Saturday, March 28, 2020

ये लोग देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं


यह नफरत का समय नहीं है, ये सरकार को कोसने का समय नहीं है, ये लेफ्ट राईट के खांचों में बंटने का समय नहीं है. ये समय अपने घरों में बैठे हुए बेघर होने का दर्द महसूस करने का है. अपने पांवों में लगातार चलने से होने वाले दर्द को महसूस करने का. कई कईं दिन की भूख को महसूस करने का. और जितना संभव हो किसी की भूख को खाने से बदल पाने का. ज्यादा और ज्यादा मनुष्य होने का.

ये समय है किसी भी तरह पैदल, भटकते देश के साथ खड़े होने का. वो लोग जो पैदल चले जा रहे हैं वो न हिन्दू हैं, न मुसलमान. न स्त्री, न पुरुष. वो इन्सान हैं. उन्हें आप पर आस्था थी. भरोसा था. जिनके पास थालियाँ थीं उन्होंने थालियाँ बजाई होंगी, आपके गाल बजाने से ज्यादा बजाई होंगी जिनके पास थालियाँ नहीं रही होंगी उन्होंने तालियाँ बजायी होंगी. उन्होंने प्रधानमन्त्री जी की बात को हमेशा गौर से सुना, उनकी बात मानी भी. उन्हें वोट भी दिए. लॉकडाउन हुआ तो भी उन्होंने बात मानी. उदास हुए लेकिन जहाँ थे वहीं रुक गए.

फिर क्या हुआ...जहाँ वो थे वहां से उन्हें खदेड़ा जाने लगा. काम से, बसेरे से. भूखे, बेघर जेब से खाली लोग सड़क पर आ गये. सडक पर आये तो पीटे जाने लगे.

वो पिकनिक मनाने नहीं जा रहे हैं. वो भी हमारी, आपकी तरह घर में रहना चाहते हैं, सैनीटाइज़र से हाथ साफ़ करते, रामायण देखते, खाने की फोटू लगाते फेसबुक पर लेकिन उनके पास नहीं है ये सुविधा. उनके पास एक देह है, भूख है, असुरक्षा है इसलिए वो चल रहे हैं.

सदियों से जो एक सी सामजिक, आर्थिक स्थिति में ठहरे हुए हैं आज वो चल रहे हैं. तब उनके ठहरे हुए जीवन पर हमारी नजर नहीं गयी कि क्यों पीढ़ी दर पीढ़ी ये वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं. जीडीपी के आंकड़ों में ये कहीं भी क्यों नहीं हैं. ये सदियों से भूखे हैं, इनका कोई सम्मान नहीं. इनके बच्चे दुखी नहीं होते अपने माँ बाप को पिटते देख. इनके माँ बाप का दिल रोता नहीं जब बच्चा रोटी (पिज़्ज़ा या चाऊमीन नहीं ) मांगता है तो ये एक चमाट मार देते हैं. इनके बच्चे बनती हुई भव्य इमारतों के बीच कहीं कोने में पड़े-पड़े बड़े हो जाते हैं. वही भव्य इमारतें जिनके बन जाने के बाद ये उसमें घुस भी नहीं सकते.

ये दीवारों के पीछे छुपाये जाते लोग हैं. इन्हें हर हाल में मौत से लड़ना होता है, हर दिन. ये देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं. इनके प्रति आपके मन में इतना आक्रोश क्यों है आखिर? कहाँ से आया? और खुद को संवेदनशील कहते हैं आप?

नफरत मिटाकर हाथ बढ़ाने का वक्त है इंसानियत की तरफ. जितनी संभव हो जरूरतमंदों की मदद करने का. परिवार के साथ रामायण देखते हुए थोड़ा सा रो लेने का. कोरोना से नहीं नफरत के वायरस से भी लड़ने का वक्त है ये.

(लॉकडाउन डेज़)

तुम हो तो जीने को जी चाहता है


तुम साथ होती हो तो
आसमान झुक कर
करीब आ जाता है

काँधे से सटकर
बैठ जाती हैं उम्मीदें

बारिश की बूंदे
सिर्फ तुम्हारी खातिर
अटकी रहती हैं देर तक
पत्तों पर

तुम हो तो हर उम्मीद को
थाम लेने की जी चाहता है
तुम हो तो जीने को जी चाहता है.

जन्मदिन मुबारक प्यारी संज्ञा

Thursday, March 26, 2020

किसे याद करता था समय?

संज्ञा उपध्याय 
कई बरस हुए. भोपाल से बहुत सी मधुर यादों के साथ एक किताब भी आई थी साथ 'पेड़ नीला था'. छोटी सी पतली सी. रुस्तम जी की कवितायें .किताब इतने सलोनेपन से बनी थी कि अपनी बनावट में ही कविताओं की बुनावट भी सहेजे हुए थी. एकलव्य प्रकाशन की खासियत है यह. रुस्तम जी की कविताओं से यह मेरा पहला परिचय था .उस परिचय को बहुत गाढ़ा किया सुशील शुक्ल की बात ने. मैंने इस कविता को बार-बार पढ़ा. उलट-पुलट कर पढ़ा. अलग-अलग मौसम में पढ़ा. अलग-अलग पहर में पढ़ा. हर बार यह अलग लगी. सुशील जी की बात को भी पढ़ा. इस कविता पर उनकी बात को. कविता ही है उनकी बात भी. किसी कविता को कैसे पढ़ा जाना चाहिए यह ढब आना जरूरी है. मेरी ही तरह सुशील भी कविता को उलट-पुलट कर पढ़ते दिखे. तो इस तरह इस कविता में चार लोग शामिल हैं. रुस्तम जी की कविता पर कवि सुशील शुक्ल की बात. उनकी उस बात को पढ़ती मैं और इन सबको अपने हरे में समेटती संज्ञा की तस्वीर. - प्रतिभा 

