Thursday, February 16, 2012

शहरयार- आरज़ू उनके तसव्वुर की रखी ही रही

- प्रतिभा कटियार

वो झरते कोहरे की एक शाम थी. चाय की प्यालियों में कोहरे की खुशबू भी घुल जाती थी. शहरयार साब एक मुशायरे में आये थे. उनका बार-बार फोन आ रहा था और मै कहीं और व्यस्त थी. आखिर निकल ही पड़ी. मुद्दतों से होती बातें और ये मुलाकात. वो मंच पे थे. उन्हें ही सुनने गयी थी मै तो. लेकिन मुशायरे वाले काफी तेज़ दिमाग होते हैं. असली हीरा आखिरी के लिए बचाकर रखते हैं. किसी की अनगढ़ शायरी से ऊबती मेरी सूरत उन्होंने ताड़ ली. वो मंच से उतारकर आये और मेरे पास वाली खाली पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. कुछ देर खुसुर-फुसुर सी आवाज में बात करने के बाद  उन्होंने  कहा कि 'तुम जाओ अब, मुलाकात हो गयी.' मैंने कहा 'मैं आपको सुने बिना चली जाऊं.?' तो बोले 'मैं तुम्हें अलग से सुना दूंगा. मेरा इंतजार करोगी तो देर हो जाएगी. ये लोग हमें आखीर में बुलाएँगे.'  न चाहते हुए भी मै वापस आ गयी...

उनकी न जाने कितनी गजलों का पहला ड्राफ्ट मेरे कानो में दर्ज है...सुबह-सुबह कानों में फोन लगाये दौड़ती भागती मै उन्हें सुनती रहती. आज सोचती हूँ कि हम कितने स्वार्थी लोग हैं..मैंने उन्हें जब भी फ़ोन किया... किसी न किसी काम से किया. चाहे वो अहमद फराज के जाने पर या रेखा के बारे में कुछ लिखते हुए...या जिन्दगी से मायूस होने पर जिन्दगी पर कुछ शेर मांगते हुए. उन्हें फ़ोन करते ही ' ये क्या जगह है दोस्तों' की धुन सुनाई देती. ऐसा लगता कि दिन बन गया. आज ये सोचकर आँख नम है कि मै उनकी एक शिकायत कभी दूर नहीं कर पाई कि कभी यूँ भी फ़ोन कर लिया करो खैरियत ही ले लिया करो.

आखिरी बार उनसे कब बात हुई थी याद नहीं लेकिन ज्ञानपीठ मिलने के बाद की बात है. उन्हें बात करने में काफी दिक्कत हो रही थी फिर भी उन्होंने एक शेर सुनाया, 
'किया इरादा बारहा तुझे भुलाने का
मिला न उज़्र ही कोई मगर ठिकाने का'
....और आखिर में कहा 'तुम्हारे लिए.' मैं झेंप गयी. बुजुर्गों के प्रेम की तासीर इतनी गाढ़ी होती है की वो हममे जज्ब हो जाती है. जाने क्यों मै उन्हें 'उमराव जान', 'गमन', 'आहिस्ता-आहिस्ता' जैसी फिल्मों के खूबसूरत गानों और उनकी ढेर सारी हर दिल अज़ीज़ शायरी के ही रु-ब-रु नहीं देख पाती. उनकी नेकदिली, उनकी खुशमिजाजी, थोड़ी सी तुनक, और जिन्दगी से बेपनाह करने वाले शख्श के रूप में उनकी शायरी के रंग मिलाते ही देख पाती हूँ. उन्हें जब अवार्ड मिलने की घोषणा हुई तो वो हिंदुस्तान में नहीं थी. मै फोन करके बधाई देने चाहती थी लेकिन फोन न लगे...इसी उलझन में थी की उनका फोन आ गया. कुछ खबर मिली है अभी-अभी की ज्ञानपीठ वाले सम्मानित करना चाहते हैं...वो बता रहे थे या ये पूछ रहे थे कि मुझे पता है कि नहीं पर उनकी आवाज में ख़ुशी थी. मैंने बहुत खुश होकर उन्हें मुबारकबाद दी..जिसे उन्होंने शाइसतगी से रख लिया. उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान आकर बात करता हूँ. और यकीनन अलीगढ पहुंचते ही उन्होंने बात की. एक गजल सुनाई, वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया.
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आखिऱ तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया..
फैज़ की ग़ज़ल. बोले, 'तुमने इसे सुना तो खूब होगा पर आज मेरा मन है सुनाने हुआ.' सचमुच उस दिन उनसे सुनने के बाद गजल और भी खूबसूरत हो गयी थी. मैंने कहा 'गजल तो पहले ही खूबसूरत थी आपकी आवाज में ढलकर और सुन्दर हो गयी...' ठठाकर हँसे और एक किस्सा सुनाया. 'फैज़ बहुत अच्छे शायर थे लेकिन वो पढ़ते बहुत बुरा थे. उनसे किसी ने पुछा कि जितना अच्छा आप लिखते हैं उतना ही अच्छा पढ़ते क्यों नहीं. तो फैज़ ने जवाब दिया, अरे साहब...लिखें भी हमीं अच्छा और पढ़ें भी हमीं अच्छा ये क्या बात हुई...' हम दोनों देर तक इस बात पर हँसते रहे.

