Sunday, January 15, 2012

तुम्हें आगे बढ़कर मिलूंगी...



कल हम दोनों ने एक पुल जलाया था 
और दरिया के किनारों की तरह नसीब बांटे थे 
बदन झटके 
तो एक बदन की वीरानी इस पार थी 
और एक बदन की वीरानी उस किनारे 

फिर ऋतुओं ने जो भी फूल दिए
तो तुमने  भी वो बदन से तोड़ लिए 
और मैंने भी वो ऋतुओं को लौटा दिए 
और झडे हुए पत्तों की तरह 
कितने ही बरस हमने पानी में बहा दिए 

बरस बीत गए par पानी नहीं सूखे 
और बहते पानियों में से 
परछाइयाँ तो देखीं पर मुंह नहीं देखे 

और इससे पहले 
की कुछ दूरी पर खड़े हम मिट जाएँ 
चलो बे पत्ते से बदन पर पानी बिछाएं 
तुम अपने बदन पर पैर रखना 
और आधे दरिया को पार कर आना 
मैं अपने बदन पर पैर रखूंगी
तुम्हें आगे बढ़कर मिलूंगी... 
- अमृता प्रीतम 

Monday, January 9, 2012

जाने क्या चाहे मन बावरा...


सुबहों का कोई ठिकाना नहीं कि वे कब आ धमकें. कभी तो आधी रात को दरवाजे पर दस्तक देती हैं और कभी दिन के दूसरे पहर भी ऊंघती सी आसमान के किसी कोने में दुबकी रहती हैं. मैंने भी अब सुबहों का इंतजार करना बंद कर दिया है. यूं मैंने किसी भी चीज का इंतजार करना बंद कर दिया है सिवाय उस पल के जिसमें सांस है, बीत जाने के. या कि इंतजार को इबादत का नाम देकर खुद को भरमाया हुआ है.

कमरा हमेशा फूलों से महकता रहता है. इतने फूल, इतने फूल कि कमरा ही गार्डन हो चला है. कल कुछ खुशनुमा से गमलों को कमरे में सजाया गया. दोस्तों की आमद का सिलसिला बारिश की किसी लड़ी की तरह कायम है. सबके हाथ में मेरे लिए कुछ फूल जरूर होते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि फूल ही हैं जो मुझे खुश करते हैं. कोई मेरे बारे में बात नहीं करता. सब किसी ख्याल की बात करते हैं. किसी किताब के किसी हर्फ की, किसी संगीत के टुकड़े की, मौसम की, राजनीति की. पर मैं समझती हूं कि ये मेरे बारे में बात न करना ही दरअसल मेरा ख्याल रखने की कोशिश की जा रही है. जानना कितना बुरा होता है कई बार कि हम हर बात की तह तक पहुंच जाते हैं और बातों का चार्म कम कर देते हैं. भले ही बातों का चार्म कम होता हो लेकिन इस बात की तसल्ली बढ़ती ही जाती है कि सबकी जड़ में मेरा ही ख्याल है.

मुरझाये फूलों को हटाते हुए एक दोस्त (मेरा स्टूडेंट मैं उन्हें दोस्त ही कहती हूं) पूछता है आपने क्या हाल कर लिया है अपना. ख्याल क्यों नहीं रखतीं. मैं हंस देती हूं. देर तक मेरी हंसी कमरे में रखे हर फूल से टकराती है फिर उसके कंधे पर जा बैठती है. वो नाराज होकर कहता है, वैसे मैम, इसमें हंसने वाली क्या बात थी? उसके पूछने में थोड़ी सी डांट का भी रंग है. मैं उसका चेहरा देखती हूं. अगर आपके छोटे कभी स्नेहवश आपको डांटें तो बड़ा अच्छा लगता है. मैं इस अच्छे लगने को अंजुरी में भरकर पीने लगती हूं. वो मेरे जवाब के इंतजार में है. बताइये, आप अपना ख्याल क्यों नहीं रखतीं? मैं शब्द तलाशती हूं जवाब की भरपाई करने के लिए.
'मैं खुद ही अपना ख्याल क्यों रखूं भई? सबका ख्याल मैं रखती हूं, कोई तो मेरा भी ख्याल रखे..'
'तो हम हैं ना रखने के लिए.'
तो रखो ना...मैं उसका चेहरा देखकर हंस देती हूं. बड़ी बेचारगी सी है उस पर.

कुछ लोग सिरहाने कुछ किताबें छोड़ जाते हैं. कल उन्हीं में से एक दक्षिण अफ्रीका की कहानियों का संग्रह उठाया. लेटे-लेटे एक कहानी 'भूत' पढ़ रही थी. जिसमें बच्चा जंगल में अपने दोस्तों के साथ जाता है और खो जाता है. घर वाले समझते हैं कि वो मर गया है. रोना धोना, अंतिम क्रियाएं सब हो जाती हैं. फिर एक दिन बच्चा लौट आता है और सब उसे जिंदा मानने से इनकार करते हैं. उसे भूत-भूत कहकर भगाने की कोशिश करते हैं. बच्चे को भूत समझने वालों में उसकी मां भी है...कहानी के अंत में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं वहां उलझ जाती हूं कि कैसे खुद को साबित करना कठिन होता है कि 'हां, ये मैं हूं.' और जब कोई नहीं मानता तो ख्याल आता है कि 'मैं क्यों हूं?'

