Saturday, August 15, 2020

सर चढ़कर बोले इश्क़

इश्क़ वो शय है जो मांगे मिले न और मिल जाए तो बिना बीच धार में ले जाकर डुबोये इसे चैन आये न. जबसे मोरपंख के पेड़ में गुलाब को चढ़ते देखा है यही महसूस हुआ कि यह इनके रिश्ते की शुरुआत है. फिर मोरपंख ने गुलाब को अपने भीतर पूरी तरह समेट लिया. एक नन्हा सा गुलाब खिला था जिस रोज खूब बारिश हो रही थी. मोरपंख और गुलाब दोनों इतरा इतरा कर झूम रहे थे. देखते देखते दोनों के अस्तित्व एक दूसरे में विलीन होते गए. लेकिन बिना खुद को खोये हुए. मोरपंख और हरा हुआ और लहराया, गुलाब फैलता गया उसके भीतर और खिलने लगा. यह जो सह अस्तित्व और खुद को खोये बिना एक दूसरे को अपनाना है न यह भी प्रकृति सिखा रही है...बस हम सीख नहीं रहे.

रिश्तों में अपनों को खुद से आज़ाद रखना बिना कोई गुमान किये. यह भी तो सीखना बाकी है.
आज़ादी मुबारक!

 

Monday, August 10, 2020

बरसे तो बरसे सुख हर आंगन



आज फिर बारिश लगातार हो रही है. बारिश लोरी सी लगती है. नींद के भीतर जो एक नींद होती है न जिसमें सोने का सुख छुपा होता है, जो कभी-कभी ही मिलता है वो रात की नींद में दाखिल हुआ. जिसने नींद में होने वाली तमाम क्रियाएँ जैसे स्वप्न, करवटें, बीच -बीच में जागना सब चुरा लिया. मृत्यु की जैसी नींद. जागो तो जैसे नया जन्म. जागते ही बारिश के करीब चली गयी देर तक देखती रही...

पक्की नींद के बाद आँखों को अगर भीगते हुए हरे का सुख मिल जाय तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है. यह संभव हो पा रहा है क्योंकि यथार्थ से मुंह मोड़ने का अभ्यास कर रही हूँ. चेतन दिखते हुए चेतना को सुषुप्त रखने का अभ्यास कर रही हूँ. खुद को ठीक रखने के लिए देखो तो क्या क्या करना पडता है. यह ठीक होना नहीं विमुख होना है...यह अभ्यास ज्यादा दिन चल न सकेगा. चाहती हूँ यह अभ्यास व्यर्थ साबित हो लेकिन यह नींद बची रहे...ऐसा कैसे होगा...हो सकेगा क्या? 

चेतना विहीन हुए बगैर सुकून की नींद आना कितना दुष्कर है इन दिनों किसी से छुपा है क्या. अख़बार छुपा देने से, न्यूज़ चैनल न देखने से सोशल मीडिया से दूर रहने से भी क्या होगा. यह तो आँख बंद करना है. बस इतना ही कि जब चीज़ें असहनीय होने लगे तो बीच बीच में आँखें मूँद लेनी चाहिए इससे सामना करने की शक्ति बढ़ती है शायद....

बात करने से हालात नहीं बदलते वो बदलते हैं उन्हें बदलने के प्रयासों से. आँखें मूंदना उपाय नहीं लेकिन कभी कभी आँखें मूंदने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचता. यह आँखें मूंदना खुद को बचाये रखने के लिए  है ऐसा कहकर खुद को बहलाती हूँ. फिर से बूंदों के आगे हथेलियाँ पसारे खड़ी हूँ...

Friday, August 7, 2020

इल्तिजा


आओ सबसे पहले वार करो
मेरी रीढ़ पर
फिर निकाल लो मेरी आँखे 
कोई काम नहीं इन्हें 
बस कि ताकती रहती हैं 
तुम्हारी राह 

उँगलियाँ जो बेसाख्ता लिखती रहती हैं
तुम्हारा नाम
उन्हें अलग कर दो काटकर

पाँव जो न धूप देखते हैं न छाँव
बढ़ते रहते हैं तुम्हारी ही ओर
इन्हें भी अलग किया जाना चाहिए
शरीर से काटकर

कान इन्हें भी कुछ सुनाई नहीं देता 
सिवा तुम्हारे नाम के
इन्हें भी क्यों बख्शा जाना चाहिए

जिह्वा जो रटती रहती है
तुम्हारा ही नाम
उसे तो सबसे पहले 
अलग किया जाना चाहिए  

दिल जो धड़कता ही रहता है 
तुम्हारे नाम पर
उस पर करना सबसे अंत में वार
कि सांस की आखिरी बूँद तक
जानना चाहती हूँ
कितनी पीड़ा दे सकते हो तुम

ओ प्रेम छिन्न भिन्न करके 
जब हो जाना थक के चूर
तब सुस्ता लेना थोड़ा 
और मत बताना किसी को
कि तुम्हें मुझसे प्रेम था कभी
कि प्रेम के नाम पर पहले ही
कम नहीं हो रही है हिंसा

प्रेम के भीतर प्रेम को सांस लेने देना
उसे बख्श देना तुम
इतनी सी इल्तिजा है तुमसे. 

Tuesday, August 4, 2020

कोई दुःख की बात नहीं है


कोई है जो अभी-अभी उठकर चला गया है पास से. कौन है वो? जब तक वो पास था तब तक उसके पास होने के बारे में पता क्यों नहीं चला. ये कैसी बात है जो पास था के बारे में दूर जाने के बाद पता चलती है. हवा एकदम सर्द हो चुकी है मेरे शहर की. और मैं ऐसे शहर में हूँ जहाँ जर्रे जर्रे में रेत बसती है. ऐसे तो धरती पर प्रेम को बसना था. हाथ बढाती हूँ तो हथेलियों में हवा भर जाती है क्या इस हवा ने मेरे हाथों की लकीरों को छुआ होगा. क्या जब बारिशें हथेलियों में उतरती हैं तब वो मेरे हाथों की लकीरों को छूकर उनसे कुछ कहती होंगी. क्या कोई लकीर अपने साथ बहा ले गयी होंगी...मुझे लगता है मैं जीवन की बाबत कुछ भी नहीं जानती.

'मेरे हाथ में जो अख़बार था. उसमें एक खबर पर मेरी नजर गई. जो खबर थी वह भी बड़े होते जाने और कुछ न बन पाने के डर की दुःखद दास्तान से भरी थी. जिया खान नहीं रही. उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.मेरे मन में आया कि ये जरूर कोई बड़ी हस्ती की बात होगी जिसने समाज पर गहरा प्रभाव डाला होगा. वरना आजकल मौत इतनी मामूली चीज़ है कि लोगों ने इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है. कोई दुनिया से गुजर जाता है और हमारी आँखों में नमी नहीं आती. हम पल भर के लिए भी इस बात पर विचार नहीं करते कि एक सुंदर और कीमती जान ने इस दुनिया को छोड़ दिया है.' (कालो थियु सै के 'शायद' से)

मेरे सामने भी अख़बार है. उसमें भी ऐसी ही खबर है. नाम बदला हुआ है. कल कोई और अख़बार था उसमें भी ऐसी ही खबर थी. मुझे अख़बार की इन खबरों में वो खबरें भी दिखाई देने लगती हैं जो अख़बार में नहीं हैं. किसान, मजदूर, गरीब, कीटनाशक पीते दम्पति, पीट-पीटकर मार दिए गये लोग, अपने ही दुपट्टों को आकाश तक लहराने का ख्वाब लिए पेड़ों या पंखों से लटक गयी लड़कियां. बिना किसी गुनाह के सालों से जेलों में सजा काटते लोग और सीना चौड़ा कर हवा में कट्टा लहराते लोग.

वो आँखें जिनमें असीम सपने भरे थे उनके बारे में सोचना सुख देता है. उन सपनों को बचाने का जी करता है. सपनों से भरी तमाम आँखों को बचाने का जी करता है.

हमारे सामने दृश्य हैं जो हमें निगलने को आतुर हैं. चमचमाते दृश्य बजबजाते दुःख को छुपा देते हैं. हमें दुःख को छुपाना नहीं था उससे सीखना था. उससे जीवन को बुहारना था, दुनिया को सुंदर बनाना था. कल सारा देश दीवाली मनायेगा. कोई रामजी से मेरी अर्जी लगा दे काश कि वो इस धरती पर हो रहे अनाचार को रोक लें...

इस मनस्थिति में किशोर चौधरी को पढ़ना रुचिकर लग रहा है. किशोर बड़े और पैने सवालों को थमाते हैं. कभी शांत करते हैं कभी बेचैनी भी देते हैं. लिखना क्या है सिवाय अपनी बेचैनियों के और पढ़ना क्या है अपनी बेचैनियों को सँवारने के. जवाब तो जाने कहाँ होंगे...कहीं होंगे शायद....

Sunday, August 2, 2020

कि जीना इसी पल में...


एक लम्बी चुप्पी के मध्य में हूँ. अकेले हुए बगैर एकान्तिक महसूस कर पाती हूँ. शब्दों के कोलाहल में शांति का ‘श’ ढूंढती हूँ. इन दिनों कभी-कभार वो मुझे मिल जाता है. पंख सा हल्का महसूस होता है. हर रोज सोचती हूँ मैं क्या हूँ, कौन हूँ. देह तो नहीं हूँ मैं यह बहुत पहले जान लिया था लेकिन देह के अलावा क्या हूँ यह जानने की यात्रा चलती जा रही है. विचार और भाव तक मेरे कहाँ हैं जब तक इन पर किसी का प्रभाव है और क्या है जो अप्रभावी है.... 

पिछले दिनों जिन्दगी और मृत्यु के बीच के फासले को और कम होते देखा है. करीब से देखा है. आसपास कई लोग थे, स्वस्थ थे, गतिमान, ऊर्जा से भरे अब वो नहीं हैं. परिवार और दोस्तों में कई युवाओं को खोया दोस्तों के माता-पिता खोये. कईयों से बरसों से मिलना शेष था अब स्मृति शेष है. कुछ को उनके बचपन से जानती थे कुछ को बचपन में देखा था. मृत्यु के आगे किसी का जोर नहीं चलता. जो अभी माँ को कहकर गया कि पूरियां खाऊँगा आकर वो लौटा ही नहीं, जिसने पिता को चाय बनाकर पिलाई उसे कहाँ पता था कि वो अंतिम बार चाय पिलाकर जा रहा है. दोस्तों को कहाँ पता था कि अंतिम बार मिलकर जा रहा है...अंतिम बार फोन पर बात कर रहा है.

मृत्यु न उम्र देखती है न यह कि अभी तो कितने काम बाकी हैं इसके झटके से लेकर चल देती है और सारा जोड़-तोड़ यहीं बिखरा पड़ा रहता है. लेकिन यह सत्य तो हमेशा से करीब था. इस करीबी को क्या हम पहचान पाते हैं.

सोचती हूँ इस सोचने का हासिल क्या है. हासिल है इससे आगे निकलने, उसको कमतर साबित करने, ज्यादा सम्पत्ति बनाने, अहंकार को पालने से दूर जाते जाना. सोचती हूँ जो इनमें फंसे हैं क्या उनकी गर्दन में अकड़े-अकड़े दर्द न होता होगा. जीवन तो हमेशा से इतना ही साफ़ था हमने उसे पहचाना नहीं. इस दौर ने उसे और साफ़ किया है कि हम शायद अब आँखें खोल सकें. समझ सकें कि जो भी है बस यही पल है. इस पल को ईर्ष्या, होड़, अहंकार, हिंसा से नहीं प्रेम से भरना ही उपाय है. 

जो करना है अभी इसी पल करना है, कोई बात कहनी है तो अभी इसी पल. शान्ति का अनुभव करना है वो भी अभी इसी पल में है. किसी से प्यार कहना हो अभी इसी पल कहना है. इस सुबह को जी भर जीना है...यह जो चाय का कप रखा है करीब उसकी एक-एक घूँट को महसूस करते हुए पीना है...

आप सबको कहना है कि आपसे प्यार है...कि इस बुरे वक़्त में जिन्दगी की खूबसूरती को आप सभी ने बचाए रखा है. ख्याल रखिये...

Wednesday, July 29, 2020

खिलना और झरना


उगना ही झरना है, सुबह ही शाम है, रात ही में दिन छुपा है, उदासी सुख का ही दूसरा रूप है. जब फूल को देखते हैं तब हमें जड़ें नहीं दिखतीं. यह जड़ें नहीं दिखना ही कारण है दुःख का. यानी दुःख दुखना नहीं है, दिखना है. इन दिनों जीवन बहुत करीब आया हुआ लगता है. बहुत करीब, जैसे काँधे से सटकर बैठा हो. 

बोलती कम हूँ इन दिनों. अब सुनना भी कम होता जा रहा है. बात सुनती हूँ, आवाज नहीं. दिल की धडकनें कैसे बिना शोर किये हजारों मील की दूरी पार कर सुनाई दे जाती है और नहीं सुनाई देती पास में घनघनाते फोन की घंटी. 

जीवन की मेहरबानी है. वो न जाने कितने रास्तों से चलकर आता है. कई बार मृत्यु के रास्ते भी चलते हुए वो हम तक आता है. कभी भय के रास्ते भी. लेकिन वो आता है और यही सच है. दिक्कत सिर्फ इतनी है कि हम उसी के इंतजार में कलपते रहते हैं जो हमारे बेहद करीब है. यानी जीवन, यानी प्रेम. वो तो कहीं गया ही नहीं, और हम उसे तलाशते फिर रहे हैं. कारण हम जीवन को पहचानते नहीं.

जीवन फाया कुन है...जिस मृत्यु का डर है, जिस मृत्यु से डर है वो बिना जीवन आये कैसे आएगी...तो मृत्यु से डरने से पहले खुद से पूछना जरा कि जिंदा हो क्या? सिर्फ साँसों के बूते जवाब मत तलाशना...जीवन के बारे में सांसें नहीं बतायेंगी, जीवन खुद बतायेगा जैसे मृत्यु के बारे में वो खुद बतायेगी...

जीना जीने से आता है...मरना मरे बगैर भी आ ही जाता है कि एक ही ज़िन्दगी में कितनी बार तो मरते हैं हम. शायद जितना जीते हैं उससे भी ज्यादा. क्या लगता है?

खिलना और झरना एक साथ देखते हुए जीना सीख रही हूँ...