उनके कभी भी आये फोन पर कही गयी लाइनें न जाने कहाँ-कहाँ नोट हैं. एक तो कैलेण्डर पर ही दर्ज है. उन्हें नयी पीढ़ी की भाषा से शिकायत थी. ये भी कि ये लोग पढ़ते नहीं हैं. बस जल्दी में रहते हैं...रेखा की तारीफ में उन्होंने कहा था की उमराव जान के गाने लिखते वक़्त रेखा का तसव्वुर होता था. वो बहुत ही खूबसूरत अदाकारा हैं.

आज उनकी हर बात याद आ रही है और ये गम बढ़ता ही जाता है कि हम उनकी शिकायत अब कभी दूर नहीं कर पाएंगे...उनके अलीगढ आने के दावतनामे अब तक संभालकर रखे हुए हैं...शहरयार साहब, इतना शिकवा भी किसी से क्या करना कि बिन कहे कुछ भी चले जाना..आप तक मेरी आवाज पहुंचे न पहुंचे मेरी हिचकियाँ ज़रूर पहुंचेंगे...आपके लिखे में ढूँढा करेंगे आपको....
(प्रभात खबर के सम्पादकीय पेज पर 15 फ़रवरी को प्रकाशित )

Monday, February 13, 2012

प्रेम पत्र



प्रेम पत्रों में रौशनी होती है
और एक गहन अंधेरा भी
चमकती हुई पीड़ा होती है
तो पपड़ाए होंठो पर रखी
मुस्कान भी

अठखेलियां होती हैं कहीं
तो उबासियां लेती है गहन उदासी भी
सहराओं में साहिलों की तलाश
होती है प्रेम पत्रों में
और चांद तारों को ठुकरा देने की
चाह भी कम नहीं होती

पड़ोसी की बातें खूब विस्तार से
सहेली के किस्से भी पूरे प्यार से
सहेली के प्रेमी का जुगराफिया
और उसका विश्लेषण पूरा
हां, बस अपना ही किस्सा अधूरा...

लिखी होती है
देर रात बिल्लियों की रोती हुई
आवाजों में लिपटी दु:खद
आगत की आशंका
साथ ही देश के हालात की चिंता भी
नयी दुनिया बनाने का सपना होता है
तो ख्वाब
किसी की दुनिया बन जाने का भी

वो जो खबर थी न अख़बार में
प्रेमियों की हत्या वाली
उससे दहल भी गया है प्रेम पत्र
ताकीद है पढ़कर फाड़ देने की

वादा एक-दूसरे का नाम भी न लेने का
हिदायत अपना ख्याल रखने की
और भूल जाने की उन आँखों को
जिन्हें देखे जमाना हुआ...