माधुरी रोज सुबह मेरे कमरे को बुहारती है. मैं उन सारे ख्यालों को समेटने लगती हूं कि जो हर वक्त मेरे आसपास रहे. लेकिन माधुरी हुनरमंद है. मुझे बातों में उलझाकर वो मेरे सारे ख्याल भी बुहार ले जाती है. बस एक मृत्यु का ख्याल उसकी झाड़ू की जद में जाने क्यों नहीं आता. वो क्यों मेरे कंधों पर चढ़ा रहता है. मुझसे क्यों शास्त्रार्थ करना चाहता है जबकि मैंने कबसे लोगों से बहस करना बंद कर दिया है. अभी-अभी इनबॉक्स में कोई सुंदर सा गीत दाखिल हुआ. कितने सारे दोस्त हैं देश के कोने-कोने में. हर कोई मेरी मुस्कुराहट के लिए जतन कर रहा है. यही तो मेरी कमाई है, मन ही मन सोचती हूं...गाना बज रहा है जाने क्या चाहे मन बावरा....


(आज समाज और जनसत्ता (२४ जनवरी) में प्रकाशित. )

Saturday, January 7, 2012

लकीरें अपने स्वभाव से चलती हैं


अजय गर्ग से मेरा पहला परिचय उनके एक सशक्त लेख के ज़रिये हुआ था. बाद में उनके पत्रकार होने का पता चला. इसी बीच मधुर भंडारकर ने 'जेल' के लिए 'दाता सुन ले...' लिखवाकर उनके शब्दों को लता जी की आवाज में पिरो दिया. गीतकार और पत्रकार होने के बीच लड़ते हुए अजय ने एक दिन जिन्दगी की लगाम अपने हाथ में ली, हिंदुस्तान की शानदार नौकरी को सलाम नमस्ते कह दिया और निकल पड़े इस धरती की सुन्दरता को समेटने. कलम और कैमरे के साथ ने उन्हें खूबसूरत ट्रैवलर बना दिया...लेकिन इन सबसे परे वो साफ़ दृष्टि और नेक नीयत वाले ज़हीन इन्सान हैं...उनकी इस कविता पर अपने अधिकार की मुहर लगते हुए इसे अपने लिए रख रही हूँ.-  प्रतिभा  

लकीरें
अपने स्वभाव से चलती हैं

हमेशा नहीं होतीं लकीरें
समानांतर एक-दूसरे के
कि चलती रहें एक साथ
अनंत तक अनादि तक

तिर्यक भी नहीं होती हर रेखा
कि दूसरी को बस
निकल जाए स्पर्श करते हुए

यह भी  ज़रूरी  नहीं
साथ चलती दो लकीरें
कभी-न-कभी निकलेंगी
एक-दूसरे को काटते हुए

किसी आयत या वर्ग का
विकर्ण भी नहीं होतीं सब लकीरें
कि उल्टे-सीधे, आगे-पीछे चलते
एक ही बिंदु पर मिलें हर बार

ऐसा भी बहुधा नहीं होता
कि एक-दूसरे से सटकर चलें ही 
तो लगे
दो नहीं एक ही लकीर है वहां

वक्र चाल ही चलती हैं
अधिकतर लकीरें
एक-दूसरे में मिलती प्रतीत होती हैं
और झट से निकल जाती हैं
एक-दूसरे से दूर
कोई नया मोड़ लेकर

लकीरें कभी नहीं बदलतीं अपना स्वभाव

रिश्तों को लकीरें समझकर चलो तो
आधे दुःख निरर्थक हो जाते हैं

- अजय गर्ग 
(http://ajaythetraveller.blogspot.com/)

Wednesday, January 4, 2012

मुझे मेरे शब्दों में मत ढूंढना



मुझे मेरे शब्दों में मत ढूंढना
न ढूंढना मेरे शब्दों को उनके अर्थ में
मत ढूंढना मुझे विन्यास में
न कला की लंबी यात्राओं में
न किताबों में दर्ज इबारतों में.

मुझे मेरे होने में मत ढूंढना
मत ढूंढना मेरे नाम में
न ही मेरे चेहरे में
न कविताओं में, न कहानियों में
न रूदन में, न खिलखिलाहटों में

मत ढूंढना मुझे इतिहास की पगडंडियों में
न ख्याल में, न बंदिश में, न ध्रुपद में
न ढूंढना मुझे आग में, न पानी में
न किसी किस्सा-ए-राजा रानी में,

मुझे ढूंढना तलाशना होगा खुद को
छूना होगा अपनी ही रूह को
मांजना होगा अपना ही व्यक्तित्व,
बेदम होती आशाओं पर
रखना होगा उम्मीद का मरहम
उगानी होगी खिलखिलाहटों की फसल ,

तमाम वाद, विवाद से परे
लिखे-पढ़े से बहुत दूर
कहे सुने को छोड़कर किसी निर्जन स्थल पर
किसी रोज मुझे ढूंढना अपने ही भीतर
मुझे मेरे शब्दों में मत ढूंढना...

Tuesday, January 3, 2012

बचा रहता है इंतजार...


सब कुछ खत्म होने के बाद भी
बची रहती है धूप के भीतर की नमी
पत्थरों के भीतर की हरारत
रेत के भीतर
उग ही आता है कोई समंदर
आग की आंखों में
छलक उठते हैं दो आंसू
बंजर धरती पर उगती हैं उम्मीदें
सब कुछ खत्म होने के बाद भी
बचा रहता है इंतजार...

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मेरी हथेली पर एक सूर्य रखा था
उँगलियों पर तारों का था ठिकाना
हथेली के ठीक आखिरी कोने पर
चाँद ने जमाया था डेरा,
अपनी हथेली पर जमा करके
समूचा आसमान
निकल पड़ी हूँ धरती की तलाश में
किसी कैलेण्डर के किसी कोने में
नहीं टंका है धरती से आसमान का मिलन
बस हथेली को उलटकर
आसमान गिराने भर की देर है
न जाने किसने थामा है मेरी हथेलियों को...
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