Sunday, July 26, 2020

Saturday, July 25, 2020

सत्ता गई, कवयित्री बची रही


 - प्रियदर्शन
बीसवीं सदी के शुरुआत में उभरी रूसी कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा का जीवन बहुत त्रासद रहा। वह एक कुलीन परिवार में जन्मी, भावावेग से भरी कवयित्री थी। उसके पति सेर्गेई अपने प्रारंभिक वर्षों में वाइट आर्मी में थे, यानी जार के साथ। बेशक, बरसों बाद उनके सोवियत सीक्रेट एजेंट होने की बात निकली, लेकिन जेल और यातनाएं तब भी उसकी जिंदगी में बने रहे। बहुत सारे निजी पारिवारिक कष्टों के बीच रूस की उथल-पुथल में मारीना का सब-कुछ नष्ट होता चला गया। वह करीब डेढ़ दशक रूस के बाहर रहने को मजबूर हुई। बरसों वह खाने को मोहताज रही। ऐसी भी नौबत आई कि किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उसे कपड़े मांगने पड़े। एक बार जूते फट जाने की वजह से वह एक कार्यक्रम में नहीं जा पाई। उसकी एक बेटी अनाथालय में भूख से मर गई।

यह हिला देने वाली कहानी किसी ऐसी कवयित्री की नहीं है, जिसे कोई न जानता हो। मारीना को मायाकोव्स्की जानते थे, पास्तरनाक और रिल्के उससे प्रेम करते थे, अन्ना अख्मातोवा उसकी दोस्त थी, ब्लोक और गोर्की उसके काम से परिचित थे। रूस और रूस के बाहर बहुत सारे लेखक उसके लेखन से खूब वाकिफ थे।

लेकिन रूसी क्रांति के बाद, खासकर स्टालिन के लंबे दौर में जिन लोगों ने रूस में साहित्य-संस्कृति के संरक्षण का बीड़ा उठाया था, वे अपने विचारधारात्मक आग्रहों के दबाव या फिर स्टालिन के आतंक की वजह से मारीना की मदद करने को तैयार नहीं हुए। बरसों बाद जब मारीना रूस लौटी तब उसके हालात बुरे होते चले गए और एक इतवार अवसाद और तनाव के बीच उसने खुदकुशी कर ली। मारीना को सोवियत सत्ता प्रतिष्ठान ने भुला देने की बरसों कोशिश की, लेकिन स्टालिन की मौत के बाद जब वहां व्यवस्था में कुछ लचीलापन लौटा तो सत्तर के दशक में मारीना का काम नए सिरे से प्रकाश में आया।

यह सारी कहानी हिंदी की एक कवयित्री प्रतिभा कटियार ने लिखी है। हिंदी में इसके पहले मारीना त्स्वेतायेवा का काम वरयाम सिंह के अनुवाद में कुछ चिट्ठियां कुछ कविताएं नाम से पहले आ चुका है। दरअसल प्रतिभा का मारीना से पहला परिचय इसी किताब के जरिए हुआ। लेकिन मारीना की कोई संपूर्ण जीवनी हिंदी में पहली बार लिखी गई है। खास बात यह है कि इस जीवनी में जितनी वस्तुनिष्ठता है उतनी ही आत्मनिष्ठता भी। प्रतिभा कटियार जैसे बीच-बीच में अपनी प्रिय कवयित्री से बतियाती चलती है। अलग-अलग अध्यायों के अंत में छोटी-छोटी ‘बुक मार्क’ जैसी टीपें पूरी किताब को आत्मीय स्पर्श ही नहीं देतीं, यह भी बताती हैं कि कैसे किसी दूसरे देश और दूसरी सदी की कवयित्री के साथ कोई लेखिका ऐसा सख्य भाव विकसित कर सकती है जिसमें वह बिलकुल उससे संवादरत हो, बारिश में उसके साथ चाय पीने की कल्पना करे और उसके दुख से दुखी हो। दरअसल किताब इसी संलग्नता से निकली है, इसलिए छूती है।

हालांकि किताब के कुछ अध्याय और बड़े होते तो अच्छा होता। खासकर रूसी क्रांति के समय की उथल-पुथल के बीच होने वाले सांस्कृतिक विस्थापन की विडंबना को और पकड़ने की जरूरत थी। किताब में प्रूफ और संपादन की असावधानियां भी खलती हैं। लेकिन ऐसे खलल के बावजूद यह हिंदी के समकालीन संसार की एक महत्वपूर्ण किताब है। हिंदी में ऐसी जीवनियां कम हैं। इसकी मार्फत एक विलक्षण कवयित्री के त्रासद जीवन पर और इस जीवन की मार्फत साहित्य और सत्ता के अंतर्संबंधों से बनने वाली विडंबना पर भी रोशनी पड़ती है।

Sunday, July 19, 2020

नींद

आधी गोली
पूरी नींद का चक्कर लगाने के बाद
घुटने टेक देती है

पूरी गोली
आधी नींद से दोस्ती कर
सुस्ता लेती है

बची हुई आधी नींद
भटकती फिरती है
सुकून की तलाश में

सुकून जो उधडा पड़ा है...

Friday, July 17, 2020

हत्या से पहले का आत्म


कुछ कहना चाहती हूँ
फिर लगता है सब कहा जा चुका है

तो सब कहे जा चुके को सुनने पर ध्यान लगाती हूँ
और ध्यान बिना कहे हुए को सुनने की ओर चल पड़ता है

उन आवाजों की ओर जिनके पाँव नहीं
उन आवाजों की ओर जो
भटकती रहती हैं देह के भीतर
जेहन के भीतर भी

हम यह मानने को भी तैयार नहीं
कि एक बहुत बड़े वर्ग की
कोई आवाज ही नहीं है अब तक

आवाजें जो कहती हैं
भूख लगने पर रोटी छीन कर खाना
अपराध नहीं होना चाहिए
आवाजें जो पूछती हैं
तुम्हारे भीतर धधकती हिंसा की लपटों पर
क्या कोई असर नहीं डालते
मन्त्र, अजान, गुरुबानियाँ.

लाठियां भांजते लोग
अपने बच्चों को किन हाथों से छूते होंगे
जब इनके बच्चे इन्हें छूते होंगे
तो उन बच्चों की निगाहों से कैसे बच पाते होंगे
जिन्हें अनाथ किया अपने ही हाथों से
ये दो तरह की हत्याओं का दौर है
एक मार-मार कर मार डालने का
दूसरा मर जाने के सिवा
कोई रास्ता ही न छोड़ने का

लोग मर रहे हैं, लाठियों से, गोलियों
बिना इलाज के अस्पतालों में
लोग मर रहे हैं
सडकों में, दफ्तरों में, बाज़ारों में, कारखानों में
लगातार मर रहे हैं लोग

कि जैसे लाशों के ढेर से घिरी हूँ
स्वप्न से जागती हूँ, 
हांफती हूँ, पानी पीती हूँ
हकीकत और स्वप्न में कोई फासला नहीं बचा है

बिलखते बच्चों की आवाजें कानों में गूंजती हैं
कोई नाकामियों से हार कर झूल गया है
अभी-अभी फंदे पर
कोई अपमान से टूटकर

कुछ आत्मश्लाघा में मरे जा रहे हैं कि
मैं ही मैं हूँ जबकि
इस मैं का कोई अर्थ नहीं सचमुच
कुछ मरे जा रहे हैं सत्ता के लोभ में
कुछ संसाधनों की होड़ में

वो जो अभी-अभी चाय पीकर गया है न साथ में
जो हंस रहा था जोर-जोर से
जिसकी गिटार की धुन पर झूम रहे थे सब
वो भी जाने कबसे मर रहा था धीरे-धीरे
हमने सुनी नहीं आवाजें मरने की
सिर्फ शोर सुना और फिर एक रोज कहा
'अरे, किसी से कुछ कहा क्यों नहीं...
हमसे ही कहा होता'

इन सबमें सबसे प्यारे हैं वो
जो मरे जा रहे हैं प्यार में
जिनका कहीं कोई जिक्र नहीं

नहीं बचा है ज्यादा फर्क
हत्या और आत्महत्या में 
हत्या से पहले आत्म को चिपका देने
से क्या बदल जाता है 

जीना कौन नहीं चाहता भला
लेकिन इस दुनिया को जीने लायक
बनाने के लिए
हमने खुद किया क्या है आखिर?

Sunday, July 5, 2020

स्मृतियाँ हरी ही रहती हैं


वो जो अटका हुआ है कोरों पर
कितने बरसों से
ढलका नहीं कभी
कि ढलक जाने की मोहलत ही कहाँ थी

ओ सावन, अबके आना
मिलना उस
कोरों पर ठहरे हुए सावन से
कि स्मृतियाँ हरी ही रहती हैं
और आँखें भरी ही रहती हैं हरदम.

Friday, July 3, 2020

मारीना त्स्वेतायेवा का तूफानी जीवन और उनकी कविताएँ

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इन्द्रेश मैखुरी उत्तराखंड की राजनैतिक व सामजिक चेतना का चेहरा हैं. वो तमाम सरोकारों से सिर्फ यूँ ही सा नहीं जुड़ते बल्कि उन्हें शिद्दत से जीते हैं, उन सरोकारों के लिए लड़ते-भिड़ते हैं. नफे-नुकसान की राजनीति से परे वो सिर्फ मनुष्यता के हक में आवाज उठाने की राजनीति करते हैं. दोस्तों के लिए प्रेमिल और उदार ह्रदय रखते हैं. उन्होंने मारीना पर अपनी टिप्पणी समकालीन जनमत के लिए लिखी है जिसे यहाँ सहेजना अच्छा लग रहा है- प्रतिभा

- इन्द्रेश मैखुरी 
क्या आप मारीना को जानते हैं ? आइये, प्रतिभा कटियार आपको उनसे मिलवाती हैं. उनकी ज़िंदगी से और ज़िंदगी की जद्दोजहद से रूबरू करवाती हैं. मारीना त्स्वेतायेवा रूस की एक बहुचर्चित कवियत्री हैं. अब देखिये मारीना खुद होती तो इसी बात से झगड़ा शुरू हो जाता. वे कहती हैं- “मैं रूसी कवि नहीं हूँ, मैं तो कवि हूँ मेरे हिसाब से कोई कवि होता है,न कि फ्रेंच या रूसी कवि.”

तो चलिये मारीना के ही अनुसार बात करते हैं. उसकी बात है तो कुछ तो उसके अनुसार करनी ही होगी. मारीना त्स्वेतायेवा कवियत्री थी, जो 26 सितंबर 1892 को रूस में जन्मी. उसका जीवन जो था, क्या जीवन था, तूफानों से भरा, झंझावातों से भरा. एक मुश्किल गुजरी नहीं कि दूसरी हाजिर. लेकिन इसके बीच यदि कुछ कायम रहता है तो उसका कवि होना. सर्वाधिक यदि वह किसी को बचाने की कोशिश करती है तो अपनी कविताओं को, अपने कवि को. और दुर्गम, दुरूह, दुष्कर स्थितियों में भी उसका कवि बचा रहता है, वह जब तक जीवित रही, उसके कवि ने ही उसे जिलाए रखा. अपनी रचनाओं को बचाए रखने की चिंता के बारे में मारीना कहती हैं- “एक लेखक के लिए उसकी रचनाएँ बहुत महत्वपूर्ण होती हैं. इसलिए लाज़िम है उसे उनकी सुरक्षा की चिंता हो. उसके लिए उसकी रचनाओं की सुरक्षा अपनी सांसों को सहेजने की तरह होती है.”
जीवन में सहेजना सिर्फ रचनाओं को ही नहीं पड़ता, जीवन को भी पड़ता है. और ऐसे जीवन को तो पग-पग पर सहेजना पड़ता है, जो कष्टों, दुश्वारियों और दुरूहताओं के झंझावातों का समुच्च्य हो. मारीना का जीवन ऐसा ही था. महज 14 वर्ष की उम्र में माँ तपेदिक की चपेट में आ कर चल बसी और 21 बरस तक आते-आते पिता भी गुजर गए. अलबत्ता कविता का दामन मारीना छुटपन में ही थाम चुकी थी. माँ उसे संगीतकार बनाना चाहती थी और लगभग जबरन बनाना चाहती थी. पिता थे बौद्धिक, इतिहास के प्रोफेसर, संग्रहालय के निदेशक. मारीना पर माँ-पिता के व्यक्तित्व का असर है पर उनसे अंतरविरोध भी है. बौद्धिक पिता से वह प्रभावित होती है पर एक सामान्य पिता की तलाश में रहती है. अपनी माँ का मारीना बेहद काव्यात्मक विवरण देती है, उनके व्यक्तित्व का जीवन में उदासियों और कमियों का, उनके संगीत और कला प्रियता का. लेकिन माँ द्वारा संगीत सीखने के लिए ज़ोर डालने से वह कतई सहमत नहीं होती, सहज नहीं होती. “पिता के हो कर भी नहीं होने” और “हर वक्त अपनी तरफ से कुछ उड़ेलने को तैयार माँ” की बीच अलग-थलग पड़ी मारीना ने शब्दों में पनाह ली, शब्दों को अपना हमसफर बनाया. शब्दों के साथ उसका जो गठबंधन है, वो जीवन पर्यंत चला.
वैसे ही चला उजड़ने और बसने का सिलसिला भी. माँ की बीमारी के चलते जो वो रूस छोड़ कर निकले तो फिर जीवन भर यह भटकने का, उजड़ने का क्रम चलता ही रहा. और चलता रहा लिखने का अनवरत सफर. घनघोर विपत्तियों में होती है मारीना पर लिखना नहीं छोड़ती. कैसी विकट स्थितियों में लिखती है, जरा गौर कीजिये. एक बेटी की मृत्यु हो चुकी है. उसकी अन्त्येष्टि में नहीं जा पा रही क्यूंकि दूसरी बेटी भयानक बीमार है. और इस दुख और कशमकश को वह कागज पर शब्दों में उतारती है. 1925 में मारीना का बेटा पैदा होता है. बेटे के जन्म के बाद उसकी सारी जीवनचर्या बच्चे के इर्दगिर्द सिमट जाती है. आधा वक्त बच्चे की देखभाल में बीतने लगता है. लेकिन इसी बीच वह गीतकाव्य- “द पाइड पाइपर” भी रच देती है. उसके बारे में जीवनी में दर्ज है कि व्यंग्यात्मक शैली का यह गीतकाव्य मारीना के बेहतरीन कार्यों में से एक है और यह मारीना ने उस बीच तब-तब लिखा जब बच्चा गाड़ी में सो जाता था.
क्या ऐसे किसी व्यक्ति से कुछ रचने की मनोस्थिति में होने की उम्मीद कर सकते हैं, जो यह कातर विनती कर रहा हो कि उसके पास जो एक जोड़ी ऊनी कपड़ा है, वह फटने लगा है, इसलिए कोई उसे एक पोशाक दे दे या जो काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किए जाने के बावजूद वहाँ न जा पाये क्यूंकि ऐन वक्त पर जूता तले से उधड़ गया और दूसरा जूता उसके पास नहीं है ! लेकिन मारीना ऐसी विकट स्थितियों के बावजूद लिखती है, काव्य, गद्य,संस्मरण, नाटक, सभी कुछ तो. कविता उसमें इस कदर रची-बसी थी कि रूसे के एक बड़े कवि वोलोशिन ने उससे कहा “तुम्हारे भीतर दस कवियों के बराबर कविता लिखने की क्षमता है.” और कवित्व कैसा ? स्विस पुलिस एक हत्याकांड के आरोप में उसके पति को गिरफ्तार करने आई. पति नहीं मिला तो पुलिस उसे ले गयी. पुलिस ने जब उससे पूछताछ की तो जवाब में “उसके मुंह से कवितायें फूट रही थी. आश्चर्य की बात है कि इस वाक़ये ने पुलिस पर मारीना का शानदार प्रभाव डाला और उन्होंने उसे ससम्मान घर जाने दिया.”
उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू उसके प्रेम भी हैं. चर्चित, कम चर्चित, काफी लोगों के प्रेम में मारीना रही. इसमें रिल्के से लेकर पास्तरनाक तक शामिल हैं. पास्तरनाक से तो वह इस कदर प्रेम में थी कि अपने बेटे का नाम बोरिस रखना चाहती थी, जो हो न सका. लेकिन इन सब प्रेमों में ऐसा लगता है कि वह अपने-आप को ही तलाश रही होती थी, अपने से ही बात कर रही होती थी . प्यार की चाह उसमें काफी गहरी थी, जैसा उसने खुद भी लिखा, “मुझे ऐसे लोगों की बहुत जरूरत है, जो मुझे प्यार करें, जो मुझे प्यार करने दें. जिन्हें मेरे प्यार की जरुरत हो. जरूरत जैसे रोटी की होती और इस तरह की जरूरत एक पागलपन ही तो है.”
मारीना जिस दौर में थी, वह दुनिया में भी उथलपुथल का दौर था. रूस में क्रांति, हिटलर का उभार, द्वितीय विश्व युद्ध जैसी घटनाओं की हलचल ने उसके जीवन के झंझावतों को बढ़ाने में योग दिया. पॉलिटिकली करेक्ट होने की न उसे सुध थी,न परवाह. इस वजह से उसके कष्टों में कुछ और इजाफ़ा हुआ.
सुदूर रूस में जन्मी इस कवियत्री की जीवनगाथा को हम तक लेकर आईं प्रतिभा कटियार. प्रतिभा जी स्वयं कविता लिखती हैं, मुख्यधारा का मीडिया जिसे कहा जाता है, उसमें काम कर चुकी हैं और आजकल अजीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के साथ हैं. पहले-पहल जब इस किताब का चर्चा हुआ तो लगा कि किसी रूसी जीवनी का अनुवाद किया होगा प्रतिभा ने. लेकिन बाद में मालूम हुआ कि यह अनुवाद नहीं खालिस जीवनी है. और यह जीवनी प्रतिभा ने लिखी नहीं है, वे डूब गयी इसको लिखने में. बचपन में अपने पिता की किताबों में पायी किताब- “मारीना त्स्वेतायेवा : डायरी, कुछ खत, कुछ कविताएं”, लगता है कि एक बार मिलने के बाद उन्होंने छोड़ी ही नहीं. बल्कि बिना रूसी जाने ही, वे जा पहुंची मारीना की दुनिया में. मारीना के साथ वे ऐसी हिलमिल गयी कि समय के कालखंडों, देशों, भाषाओं की बन्दिशों को पीछे छोड़ संवाद करने लगी मारीना से. जीवनी के हर अध्याय में जो बुकमार्क नाम का हिस्सा है, वहाँ प्रतिभा कटियार मौजूद हैं, मारीना के साथ गपशप करने, दुख-सुख बांटने, चाय पीने के लिए ! इस तरह मारीना की दुनिया को वो हमारी दुनिया तक ले आईं.