सिर्फ एक पत्ते पर
रोशनी गिर रही थी
सिर्फ एक पत्ता हरा था
सिर्फ एक पत्ता हिल रहा था
हौले-हौले हिल रहा था
पृथ्वी शांत थी
पूरी पृथ्वी शांत थी
सिर्फ एक पत्ता हिल रहा था. - रुस्तम 

इस कविता में एक सांगीतिकता है. पहले यह कविता और इसकी भाषा एक बहुत ही शांत माहौल रचती है. फिर अपनी बात कहती है.
सिर्फ एक पत्ते पर रौशनी गिर रही थी.एक साथ नहीं कहती है.
पहले कहती है सिर्फ एक पत्ते पर.
रोशनी गिर रही थी. ज्यादा महत्वपूर्ण चीज रोशनी नहीं है, वह तो बाद की बात है. जरूरी बात है कि सिर्फ एक पत्ते पर गिर रही थी. सिर्फ एक पत्ता हरा था. सिर्फ एक पत्ता हिल रहा था.

पृथ्वी शांत थी. पूरी पृथ्वी शांत थी. एक पत्ते की बात इस कविता में चल रही है. एक पत्ते की बात इस कविता में चल रही है. एक पत्ते की बात करती यह कविता पृथ्वी पर आ जाती है. कहाँ एक पत्ता और पृथ्वी? इसलिए कविता पृथ्वी की शायद विशालता को, विराट को रचने के लिए दुबारा कहती है- पूरी पृथ्वी शांत थी.  जैसे पृथ्वी शांत थी कहने से कुछ छूट सकता था. पूरी पृथ्वी शांत थी, बस एक पत्ता हिल रहा था. क्यों क्योंकि सिर्फ वही हरा था. क्यों? क्योंकि सिर्फ उसी पर रोशनी गिर रही थी.

यह कविता पढ़ते हुए कई तरह के मन बनते हैं. एक, जैसे कोई याद आती है. रह रहकर. कोई चीज कचोटती है.
रह रहकर. इस कविता का ढांचा उस तरह का भी है. रह रहकर...एक सांस में कोई बात कह दी. झट से. ऐसा नहीं है.

दूसरा, जैसे बस कुछ को ही रोशनी हासिल है. और पृथ्वी शांत है. पूरी पृथ्वी शांत है. तो पूरी पृथ्वी का शांत होना एक सवाल बन जाता है कि पूरी पृथ्वी शांत क्यों है?

एक मन कहता है कि यह किसी सघन क्षण की याद है. जब शेष कुछ नहीं था. बस वह क्षण था. वह पत्ता इस तरह दिख रहा था कि जैसे उसे देखने भर की रौशनी ही बची थी या बाकी थी. पर क्या उस पत्ते की खास स्थिति की वजह से रोशनी सिर्फ उसी पर गिर रही थी? या वह क्षण ख़ास था?

क्या रोशनी ज्ञान और उससे पैदा हुई सत्ता का प्रतीक है? कि वह इस पृथ्वी नाम के दरख्त के एक पत्ते हिस्से को हासिल है? और पूरी पृथ्वी शांत है? चुप.

कभी यही कविता उस एक पत्ते को समूची पृथ्वी से बाहर लाकर खड़ा कर देती है.

पूरी पृथ्वी शांत थी. पूरी पृथ्वी में तो वह पत्ता भी शामिल होना चाहिए. पर वह तो हिल रहा है. हरा है. उस पर रोशनी गिर रही है. कि उस एक पत्ते के बिना भी पृथ्वी पूरी थी. कि यह क्षण पारलौकिक था. पत्ता पृथ्वी से बाहर का लगता था. या कि पूरी पृथ्वी में उस पत्ते की कोई गिनती नहीं थी. उसका होना या न होना बराबर था.
सुशील शुक्ल 

Wednesday, March 25, 2020

बसंत त्रिपाठी की कवितायें संध्या राग

बसन्त त्रिपाठी की कवितायें 1998 में पहली बार पढ़ी थीं. तब उनकी कविताओं की सादगी और गहनता ने आकर्षित किया था आज इतने बरस बाद उनकी कविताओं की सादगी में इजाफा हुआ है. गहनता ने और गोते लगाये हैं. उनकी भाषा की तरलता में अलग किस्म का सम्मोहन है. यह उनकी कहानियों को भी विशेष बनाती है और कविताओं को भी. वो सक्रियता के उफान में कविता के फलक पर आने और छाने वाले कवि नहीं हैं. उनकी उपस्थिति गरिमामय और संजीदा है जो निरंतर अपना स्पेस बढ़ाती जा रही है. बसंत को पढ़ना बसंत के मौसम को महसूस करने सरीखा लगता है. आज मेरे इस प्रिय कवि मित्र का  जन्मदिन है. उनकी कुछ कवितायें जो शाम के अलग-अलग रंग बिखेर रही हैं, यहाँ सहेज रही हूँ. जन्मदिन मुबारक दोस्त! - प्रतिभा 

संध्या राग 
1.
शामें कितनी भी अच्छी क्यों न हों
रात की दराज़ में
प्रेम-पत्र की तरह पड़ी होती हैं
प्रेम, जो अपनी सघन भावनाओं की
अनुभूत उपस्थिति के साथ
बीत चुका है
कालातीत
रात खुद
सुबह की चमक से चौंधियाकर
ससुराल आई नई बहू की तरह
कोठरी में दुबकी होती
दोपहर की थाली में
सुबह को
भोजन की तरह परोसा जाता है
और साँझ उसे
निवाले की तरह निगल जाती है

2.