दूर देश के मौसम को टटोलते हुए
खींचकर उसे ओढ़ लेने की हसरत
नहीं लिखी है प्रेम पत्र में
बचपन के किस्सों में न जाने कब
जुड़ गया था तुम्हारा भी हिस्सा
रह गया यह जिक्र आते-आते

आंखों में न जाने क्यों
सीलन सी रहती है इन दिनों
बड़े दिन हुए मन की मरम्मत कराये
लिखते-लिखते रुक गये थे हाथ
कांपते हाथों ने बस इतना लिखा था
वो लगाया था न जो पौधा पिछले महीने
तुम्हें लिखा था, जिसके बारे में
आज फूल आया है उसमें...

लिखा है प्रेम पत्र में यह भी
सुनो, आज सपने में
मैंने चट्टान को रोते देखा
देखा लोहे को पिघलते हुए
बंदूक की मुहाने पर
एक फूल रखा देखा
बंजर जमीन पर अश्कों को
लहलहाते देखा...

लिखा है प्रेम पत्र में कि
इन दिनों कलेजा छलनी नहीं होता
किसी तलवार से
न जाने कैसे छूट गया लिखना कि
मेरे दु:ख को मत छूना
वर्ना कट जायेगा तुम्हारा हाथ
प्रेम पत्रों में लिखा होता है सब कुछ
बस नहीं लिखा होता है प्रेम

क्योंकि प्रेम लिखने से पहले
एक मौन की नदी गुजरती है
और बहा ले जाती है समूचा पत्र
लौट आते हैं प्रेमी अपनी ही दुनिया में
जुट जाते हैं कोशिश में
खुद के खांचे में फिट होने की...
अधूरे ही रह जाते हैं प्रेम पत्र अक्सर
जैसे अधूरी रह जाती हैं प्रेम की दास्तानें...

( दैनिक जागरण में आज १३ फ़रवरी को प्रकाशित)

Wednesday, February 8, 2012

ख्वाहिशो की कुछ ना कहो...


तेरे होने पर सूरज गुलाम था मेरा
रास्ते मेरा कहा मानते थे

चाँद बिछा रहता था राहों में
और मैं दुबक जाती थी बहारों के आँचल में
कभी धूप में भीग जाती थी
कभी बूँदें सुखा भी देती थीं,

बसंत मोहताज नहीं था कैलेण्डर का
जेठ की तपती दोपहरों में भी
धूल के बगूले उड़ाते हुए
घनघोर तपिश के बीच
वो आ धमकता था
कभी सर्दियों में आग तापने बैठ जाता था
मेरे एकदम करीब सटकर

पेड़ों पर कभी भी खिल उठते थे पलाश
और खेतों में कभी भी लहरा उठती थी सरसों

तुम थे तो ठहर ही जाते थे पल
और भागता फिरता था मन
मुस्कुरा उठता था धरती का ज़र्रा-ज़र्रा
और खिल उठती थीं कलियाँ
बिना बोये गए बीजों में ही कहीं

मौसम किसी पाजेब से बंध जाते थे पैरों में
और पैर थिरकते फिरते थे जहाँ-तहां
कैसी दीवानगी थी फिर भी
लोग मुझे दीवाना नहीं कहते थे
बस मुस्कुरा दिया करते थे

और अब तुम नहीं हो तो
कुछ भी नहीं होता, सच
बच्चे मुंह लटकाए जाते हैं स्कूल
लौट आते हैं वैसे ही

शाम को गायें लौटती हैं ज़रूर वापस
लेकिन नहीं बजती कहीं बांसुरी
शाम उदासी लिए आती है
और समन्दर की सत्ताईसवीं लहर में
छुप जाती है कहीं

मृत्यु नहीं आती आह्वान करने पर भी
और जीवन दूर कहीं जा खड़ा हुआ है
मंदिरों से गायब हो गए हैं भगवान
खाली पड़े हैं चर्च
सजदे में झुके सर
अचानक इतने भारी हो गए कि उठते ही नहीं