संवाद प्रकाशन मेरठ से छपी इस 300 रुपये मूल्य वाली इस जीवनी के जरिये, प्रतिभा कटियार के साथ आप भी विचर आइये मारीना के तूफानी जीवन और उसके कविताओं के संसार में.


Thursday, July 2, 2020

उत्सव निर्णय लेने का



उन्हें न निर्णय लेना आता है, न किसी के निर्णय का सम्मान करना आता है. न रिश्ते बनाना आता है, न उन्हें निभाना आता है, और अगर रिश्तों में कोई रुकावट आ ही जाए तो उसके साथ डील करना तो बिलकुल नहीं आता. और जिन्हें यह आ जाता है उनसे सीख ही लें यह भी नहीं आता. उन्हें सिर्फ आता है, ज्ञान देना, सद्भावना के नाम पर चुभन देना. समाज में जितनी कुंठा प्रेम को लेकर, प्रेम विवाह को लेकर है उससे कहीं ज्यादा कुंठा है तलाक को लेकर...लेकिन देवयानी भारद्वाज इन तमाम मीडियोक्रेसी के मुंह को अपनी हिम्मत, मजबूत इरादों और स्नेहिल मुस्कुराहट से बंद करती हैं...जिसे हम तलाक देते हैं उससे दुश्मनी ही हो ऐसा भी क्यों सोचता है कोई. वो जो बीता वक़्त था वो इतना मीठा था कि उसे भूलना क्यों. अगर निर्णय साथ रहने का सेलिब्रेट करते हैं तो अलग होने का क्यों नहीं करते.

नासूर बन चुके रिश्तों को ढोते हुए, उसकी घुटन में बिलबिलाते, रिश्तों से इधर-उधर मुंह मारते लेकिन झूठी पारिवारिक तस्वीरों के परदे डालते हुए लोगों पर सच में दया ही आती है. उन्होंने तो उन प्रेमिल दिनों का स्वाद शायद चखा ही नहीं जिन्हें देवयानी जी भरके जी चुकी है. मुझे ऐसे ही इस लडकी से प्यार नहीं, इसके संघर्ष, इसकी मुस्कुराहटों को मोनालिसा की मुस्कान से ज्यादा खूबसूरत बनाते हैं..

तलाक के बारे में देवयानी का लिखा बार बार पढ़ा जाना चाहिए, पढ़ाया जाना चाहिए.-

देवयानी भारद्वाज- 

यदि आपने कोई निर्णय लिया, जिसके बाद आप अधिक आत्मनिर्भर हुए, आप ज्यादा खुश रहने लगे तो आप उसका जिक्र करेंगे या उसके जिक्र से बचेंगे?

 जब भी तलाक का उल्लेख करती हूं मुझे कई शुभकांक्षी मित्र संदेश भेजते हैं कि इसका जिक्र न किया करूं। उनके कहने में मेरे प्रति सहानुभूति होती है। शुक्रिया दोस्तो, लेकिन अब मैं उस जगह से बहुत आगे निकल गई हूं, जहां यह सहानुभूति मेरे काम आए। मैं उम्मीद करती हूं कि ऐसे मित्र मेरी इस पोस्ट को अन्यथा नहीं लेंगे।

मैं यह बताना चाहती हूं कि तलाक मेरे जीवन का बहुत महत्त्वपूर्ण फैसला था। मैं तो उसकी हर सालगिरह सेलिब्रेट करना चाहती हूं। इसमें उस व्यक्ति के लिए भी कोई तिरस्कार नहीं जिससे तलाक लिया। मैं अब भी उसका जिक्र प्यार के साथ करना चाहती हूं। जो उससे शिकायतें हैं, वे अपनी जगह। मुझे अब भी उसके साथ की कई तस्वीरें पसंद हैं। तलाक का जिक्र न करने का मतलब उसके साथ जिए जीवन का भी जिक्र न करना हो जाता है, जबकि हमने भरपूर जीवन जिया है। यह तो मेरा अपना कारण है इस पोस्ट को लिखने का।

दूसरे यदि आप किसी स्त्री को उसके एक निर्णय के उल्लेख से रोकते हैं तब आप उन बहुत सारी औरतों को वह निर्णय लेने से भी रोकते हैं। किसी बात का उल्लेख न करने का अर्थ है आप यह बताना चाहते हैं कि वह निर्णय शर्मिंदगी लेकर आता है। मैं शर्मिंदा नहीं हूं, खुश हूं। आप यदि किसी को शादी की तस्वीरें शेयर करने पर नहीं कहते कि इन्हें शेयर मत करो, जन्मदिन पर बधाई देते हैं तो तलाक पर यह छुपमछुपाई क्यों! ऐसे ही परिवारों से आने वाले बच्चे स्कूल में मेरे बच्चों से कहते हैं, "ओह! तुम्हारे पेरेंट्स का डिवोर्स हो गया। किसी को बताना नहीं!" मेरे बच्चे मुझ पर गर्व करते हैं और अपने पापा से प्यार। मैं अपने फैसले पर शर्मिंदा रह कर अपने बच्चों को पिता से प्रेम करना नहीं सिखा सकती थी।

मैं चाहती हूं कि लड़कियां सड़ चुके रिश्तों की लाश ढोने की बजाय आगे बढ़ें, अपने फैसले करें। जीवन किसी भी तरह सरल और आसान नहीं है। मुश्किलें अपनी चुनी हुई होती हैं तो जीना अच्छा लगता है।

अंत में यह कहना चाहती हूं कि- She lives happily ever after the divorce. Please celebrate her!

Wednesday, July 1, 2020

वैधानिक गल्प- चन्दन पांडे


मुझे वो लोग, वो बातें, वो घटनाएँ बहुत अच्छी लगती हैं जो मेरे अब तक के जाने हुए से मुझे आगे ले जाती हैं, अब तक के सोचे हुए को गलत साबित करती हैं. मैं हमेशा उत्सुक, जिज्ञासु और तत्पर रहती हूँ खुद के अब तक के जाने और सोचे हुए को ख़ारिज होते देखने को.

इन दिनों ऐसा ही दौर आया हुआ है. अभी कुछ दिन पहले ही लग रहा था कि कहानियों और उपन्यासों से दोस्ती कम हो चली है शायद. लेकिन मैं गलत साबित हुई. चंदन पांडे का उपन्यास वैधानिक गल्प एक सांस में पढा ले गया. (इसके पहले सुजाता का एक बटा दो भी ऐसे ही पढ़ा था.) इस एक सांस को तमाम कामों समेत 18 घंटे का समय माना जाय.अफ़सोस हुआ कि क्यों चन्दन पांडे को इतनी देर से पढ़ा.

पहली पंक्ति से यह उपन्यास पाठकों पर पकड़ बना लेता है और घसीटते हुए भीतर ले जाता है. कहानी में कितनी कहानियां हैं, किस्सों में कितने किस्से. कोई पूर्वाग्रह नहीं किसी किरदार का. अर्चना और अनुसूया के बहाने स्त्रियों के बीच ईर्ष्या से इतर एक सार-सहेज और चिंता फ़िक्र वाला रिश्ता देख मन भीगने लगता है. यही दूरी तय करनी तो बाकी है हम स्त्रियों को. कितनी आसानी से अर्जुन की पत्नी अर्चना अर्जुन की पूर्व प्रेमिका रह चुकी और फिलवक्त मुश्किल में फंसी अनुसूया की चिंता में इस कद्र द्रवित है कि तुरंत पति को भेजने को न सिर्फ कहती है बल्कि जल्दी पहुँचने का इंतजाम भी करती है. पति को यथासंभव मदद पहुँचाने का प्रयास करती है, हौसला बंधाती है और अनुसूया से भी बात करते हुए उसे हिम्मत देने की कोशिश करती है. हालात बिगड़ने पर पति को आदेश देती है कि उसे इस हालत में वहां छोड़कर मत आना उसे साथ लेकर आना. अर्चना का किरदार मुझे उपन्यास का बहुत मजबूत किरदार लगता है. यूँ अनुसूया भी कम साहसी नहीं कि पहले प्रेम के नाकाम होने के बाद तमाम घरवालों के खिलाफ जाकर मुसलमान से ब्याह करने की हिम्मत रखती है वह.

उपन्यास में जितने भी स्त्री किरदार हैं सब सुलझे हुए, मजबूत और लड़ते, जूझते हुए हैं. ऐसा कम ही देखने को मिलता है. वैधानिक गल्प के डिफरेंट शेड्स के बीच नायक अर्जुन की कमजोरियों के जो टुकड़े आये हैं वो भी एक ईमानदार स्वीकारोक्ति के तौर पर अच्छे लगते हैं. एक कमजोर, कायर प्रेमी. प्रेमी के तौर पर अक्सर टूट जाते, कमजोर पड़ जाते पुरुषों में ये स्वीकारोक्तियां अभी आनी बाकी हैं. अनुसूया का अर्जुन के लिए कहा देखिये तो, 'तुम्हें तो अपनी जाति में कोई चाहिए थी. यह बात तुम्हें सात-आठ सालों में समझ में आई लेकिन मुझे बहुत पहले ही समझ में आ गयी थी. तुम्हारी हरकतों ने मुझे सब कुछ सिखलाया. तुममें मना करने का साहस नहीं था इसलिए तुम खींचते रहे. बहाने-बहाने से मुझे डिमौरलाइज करते रहे और जानते हो तुमसे अलग हुई तो मम्मी कसम कोई अतिरिक्त दुःख न हुआ....'

प्रेम में स्त्रियाँ हमेशा से ज्यादा मजबूत रही हैं, प्रेम में ही क्यों जीवन में भी. उपन्यास में भी अर्चना, अनुसूया, जानकी...सब अपनी चमक लिए हैं लेकिन वो चमक दैवीय नहीं है. यही बात उन्हें विशेष बनाती है.

पत्नी के कहने पर पूर्व प्रेमिका की मदद को निकल पड़े नायक के मन मस्तिष्क में चलने वाली स्मृतियों की बूंदाबांदी के तूफ़ान बनने की संभावनाओं को कभी रुकते कभी उफनते देखना, उसके लापता पति को ढूंढते हुए समूचे सिस्टम की परतों को खुलते देखना, उन परतों में उलझना भी, फिर समझना भी.

लव जिहाद कहानी में इस तरह आएगा इसका अंदाजा भी नहीं लगता, प्रीडेक्टेबल नहीं है कहानी. अपने अंत पर पहुंचकर बताती है कि ये वही कहानी है जिसे तुमने टीवी में देखा था, अखबारों में पढ़ा था. लेकिन वो कितना कम था.

रफीक और नियाज के अलावा अमनदीप और जानकी तो फ्रंट में हैं लेकिन जो बैकग्राउंड में है एक पूरा सिस्टम, सिपाही, फेक वीडियो, झूठे फोन, झूठे समारोह, सम्मान वो सब कहानी के किरदार हैं. किरदार हैं रफीक की डायरी के वो पन्ने जिन्हें जैसे तैसे अनुसूया ने बचाया और उस बचाने में वो भीगे, गले, कुछ शब्द बह गये कुछ रह गये, जो कमरे भर में बिखरे, सूखने के इंतजार में, रफीक के मिलने के इंतजार में. चन्दन की कहन बहुत कमाल की है, वो किताब को छोड़ने नहीं देती. ऐसी पठनीयता से गुजरते हुए मुझे नाना जी देर रात तक चलती जाने वाली कहानियां याद आती हैं.

यह मेरी कमजर्फी ही है या जिन्दगी की बेदिली कि उसने मेरे कई बरस निचोड़ लिए, जीने का मौका ही न दिया पढने का मौका कैसे देती भला. यही वजह है कि मैंने चन्दन पाण्डेय का लिखा पहली बार कुछ पढ़ा है. हालाँकि अब बाकी किताबें भी ऑर्डर की जा चुकी हैं.

मुझे समीक्षा जैसा लिखने का न तो शऊर है, न मन है. बस इतना कहने का मन है कि बहुत सुंदर उपन्यास पढ़ा मैंने.आपने अगर न पढ़ा हो तो जरूर पढ़िए...

Saturday, June 27, 2020

दूर ही होता है बहुत दूर


इस दरमियान मैंने एक नया दोस्त बना लिया है. जीवन. मुझे लगता है जीवन भी मेरी तरह है, उलझा हुआ, बेचैन, थोड़ा संजीदा, थोड़ा शैतान. सबको लगता है जीवन के पास हर बात का जवाब होगा लेकिन असल में वह एक छोटे से सवाल से भी परेशान हो जाता है, सर खुजाने लगता है. चाय के बहाने सवालों से दूर निकल जाता है. अब चूंकि हमारी दोस्ती हो गयी है तो वो मुझे और मैं उसे देखकर देर तक हंसते रहते हैं. सलीम और बंटी की समझदारियों पर खामोश रहते हैं. जीवन बंटी और सलीम को देखकर कहता है अभी इन्हें पता नहीं कि यह जो समझदार होना है न इनका, यही इन्हें डुबोयेगा फिर आयेंगे इसी जीवन के पास और तब मैं चल दूंगा. यह कहते हुए वह मुस्कुराता है. मैं उससे कहती हूँ नहीं, तुम चल नहीं दोगे, चल देने का नाटक करोगे क्योंकि हो तो तुम दोस्त ही न, तो तुम साथ छोड़ नहीं पाओगे. जीवन फिर से सर खुजाने लगता है. समझदारी वाली कोई बात जीवन को भाती ही नहीं वो ऐसी तमाम बातों से दूर जाना चाहता है...बहुत दूर. बिना यह जाने कि बहुत दूर कितना दूर होता है.

ली-वान को जहाँ छोड़कर मैं इधर-उधर भटकने निकल गयी थी कि शायद उससे बातें करना बचाकर कुछ बचा लूंगी वो वहीं बैठी मिली. इस बीच उसने न जाने कितनी कॉफ़ी पी, कितनी बार घड़ी देखी पता नहीं. लेकिन जैसे ही मैंने पेज 140 खोला वो मुस्कुराती हुई मिली. मुझे लगा वो पूछेगी 'कहाँ रह गयी इतने दिन' लेकिन वो पूछती है, 'पाकिस्तान कैसा है?'