यह गर्म लू के थपेड़ों से
भुनी हुई एक साँझ है
मूंगफली की तरह नहीं
कि छिलके उतारे और दाना मुँह में
कुरकुरा और मज़ेदार
भुट्टे की तरह भी सिंकी हुई नहीं
कि नींबू और नमक से मिलकर
जायकेदार
यह दोपहर की भट्टी से
अभी-अभी उतरी साँझ है
बड़भूँजे सूरज ने इसे
देर तक भूना है
इसी दोपहर की कड़ाह में कभी
महाकवि ने देखा था
पत्थर तोड़ती मजूरन को
गर्म साँझ धीरे-धीरे काली हो गई है
लेकिन बैसाख की रात
अब भी धमका रही है
3.
धूल का बवंडर
उठा है अभी-अभी
सूखी पत्तियों ने भी साथ दिया
बंद दरवाज़ों की दरार से 
भीतर घुस आई है धूल
सारी चीज़ों को अपने घेरे में लेती हुई
सड़कें तो जैसे
धूल की चादर
फर फर उड़ रही हैं
मुँह के भीतर किचकिचा रही है धूल 
परिन्दों ने ढूँढ़ लिया है
तत्काल कोई सुरक्षित जगह
खुशगवार शामों को
बेस्वाद बना रही है
सड़कों पर बिछी अलक्षित धूल.

4.

पल को
पलकों ने उठाया
तह कर रख दिया
करीने से
मेरी नींद के स्याह जल में
नींद के जल में
उजले कपड़ों की तरह
धीरे-धीरे घुल रहा है
बीत हुआ सघन पल
स्वप्न इशारे से बुलाता है अपने पास
मैं उस ओर जाता हूं
शब्दहीन शब्दातीत
जैसे शाम
चुप पड़े खेतों के बहुत पीछे
रात की गोद में
धीरे-धीरे दुबककर सो जाती है.
5.
यह एक संभ्रांत की शाम है
लगभग घटनातीत
घटनाओं के नाम पर
आसमान में बादलों के कुछ थिर टुकड़े हैं
और उनके भीतर से झाँकता
पका हुआ संतरा
पंछियों की लौटती हुई उड़ाने हैं
आसमान की दीखती हलचल है
और उसके पीछे ठहरा हुआ नील
जो बरस रहा है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे
यह पक्के मकान की छत की शाम है
घनी आबादी वाले रिहाईशी से लगभग बाहर
भौतिक आशंकाओं के घेरे से बाहर खड़े
सौंदर्यवादी के लिए
शाम
दरअसल कब्रगाह है
जिसमें वह पहले ज़िन्दा गिरता है
मौत फिर धीरे-धीरे आती है
आती चली जाती है
6.

मामूली से मामूली दोपहरें भी
दिहाड़ी मजदूर की भूरी-नीली बनियान में
नमक की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें छोड़ जाती है
बस शाम ही है
जो उसे थपकी देती है
तनी हुई नसों में
राहत बनकर दौड़ती है
हाथठेला खींचता हुआ मजदूर
छत्तीसगढ़ी लोकगीत की धुन पर
लगभग थिरकता हुआ
देशी ठेके तक पहुँचता है
शाम उसकी नसों में
नशा बनकर उतरती है.
7 . 

शाम चाहे समुद्री हो, पहाड़ी हो,
मरुस्थली, ऊसर या पथरीली
घने जंगल या नदी किनारे की नम शाम
या टूटे छप्परों वाली छत के भीतर
धीरे धीरे उतरती हुई
ये सारी शामें मेरे लिए
सैलानी की शामें हैं
मैं हर बार
बस देखता हूँ
अपने शहर की भागती धूल उड़ाती
गर्म और ठंडी शामें
मेरी हर शाम
मेरे शहर की ही शाम
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हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज – 211001

मो. 09850313062

Tuesday, March 24, 2020

बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है



एक समय था जब मैं प्यार में मर जाना चाहती थी. एक वक़्त है जब मैं प्यार को पी जाना चाहती हूँ. एक वक़्त था जब बेजारी थी जिन्दगी से एक ये वक़्त है जब यारी है जिन्दगी से. सुबहों को घंटों परिंदों से बाते करते हुए महसूस होता है मेरे भी पंख उग आये हों जैसे. उनके साथ मैं भी उड़ती जाती हूँ . पंडित शिव कुमार शर्मा संतूर पर राग भैरवी बजा रहे हैं. पहाड़ियां उन मधुर लहरियों में डूबती जा रही हैं. 

मुझे इन दिनों अपने आस पास कोई नजर नहीं आता, कोई महसूस भी नहीं होता. ज़रूरत भी नहीं महसूस होती. वो जो खाली केंद्र था अपनेपन की महक से भर गया है. बाहर कुछ भी नहीं, सब भीतर है. उस भीतर तक पहुँचने के लिए बाहर भटकते रहते हैं. सेहरा, पहाड़, दरिया पार करते हैं, लेकिन मिलता है वो किसी पेड़ के नीचे ही, एक चम्मच खीर खाकर या किसी कुटिया में झूठे बेर खाकर.

हम सबको झूठे बेरों की तलाश है. कोई इतने प्यार से चखकर रखे तो. कोई इतने प्यार से खीर बनाकर लाये तो. वो खीर की चाह थी जिसने खीर को ज्ञान का माध्यम चुना, वो चाह जिसे दुनिया भूख कहती है. हमें अपनी भूख तलाशनी है असल में. जिन चीज़ों के पीछे भाग रहे हैं, जिनके लिए जान दे रहे हैं वो हमारी भूख हैं ही नहीं. जो भूख है वहां हम पहुंचे ही नहीं. वहां पहुँचने की यात्रा ही जीवन है. मुझे मेरी भूख मालूम है. मुझे बारिश चाहिए (बेमौसम नहीं), मुझे ढेर धूप चाहिए, अंजुरी भर सर्दी चाहिए, अमलताश चाहिए, मोगरे का गजरा चाहिए, सामने मुस्कुराती जूही और हरसिंगार की गमक चाहिए.

मुझे इंतजार चाहिए...यही मेरी चाह है. मेरी इस चाह को परिंदे समझते हैं. तुम भी तो परिंदे ही हो...उड़ते उड़ते जा बैठे हो किसी और डाल पर. तुम कनखियों से देखते हो, मुस्कुराते हो, मैं पुकारती नहीं, तुम आते नहीं....दूर जाकर तुम ज्यादा करीब जो आ गये हो...मेरी शामों में मेरी सुबहों में तुम घुले हुए हो...डाल कोई भी हो तुम्हारी, दिल मेरे ही पास है जानती हूँ...

बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है, सुन रहे हो न तुम.
(इश्क़ शहर, लॉकडाउन डेज़)

Monday, March 23, 2020

लॉकडाउन- 1


मैंने मृत्यु को बहुत करीब से छूकर देखा है. मृत्यु के ख्याल को मुठ्ठी में कसकर रखा है बरसों तक. फिर उस डर से आज़ाद हुई. बहुत तकलीफ सही लेकिन आज़ाद हो गयी. अब ख़ुशी है जो हर वक्त साथ रहती है. कुछ खोने का डर जाता रहा. जब हम ये डर जीत लेते हैं, तब जिन्दगी दोस्त हो जाती है. मेरे आसपास डरे हुए लोग हैं मैं उनके लिए फ़िक्रमंद हूँ. ख्याल रखती हूँ अपना भी कि मरना नहीं चाहती लेकिन जानती हूँ मरने से डरती भी नहीं.

लगता है जी ली हूँ पूरा. कितने बरस हो गए जीते जीते. ज्यादा कुछ तो चाहा भी नहीं था जिन्दगी से. जो चाहा वो मिला. जितना चाहा उससे ज्यादा ही मिला. जितने भी दुःख मिले जीवन में वो अहंकार से जन्मे थे जिन्हें मैं प्यार से जन्मे हुए समझती रही. प्यार कब अहंकार हो जाता है पता ही नहीं चलता. कब्ज़ा करने की प्रवृत्ति, कोई छीन न ले का डर.

सोचती हूँ क्या कोई किसी को किसी से छीन सकता है? प्रेम तो मृत्यु की तरह है शाश्वत और पवित्र. जब जैसे जिस पर आना है आएगा. बुलाओगे तो आएगा नहीं और जब चाहोगे कि चला जाय तो जाएगा नहीं. यही हासिल है जीवन का. यह समझ और शांति.

आज घर कैद के दिनों में मैंने उसी प्रेम को अपने ऊपर रेंगते हुए महसूस किया जिसके कारण कभी मर जाने को जी चाहता था. बहुत प्यारी सी छोटी से बच्ची ने जब किलकते हुए हाथ बढ़ाया और वो मुझे देख के मुस्कुरायी तब लगा बस यही है जिन्दगी, लेकिन अगले ही पल एहसास हुआ कि उस बढे हुए मासूम हाथ को थाम नहीं सकती क्योंकि हमने दुनिया ऐसी बना ली है कि इन्सान इन्सान से मिलने से डर रहा है. मैं उस बच्ची के बढे हाथ को इसलिए नहीं थाम सकी क्योंकि मुझे कुछ हो जायेगा. नहीं ,मुझे डर था कि उसे कुछ न हो जाये अनजाने. बस हम दूर से एक दूसरे को देखते रहे, खेलते रहे. वो मेरी आँखों में आँखे डालकर शरारत करने की गति बढ़ाती रही. अंत में उसने गोद में आने की जिद कर ही ली, और यही पल था मेरी आँखें पनीली होने का. मैंने उससे निगाह तोड़ी. ठीक वैसे ही जैसे विदा के वक्त निगाह तोड़ते हैं प्रेमी.

उसकी किलकारी कानों में है, उसके बढे हुए हाथ मुझे बेचैन कर रहे हैं. काश कि इस दुनिया को हमने प्रेम के काबिल बनाया होता. काश कि हम प्रेम की हर पुकार पर दौड़कर पहुँच पाते...

हालाँकि बढे हुए हाथ को न थाम पाना प्यार का न होना नहीं होता यह तो अब समझ ही चुकी हूँ. महत्वपूर्ण है हाथ बढाने की इच्छा का होना. वो बच्ची अपने बढे हुए हाथ और आँखों में समाये ढेर सारे प्यार को छोडकर जा चुकी है. जानती हूँ वो लेकर भी गयी है गोद में आने की इच्छा को. ये इच्छाएं प्रेम हैं. प्रेम जीवन है.

(इन द टाइम ऑफ कोरोना )

Saturday, March 21, 2020

जमा कर रही हूँ स्मृतियाँ


खिलखिला कर हंस रहे हैं फूल
पंछियों का झुण्ड
कलरव से भर रहा है सन्नाटा
तमाम बारिशों से गुजरने के बाद भी
पेड़ों ने बचायी हुई हैं
अपनी शाखों पर बौर

सुन सकती हूँ धडकन
आज फिर से
अपनी भी, तुम्हारी भी
नब्ज के चलने की आहटों पर
धर सकती हूँ ध्यान

वो जमा कर रहे हैं आटा, दाल, चावल
मैं जमा कर रही हूँ स्मृतियां...


Wednesday, March 18, 2020

क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं



नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं

जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उनको सुनाने के दिन आ रहे हैं

अभी से दिल-ओ-जाँ सरे-राह रख दो
के लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं

टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं

सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं

चलो 'फ़ैज़' फिर से कहीं दिल लगाएँ
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं.

Monday, March 16, 2020

पत्थरदिल दुनिया में दिल का टूटना


पलाश से भरी धरती भी उदास हो सकती है
तारों भरा आसमान भी हो सकता है गुमसुम

मुस्कुराहटों के मौसम के संग भी
आ सकती हैं निराश बारिशें
तमाम सभ्यताओं के बारे में जान लेने के बाद भी
बची रह सकती है असभ्यता
रास्ता मिलना
जिंदगी में भटक जाने का भरम भी हो सकता है
हिदायतें हमारे जिए हुए डर हो सकते हैं
और क्रोध हमारी असमर्थता

दिल का टूटना
पत्थरदिल दुनिया में
दिल के बचे रहने की मुनादी भी हो सकती है
और दर्द का होना हो सकता है
जीवन में बची हुई आस्था का होना
प्रार्थनाएं खोई हुई उम्मीदों के लिए भटकना भी हो सकता है
और तुम्हारा न होना तुम्हारा होना भी हो सकता है.