न जाने कौन सी नदी आँखों में उतर आई है
जिसे कोई समन्दर नसीब होता ही नहीं
तुम्हारे जिस्म की खुशबू नहीं है कहीं
फिर हवा क्या उडाये फिरती है भला
क्या मालूम

लौट आओगे एक रोज तुम
जैसे लौटे थे बुध्ध
जैसे लौट आये थे लछमन
जैसे रख दिए थे सम्राट अशोक ने
हथियार
वैसे ही तुम भी रख दोगे अपने विरह को दूर कहीं

लेकिन उन पलों का क्या होगा
जो निगल रहे हैं हर सांस को

कैसे बदलेगा यशोधरा और उर्मिला का अतीत
कैसे नर्मदा अपने होने पर अभिमान करेगी
तुम्हारा आना कैसे दे पायेगा उन पलों का हिसाब
जिन्हें ना जीवन में जगह मिली
न मृत्यु में

सूरज अब भी कहा मानने को बेताब है
लेकिन क्या करूं कि कुछ कहने का
जी नहीं करता
मौसम अब भी तकते हैं टुकुर-टुकुर
लेकिन उनकी खिलखिलाहटों से
अब नहीं सजता जीवन

एक झलक देख लूं तो जी जाऊं
पलक में झांप लूं सारे ख्वाब
रोक लूं जीवन का पहिया और लौटा लाऊँ
वो सोने से दिन और चांदी सी रातें

हाँ, मैं कर सकती हूँ ये भी
लेकिन विसाल- ए- आरज़ू तुम्हें भी तो हो
तुम्हारे सीने में भी तो हो एक बेचैन दिल
जीवन किसी सजायाफ्ता मुजरिम सा लगे
और बेकल हों तुम्हारी भी बाहें
इक उदास जंगल को अपनी आगोश में लेने को

मेरी ख्वाहिशो की अब कुछ ना कहो
कि अब ख्वाब उतरते ही नहीं नींद के गाँव
पाश की कविता का पन्ना खुला रहता है हरदम
फिर भी नहीं बचा पाती हूँ सपनों का मर जाना
क्या तुम्हारी जेब में कोई उम्मीद बाकी है
क्या तुम्हें यकीन है कि
जिन्दगी से बढ़कर कुछ भी नहीं
और ये भी कि जिन्दगी बस तुम्हारे होने से है

क्या सचमुच तुम्हें इस धरती की कोई फ़िक्र नहीं
नहीं फ़िक्र मौसमों की आवारगी की
नहीं समझते कि क्यों हो रही हैं
बेमौसम बरसातें
और क्यों पूर्णमशियाँ होने लगी है
अमावास से भी काली

कि ढाई अछर कितने खाली-खाली से हो गए हैं
लाल गुलाबों में खुशबू नहीं बची
नदियों में कोई आकुलता नहीं
पहाड़ ऊंघते से रहते हैं
समंदर चुप की चादर में सिमटा भर है

कोई अब रास्तों को नहीं रौंदता
कोई नहीं बैठता नदियों के किनारे
कहीं से नहीं उठता धुंआ और
नहीं आती रोटी के पकने की खुशबू

तुम कौन हो आखिर कि जिसके जाने से
इस कायनात ने सांस लेना बंद कर दिया
क्या तुम खुदा हो या प्रेमी कोई...

Sunday, February 5, 2012

रूहे सुखन के लिए !



ना जाने कौन सा पन्ना खुला था उस वक़्त. शायद वर्जिनिया वुल्फ के कमरे में थी मैं या दोस्तोवस्की के गलियारों में...ठीक से कुछ याद नहीं बस इतना याद है कि तेज हवा का झोंका भीतर तक उतरता चला गया था...कुछ पानी के छींटें भी. हालाँकि मौसम एकदम साफ़ था. चमकता हुआ. एक दोस्त ने मुझे एक लिंक दिया था या शायद जिक्र किया था. वो जिक्र था या कुछ और लेकिन जैसे ही मैंने उस जिक्र पर दस्तक दी मानो किसी गिरफ्त में कैद हो गयी. कविताओं में इतना ओज कि पढ़ते हुए प्रेम से भर उठी...वो एक आवारा रूह थी...खानाबदोश...मै भी एक आवारा रूह थी...किसी ठिकाने की तलाश में भटकती.