लेखक कहता है,' मैं कभी गया नहीं हूँ पाकिस्तान पर वह बहुत सुंदर है. बिलकुल भारत जैसा सुंदर.' दोनों बहुत एक जैसे हैं. दोनों अपने भीतर बहुत सारी हलचल पाले रहते हैं.'

'यह वाक्य कितना काव्यात्मक लगता है कि शायद हम मनुष्यों की आखिरी जनरेशन होंगे जो अपने समय में इस दुनिया को खत्म होता देखेंगे...' ली वान कहती है.

ली-वान खूबसूरत है. वो चाइना से है लेकिन असल में वो पूरी दुनिया की है. घुम्मकडी उसका काम भी है और शौक भी. वो बहुत सी भाषाएँ जानती है और पूरी दुनिया से प्यार करती है. ली-वान की ख़ास बात है कि वो अपनी दुनिया में आये दिए बगैर आपकी दुनिया में शामिल हो जाती है, बिना कोई ज्यादा जगह घेरे.

ली-वान के साथ रात के शहर को देखना अलग ही अनुभव है. वो जानती है कि किसी शहर से दोस्ती करनी हो तो उस शहर में पैदल घूमना चाहिए. उसके चेहरे पर छाई बच्चों सी किलक के बीच सीरियाई बच्चों की चिंता की लकीरों को अलग करके उसे देख पाना आसान नहीं. वो अपने साथ अनगिनत सवाल लिये फिरती है. लेकिन वो अनजाने हमारे बिना पूछे सवालों की बाबत आसानी से बात कर लेती है,' तुम्हें पता है मैं सामाजिक विज्ञान की छात्र हूँ. असल में मुझे ऐसा लगता है कि जैसे ही लोग शादी करते हैं, वह एक बाज़ार की साजिश का शिकार हो जाते हैं. बच्चे होने के बाद वह बाज़ार के बने बनाये एक ढांचे में घुसते हैं और उन्हें वही करना होता है जो समाज उन्हें कहता है कि यह सही है और यह गलत. प्रश्न करते ही वे उस व्यवस्था को चैलेंज करते हैं, जिसके भीतर वे गले तक डूबे हुए हैं. यह बहुत अद्भुत है कि हम इंसानों ने कैसे बाज़ार के सामने घुटने टेक दिए हैं और समाजशास्त्र कोई दूसरा तरीका जो सभ्य समाज को भी बनाये रखे, खोजने में नाकाम रहा है.'

ली-वान प्यारी हो तुम. तुम मेरे मन की बातें कहती हो.लेकिन जैसा कि हर यात्रा का हासिल चलते जाना है, इस चलते जाने में लोगों का चीज़ों का, शहरों का भावनाओं का छूटते जाना लाजिम है. ली-वान भी छूट जाती है.

कभी सोचती हूँ कि ली-वान, मार्टिन, कैथरीन, जंग-हे अगर कभी मिलें तो कितना अच्छा हो. अगर मैं उन शहरों में कभी गयी तो बिना उनसे मिलने की इच्छा लिए उन्हें जरूर ढूंढूंगी. कोरियन दोस्त को भी...हालाँकि इन सबने मिलकर मुझे खुद को ढूँढने में बहुत मदद की है. उन्होंने मेरी सुबहों में शामिल होकर बताया है कि यथार्थ में बहुत दूर...अकसर सच में बहुत दूर ही होता है, अपनी कल्पना में हम उस दूरी को कुछ कम करते हुए थोड़ा पास ला सकते हैं.

मेरी आँखें भरी हुई हैं...मुझे एकदम अच्छा नहीं लग रहा. जीवन मुझे देखकर मुस्कुराता है. जीवन यात्रा की पुकार से बड़ी कोई पुकार नहीं...कि दफ्तर की मीटिंग का वक़्त हो चला है...

Friday, June 26, 2020

ये जो पढ़ना होता है न



जब कोई लिखने की बाबत बात करता है तो मुझे लगता है उसे पढ़ने की बाबत बात करनी चाहिए. मसलन, लिखने में मुश्किल होती है, कैसे शब्द, कैसे वाक्य, कैसी क्रमबध्दता समझ में नहीं आता और तब मैं अपने भीतर कहीं दुबक जाती हूँ. मुझे इन सवालों के जवाब नहीं मालूम. लेकिन मुझे लगता है कि अगर मुझे मेरे लेखकों से कुछ पूछना हो तो मैं यह पूछने की बजाय कि फला महान रचना आपने कैसे लिखी मैं यह महसूस करना चाहूँगी कि कितने जख्म, कितनी सलवटें, कितनी पीड़ा और कितने सुख से गुजरा होगा यह लेखक. कितना अप्रिय है अपने प्रिय लेखक के सामने खुद को अपने अधकचरे लिखे के साथ एक लेखक की तरह पटक देना और मुस्कुराकर देखना लेखक की प्रतिक्रिया.

इन दिनों पहले से पढ़ी हुई किताबों को फिर से पढ़ रही हूँ, पहले देखे सिनेमा को फिर से देख रही हूँ. और मुझे कुछ नया ही दिख रहा है, कुछ नया समझ पा रही हूँ. शायद कुछ बरस बाद कुछ और पढ़ सकूं उसी रचना में. यह लेखक की नहीं पाठक की यात्रा की बाबत है.

साहित्यिक गतिविधियों की जोर आजमाइश से बहुत दूर पाठक को अपनी यात्रा खुद तय करनी होती है. लिखे हुए को उलट-पुलट कर देखते हुए अपने सम को समाज और लेखक के सम से मिलाते हुए. या मिलते हुए देखते हुए. मैं गोता लगाते हुए पढ़ती हूँ, इस प्रकिया में कई बार डूब भी जाती हूँ, गुड्प की कोई आवाज नहीं आती. लेकिन हर रचना डुबो ही देगी यह जरूरी नहीं. कुछ रचनाएँ मैंने रचनाओं की दहलीज पर बैठकर ही पढ़ लीं, वो अच्छी रचनाएँ थीं, कुछ रचनाओं को उनमें पाँव डालकर बैठे हुए पढ़ा. उन्हें पढ़ने का सुख हुआ. उन्हें पढ़ते हुए कई बार ठंडी हवाओं ने माथा सहलाया. कुछ रचनाएं इतनी निर्मम थीं कि उन्होंने बुक शेल्फ में सज जाना तो मंजूर किया लेकिन हाथ लगाने की मनाही कर दी, इस उद्घोषणा के साथ कि 'तुम अभी योग्यता ग्रहण करो'. उनके कुछ पन्नों तक जाकर लौट आना पड़ा हर बार. कुछ रचनाएँ विनम्र थीं, खुद आयीं पास, हाथ थामा और किलकते हुए खींचकर ले गयीं ठीक बीच धार में...फिर जब उस धार में धंसे रहने का सुख आने लगा उन्होंने हमें छोड़ दिया...

एक पाठक के तौर पर इन सब अनुभवों से गुजरना खूब हुआ. ऐसे ही बीच धार में छूटे हुए लम्हों में खुद के बारे में सोचते हुए महसूस हुआ कि मुझे इन दिनों कहानियों में रुचि कम होने लगी है. या यूँ कहूँ कि उन कहानियों में जिनमें यथार्थ का खुरदुरापन कम हो और लेखकीय कौशल ज्यादा. यूँ मुझे हमेशा से डायरियां पढ़ना ज्यादा पसंद रहा. डायरी पढ़ते हुए यात्राओं को पढ़ना अच्छा लगने लगा. फिर संस्मरण और कवितायें. उपन्यास, कहानियां पढ़ना जाने क्यों कम होता जा रहा है.

कहानियों का जो कहानीपन है मुझे कम रुचता है. सोचे हुए कथ्य के साथ लेखकीय कारस्तानियों को जानने से ज्यादा रुचि मुझे लेखक की सहज अभिव्यक्ति में है. शायद इसीलिए ऐसे तमाम लेखक हैं जिनकी डायरियों को, यात्रा वृत्तों को पढ़ने में खूब मजाआया लेकिन उनकी कहानियों से रिश्ता बना नहीं. 

हालाँकि कल एक और खेप आई है किताबों की, जिनमें कुछ उपन्यास भी हैं और कहानियां भी.

Tuesday, June 23, 2020

नींद तुम ख्वाब मैं


भरे-भरे बादल कबसे टंगे हुए हैं...ये किसके इंतजार में हैं. बरसते क्यों नहीं. जाने कहाँ चला गया है चिड़ियों का झुण्ड कि चुपचाप झरती पत्तियों की आवाजों को फिर से गाड़ियों के शोर ने ढांक दिया है. फल सारे उतर चुके हैं पेड़ों से शाखें खाली हैं, उदास हैं. यह ठहरे हुए लम्हे सहन नहीं हो रहे. मैंने फूलों की डाल को जोर से हिलाया कि कुछ हरकत तो है, कि यह स्टिल दृश्य नहीं है.

फूलों से भरी डाल इतनी जोर से हिलाए जाने बाद भी एक भी फूल नहीं छोडती धरती पर गिरने के लिए. ऐसा कैसे हो सकता है. लेकिन यह हो रहा है. कल रात मेरी नींद में जो ख्वाब चला आया था वो मेरा ख्वाब नहीं था तो वो मेरी नींद में क्यों था. उसमें मैं क्यों थी. अगर उसमें मैं थी तो मेरी बात सुनी क्यों नहीं गयी. बहुत अजीब है ये सब. मैं ऐसे तमाम सपनों को तोड़ दूँगी जिसमें मुझे जबरन रख दिया गया होगा और जिनमें मेरी आवाज की कोई आवाज नहीं होगी.

मैं नींद से उठकर पूरे घर का चक्कर लगाती हूँ ताकि उस उस ख्वाब को पटखनी दे दूं. उस ख्वाब को तो मैंने तोड़ दिया जो मेरा नहीं था लेकिन मेरी नींद में पैबस्त कर दिया गया था लेकिन इस सुबह का मैं क्या करूँ?

सोचती हूँ उसकी नींद का ख्वाब बन जाऊं...उसे वैसे ही दिक् करूँ जैसे वो मुझे करता रहा है...ख्वाब का यह ख्याल भी कितना सुंदर है.

डाल पर मुस्कुराते हुए फूलों को देखती हूँ, यूँ किसी के कहने पर डाल से न झरना, झरना तब जब तुम्हारा मन हो,..ये आंधियों को मुंह चिढाने की प्रैक्टिस है. मैं भरे हुए बादलों को देख रही हूँ, वो मुझसे कह रहे हैं,' तुम खुद बरस क्यों नहीं जातीं? मैं कहती हूँ ऑफिस को देर हो रही है...

Monday, June 22, 2020

रिहा होना जरूरी है...

तस्वीर-गोवा के एक गाँव की 

मेरे भीतर जो शब्द भर गये थे, उन्हें उलीच रही हूँ कुछ दिन से. अब जब काफी शब्दों को उलीच के बाहर फेंक चुकी हूँ तो देख रही हूँ उन शब्दों ने 'बहुत कुछ' को ढंक रखा था. वो बहुत कुछ जो जाने कहाँ से आ गया होगा. उस बहुत कुछ में निराशा का हिस्सा ज्यादा है. निराशा जो उम्मीद से जन्म लेती है. निराशा जो ज्यादा होते जाने पर दुःख बन जाती है.

फिर मैंने बचे हुए शब्दों को भी निकाल फेंकना चाहा, मैं उस 'बहुत कुछ' के करीब जाना चाहती थी जो मुझमें है और मुझे लग रहा था वो नहीं है. यह तो बेईमानी हुई न. मेरे ही भीतर  'यह बहुत' कुछ चिपक कर रह रहा है और मुझे ही पता नहीं. लेकिन जब बचे हुए शब्दों को मैंने खींचकर अलग करना चाहा तो मुझे बहुत दर्द हुआ. चीख निकल गयी. ये शब्द मेरी आत्मा से चिपक गये थे. इन शब्दों में जैसे मेरा खून बहने लगा है. इन्हें अलग करना लहूलुहान होने के सिवा कुछ नहीं. फिर मैंने इन कुछ शब्दों को छोड़ दिया. यह मान लिया कि ये शब्द अब जड पकड़ चुके हैं.

मैंने उस 'बहुत कुछ' को निकालकर बाहर मेज पर लाकर पटक देना चाहा, लेकिन वह 'बहुत कुछ' मुस्कुरा दिया. वह बहुत कुछ मेरी कामनाओं, इच्छाओं से बना था. वो जो छोटे-छोटे दुःख थे असल में वो बड़े दुखों को ढंके हुए थे, वो जो छोटे-छोटे से सामान्य शब्द हैं वह बहुत बड़े दुःख के तिलिस्म को संदूक में बंद करके ताला लगाने की कोशिश हैं. लेकिन क्यों बड़े दुःख को संदूक में बंद करना, क्यों रिहा नहीं करना.

शायद इसलिए कि रिहा करने से पहले रिहा होना जरूरी होता है. यह जो ढेर सारे चमकीले शब्दों के नीचे तलहटी में धंसा हुआ है 'बहुत कुछ' होकर वो रिहा नहीं होने देता कुछ.अचानक छुपाकर रखा हुआ दुःख तलहटी पर उतर आया. तैरने लगा. मुझे बहुत घबराहट हुई. मैंने अपने भीतर से उलीच कर बाहर फेंके हुए शब्दों को फिर से अंदर भर लिया. कुछ नए चमकदार शब्दों को भी भर लिया.अब कुछ ठीक लग रहा है...लेकिन यह 'कुछ ठीक लग रहा है' असल में धोखा है. क्योंकि अब मैंने अपने भीतर के उस बहुत कुछ को देख लिया है अब शब्दों के जादू से उसे ढंक नहीं पाऊंगी.

सोच रही हूँ एक दिन मैं बिना शब्दों के काम चलाना सीख जाऊंगी. सिर्फ मुस्कुराकर या पलकें झपकाकर या सिर्फ उन शब्दों से जो मुझमें अब सांस लेने हैं. और तब यह बहुत कुछ मेरे भीतर नहीं रहेगा, दुःख भी नहीं रहेगा...फिर मैं उस खाली जगह का क्या करूंगी...

मैं अपनी काफ्काई हरारत से निकलकर चाय का पानी चढाते हुए सोच रही हूँ...बेवजह की चीज़ों की तरह बेवजह के शब्द भी खूब जमा कर लिए हैं हमने. करतब दिखाने वाले शब्दों से मुझे चिढ है. चाय की भाप के साथ अदरक इलायची की खुशबू भी मेरे चेहरे पर जमा हो रही है...सबसे सच्चा शब्द कौन सा है जीवन का...

Sunday, June 21, 2020

छूटी हुई चीजों की जड़ें निकल आती हैं...


और इस तरह मैंने जड़ें फूटने की आस में कुछ पन्ने छोड़ दिए पढ़ने से...क्योंकि सुना है छूटी हुई चीज़ों की जड़ें निकल आती हैं. अब तक पढ़े हुए को बार-बार पढने की इच्छा को मुठ्ठियों में जोर से भींचकर कल सारा दिन नीम हरारत में गुजारना अच्छा था. जड़ें फूटने की आस के बीज को बाहर रख दिया. बारिश में. अंकुर फूटेंगे यह सोचकर.

सब कुछ होना बचा रहेगा...को किसी मन्त्र की तरह बुदबुदाते हुए पहली बार विनोद कुमार शुक्ल जी से हुई छोटी सी बात को बार-बार याद करती रही.

