि वो लड़की है. यह गलत बात है. पीटना या पिटना अपने आप में गलत बात है, लड़का हो या लड़की. समझे? उन्होंने राघव से कहा, जी गुरू जी.
और काजल अब तुम किसी को नहीं पीटोगी.
जी गुरू जी.....काजल ने धीरे से कहा.
(उत्तराखंड के जेंडर मॉड्यूल में पठन सामग्री के तौर पर शामिल )
Friday, September 20, 2013
सब ठीक है....
सुबह जल्दी जागती हूं इन दिनों
रियाज़ के लिए चुनती हूं राग भैरवी
सैर में भैरवी की तान के संग
गुनती चलती हूं स्कूल जा रहे
बच्चों की मुस्कुराहटें
चाय के साथ बस थामे रहती हूं अखबार
फिर उठाकर रख देती हूं दूर
व्यवस्थित करती हूं घर
ढूंढती हूं कुछ खोई हुई चीजें
दवाइयां वक्त पर लेती हूं
ऑफिस में भी सब ठीक है
काम अपनी गति से चल रहा है
मुस्कुराहटों वाली चूनर में
कुछ छेद हो गये थे
पिछले दिनों उसे भी रफू करा लिया है
गाड़ी की सर्विसिंग ड्यू नहीं है
बच्चों की परीक्षाएं भली तरह निपट गयी हैं
बहुत दिन हुए किसी दोस्त से
नहीं हुई खट-पट
चैनलों को देखकर
जागता था गुस्सा
सो अब इंटरटेनमेंट चैनल में
मुंह घुसाये रहती हूं कुछ घंटे
पलटती हूं कुछ किताबें सोने से पहले
और खुद से बुदबुदाती हूं कि
सब ठीक है....
काम अपनी गति से चल रहा है
मुस्कुराहटों वाली चूनर में
कुछ छेद हो गये थे
पिछले दिनों उसे भी रफू करा लिया है
गाड़ी की सर्विसिंग ड्यू नहीं है
बच्चों की परीक्षाएं भली तरह निपट गयी हैं
बहुत दिन हुए किसी दोस्त से
नहीं हुई खट-पट
चैनलों को देखकर
जागता था गुस्सा
सो अब इंटरटेनमेंट चैनल में
मुंह घुसाये रहती हूं कुछ घंटे
पलटती हूं कुछ किताबें सोने से पहले
और खुद से बुदबुदाती हूं कि
सब ठीक है....
नमी से भरपूर ये शब्द
हर रात मुझे मुंह चिढ़ाते हैं...
हर रात मुझे मुंह चिढ़ाते हैं...
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