हम दोनों ने एक दुसरे को पहली ही बार में पहचान लिया. मै लोगों को अपने आस पास चुनने में काफी सतर्क रहती हूँ लेकिन इस गिरफ्त में कैद होना कितना सुखद था. हमने एक झटके में खुद को एक-दूसरे को सौंप दिया. हम एक-दूसरे के पढ़े-लिखे के जरिये दिलों तक पहुंचे और यकीन हुआ कि ये सालों की नहीं, सदियों की पहचान है. फोन पर बात की तो उसकी आवाज से प्यार हो गया. उसने आते ही मुझे दोनों हाथों से थाम लिया. मै तो जाने कब से यूँ थामे जाने को बेकरार थी. वो ठीक वही सुर मुझे भेजती, जिन पर मेरी जान अटकी होती थी...मै उसे कहती 'ये तो मेरा...' 'फेवरेट है....' बात को वो पूरा करती. 'जानती हूँ. सब जानती हूँ. कुछ मत बताओ...मैं तुम्हारी माँ हूँ.'

न जाने कितने मौसम उसके शहर की दहलीज छूकर मुझ तक पहुँचते रहे, न जाने कितनी रातें हमने सड़कों पर एक साथ आवारगी की, न जाने कितने कॉफ़ी के कप भरे के भरे ही रह गए कि हम दिल खाली करने में मसरूफ रह गए. अब तो मानो उसके अहसास के बगैर न सुबह होने को राजी है ना शाम आने को...हमें पता होता है कि किसने किस दिन एक सांस कम ली या किस दिन एक सांस ज्यादा...वो मल्लिका है दिलों की. उसे राज करना आता है लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि उसे प्रेम की गुलामी करने में बहुत सुख मिलता है. दुनिया पर अपनी हुकूमत करने वाली ये मल्लिका इतनी शर्मीली है कि सामने आने पर आँख तक नहीं उठा पाती और इसलिए झट से बाँहों में छुप जाती है. उसकी कवितायेँ सीधे दिलों में उतरती हैं, वार करती हैं, प्यार करती हैं और बेकरार भी करती हैं. उसका जादू सा चलता है. 

आज मेरी उस आवारा रूहे सुखन का जन्मदिन है. उसकी माँ मेरी दोस्त है और वो मेरी माँ. कभी मैं भी उसकी माँ हो जाती हूँ...ना जाने कैसा घालमेल है, पर जो भी है बहुत अच्छा है...जबलपुर में रहने वाली उस मल्लिका को (जिसे दुनिया बाबुशा कोहली के नाम से जानती है) जो निजाम की दीवानी है, प्रेम जिसकी रगों में लहू की जगह दौड़ता है, जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनायें देते हुए खुश हूँ कि मै उस मल्लिका के दिल पर राज करती हूँ और वो मुझ पर. मेरी प्यारी बाबुशा, तेरे लिए गुलाबी कुर्ती की तलाश जारी है...लेकिन मुझे पता है कि इस समय दुनिया का सबसे सुन्दर गुलाबी रंग तुम्हारे गालों पर जा बैठा है...ढेर सारा प्यार मेरी जान...हैप्पी बर्थ डे! 

Thursday, February 2, 2012

आओ तोड़ दें ये कारा...