अदरक नहीं थी घर में, मुझे बिना अदरक वाली चाय पसंद नहीं फिर भी कल मैंने दिन में कई बार चाय पी. और चाय मुझे बुरी नहीं लगी. फिर मैंने अकीरा कुरोसावा का सिनेमा देखा, मंगलेश डबराल जी की फेसबुक वॉल पर कुछ दिन पहले कविता और सिनेमा की बात देखी थी. पढ़ी नहीं थी, सिर्फ देखी थी. उस देखी हुई बात को कल ढूंढ निकाला. पढने के लिए नहीं, ठीक से देखने के लिए. कभी-कभी मुझे लगता है पढने को देखने जैसा होना चाहिए, जीने जैसा होना चाहिए. और देखने को छू लेने जैसा होना चाहिए. लिखने को फूलों के खिलने जैसा या फफक कर रो लेने जैसा होना चाहिए.

मैंने कुरोसावा को शायद बचाकर रखा था देह के ताप को मन की ठंडक से बदल लेने के लिए. कम्बल में दुबक कर VILLAGE OF WATERMILLS देखी.
https://vimeo.com/31359086?fbclid=IwAR34A2lNdXvkVrou6iH4AJGvq1yRpSfwCeEAenYLQndGh6xObGsm-ufXPwY

'विलेज ऑफ वाटरमिल्स' देखते हुए तीव्र इच्छा हुई मर जाने की. मैंने सोचा कि काश जब मैं मरुँ तब उत्सव हो. सब लोग खूब डांस कर रहे हों, अपनी पसंद का खा रहे हों, अच्छे कपडे चुन रहे हों उत्सव के लिए, फूल हों ढेर सारे और मुझे झरनों के आसपास कहीं देह से मुक्त किया जाय. जहाँ से बच्चों का गुजरना होता हो, मैं हमेशा फूलों, बच्चों की खिलखिलाहटों और झरनों की आवाजों के बीच सांस लेती रहूँ...वाह मरने के बाद भी सांस लेते रहने का ख्याल. कितना लालच है जीने का जो मृत्यु के बाद भी मुक्त नहीं हो रहा. फूलों से घिरे लकड़ी के उस पुल पर बैठकर झरनों की आवाजें सुनने की इच्छा के बीच क्रोएशिया जाने का सपना जाने कहाँ से आ गया. खुद को छूकर देखा तो हरारत मुस्कुराने लगी थी. ये हरारत जानी-पहचानी है. ये मन की दशा के संग चलती है. 

फिर संज्ञा  ने फ़ोन पर कहा, सो जाओ...उसे कैसे पता चला कि मुझे सोना है...फिर मैं सो गयी. लेकिन मैंने नींद में अपने भीतर एक हुडक एक हूक महसूस की. क्या ये नई जड़ों के फूटने की हूक थी? मैं हर नये दिन के प्रति जिज्ञासा से भरी हुई होती हूँ. कि दिन उगेगा, उसकी मुठ्ठी खुलेगी और उसमें होगा कुछ ऐसा जो एकदम नया होगा...वो क्या होगा पता नहीं. हो सकता है पुरानी किसी छूटी चीज में जड़ें फूट आयें और कल्ले फूटने लगें...

आज बारिश नहीं हो रही है...सोचती हूँ पास रखी किताब को उठा लूं तो शायद बारिश भी आ जाये...लेकिन नहीं उठाती. खुला हुआ आसमान धुला हुआ आसमान लग रहा है...



Saturday, June 20, 2020

सब कुछ होना बचा रहेगा


यह कैसा अनुभव है, कैसी सिहरन है ये, कैसी बेचैनी है. यह एकदम जाने पहचानी नहीं. कल की सुबह जिस सुख के एहसास से भरी हुई थी वो सुख शाम तक गुम होने लगा. उस सुख में सेंध लगाकर जाने कहाँ से एक उदासी भी आ गयी. कल दोपहर के बाद यह उदासी सुबह के सुख में शामिल हुई थी. जब बारिश की तेज़ झड़ी के बीच मैंने ऑफिस के कॉरिडोर में 'बहुत दूर कितना दूर होता है' के ढेर सारे पन्ने पढ़े...मैं रुकना चाहती थी...रुक जाना चाहती थी, रुकी ही रहना चाहती थी लेकिन रुक नहीं पा रही थी. पहली बार मुझे अपनी तेज पढ़ने की आदत पर गुस्सा आया. क्यों मैं धीरे नहीं पढ़ सकती, क्यों मैं एक पन्ने पर दिन भर अटकी नहीं रह सकती. हालाँकि पढ़ चुकने के बाद तो अटकी ही हुई हूँ...

मैंने इस बेचैनी के बारे में लिखने की सोची कि पेज 136-137 पर लिखी लाइनों पर गयीं- 'कैसे यह यात्रा इतनी जल्दी अपने अंत पर है...इसके बाद फिर वापस एक असीम रिक्तता. शायद पहले से ज्यादा ही. कितना याद रहेगा इन पन्नों से गुजरते हुए उन अंधेरी रातों में जंग-हे के साथ चलना, बेनुआ की हंसी, कैथरीन की आँखें. खुद से देर तक बोलने की तड़प में बातें करना. कैफे के वेटर्स...यहाँ वहां की मुस्कुराहटें, लम्बी वॉक, सुस्त दोपहरें, कॉफियां और वह सब जिनके नाम धुंधले होते जा रहे हैं. और जिनका नाम मैं लेना नहीं चाहता. सारा कुछ. दो और दिन हैं मेरे पास...इन दो दिनों में जीने की इच्छा है अपनी ही यात्रा वापिस पढने की. शुरू से पूरा का पूरा वापिस जीने की. पर अभी नहीं, अभी कुछ और बचा है...'

यही एकदम यही तो चल रहा था मेरे मन में लेखक ने यह भी लिख दिया है. मुझे गुस्सा भी आया हंसी भी...लेकिन ज्यादा रोना आया. तभी बारिश की रफ्तार बढ़ गयी.

जब इस किताब को पढना शुरू किया था कितना उत्साह था. कितना सुख था हर पन्ने से गुजरने का. किताब का ज्यादा हिस्सा मैंने बारिश की आवाजों के बीच पढ़ा है. यह इत्तिफाक है कि यह किताब भीगते हुए ही घर पहुंची थी मानो अपने हिस्से की बारिशें लेकर आई हो और अब जबकि यह मुझे मेरे हिस्से की बारिशों के हवाले करके जाने वाली है, खत्म होने वाली है एक गहरी उदासी तारी हो गयी है. उदासी मेरी देह पर रेंग रही है. तो अब मैं क्या करूंगी...अब मेरी सुबहों में कौन होगा, कौन बीच दोपहर में कॉफ़ी पीने की इच्छा को आदेश में परिवर्तित करके सीधे रसोई में खड़ा कर देगा.

वापस फिर उस अंधी सुरंग में जाने का एकदम मन नहीं जहाँ सब व्यवस्थित और तयशुदा है, इस व्यवस्थित और तयशुदा होने में कितनी ऊब है, कितना विचलन. इन दिनों फैला हुआ घर बुरा नहीं लग रहा, बिखरा हुआ जीवन सुंदर लग रहा है...खुद को बेतरतीब शामों के हवाले करने में आनन्द आने लगा है. घर में टहलती चिड़िया से गप्पें लगाना रुचिकर लग रहा है. देहरादून की सड़कों पर भीगते हुए बारिश को महसूस करते हुए फ़्रांस की गलियों में भटकने का सुख लेने लगी हूँ...जैसे कोई जादू घट रहा हो.

लेकिन अब यह यात्रा समाप्ति की ओर है और मन घबराहट से घिर गया है. पढूं या न पढूं की बेचैनी के बीच Martine आ चुकी है. वही Martine जो 2012 में उत्तराखंड में मिली थी. सात बरसों के फासले में कितना कुछ बदल गया है. 'सेपरेट' होना सिर्फ एक शब्द नहीं है. एक जर्नी है...जिसकी एक-एक लकीर आपके चेहरे पर दर्ज होती है. दर्द आपकी मुस्कुराहटों में घुल जाता है.

'जब इस उम्र में आकर अचानक आप अकेले हो जाते हैं तो बहुत अजीब लगता है. पहले मुझे लगा था कि आज़ादी मिली है. लेकिन जल्दी ही मुझे लगने लगा कि इस आज़ादी का करना क्या है? मैं बहुत मेहनत करती हूँ खुश रहने के लिये. ख़ुशी आ जाती है पर ये आज़ादी असल में सिगरेट की तरह है...आप हमेशा से पीना चाहते थे पर जब आपके पास सिगरेट आई तो माचिस की सारी तीलियाँ खत्म हो चुकी थीं. ये आज़ादी इस वक़्त बिना माचिस की सिगरेट की तरह है...'

आज़ादी का बोझ...जो लेखक Martine के कंधे पर देख रहा है उसे मैं अपने कंधे पर महसूस कर रही हूँ. मैं Martine के गले लगकर खूब सारा रोना चाहती हूँ. मैं उसे बहुत प्यार करना चाहती हूँ, उसकी दोनों बेटियों के लिए अपने हाथों से कुछ पकाना चाहती हूँ अचानक मेरे भीतर से रुलाई का भभका फूट पड़ता है और हमेशा की तरह अचानक बिना जगह और आसपास का माहौल देखे फूटते इन रुलाई के भभकों को वाशरूम में पनाह मिली. तबियत बिगडती सी मालूम हुई तो घर जल्दी आना पड़ा.

देर तक लेटे हुए उदासी गाढ़ी होने लगी. किताब सिरहाने रखी रही...बार-बार उसके बचे हुए थोड़े से पन्नों को देखती और उदासी बढ़ जाती. क्या यह एक किताब के खत्म होने की उदासी है या कुछ और है. किताब के बहाने शायद मैं खुद की किसी यात्रा में चल पड़ी थी...और अब जबकि लेखक की यात्रा खत्म होने को है मेरे सामने कोई रास्ता नहीं वापस अपनी उसी सामान्य सी दुनिया में लौट आने के. मैं लौटना नहीं चाहती, मैं चाहती हूँ कैथरीन से बातें करना, जंग-हे के साथ घूमना...लेकिन नहीं यह चाहना बुरा रोग है. लेखक इन यात्राओं में आसक्तियों से बचना भी तो सिखा रहा है...कैथरीन की मिलने की इच्छा को यह कहकर टालना कि 'अभी तो मैं गिलहरियों के खेल को देखने में व्यस्त हूँ, अभी मैं कैसे आऊँ? ' इसमें एक सन्देश है. लेकिन वह सन्देश सुनने का मन नहीं.

ली-वान आकर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी है. ली-वान चाइना से है. ली-वान से मैंने कहा,' मैं तुमसे कल मिलूंगी. अभी मुझे Martine के साथ रहना है. मैं स्मृतियों के चेहरे आपस में मिलाना नहीं चाहती.

Martine के चेहरे पर जिए जा चुके जीवन की थकन तो है लेकिन आने वाले जीवन का उत्साह नहीं है. मुझे उसके चेहरे में मेरा चेहरा उगता नजर आता है....शायद Martine भी इस वक़्त रो रही होगी...शायद कैथरीन भी...शायद ली-वान भी. शायद लेखक भी.नहीं लेखक निर्विकार है तमाम दुखों से, मोह से तभी वो लेखक है...

मैंने जानबूझकर कुछ पन्ने बचाए हैं. लेकिन यह दुःख मुझे निगल रहा है कि मैं इन पन्नों को कब तक बचाए रहूंगी...उसके बाद क्या होगा...मुझे अचानक सलीम और जीवन की याद आने लगी है और मेरा मन कर रहा है कि जीवन से बंटी की शिकायत कर दूं फिर सलीम के साथ बैठकर देखूं बंटी की चेहरे की उड़ती हुई हवाइयां.

यह शरारत भरा ख्याल मेरे भीतर की टीस को कम नहीं कर पा रहा...बारिश तेज होती जा रही. 

दोस्त ने कहा, 'फ़िक्र न करो सब कुछ होना बचा रहेगा' और मैंने दोहराया,'हाँ सब कुछ होना बचा रहेगा.' 

Friday, June 19, 2020

मुक्कमल होना भी क्या होता है

photo- from google

'कुछ तार कभी टूटते नहीं हैं. कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें. उन्हें लाख आश्वासन भी क्यों न दें कि अभी तोड़ रहे हैं, पर बाद में गाँठ बांधकर फिर से जोड़ सकते हैं, पर वह मानते नहीं हैं. सारे तनाव, खिंचाव के साथ वह भीतर कहीं बहुत महीन त्रासदी के साथ जुड़े रहते हैं.'
- (बहुत दूर कितना दूर होता है से)

133-134 पेज पर जैसे अटक गयी हूँ. खूब-खूब रोना आ रहा है. इस रोने में दुःख नहीं है. स्मृतियाँ हैं जो अब दुःख से खाली हो चुकी हैं. इस रोने में वो लम्हे हैं जो मुकम्मल हो सकते थे लेकिन हुए नहीं...यूँ मुक्कमल होना भी क्या होता है सिवाय भ्रम के.

ऐसा लग रहा है जंग हे से मैं ही बिछड़ रही हूँ. जितना समझा है जीवन को बिछड़ना सबसे त्रासद शब्द है दुनिया का. भले ही इसमें फिर मिलने की क्षीण संभावना छुपी ही क्यों न हो फिर भी इसकी त्रासदी कम नहीं होती.

'मैंने कहा मैं चला जाऊँगा....लेकिन उसका यह कहना कि छोड़ने आती हूँ, बस स्टैंड के बाहर एक आखिरी कॉफ़ी साथ पी लेंगे.'

यह लालसा ही तो जीवन को कमजोर बनाती है, मोह में बांधती है. मोह में न बंधना शायद कुछ हद तक आसान होता हो लेकिन अगर कभी एक लम्हे को भी आप किसी से मोह में बंधे हैं फिर उस गाँठ को खोलना बहुत मुश्किल होता है.

मुझे विदा के तमाम पल याद आ गये, तुम्हारा तेज क़दमों से लौटना, पलटकर कभी न देखना. जैसे कुछ था जिससे हाथ छुड़ाकर जा रहे हो, हाँ वह मोह ही था शायद. या तुम उदासी बटोरकर जा रहे होते थे. या कोई हडबडी तुम्हें खींच रही होती थी. तुम्हारे जाने के बाद कई बार देर तक नहीं चली ट्रेन या लेट होती गयी फ्लाईट और वो वक्त जबकि हम कुछ और वक्त साथ बिता सकते थे यह सोचने में गया कि तुम्हें क्यों यह हड़बड़ी थी लौटने की. यह हड़बड़ी क्या कभी आने की भी थी?

अब सोचती हूँ तो हंसी आती है. आना होता क्या है, जाना क्या होता है आखिर. यह समझना ही जीवन है. जो आता है वो वापस नहीं लौटता कभी, लौटता कोई और है. और जो आया होता है वो जिन्दगी में अपनी पर्याप्त जगह घेर लेता है. वो जो देर तक हिलती रही थी टहनी तुम्हारे जाने के बाद मेरे साथ तुम्हारी पीठ देखते हुए उसने मुझसे क्यों नहीं कहा, कि ये ते कदम, ये उजली कमीज वाली पीठ उदास देह है, सुखी मन तुम्हारे पास ही छूट गया है इसका.

असल में जाना तभी हो जाता है जब हम जाने के बारे में सोच लेते हैं, उसके बाद जबरन रोके गए लम्हे साथ नहीं होते विदा की यातना होते हैं. हम उन लम्हों में साथ को नहीं विदा की यातना को याद करते रहते हैं और इस तरह उन बिना घटे यातना के लम्हों को कल्पना में इतना जी लेते हैं कि साथ की कोमल पंखुडियां उदास होने लगती हैं.