- री पोस्ट

क्योंकि वो जी भरके जीना चाहती हैं....


स्त्रियों की दुनिया बदल रही है. उनकी दुनिया के सवाल बदल रहे हैं, चुनौतियाँ बदल रही हैं. यह एक सकारात्मक तस्वीर है. लेकिन यह समूची तस्वीर भी नहीं है. अभी उन स्याह घेरों को भी इस उजली तस्वीर में शामिल होना है जहाँ जन्म लेने से लेकर मरने तक हर लम्हा जूझना पड़ता है. मुठठी भर भात के लिए लड़ना पड़ता है, पहले पढने के लिए फिर अपनी पसंद के विषयों को पढने के लिए लड़ना पड़ता है.

यह सच है कि कुछ महिलाओं ने तमाम चुनौतियों को पार कर लिया है लेकिन बहुत सी स्त्रियों को अभी मामूली बातों के लिए बोलने की भी आज़ादी नहीं है. शिक्षा एक बड़ा हथियार है जिससे आधी दुनिया के अंधेरों को काटा जा सकता है, काटा जा रहा है.

आज भी तमाम बदलावों के बावजूद महिलाअधिकारी से आदेश लेने में सहज नहीं होते हैं पुरुष. जहाँ यह सहजता है वहां पावर का बड़ा रोल है. पितृसत्ता के गहरे निशान स्त्रियों में भी देखे जा सकते हैं ठीक वैसे ही जैसे कुछ पुरुष स्त्रियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील भी होते हैं. हालाँकि यह 'कुछ' काफी कम है. तो महिला मुद्दों की बात में हमें सायास अपने पुरुष मित्रों को भी जरूर शामिल करना चाहिए....तभी बात बनेगी...

कमोबेश इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द अपनी बात रखी दूरदर्शन के कार्यक्रम में. मेरे साथ एसपी सिटी देहरादून श्वेता चौबे, शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी इरा कुकरेती भी इस बातचीत में शामिल रहीं. कार्यक्रम का प्रसारण 8 मार्च को दोपहर 1 बजे हुआ.

इस मौके पर यह कविता भी पढ़ी-

एक रोज लड़कियां तमाम ख्वाहिशें तह करके
करीने से सूटकेस में लगाती हैं
कच्चे-पक्के ख्वाब रखती हैं साथ में
हिम्मत रखती हैं सबसे ऊपर वाली पॉकेट में
कमर तक लटकते पर्स में रखती हैं मुसुकराहटे

उदास रातों का मोह बहुत है
लेकिन बड़ा सा गठ्ठर है उनका
बार-बार उन्हें छूकर देखती हैं
और सूटकेस में बची हुई जगह को भी
फिर सबसे ज्यादा जागी
और भीगी रातों को रख ही लेती हैं खूब दबा-दबाकर

कागज के कुछ टुकड़े रखती हैं
जिनमें दर्ज है लड़-झगड़ के कॉलेज जाने पर मिले पास होने के सुबूत
हालाँकि जिंदगी में फेल होने के सुबूत बिखरे ही पड़े थे घर भर में
जिंदगी के इम्तहान में बैकपेपर देकर एक बार पास होने की इच्छा
रखती हैं किनारे से सटाकर

कुछ सावन रखती हैं छोटे से पाउच में
एक पुड़िया में रखती हैं जनवरी का कोहरा और कॉफी की खुशबू
जेठ की दोपहरों में घर के ठीक सामने
ठठाकर हँसते अमलताश की हंसी रखती हैं

कुछ किताबों को रखने की जगह नहीं मिलती
तो ठहरकर सोचती हैं कि क्या निकाला जा सकता है
सब रखने की चाहत में जबरन ठूंसकर सब कुछ
सूटकेस के ऊपर बैठकर बंद करने की कोशिश करती हैं

रिहाई का तावीज़ बना टिकट संभाल के रखती हैं पर्स में

पानी पीती हैं गिलास भर सुकून से
घर को देखती हैं जी भरके

एक खत रखती हैं टेबल पर
जिसमें लिखा है कि
लड़कियां घर से सिर्फ किसी के इश्क़ में नहीं भागती
वो भागती हैं इसलिए भी कि जीना ज़रूरी लगने लगता है
कि बंदिशों और ताकीदों के पहरेदारियों में
अपने ख्वाबों का दम घुटने से बचाना चाहती हैं

क्योंकि वो जी भरके जीना चाहती हैं....

प्रेम, तुम ही तो उम्मीद हो!



जब नेटफ्लिक्स पर 'लैला' सिरीज देखी थी तो कई दिनों तक ठीक से नींद नहीं आई थी. जो कभी आ गयी तो सोते से जाग पड़ती थी चौंक के. कोई अतिशियोक्ति नहीं लगी थी फिल्म में न फैंटेसी कोई बस कि लगा जैसा देश का हाल चल रहा है यही होने वाला है कुछ सालों बाद. उस वक़्त नहीं जानती थी कि कुछ सालों में नहीं यह तो अभी हो रहा है. 'जय आर्यवर्त' 'दूषित रक्त', 'प्रयश्चित के उपक्रम' 'गुरु माँ' सब कुछ तो आसपास ही है...माँओं के सीने से आगे बच्चे छीनकर उनके ही सामने क़त्ल किये जाने दृश्य, स्त्रियों को निक्रष्टतम प्राणी समझने वाला समाज, सिर्फ सेक्स ऑब्जेक्ट समझने वाली सोच सब तो है. कोई सुरक्षित नहीं, कहीं नहीं. न घर में, न रास्ते में, न स्कूल कॉलेजों में. सुरक्षित पुरुष भी नहीं, वो भी नहीं जो जय आर्यवर्त के नारे लगा रहे, वो भी नहीं जो आर्यवर्त के रक्त पिपासु राजा के लिए तैयार करते हैं खुनी साजिशें. पानी महंगा खून सस्ता होने का दौर है यह. न्याय एक कल्पना है, सुख टहनी से उड़कर जा चुकी वो चिड़िया है जिसकी तलाश में शिकारी भटक रहे हैं.