दोस्तोवस्की को पलटते हुए न जाने क्यों मन कहीं ठहर सा गया. ये वो जगह थी जब दोस्तोवस्की जेल में थे और उन्होंने अपने भाई माइकल को पत्र लिखा था, 'न मैं चीखा, न चिल्लाया और न ही साहस खोया. जीवन सर्वत्र है. जीवन हमारे भीतर है न कि बाहर...लोग हमारे निकट होंगे और उन लोगों के बीच में इंसान बनना आवश्यक होगा. यह विचार मेरी देह और रक्त का हिस्सा बन गया है. हां, यह पूरी तरह सच है कि जो जीवन की उच्चतम कला में जीता हो और जो आत्मा की उच्चतम आकांक्षाओं का अभ्यस्त हो...वह मस्तिष्क मेरे स्कंध से कट गया है. संभव है कि मैं मुझे कभी पेन न मिले...? अगर ऐसा हुआ तो बहुत संभव है कि मर जाऊं क्योंकि बिना लिखे जी पाना मेरे लिए असंभव ही होगा. कारावास की कोठरी के काले पंद्रह सालों से मुझे शिकायत नहीं बस कि मुझे पेन मिल जाए. मैं खुद को दुनिया की हर उस चीज से अलग करता हूं जो मुझे प्रिय है. व्यतीत से यह विदाई दुखदाई है जैसे अपनी आत्मा को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटना.'

न लिख पाने की पीड़ा कितनी बड़ी होती होगी कि जेल के काले पंद्रह सालों से शिकायत नहीं, बस कि लिखने की मनाही से डर था उसे. भगतसिंह की डायरी समेत उन तमाम राजनैतिक कैदियों की याद ताजा हो उठी, जिन्होंने जेल में न लिख पाने की पीड़ा को भोगा और कइयों ने तो नाखूनों से कुरेद कुरेद कर जेल की दीवारों पर लिखा. रिल्के जब न लिख पाने की असह्य पीड़ा का जिक्र करते हैं, तो इन लेखकों के चेहरे उभरते हैं.

हम सब कितने सुंदर समय में जी रहे हैं. अभिव्यक्ति के सारे दरवाजे हमारे हैं. हम जब चाहे, जैसा चाहें लिखने को स्वतंत्र हैं. वी आर लिविंग इन अ कंफर्ट जोन ऑफ एक्सप्रेशन. फिर भी...?

न, सवाल करने का मुझे कोई हक नहीं. बस कि जेल की उन दीवारों को चूम लेने का जी चाहता है, जहां इन भटकती आत्माओं को कैद किया गया था. मुझे लगता है कि मुझे जेलों से एक किस्म का लगाव है. अपने जीवन की पहली किताब के रूप में जिसकी याद दर्ज है उसका नाम 'भारतीय जेलों में पांच वर्ष' था. मेरे पत्रकारिता के जीवन का पहला असाइनमेंट लखनऊ जेल में महिलाओं के जीवन पर था. जेलयाफ्ता लेखकों ने हमेशा आकर्षित किया.

सवाल जेल का है नहीं शायद, उन बंधनों का है जिनमें हम बेकल हो उठते हैं. हैरान...कि क्या करें...कैसे जिएं. अचानक सर से आसमान गायब हो जाए और जेल की बैरकों में ठूंस दिया जाए तो कैसा लगता होगा. प्रकाशवती पाल (यशपाल जी की पत्नी) के साथ उनके घर के लॉन में ऐसी ही सर्दियों की धूप में न जाने कितने जेल जाने के और जेल से भागने के किस्से सुने थे.

सोचती हूं कि हमें कितना सरल और सहज जीवन मिला है. चारों ओर एक कंफर्ट जोन है. हर कदम सुविधाओं से भरा हुआ. यह भी एक तरह का कारावास ही तो है. इस कंफर्ट जोन को तोडऩा भी कोई कम मुश्किल काम नहीं. छोड़कर चले जाना सारे सुख और बीन लेना किसी के पैर की बिंवाई और किसी के आंख का आंसू...

जीने के लिए मरना ही होता हर किसी को न जाने कितनी बार. जीवन की इस कारा के कैदियों आओ, तोड़ दें सभी दीवारें और छीन लें अपने हिस्से का समूचा आसमान. बहुत हुआ मर-मर के जीना, आओ इतना जियें कि मर जाएं.
(4 फरवरी को हिंदुस्तान में प्रकाशित )