जंग हे को याद कर रही हूँ. जैसे वो इतने दिनों से मेरे साथ थीं, खाने पर, कंसर्ट में, सड़कों पर, कॉफ़ी, वाइन सब में साथ. कहना चाहती हूँ मत जाओ जंग हे लेकिन वो तो जा ही नहीं रही. जा तो कोई और रहा है और बिछड़ मैं रही हूँ. अजीब बात है न.

मैंने जंग हे को देखा नहीं है लेकिन ऐसा लगता है मैंने देखा है उन्हें, उनकी कोमल सफेद और मुलायम हथेलियों को हाथों में लिया है. ठीक इस वक्त मुझे निर्मल वर्मा की उन हथेलियों की याद हो आई जिन हथेलियों में एक रोज मेरी नन्ही हथेलियाँ थीं. यह कोरों से टपकता सुख आज बाहर की बारिश से ज्यादा मीठा हो गया है...

Thursday, June 18, 2020

अच्छा लगना कितना अच्छा होता है


मैंने उसे कहा कि मैं एक किताब पढ़ रही हूँ इन दिनों, 'बहुत दूर कितनी दूर होता है' बहुत अच्छा लग रहा है. उदासियों की चादर ओढ़े डूबी सी आवाज में उसने धीमे से कहा, 'अच्छा लगना कितना अच्छा होता है'. जाने क्यों मुझे सुनाई दिया 'अच्छा लगना कैसा होता है'. मैं उसे बताना चाहती हूँ कि अच्छा लगना बहुत अच्छा होता है. कभी-कभी वो हमसे खो जाता है. कभी-कभी ज्यादा दिन के लिए भी खो जाता है लेकिन असल में वो इतना अच्छा होता है कि हम उसे ढूंढ लेते हैं. और अगर कभी हम ढूंढ नहीं पाते तो वो हमें ढूंढ लेता है. बस हमें ध्यान इतना ही रखना होता है कि खेल से बाहर नहीं होना है. खेल में बना रहना जरूरी है. जीवन के खेल में.

मैं उसे बताना चाहती हूँ, खोया हुआ अच्छा लगना जब वापस मिलता है तो वह पहले से भी ज्यादा चमकदार होता है, ज्यादा निखरा हुआ.

लेकिन उदासी की चादर ओढ़ के सोये व्यक्ति से ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहिए, बस उसके सर के बालों को सहला देना भर काफी होता है, या जलते हुए तलवों पर ओस के कुछ फाहे रख देना या उसकी जागी आँखों पर स्नेहिल चुम्बन रख देना. इतना ही. बहुत हुआ तो कभी-कभार आलिंगन भी. लेकिन बिना किसी किस्म की जताहट के. ये बहुत छोटी सी लगने वाली चीज़ें अक्सर रह जाती हैं.

और जताहट वो काबिज हो जाती है. मैं तुम्हारी केयर करता हूँ या करती हूँ यह जताने की बात होती ही नहीं. केयर तो एहसास में घुली होती है न. लेकिन मेरे कंधे तो छिले हुए हैं एक समय में जताहटों के बोझ से. लेकिन जिन स्पर्शों ने जिन संवादों ने मुझे सहेजा वो बहुत नार्मल थे. यह नॉर्मल होना इतना मिसिंग क्यों हो जाता है. जबकि नार्मल होने की बात सब कहते हैं, कोशिश करते हैं लोग नार्मल होने की. मुझे हंसी आती है, अरे वो नार्मल होना है, वो कोशिश करने से नहीं आता है, वो कोशिश करना छोड़ देने से आता है. लेट इट बी नार्मल.

एक बार रंगमंच से जुड़े एक दोस्त से बात करते हुए मैंने कहा था, 'अजीब बात है न जीवन में वो लोग सफल होते हैं जो अच्छा अभिनय कर लेते हैं. और रंगमच में वो ऐसा अभिनय करें कि लगे ही न कि वो अभिनय है.' हम दोनों देर तक हँसे थे इस बात पर.

मैं इन दिनों जिस किताब में धंसी हुई हूँ वहां से निकलना नहीं चाहती. और उसे पढ़ते जाने का मोह भी नहीं छूट रहा. अजीब कशमकश है. कल दिन में ऑफिस में जब लंचटाइम में कानों बारिश पहनकर मैंने उस किताब को खोला तो उसके एक पन्ने पर कुछ पीला निशान दिखा. यह हल्दी का निशान था. मुझे इतनी जोर से हंसी आई कि आसपास के लोग मुझे देखने लगे और मैंने खुद को संयत किया. मुझे जो हंसी आई उसमें एक सुख था. सुख कि फिर से किताबें हर वक़्त साथ रहने लगी हैं. ये सुख मुझसे खो गया था. कॉलेज के जमाने में यह सुख मेरे जीवन का हिस्सा था. हर वक़्त साथ रहने से किताबों पर हमारे जिए जा रहे लम्हों के निशान भी दर्ज होते रहते हैं हमारी उन आँखों के साथ जो उसमें हर वक़्त धंसी रहती हैं. इस किताब पर हल्दी के निशान उस वक़्त आये होंगे जब मैंने इसे किचन में एक हाथ में पकड़े हुए सब्जी बनाते हुए पढ़ा होगा.

लेखक की पी गयी कॉफी और पाठक के द्वारा छौंकी गयी भिन्डी की सब्जी का स्वाद और निशान हमेशा के लिए उन पन्नों में दर्ज हो चुके हैं. मेरी तमाम किताबों में ऐसे निशान मिलेंगे. तरतीब से पढना नहीं आता. मेरी किताबें मैं किसी को नहीं देती क्योंकि उन किताबों में एक खुशबू दर्ज होती है, पढ़े जाने की पूरी यात्रा. बिलकुल, पाठक की भी एक यात्रा होती है.

बहरहाल, यह किताब खत्म न हो इसलिए मैं इसके पढ़े जा चुके पन्नों में से कुछ हिस्सों को पहले देर तक चुभलाती हूँ फिर उसमें कुछ नए बिना पढ़े गये पन्नों का स्वाद मिला लेती हूँ. लेकिन मैं ज्यादा दिन तक ऐसा नहीं कर सकूंगी. फिर मैं क्या करूंगी? क्या नयी किताब मुझे यह सुख यह सुकून देगी. इस बारे में अभी सोचना नहीं चाहती. लेकिन इतना जरूर है कि इस किताब ने एक बार फिर मेरे पढने के सिलसिले को शुरू किया है. मानव को पढकर पहले भी कई बार ऐसे रुके हुए सिलसिले चल पड़े हैं लेकिन वो ब्लौग का जमाना था जब मैं घोर उलझनों में 'मौन में बात' की कुछ बार बार पढ़ी पोस्ट को फिर से पढ़ने लगती थी. असल में इस पढ़े में खुद को पढने सरीखा एहसास होता है. यही बात लेखक और पाठक के बीच के रिश्ता कायम करती है.

'यहाँ से दस मिनट की दूरी पर एक ब्रिज है जिससे चलकर तुम जर्मनी से फ़्रांस जा सकते हो. Basel बार्डर है.' जंग हे लेखक को बता रही हैं और मैं उस पुल पर खुद को खड़ा पाती हूँ. मेरा दिल चाह रहा है मैं उस पुल पर ही खड़ी रही हूँ. और जर्मनी और और फ़्रांस दोनों को उलझन में डाले रहूँ कि मैं किधर जाने वाली हूँ. हा हा हा...कितना अच्छा है ऐसे सोचना. जंग हे ..को तो पता भी नहीं होगा कि एक लेखक के साथ यात्रा करते हुए वो कितने सारे पाठकों की दोस्त बन चुकी हैं. वो मुझे बहुत सुलझी हुई लगती हैं. उनके पास से शेक्सपियर की याद सी आती हुई मालूम होती है. शायद इसलिए कि मैंने शेक्सपियर के जन्म का वह ठीहा देखा है और मैं जंग हे से वहीं कहीं मिलना चाहती हूँ. लेकिन फिर उस पुल का क्या होगा जो फ़्रांस और जर्मनी के बीच है दोनों देशों को जोड़ता हुआ.

हम सबको ऐसे पुलों की जरूरत है. जिन पर खड़े होकर आश्वस्त हुआ जा सके कि बस दो कदम चलकर पहुंचा जा सकता है अपने मनचाहे गन्तव्य तक. इस तरह सोचना सुख देता है...हालाँकि हमने दिलों की दूरियां मिटाने वाले पुलों को खूब तहस-नहस किया है, दुनिया की दूरियां मिटाने वाले पुलों को भी. सरहदें कितनी उदास होती होंगी अपने सीने पर जवां खून के छींटे सहेजते हुए इस पार भी उस पार भी.

कोई क्यों नहीं समझता कि घर में आई छोटी चिड़िया से बात करना वैसा ही है जैसे किसी भी देश के व्यक्ति को प्रेम करना. भले ही हम उसकी भाषा न जानते हों, उसका नाम भी ठीक से उच्चारित न कर पाते हों. उदासी की चादर ओढ़े दोस्त से कहना चाहती हूँ, 'हाँ अच्छा लगना बहुत अच्छा होता है.' खिड़की खोलो जरा, वो वहीं बाहर खड़ा नजर आयेगा...

Wednesday, June 17, 2020

पहली बार हथेलियों में खिलना तुम्हारा चेहरा


हर साल 17 जून हाथ पकडकर मुझे ढेर सारी स्मृतियों में लेकर जाता है. नन्ही उम्र की एक छोटे भाई की हसरत जो पूरी हुई थी इस रोज. पहली बार जब अस्पताल में मेरे नन्हे हाथों ने तुम्हें उठाया था. पहली बार हथेलियों में तुम्हारा चेहरा खिला था. 

कामकाजी माँ की व्यस्तताओं ने हमें एक-दूसरे के और करीब किया. लड़ने-झगड़ने, प्यार करने, शैतानियाँ करने और मम्मी से एक-दुसरे की शिकायतें करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हमने. फैंसी ड्रेस में पार्टिसिपेट करने को तुम्हें तैयार करना हो या स्कूल से साइकिल पर बिठाकर घर लाना जिन्दगी कितनी मजेदार थी. गर्मी की छुट्टियाँ एक कमरे वाले बिना कूलर वाले घर में बाज़ार खेलते हुए बिताते हुए कभी कोई कमी तो महसूस नहीं हुई. घर में पहले फ्रिज, पहले टेपरिकॉर्डर, पहले टीवी, कूलर आने की ख़ुशी हमने मिलकर सेलिब्रेट की.हमने पापा के लेम्ब्रेटा पर सपरिवार घुमाई की.

तुम हमेशा से मेरे फेवरेट हो. आज जब तुम परेशानियों में मजबूत छाया की तरह खड़े होते हो न तो बहुत सुख होता है. तुम्हारा जन्मदिन मेरे लिए तमाम त्योहारों से बहुत बड़ा है. तुम्हारा होना मुझे इत्मिनान से भरता है. भाइयों को ऐसा ही होना चाहिए.अपने होने से मुक्त रखते हुए अपने होने की ताकत से भरने वाला और अपने कदमों पर भरोसा बना सकने लायक बनने को प्रेरित करने वाला.

जन्मदिन खूब मुबारक हो भाई! सच्ची में तुमको हमारी उमर लग जाए टाइप फीलिंग आ रही है. मालूम है तुम सोशल मीडिया पर नहीं हो, जो होते तो नाराज ही होते यह सब पढकर. पर यह तो मैंने अपने लिए लिखा है न?

खुश रहो हमेशा !

उदास दिनों में सफ़ेद पहाड़ों की बात


पूरे दस घंटे सोकर उठी हूँ. थोड़ा सुकून थोड़ा आलस भरा है शरीर में. रात भर बारिश हुई और बारिश की थपकियों के बीच कम्बल ओढ़कर सोना अलग ही सुख देता है. मुझे यह सुख चाहिए. यह मेरे ही हिस्से के सुख हैं. पहले इन छोटे-छोटे सुखों के बारे में पता नहीं था, बाद में जब पता चला तो ये सुख मुझसे खो गये. अब मुश्किल से मिले हैं तो मैं इन्हें जोर से पकड़े रहना चाहती हूँ.

जो किताब पढ़ रही हूँ न 'बहुत दूर कितना दूर होता है' वह मुझे दूसरी दुनिया में घुमाते हुए हर रोज मेरी ही दुनिया की दहलीज पर लाकर छोड़ रही है. मैं धीरे-धीरे पढ़ रही हूँ. जैसे स्वादिष्ट खाना देर तक चुभला-चुभला कर आराम से खाते हैं न वैसे ही. उस खाने के सुख में उसके खत्म हो जाने या पेट भर जाने का भय भी शामिल होता है. ऐसी किताबों को पढ़ते हुए पेट तो नहीं भरता वैसे और ये खत्म भी नहीं होतीं. ऐसी किताबों की बात करते हुए मुझे धुंध में उठती धुन, चीड़ों पर चांदनी, वॉन गॉग के खत, रिल्के खत याद आते हैं. ये कभी खत्म नहीं हुए. इन्हें कभी भी उठा लो, कोई भी पन्ना जो पहले भी बीसों बार पढ़ा जा चुका है फिर से पढना शुरू किया जा सकता है. पहले पढ़ा जा चुका इस नए पढने से अलग होता है इसलिए नए सिरे से पढने पर कुछ अलग सा ही महसूस होता है.  फिर भी इन्हीं ठहर के पढना सुखकर होता है.

एक रोज जब मैंने पहाड़ की बारिशों के बारे लिखकर पूर्णविराम लगाया और चाय बनाने उठी तो ऐसा लगा बारिशों की खुशबू घुली है पूरे घर में. फिर चाय पीते हुए 'जब बहुत दूर कितना दूर होता है' को बुकमार्क लगाकर रखी गयी जगह से खोला तो वहां पहाड़ की बारिशों का जिक्र था. फ़्रांस में घूमते हुए वहां के पहाड़ों के करीब जाते हुए उत्तराखंड के पहाड़ों की याद थी वहां. एकदम वैसा ही मह्सूस हुआ जैसे एडिनबरा की खूबसूरत बारिशों के बीच से गुजरते हुए हरे के विशाल समन्दर में प्रवेश करना और देखना वहां के पहाड़ों को. सच, कितने मोहक पल थे वो. जैसे कोई पेंटिंग थी सामने और हमें उसमें चुपके से इंट्री मिल गयी हो. आँखों में कोई नमी उतर आई थी वो नमी अभी इस पल उस पल की याद बनकर साथ है. तब मुझे भी अपने उत्तराखंड के पहाड़ याद आये थे. एक जुडाव और अपनापन है यहाँ के पहाड़ों में.

तो इस वक्त स्कॉटलैंड, फ़्रांस और देहरादून सब साथ चलते रहते हैं. मेरी चाय में मानव की कॉफ़ी का स्वाद जाने कहाँ से आकर घुल जाता है. शायद यही वजह होगी कि इन दिनों कॉफ़ी पीने की इच्छा बढ़ने लगी है.

सारा दिन खबरों से भागती फिरती हूँ आजकल. खबरें मुझे उदास करती हैं, लेकिन हर कोई जानबूझकर न देखी गयी खबरों को कानों में ठेलता रहता है. कोई वाटसप  ज्ञान, कोई फेसबुक ज्ञान टीवी. मैं चीखकर कहना चाहती हूँ कृपया मुझे सूचनाओं से न भरें. मैं खुद को खुद के लिए बचा रही हूँ. ये खबरों से भागना मेरी कायरता हो सकती है, लेकिन इस समय मुझे कायर कहलाया जाना मंजूर है. मैंने बमुश्किल उदासियों से पीछा छुडाया है.