सबकी बारी आएगी यकीनन अगर सब एक साथ समय रहते नहीं चेते. यह बारी दाहिने से भी आएगी और बाएं से भी...

मौसम हमेशा की तरह खिल रहा है लेकिन मन उदास है. कल ही प्रेम का उत्सव मना है सोचती हूँ काश यह उत्सव रोज मने और तमाम नफरतों को अपनी जद में ले ले. हत्यारों को फूलों से प्यार हो जाय, बच्चों की खिलखिलाहटों से प्यार हो जाय...खोये हुए लाल माँओं की गोद में लौट आयें.

ओ प्रेम जाओ पूरी दुनिया को नफरत से मुक्त करो न. तुम ही तो उम्मीद हो!

(न लेफ्ट न राइट बस इंसानियत के साथ खड़े होने का वक़्त है यह.)

Thursday, March 12, 2020

छोटी सी बात है, बस इत्ती सी

मैं- होली कैसी रही?
मित्र- वैसी ही जैसी पिछले बरस हुई थी.
मैं- मतलब? फिर से?
मित्र- हाँ. लेकिन इस बार सास बहू की नहीं पति-पत्नी की लड़ाई हुई. यानी अम्मा और पिताजी की.
मैं- वो तो नार्मल बात है.
मित्र- हाँ, नार्मल ही है. अम्मा सूटकेस पैक करके मामा को फोन लगाईं कि ले जाओ हमको. मामा बोले कुछ दिन रुक जाओ अभी बिजी हैं.
मित्र- हँसते हुए. फिर यहीं मनी होली. रूठे-रूठे.
मैं- हम्म्म्म. कितना दुःख हुआ होगा अम्मा को.
मित्र- अरे नहीं. ये रोज का है उनका. जाएँगी कहाँ. खाली हूल देती हैं.
मैं- पापा ने भी कुछ नहीं कहा. मतलब रुकने को?
मित्र- पापा तो कहे, पहले इनको जाने दो तब खाना खायेंगे....

यह संवाद हुए कुछ दिन बीत गए हैं. जिस मित्र से संवाद हुआ वह सहज है. उसके पिता भी, पत्नी भी...मामा भी और भी सब लोग शायद. बस मैं ही सहज नहीं हूँ. लगता है अम्मा के कलेजे में अपमान का जो दंश चुभा होगा, वो सालता तो होगा. अम्मा पहले भी एक बार घर छोड़कर बेटे के साथ चली गयी थीं. तब छोटा बेटा था अविवाहित.अब वो बेटे के साथ ही रहती हैं. बेटे की बीवी यानी छोटी बहू से बनती नहीं. कई बार बातों में यह आ चुका है कि माँ बेचारी हो गयी हैं अब. उन्हें कौन रखेगा? इसलिए यहीं रहेंगी, बस इस बात को मानती नहीं हैं.सोचती हूँ क्या यह सिर्फ एक घर या रिश्ते की कहानी है? नहीं, यह स्त्रियों के अकेलेपन की असुरक्षा की कहानी है.

क्या इन्हीं दिनों के लिए रिश्ते बनाये जाते हैं? शादी की जाती है कि बुढ़ापे में एक-दूसरे के साथ रहेंगे. बच्चे पैदा किये जाते हैं कि बुढ़ापे में जब शरीर अशक्त होगा तो बच्चे देखभाल करेंगे. सिर्फ आश्रम में न छोड़ आना ही काफी नहीं, माँ-बाप को उनको सम्मान के साथ रखना भी जरूरी है. ओह रखना जरूरी है का क्या अर्थ हुआ भला, हमें उनके साथ रहना है यह बोध होना जरूरी है हमें भी तो. उनके भीतर की असुरक्षा को समझना, उसे अपने होने से भरना भी जरूरी है. उन्हें ऐसी स्थिति में पड़ने से बचाना भी जरूरी है जहाँ उनका अपमान होने की संभावना हो.

एक स्त्री का सच में अपना कोई घर नहीं होता. उम्र के किसी भी मोड पर उसे यह बात चुभ सकती है. घर की रजिस्ट्री उसके नाम हो तो भी. मुझे लगता है अम्मा को समझने की जिम्मेदारी छोटी बहू को ही लेनी चाहिए. इन पुरुषों को अभी बहुत वक़्त लगेगा अपने दायरों से निकलने में लेकिन हम स्त्रियों को देर नहीं करनी चाहिए.

मैं मित्र से बहुत दूर हूँ लेकिन बहुत जोर से रोना चाहती हूँ अम्मा के गले लगकर. पिता, पति, पुत्र, भाई कोई भी कहाँ दे पाया भरोसा कि जिस भी घर में वो रह रही हैं, जहाँ वो जाना चाहती हैं वो सब उनके ही घर हैं, उनका अधिकार है उन घरों पर. उन्हें कहीं क्यों जाना है छोड़कर...लेकिन क्या वो कभी कह पायीं कि तुम चले जाओ घर से, हाँ, ये सुना अलबत्ता कई बार उन्होंने.

मित्र को मेरी बात ज्यादा समझ नहीं आती. 'कुछ ज्यादा ही सोचती हो' कहकर वो हंस देता है. मुझे अम्मा ज्यादा मित्रवत लगती हैं. दुनिया की तमाम स्त्रियाँ अम्मा सी लगती हैं.

