कल हम दोनों ने एक पुल जलाया था
और दरिया के किनारों की तरह नसीब बांटे थे
बदन झटके
तो एक बदन की वीरानी इस पार थी
और एक बदन की वीरानी उस किनारे
फिर ऋतुओं ने जो भी फूल दिए
तो तुमने भी वो बदन से तोड़ लिए
और मैंने भी वो ऋतुओं को लौटा दिए
और झडे हुए पत्तों की तरह
कितने ही बरस हमने पानी में बहा दिए
बरस बीत गए par पानी नहीं सूखे
और बहते पानियों में से
परछाइयाँ तो देखीं पर मुंह नहीं देखे
और इससे पहले
की कुछ दूरी पर खड़े हम मिट जाएँ
चलो बे पत्ते से बदन पर पानी बिछाएं
तुम अपने बदन पर पैर रखना
और आधे दरिया को पार कर आना
मैं अपने बदन पर पैर रखूंगी
तुम्हें आगे बढ़कर मिलूंगी...
- अमृता प्रीतम