इस जजमेंटल होती दुनिया में खुद के लिए एक ऐसी जगह सहेजना जहाँ आप जैसे हैं वैसे ही सांस ले सकें कितना मुश्किल है. मुझे लगता है उदास होना आंतिरक क्रिया है लेकिन वह बाहरी अतिरेक होकर फैलने की हडबडी में तब्दील हो रही है. जब उदासी एक बाजार में तब्दील होने लगती है जिसमें हमारी भी भूमिका होती ही है भले ही उसे कोसते हुए ही सही तब हम वैसी ही अन्य उदास ख़बरों के लिए जगह बना रहे होते हैं.

मुझे इस बाजार से डर लगता है. भावनाओं के बाज़ार से सबसे ज्यादा. उफान से डर लगता है. मैं किसी व्यक्ति से बात करने की बजाय पेड़ों से बात करना, बादलों को देखना या नदी के किनारे बैठते हुए खाली आसमान को देखना पसंद करूंगी. मैं लोगों के जीवन में नदी, पेड़ या बादल होकर शामिल होना चाहूंगी.

सर थोड़ा भारी होने लगा है. बेहतर है मैं एलेक्स के साथ Alps की सफ़ेद पहाड़ियों का रुख करूँ. अरे हाँ, यह बताना तो मैं भूल ही गयी कि लीचियां पेड़ों से उतरकर घर आ गयी हैं...खाने से ज्यादा उन्हें देखने का सुख है.

Monday, June 15, 2020

तुम्हारी दोस्ती नियामत है सुभाष


दोस्त वो नहीं जो आपकी तारीफ करे, वो नहीं जो पैम्पर करे, वो तो बिलकुल नहीं जो हाँ में हाँ मिलाये. सुभाष भी ऐसे ही हैं डांट लगाने वाले, दुरुस्त करने वाले. लेकिन हमेशा कुछ सिखा देने वाले. वो बेहद शानदार इंसान हैं, उनसे दोस्ती हुई उनसे लड़ाई के साथ.

इतना मुश्किल है सुभाष को झेलना, एक मिनट की देरी पर वो डांट लगा सकते हैं, एक जरा सी बात पर डांट लगा सकते हैं, परफेक्शन की बीमारी है इन शख्श को. काम कोई भी हो पागलपन की हद तक अटैच होते हैं अपने काम से. मैंने न जाने-क्या क्या सीखा सुभाष से. जाना कि स्त्री पुरुष नहीं दोस्त दोस्त होते हैं, उन्होंने मेरी हिचक, संकोच और पूर्वाग्रहों से मुझे वाकिफ कराया, दूर किया.

बिना किसी से कोई भी निजी सवाल किये कैसे साथ हुआ जाता है, कैसे महसूस किया जाता है कि एक दोस्त जो सबसे बड़ा क्रिटिक होता है तो सफर कैसे आसान हो जाता है. मुझे पब्लिक स्पीकिंग में कितनी हिचक थी, सुभाष साथ होते थे और सब आसान हो जाता था...धीरे धीरे उन्होंने साइकिल सिखाने की तरह पीछे से साइकिल पकड़ना छोड़ दिया और कुछ हद तक साईकिल चलती गयी. जब सुभाष कह देते हैं कि ठीक किया तो सांस में सांस आती है इसलिए मेरी नजर उन्हें ढूंढती रहती है कि और इंतजार रहता है कि वो कहें 'हाँ ठीक था.' मतलब उनके ठीक का अर्थ अच्छे से लगाया जा सकता है. रंगमंच, अभिनय और उसके शिक्षा से जुड़ाव को जिस तरह सुभाष रखते हैं वह बेमिसाल है. मैंने उनके साथ काम किया है, उन्हें डूबकर काम करते देखा है.

मैं सुभाष से खुद को इसलिए खूब कनेक्ट करती हूँ कि वो उन सब चीज़ों में मुझसे भी ज्यादा लापरवाह हैं जिनके लिए मुझे खूब डांट पड़ती रही है. सोमाली आप समझ सकती हैं, चाबियाँ खोना, बिल जमा करना भूल जाना, कोई कागज कहीं रखकर ढूंढते फिरना, टैक्स, अकाउंट इन सबमें मेरा और सुभाष का हाल एक सा है इसलिए जब उनकी लापरवाही के किस्से सुनती हूँ तो मजा आता है.

खूबसूरत बात यह है कि आज मेरे इस बहुत प्यारे से दोस्त का जन्मदिन तो है ही उनके साहबजादे सम्यक का भी जन्मदिन है. दोनों पिता पुत्र को जन्मदिन खूब मुबारक.

सुभाष, आज तुम्हारा दिन है तो हो गयी थोड़ी तारीफ शायद, वैसे कोशिश पूरी की थी कि न हो, क्योंकि साल भर तो हमें लड़ना ही है...

हैपी बर्थडे दोस्त.

जीने की इच्छा जैसे मैगी खाने की इच्छा


क्या कोई मेरी सुबहों को थोड़ा और लम्बा कर सकता है? नींद से समझौता किये बिना? कैसी तो बचकानी बात है, मैं खुद भी हंस रही हूँ यह लिखते हुए. असल में यह लालच है. हर प्यारी चीज को मुठ्ठी में बांधकर रखने का. मुझे शामें कम पसंद हैं लेकिन सुबहें बेइंतिहा पसंद हैं. सोचती हूँ कोई शामों का चहेता मिले तो उससे अदला-बदली कर लूं. छोड़ो जाने दो, बचपने की बाते हैं.

लेकिन दूसरे ही पल लगता है ये बचकानी बातें, ये ऊट-पटांग से ख्याल कितना जीवन है इनमें. इन्हें हम क्यों जाने दें भला? स्कूल के दिनों में जब दोस्त स्क्रैप बुक भरवाते थे तो उसमें दाल चावल खाने की इच्छा को जब लिखा था तो कैसा तो मजाक उड़ाया था सबने. लेकिन मुझे वही पसंद था तो मैं और कुछ क्यों लिखती भला. 

ये सब बातें अगड़म-बगड्म लग सकती हैं तुम्हें लेकिन ये बातें मुझे उन उदासियों को रिहा करने के काम आती हैं जो भीतर छुपी होती हैं और अचानक सामने आ खड़ी होती हैं. कल से सुशांत की खबर ने उदासी से भर दिया है. असल में उस खबर ने अपनी तमाम बेचैन दिनों को याद दिला दी है. कहने का पता नहीं लेकिन शायद उस मनस्थिति को कुछ हद तक समझ सकती हूँ. जब बहुत से लोग आसपास होते हुए भी कोई करीब नहीं लगता. ढेर सारे संवादों के ढेर में से एक वाक्य नहीं मिलता जो जीवन में रोक सके. उम्मीद का एक शब्द. 

अब समझ सकी हूँ कि बाहर से नहीं आती उम्मीद, खुद उगानी होती है. वो शब्द हमारे ही भीतर होता है, हमें अपने भीतर बार-बार छलांग लगानी होती है और उसे ढूंढना होता है. हाँ, इसमें जल्दबाजी काम नहीं आती. बरस के बरस बरस के चले जाते हैं. आज यह लिखते हुए उदास नहीं हूँ, जब उदास थी तब लिख नहीं पा रही थी. 
हम पीड़ा में छटपटाते हैं, कभी जोर-जोर से हंसते हैं, रोते हैं, गाते हैं, गिटार बजाते हैं. आवाज देते हैं, चुप हो जाते हैं. बस खुद को रिहा नहीं करा पाते. कोई जान नहीं पाता कभी कि अभी अभी जो साथ बैठा था, हंस रहा था जोर-जोर से, चुटकुले सुना रहा था वो भीतर से इतना टूटा था...वो जो गया है अभी-अभी उठकर वो मर रहा था. समाज के तौर पर अभी इतना नहीं सीख पाए हम. अरे हम तो कहे गये शब्दों के मानी नहीं समझ पाने लोग हैं, अनकहे को समझने की यात्रा तो बहुत लम्बी दिखती है. फिर भी कुछ कमीने दोस्तों का होना जिन्दगी को कुछ आराम तो देता है. 

जीकर यह जाना है कि साझेदारी आसान नहीं. साझेदारियां बहुत बार व्यर्थ ही जाती हैं या अजीब अजीब से ज्ञान भरे प्रवचनों के रूप में लौटती हैं. दम घुटता है प्रवचन सुनते हुए. जी चाहता है चिल्लाकर कहें, खुदा के लिए चुप हो जाइए, रहने दीजिये मुझे समझने का ड्रामा करने की कोशिश, आपसे न होगा, आपकी योग्यता नहीं. लेकिन सम्मान में हम ऐसा कहते नहीं, उस कहे हुए को सहते हैं. 

मुझे अजनबी चेहरे पसंद हैं, वो आपको जज नहीं करते. अजनबी, सड़कें, अजनबी लोग, चाय की टपरी, फूलों भरे बागीचे जहाँ से ट्रेन की आवाज सुनाई न देती हो. जहाँ आप रो सकें जी भर के. जीकर ही समझा है कि जीवन बहुत मामूली चीज़ों का नाम है, उन्हीं से बना है और उन्हीं मामूली चीज़ों से ही यह बचता भी है. जैसे बरसती बूंदों के आगे हथेलियाँ पसारना जैसे पंछियों के संग शरारत करना, कैसे वो सब गलतियाँ करने की इच्छा को पोसना जिसे करने से रोका गया हो अब तक. 

जैसे इस वक्त बिना किसी इच्छा के तुम्हें याद करना, चाय का पानी चढ़ाना और सोचना मैगी के बारे में कि वो खत्म हो गयी है घर में, आज लाना है.  

Sunday, June 14, 2020

तुम्हारे सपने में कौन आता है?


कल बारिश हुई. आज भी होने के आसार हैं. यूँ पहाड़ों का तो बारिशों से फूलों से और प्रेम से गहरा रिश्ता है ही. फिर भी हर बार जब बारिश होती है ऐसा लगता है पहली बार देख रही हूँ बारिश. ये मौसम बारिशों का है. फलों में मिठास उतरने का मौसम है ये. फलों के शाखों से उतरकर घरों में आने का मौसम है.

दुनिया को बारिशों को ठहरकर देखना चाहिए. पहाड़ की बारिशों को. ठहर ठहर कर कभी द्रुत गति से कभी मध्धम गति से आती बारिशों को. कभी आलस में भरी नयी दुल्हन सी भी लगती हैं बारिशें...बस चुपचाप गिरती जाती हैं...घूँघट के भीतर से जैसे मुस्कुराती हो धीमे-धीमे. और मुसुकुराहट उतारना भूल जाती हों. बरसती जाती हों. मैं बारिश होना चाहती हूँ. क्या तुम भीगना चाहते हो?

कल व्यस्तताओं का बड़ा सा पहाड़ था. मैं बारिशों को खिड़की से आँख उठाकर ठीक से देख भी नहीं सकी. उसकी आवाज सुनती रही और शीशे के उस पार उसके बुलावे को इग्नोर करती रही. दिन खत्म होने के साथ काम खत्म हुआ और बारिश भी. रूठकर जाती बारिशों के आगे हथेलियाँ बढ़ा दीं तो टप्प से एक बूँद टपक गयी. मानो जाते-जाते कहा हो बारिशों ने 'जाओ माफ़ किया.'

मैं हथेलियों में उस बूँद को सहेजे-सहेजे ही सो गयी. सुबह में उस बूँद की नमी शामिल है. प्रकृति के ये तोहफे जिन्दगी की खर्ची हैं. इन्हें सहेजना आना जरूरी है. मैं सीख रही हूँ सहेजना.

रात सपने में मैं वहीं भागती फिर रही थी जहाँ गुलमोहर की छाँव में नदी में पांव डाले हम घंटों बैठा करते थे. तुम कुछ गाया करते थे. कितना बेसुरा गाते थे तुम लेकिन एकदम डूबकर. मैं सोचती थी तुम क्यों गा रहे हो, मत गाओ न, नदी की आवाज सुनने दो न? और तुम्हारा गाना खत्म होते ही मैं नदी की बीच में धार में खड़ी हो गयी थी. बाहें पसारे. तुम डर गये थे कि मैं बह जाऊंगी, मैं खुश थी कि नीचे नदी ऊपर आसमान, किनारे गुलमोहर और तुम्हारे माथे पर चिंता के निशान सब एक साथ हैं. प्रेम का ऐसा कोलाज कमाल अमरोही के फ्रेम को भी पीछे छोड़ रहा हो जैसे. वो सपने का सच था या सच का सपना इस बात को जाने देते हैं.

एक रोज मैं नदी से मिलने गयी थी वहां तुम्हारे बेसुरे गाने की आवाजें अब भी आती हैं. जब मैं नहीं जा पाती नदी से मिलने नदी मेरे सपने में आती है. तुम्हारे सपने में कौन आता है?

मेरी हथेलियों में कल की बूँद के निशान बाकी हैं,..

Wednesday, June 10, 2020

खाली दीवार पर उग आये हैं सूरजमुखी

VINCENT VAN GOGH: SUNFLOWERS
जो हमें पसंद हो उसका हमारे जीवन में होना क्यों जरूरी है. यह एक किस्म की लालसा है. इसमें एक तरह के स्वार्थ की बू आती है. जो चीज़ें हमें पसंद हैं, हमारे पास हों, घर में हों यह पागलपन है. जो हमें पसंद है वो वहीं रहे जहाँ वो है तो क्या हमारी पसंद घट जाती है? शायद ज्यादा बची रहती है. और फिर अगर किसी रोज पसंद बदल जाए तो उस व्यक्ति का या सामान का क्या करें जिसे जीवन में या घर में इस कदर भर लिया था कि वो पूरा जीवन ही घेरकर बैठ गया था. अब या तो उस बदली हुई पसंद के साथ रहना होता है या उसके बगैर छूट गये  ढेर सारे खालीपन के साथ. 

मुझे अब यह समझ आने लगा है कि हासिल करने जैसा कुछ नहीं होता. पसंद और प्रेम का कोई रिश्ता नहीं होता. अहंकार अलबत्ता जरूर आते-जाते हैं. अधिकार आते-जाते हैं, अपेक्षाएं आती-जाती हैं. यह सब मिलकर उस पसंद के उस मूल तत्व को नष्ट कर देते हैं जहाँ होना सुख देता था. सुख की उस अनुभूति को, उस केंद्र को हम दुनियावी प्रवंचनाओं से नष्ट कर देते हैं. फिर उसे खोजते हुए आरोप गढ़ने के लिए कोई केंद्र ढूंढते हैं. कोई तो हो जिसे कहें कि तुमने मेरा जीवन नष्ट कर दिया. जबकि असल में ऐसा कुछ होता नहीं है. हम खुद ही अपना जीवन नष्ट करते हैं या सुंदर करते हैं. 

जीवन की नदी का जो मटमैलापन है इसे भी प्यार करना चाहिए. यह मटमैलापन हमें गढ़ता है. हम ईश्वर या खुदा नहीं हैं. गलतियों का भी सुख है, लड़ने झगड़ने का भी, प्यार करने का भी और प्यार के टूटकर बिखर जाने का भी. यह मटमैलापन अपने भीतर बहुत सारा उजाला छुपाये है. जैसे खूब गहरे उतरकर समझ आता है कि ऐसा कुछ नहीं जिसके बिना जिया नहीं जा सकता. हमें किस कदर लगता है कि इसके बिना कैसे चलेगा जीवन, लेकिन मजे में चलता है. दुःख प्रेम के टूटने का नहीं अहंकार के टूटने का होता है. क्योंकि प्रेम तो टूटता नहीं हाँ उसका हमारे जीवन में रहने का तरीका बदल जाता है. जैसे कमरे की सेटिंग चेंज कर दी हो, 

यह कितना अजीब है कि जब हम एक बड़ी, कठिन और लम्बी यात्रा कर चुके होते हैं और कहीं पहुँच चुके होते हैं या पहुँचने वाले होते हैं तब पता चलता है हम तो गलत दिशा में आ गए. यात्रा की सारी थकान बिखर जाती है...फ़ैल जाती है. जैसे सब हाथ से छूट गया हो. फिर किसी कोंपल के फूटने की आवाज सुनाई देती है. गलत दिशा में चलकर आई हुई जगहों पर अक्सर सही चीज़ें मिली हैं. सारा थका हुआ सुख में बदल जाता है. जीवन ऐसा ही है. 