(अमृता शेरगिल की पेंटिंग गूगल से साभार )

Tuesday, March 10, 2020

फेसबुक


लोगों की वॉल पर उतराती
दंगे की तस्वीरें, वीडियो, खबरें
छोड़ रही हैं कसैलापन
व्याकुलता, क्षोभ,पीड़ा
दूर कहीं उदास कोयल
 गा रही है उदासी का राग

हर ओर के लोग दुःख से भरे
कुछ गुस्से से भरे
कुछ सुकून से भी भरे हुए
कुछ हिसाब लगाते कि
इसके मरने पर दुखी हो
उसके मरने पर दुखी क्यों नहीं
इस बच्चे के आंसू से पसीज रहे हो
उस बच्चे के आंसू के वक़्त कहाँ थे

ये लोग थे तो 'एक ओर ही'
अलग-अलग कब हुए
इसका कोई ब्यौरा नहीं

तभी एक सिनेमा का जिक्र
गुजरता है नज़रों से
बदलता है स्वाद
जेहन की जीभ का

कहीं कोई स्त्री
नयी साड़ी वाली फोटुक में लहराती है
किसी की यात्रा की तस्वीरें
नज़रों से अनायास ही टकरा जाती है

कोई प्रेयसी उदासी में पिरो रही है
मेंहदी हसन की गज़ल
'मुझसे ख़फा है तो जमाने के लिए आ...'

किसी ने कविता पाठ ठोंक दिया है
फेसबुक की दीवार पर खूँटी गाड़कर
याद दिलाया एक सन्देश ने उन दोस्तों का जन्मदिन
जिन्हें कभी मिले भी नहीं
अपने करीबियों के जन्मदिन भूल जाने वाले भी
अब भर-भर भेजते हैं बधाई अनजाने लोगों को
पहले डायरियों में लिखा करते थे अपनों के ख़ास दिन

रवाना करने के बाद शुभकामनाओं की खेप
नजर आती है कोई पकवान की तस्वीर
लीजिये रेसिपी भी मांग ली है किसी ने तो
इसके पहले कि जुबान पर टिकता पकवान का स्वाद
बड़े साहित्यिक जलसे की तस्वीरें नुमाया होती हैं
कौन क्या बोल, किसने क्या सुना से ज्यादा
किससे मिले, कितनी तस्वीरें खिंची
के दृश्य आँखों में झरते चले जाते हैं

निपटा के घर के काम एक स्त्री
कोने में बैठी है उदास
देख रही है आकाश
हालाँकि किताब का कोई अधखुला पन्ना
फडफडा रहा है वहीँ उसके पास
बीच-बीच में बाज़ार दिखाने लगता है
आपकी पसंद की साड़ियाँ, शर्ट, जूते
आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस तो
पति और प्रेमी से बेहतर निकला
इसे तो हमारी पसंद के रंग और पैटर्न भी पता हैं
बाज़ार की ओर
चल पड़ती हैं उँगलियाँ अनचाहे ही
उलझी रहती हैं कुछ देर

त्योहार आ ही गया सर पर
रंग ही रंग छाने लगा है दीवारों पर
इसके पहले कि ठहरे कोई रंग
जीवन में, जेहन में
फेसबुकिया हलचल बदलती रहती है
मिजाज़ मन का

वो एक ही पल की बात है जब
रंग और बेरंग दोनों ही दुनिया में
थिरकती हैं उँगलियाँ
मुस्कुराने और रोने वाले ईमोजी
सेकेंड्स के भीतर उँगलियों से रिहा होते हुए
अवतरित होते हैं वॉल पर

कोई नोटिफिकेशन फिर थमा देता है उदासी
कि दंगों में मरने वालों की संख्या बढ़कर....हो गई है
राष्ट्रवाद फिर से मनुष्यता से टकराने को
बाहें कसने लगा है फेसबुक पर...

Monday, March 9, 2020

मारीना- एक किताब की सहयात्रा में


- सिध्धेश्वर सिंह

इस किताब के बुने जाने के वास्ते रेशों के काते जाने की आहटें कुछेक वर्षों से मेरे कानों तक पहुंच रही थीं।इस बात का भान था कि 'कुछ' बन रहा है ; कुछ सीझ रहा है।पर इस बरस नया साल आते - आते किताब अंततः आ ही गई जो कि प्रकाशकीय हवाले से 'रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा का युग और जीवन' दर्शाने वाली एक 'जीवनी' है।आमतौर पर कोई भी (साहित्यिक)) जीवनी किसी 'था' अथवा 'थी' हो चुके व्यक्तित्व के कृतित्व पर रोशनी डालने वाली एक ऐसी किताब होती है जिसके जरिये एक पाठक अपने अब तक के जाने हुए में कुछ और जोड़कर देखता है लेकिन जिसके बारे में किताब लिखी जाय वह 'थी' होकर भी निरंतर/ सतत 'है' बनी रहे तो जाहिर है कि ऐसी किताब कुछ अलहदा ,कुछ जुदा ,कुछ न्यारी ,कुछ हट के तो होनी ही चाहिए।

किताब का नाम है 'मारीना 'और इसे लिखा है प्रतिभा कटियार ने।इसी साल जनवरी 2020 में आई यह किताब पिछले दो - ढाई महीने से मेरे साथ यात्रा करती रही है।नौकरी के सिलसिले में घर से डेरा और डेरे से घर की यात्राओं में इसे बहुत धीमी गति से ठहरकर पढ़ता रहा हूँ और अब इस स्थिति में हूँ कि एक पाठक की हैसियत से कुछ कह सकता हूँ। सबसे पहली बात तो यह कि यह जीवनी भर नहीं है बल्कि एक कविता प्रेमी का अपने प्रिय कवि को दिया गया एक ऐसा 'ट्रिब्यूट' है जिसमें महानता ,श्रद्धा और भावुकता की जगह दोस्ताना संवाद है।बड़े कवियों पर लिखी जाने वाली किताबों में उनकी बड़ी बातों पर ज्यादा फोकस रहता है और यह वह सबकुछ होता है जिसे दुनिया जाहिरा तौर पर जानती है। 'मारीना' इस अर्थ में भिन्न है कि यह वह सब तो बताती ही है जो कि एक कवि के जीवन और उसके रचे गए को सामने रखने से ज्यादा यह बता जाती है कि किसी कवि को कैसे पढ़ा जाय और उस पढ़े को गुनकर कैसे जिया जाय।पढ़ना तो मन लगाकर किया जा सकता है।समय ,समझ और उम्र के गुनने की थोड़ी सलाहियत भी आ (ही) जाती है लेकिन किसी कवि के जिये से उपजे रचे में रमकर जी जाना इतना सहल भी नहीं।मुझे लगता है कि यह वही बिंदु है जिसे जिगर मुरादाबादी और मिर्ज़ा ग़ालिब 'एक आग का दरिया है और डूबकर जाना है' तथा 'वो ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता' कह गए हैं।इस किताब को पढ़ते हुए मुझ बार - बार लगता है की मारीना की जिंदगी और शायरी का 'तीर -ए- नीमकश' जीवनीकार प्रतिभा कटियार के दिलोदिमाग में कहीं गहरे तक खुभा हुआ है। नहीं तो कोई किसी अदेखे -अजाने कवि को इतनी आत्मीयता से कैसे जान सकता है भला !