कई बरसों से मुझे लगने लगा था कि मैं लिख नहीं पाऊंगी, फिर मैंने लिखने की कोशिश करना छोड़ दिया लेकिन ब्लैंक स्क्रीन के सामने घंटों बैठकर उसे देखते रहना नहीं छोड़ा. कई बरसों से मुझे लगने लगा था मैं पढ़ नहीं पाऊंगी फिर मैंने पढने की कोशिश करना छोड़ दिया लेकिन किताबों के आसपास रहना नहीं छोड़ा, कई बरसों तक मुझे लगता रहा मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगी, फिर मैंने इस तरह सोचना छोड़ दिया लेकिन तुम्हारी स्मृतियों के आसपास रहना नहीं छोड़ा. या यूँ कह लो कि यह सब मुझसे छूटा नहीं. 

अब जब मेरे हाथ में हर वक़्त कोई किताब फिर से रहने लगी है तो लगता है जीवन वापस लौट रहा है पहले से बेहतर होकर. स्मृतियाँ अब दुःख नहीं हैं. ब्लैंक स्क्रीन से दोस्ती होने लगी है, लिखने का पता नहीं लेकिन कुछ शब्द उगने लगे हैं. लॉकडाउन में बहत कुछ अनलॉक हुआ है. खुद के भीतर खुद को फिर से देखा है इन दिनों. 

मेरे कमरे की नीली दीवार जो सिरहाने है उस पर पेड़ की डालियाँ हैं और चिड़िया हैं. सामने की दीवार खाली है. उस खाली दीवार पर सोचा था तुम्हारी परछाई सहेजूंगी. लेकिन इन दिनों उस दीवार पर सूरजमुखी उगते दिखने लगे हैं. खाली दीवार में कितना कुछ है उगने को. कभी सोचती हूँ इस दीवार पर गाढे नीले रंग की पेंटिंग लगाऊंगी जिसमें पानी होगा, कभी सोचती हूँ इस पर एक रोज अमलतास खिलेंगे, कभी यह दीवार कल्पना के सुफेद फूलों से भर उठती है. हालाँकि इन पर सूरजमुखी उगेंगे एक रोज यह मैंने सोचा नहीं था. लेकिन वो उगे हुए हैं. और अच्छे लग रहे हैं. जो हम सोचते हैं उससे इतर भी कितना कुछ है अच्छा हमारे जीवन में आने को. हम अपने जाने हुए से उस अनजाने की आमद का रास्ता रोककर खड़े हुए हैं. अजीब बात है न. हमें अपने जीवन में कुछ खाली जगहें रखनी चाहिए, घर में कुछ खाली दीवारें. 

जब  कभी दीवार पर अपनी ही छाया को देखती हूँ तो मुस्कुरा देती हूँ...

जन्मदिन मुबारक वरयाम जी


जब मारीना को पहली बार पढ़ा था तब दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि वो मुझे एक अलग दुनिया में ले जायेगी और मिलवाएगी वरयाम सिंह जी से. हालाँकि हकीकत ये है कि वरयाम जी ने मिलवाया था मारीना से लेकिन बाद में मारीना हाथ पकड़कर वरयाम जी तक ले गयी. वरयाम जी बहुत से लोगों के लिए बहुत विद्वान व्यक्ति हैं, मेरे लिए वो विद्वता से  काफीअधिक हैं, बहुत कुछ हैं. एक सादा, सरल और प्रेमिल व्यक्तित्व अक्सर महानताओं और विद्वाताओं के बीच कहीं खो जाता है लेकिन वरयाम जी बिलकुल नहीं खोये. उनके आसपास होना हमेशा एहसास कराता है कि मैं सुरक्षित घेरे में हूँ. मारीना पर काम करने की कच्ची इच्छा लिए उनसे मिलने गयी थी और कितना अपनापन और भरोसा लेकर लौटी थी कि उस अपनेपन और भरोसे के भरोसे खुद को छोड़ पाना आसान हो गया.

मैंने उनके संग गप्पें लगायीं, पैदल चलते हुए रूस के किस्से सुने, देश दुनिया के सामयिक हालात पर बातें की और हमेशा जिस बात का सबसे ज्यादा असर लेकर लौटती वो थी उनका स्नेह. बेहद कीमती स्नेह. मुझे उनके बारे में बहुत सी बातें करनी हैं, बहुत सारा उनके संग जिया मुझे गढ़ता रहा है लेकिन उसने मेरे भीतर की अनगढ़ता को भी दुलराया. मैंने महसूस किया कि मैं उनके संग कोई छोटी सी बच्ची हो जाती थी, हो जाती हूँ.

मैं वरयाम जी से या तो जेएनयू में मिली या साहित्य अकादमी में. मंडी हाउस के आसपास पीठ पर लैपटॉप बैग टाँगे हुए घूमते फिरना, पलाश बटोरना, चाय पीना, साहित्यिक बहसें सुनना और मारीना पर अपने किये हुए काम को उनसे दुरुस्त करवाना. मकसद था मारीना की आत्मा को खरोंच आये दिए बगैर कुछ कह सकूं उसके बारे में.

एक किस्सा जो मुझे बहुत ही मजेदार लगता है वो बताती हूँ. दिल्ली में मारीना पर काम करते हुए स्क्रिप्ट चेक करते, करेक्शन करते हुए 5 दिन हो चुके थे. और छठा दिन आखिरी दिन था. उस दिन मेरा वीजा का इन्टरव्यू भी था. काम अभी काफी बाकी था और इन्टरव्यू का टाइम भागभाग के करीब आ रहा था. मैं वरयाम जी के हाथों में अपना काम सौंपकर बेफिक्र हो जाती थी. हम काम कर रहे थे तभी मेरी नजर किसी महान कवि पर पड़ी, मैंने उनसे कहा, ये तो फलां कवि हैं न, उन्होंने हूँ कहा और स्क्रिप्ट देखने लगे, फिर कुछ देर में मेरी नजर एक बच्चे पर पड़ी वो देर से अपनी खाई जा चुकी आइसक्रीम के खोखे में जूझ रहा था. मैं लापरवाह और शरारती हो चुकी थी. वरयाम जी ने मुझे डांट लगाई, 'इधर उधर देखना बंद करो, काम करो जल्दी से. वीजा के इन्टरव्यू का टाइम हो रहा है.' मुझे लगा ऐसे तो माँ डांटती हैं. मुझे इतना सुख हुआ उनकी उस मीठी डांट का क्या कहूँ.

वो जब भी मिलते हैं मैं एकदम छोटी बच्ची जैसा महसूस करती हूँ.

उन्होंने रूस को जिया है, जीते हैं वो. मुझे वो रूसी ही लगने लगते हैं कभी-कभी. कभी यूँ भी सोचा था जेएनयू में साथ चलते हुए कि हम कभी काश मास्को की सड़कों पर भी इस तरह घूमें. मेरे लिए उनका सानिध्य बेहद खूबसूरत और खूब सिखाने वाला रहा है. आज वरयाम जी का जन्मदिन है. यह दिन मेरे लिए बहुत ख़ास है. बहुत सारी शुभकामनाएं वरयाम जी.

Tuesday, June 9, 2020

आवारगी सीजन- 2


अभी तो पागलपन की उम्र आई है.अभी तो बहुत सारी शरारतें करनी हैं, अब तो शुरू हुआ है बेफिक्री का सीजन-2. अभी तो गोवा जाकर लोट लगानी है. पेड़ों से डायरेक्ट मुंह लगाकर फल खाने हैं, नदी के ठीक बीच में उतरकर अंजुरी में भर-भर पीना है पानी और मच्छी की आँख की चमक देखनी है कि वो जाने कि मनुष्य के पास आने का अर्थ उसकी पेट की भूख भर नहीं होती, न होता है ड्राइंगरूम के अक्वेरियम में सजना, प्रेम से उसे देखते रहना भी होता है.

अभी तो हमें आवारगी की किताब का नया एडिशन निकालना है. बहुत भूख है जीने की यार और बहुत प्यास है ढेर सारी गलतियाँ करने की. बिना जज किये जाने के खौफ के एक-दूसरे के कन्धों पर गिर जाना है अपनी तमाम भूलों और मासूमियत के साथ.

जब भी तुम्हारा जन्मदिन आता है मुझे लगता है यह बड़ा जरूरी दिन है. ऐसा लगता है हम दोनों एक-दूसरे के लिए आये थे दुनिया में. हा हा हा हा....ऐसे तो प्रेमी व्रेमी लोग बोलते हैं न फिल्म में. लेकिन सच्ची में गरियाने वाली और गरियाकर गले लगाने वाली दोस्ती की कीमत कउनो रमेश बाबू का जानेंगे. नहीं न जान सकेंगे.

इत्ते बरस से देहरादून में मन रहा है तुम्हरा जलमदिन. अबकी बार कोरोना आ गया बीच में. कसम से आग लगे कोरोनवा को. चलो कि अबकी डिस्टेंस मोड ही सही. पार्टी तो होगी ही....फूल भी आयेंगे, गुब्बारे भी सजायेंगे, केक भी खायेंगे और डांस भी होगा....हैपी बड्डे दुष्टू.

'जीवन के हाथों में बहुत सारा उलझा हुआ मांझा है...'- मानव कौल



कभी-कभी सोचती हूँ कि इन रोजानमचों का क्या हासिल? फिर सोचती हूँ इस जिन्दगी का भी क्या हासिल? फिर यह सोचती हूँ कि क्यों होना ही चाहिए हासिल, छोड़ो न. और अगले पल ही यह सोचते हुए पिछला सारा सोचा हुआ हंसी में उड़ा देती हूँ कि इतना सोचती क्यों हूँ?

तो कल की बारिश की बात है, टूटे हुए चश्मे को बनवाना जरूरी था और वक़्त पर घर पहुंचना भी, दफ्तर के सारे काम भी जरूरी थे तो बारिश में भीगते हुए चश्मा बनवाने जाना तय हुआ. इन दिनों पढने की इच्छा ने जैसे स्पीड पकड़ी हुई है ऐसे में चश्मे का टूटना बड़ा स्पीड ब्रेकर था. परसों रात जो किताब पढ़ी थी और उसके पहले वाली रात जो किताब पढ़ी थी उन दोनों अलग-अलग लेखकों की किताबों के किरदार परसों की रात मेरी नींद में गप्प लगा रहे थे.

इन दिनों हो यह रहा है कि एक साथ कई किताबें पढ़ी जा रही हैं. एक साथ. जिस किताब का जिक्र मैं छुपा रही हूँ उसका पढ़ना हूक से भर रहा है. वह किताब है 'बहुत दूर कितना दूर होता है.' मानव कौल की किताब. यह अनलॉक  की दूसरी सौगात थी. जैसे ही अनलॉक हुआ हमने खूब सारी किताबें ऑर्डर कर दी. किताबें आ रही हैं एक-एक कर. रोज घर पहुँचो तो कोई नया संसार कुछ नए किरदार इंतजार करते मिलते हैं और मन एकदम खुश हो जाता है.

सिलसिला शुरू हुआ किशोर चौधरी से...आगे बढ़ाया मानव कौल ने लेकिन बीच में सुजाता ने इंट्री ले ली और जिस चश्मे को बनवाते हुए मन में यह ख्याल था कि पेरिस पहुँचने के बाद बंटी का क्या हुआ निवेदिता, सिध्धांत, जगजीत, अबीर और मीना अपने साथ अलग यात्रा पर निकल गये. बहुत अरसे बाद एक ही बार में पूरा उपन्यास खत्म किया है. इसमें मनस्थितियों का भी बड़ा हाथ है.

इस सुबह में पेरिस पहुँचने की इच्छा है लेकिन कोई हडबडी नहीं है. बीती रात पढ़े 'एक बटा दो' का असर है लेकिन अब कोलाहल नहीं है. उधर वो बाड़मेर वाला अमित दूर से बैठा देख रहा है जैसे उसने इत्मिनान भरी आँखों से देखकर आश्वस्त किया हो कि मैं हूँ, यहीं. तुम आराम से घूम लो पेरिस फिर हम साथ चलेंगे.

ये किरदार कितने प्यारे होते हैं कि हम इनसे दिल लगा बैठते हैं.

तो बीती रात से पहले वाली रात का किस्सा सुनो, हुआ यूँ कि अमित के संग बाड़मेर घूमने के बाद सोयी थी और सुबह यानी इतवार की सुबह एक बहुत दूर, कितना दूर जानने निकल पड़ी. मानव तो फिर मानव है. अजीब जादुई असर में लाते हैं. मानव को पढना भीतर की यात्रा में ले जाता है, वो अपने आप को कुरेदना सिखाता है.

तो सलीम, बंटी और जीवन से दोस्ती होती है. कभी लगता है मैं बंटी हूँ, कभी लगता है सलीम हूँ लेकिन जीवन जीवन ही है. सारा दिन बिटिया कहती रही 'क्या मम्मा सारा दिन नापती रहती हो बहुत दूर कितना दूर होता है, लो मेरा स्केल ले लो और नाप लो. और मानव अंकल को भी दे दो वो भी नाप लेंगे.' हम दोनों हंस देती हैं.

मानव को गति से नहीं पढ़ा जा सकता, वह बाहर का पढना नहीं है. एक-एक लाइन वापस बुलाती है और डुबो लेती है भीतर.

'जीवन से झूठ बोलने पर आँखें खुद झुक जाती हैं.'
'जीवन के हाथों में बहुत सारा उलझा हुआ मांझा है...'
'जीवन ने बंटी को रोकने की कोशिश की बंटी ने जीवन का हाथ झिडक दिया.'
यह जीवन सलीम और बंटी का ही नहीं हम सबका जिया हुआ है, जिया जा रहा है. हम अपना तमाम जिया हुआ इसके आगे पसार के बैठे रहते हैं. हम भाग क्यों नहीं जाते. हमें अपने तमाम सवालों के जवाब अपनी ही धुरी पर क्यों चाहिए. हमें सच में निकलना चाहिए यह जानने कि बहुत दूर कितना दूर होता है. दूर होता भी है या नहीं...या बहुत दूर असल में बहुत पास होता है और बहुत पास होता है बहुत दूर.

दूर फ़्रांस में इस सवाल से उलझे बंटी की बात अचानक बाड़मेर वाले अमित से होने लगती है. फिर वो दोनों नापने लगते हैं 'बहुत दूर कितना दूर होता है' को. जबकि जीवन भेलीराम की थडी पर सलीम और अपनी चाय बनवा रहा है. क्योंकि बंटी तो बहुत दूर फ़्रांस में है. तभी बंटी कूदकर चाय लपक लेता है कहते हुए, 'अरे मैं यहीं हूँ बे...'

कैथरीन दूर कहीं बंटी के इंतजार में है...वान गौग, पिकासो, कामू और सात्र भी हैं.

लेकिन मेरी नींद में सलीम जीवन अमित और बंटी की गप्प चलती रही...बीती रात उन सबकी जगह सिध्धांत, जगजीत,अबीर ने ले ली. यह सोचते हुए सो गयी कि सब के सब अलग-अलग तरह से कितने कमजोर पुरुष थे...

आज नया दिन है और मुझे पेरिस की यात्रा पर निकलना है, शाम तक दिन कौन सी करवट लेगा पता नहीं. कि कुछ किताबें अभी रास्ते में हैं...