'मारीना' नामक इस किताब में कुछ रूस की एक महान कवयित्री के जीवन की 'क्रोनोलॉजी' है।उसके जगत के 'किस्से' हैं।उसकी कविताओं की किताबत है जो अनुवादों के जरिए संसार भर की अनेकानेक भाषाओं में घुलकर सदानीरा है। यह सब तो है ही इसमें लगभग हर चेप्टर के बीच पेजब्रेक की तरह 'बुकमार्क' शीर्षक से दर्ज वे इबारतें हैं जो इस एक मँझोले कद वाली किताब को हमारी हिंदी की एक जरुरी किताब बनाती हैं।.. और क्या कहूँ ! एक पाठक* के रूप में यह मेरी एक छोटी - सी टीप है जिसकी साझेदारी का मकसद बस यह है कि अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो मेरी राय है कि अवश्य पढ़िए और अगर पढ़ी है तो मैं सचमुच जानने को उत्सुक हूँ कि यह आपको कैसी लगी?
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* 'पाठक' शब्द पर स्टार लगाकर यह फुटनोट इसलिए लिख रहा हूँ कि ( हिन्दी के) एक प्रोफेसर के रूप में 'मारीना' की समीक्षा लिखना मेरे लिए बहुत आसान था लेकिन मैं अपने पाठक का क्या करूँ ! हिन्दी की पढ़ने - लिखने वाली बिरादरी में जिस तरह किसी किताब के आते ही 'ब्रेकिंग न्यूज' की तरह 'ब्रेकिंग रिव्यूज' आ रही हैं वैसे में इतनी देर से आज / अब अगर कुछ लिख सका तो अपने लिए बस यही कहूँगा कि (पढ़त - लिखत में) 'हमन को होशियारी क्या !' और जीवनीकार प्रतिभा कटियार के वास्ते भी कबीर के ही शब्द उच्चारूँगा कि 'हमन हैं इश्क मस्ताना '। तो,बस एक जानकारी भर कि एक कवि और उसकी कविताओं के इश्क में डूबी यह किताब 'मारीना' संवाद प्रकाशन से छपी है और इसका दाम तीन सौ रुपये (मात्र) है। तो ,मन करे तो 'मारीना' को खोजिए,खरीदिए और पढ़िए।
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पुनश्च : यह विश्व पुस्तक मेला ,नई दिली की तस्वीर है जिसमें 'संवाद' के स्टाल पर बैठीं एक कवि -अनुवादक की बेटी और दो युवा कवयित्रियों की प्यारी भतीजी नेहिल हैं जो मेरे इसरार पर 'मारीना' की मेरी वाली प्रति पर अपने ऑटोग्राफ दे रही हैं।

Wednesday, March 4, 2020

कई बेआवाज थप्पड़ों की याद दिलाती फिल्म ‘थप्पड़’


'थप्पड़' बस इतनी सी बात? बस इतनी सी बात पर घर छोड़ दिया? इतनी सी बात पर तलाक ले लिया? पागल है क्या? कितना तो चाहता था उसका पति उसे, थोड़ा बहुत तो हो जाता है ऊंच-नीच. इतना एडजेस्टमेंट तो रिश्तों में चलता है. ऐसे सोचने लगें तो एक भी औरत घर में रहे ही न सब घर छोड़कर चली जाएँ. सारी शादियाँ टूट जाएँ. ये तो कुछ ज्यादा ही दिखा दिया फिल्म में.. औरत वो जो घर जोडकर रखे, खुद सहे लेकिन परिवार पर आंच न आने दे. जिन औरतों ने सहा नहीं उनके घर टूटे ही हैं. ये और बात है कि टूटे घर वाली औरतों ने भी कम नहीं सहा. फिर इस फिल्म में तो लड़का सौरी फील भी कर रहा था. लेने भी आया. कितना कहा कि गुस्से में था...लड़की मानी ही नहीं...ऐसे तो चल लिया यह समाज. ऐसे तो निभ गयीं शादियां?

थप्पड़ देखते हुए आसपास से सुनाई देने वाले वक्तव्यों के चेहरे कुछ ऐसे ही थे. ‘इत्ती सी बात...’ यही बार-बार सुनाई दे रहा था. सच कहूँ तो कुछ देर तक समझ में मुझे भी नहीं आया कि इत्ती सी बात को फिल्म का विषय क्यों बनाया. इसमें बहुत कुछ और शामिल हो सकता था. माइनस थप्पड़ जो एक एक्सट्रीम गुस्से की वजह से पत्नी पर निकल गया अमृता की जिन्दगी में सब कुछ तो ठीक था. कुछ ज्यादा ही ठीक था. कितनी लड़कियों के पिता उन्हें इतना प्यार करते हैं भला, कितने पिता अनकंडीशनली बेटियों के साथ खड़े होते हैं. अव्वल तो वो खड़े होना ही नहीं चाहते क्योंकि वो आखिरी दम तक घर बसा रहे की कोशिश करने में लगे रहते हैं बिना यह सोचे कि इस कोशिश में कितनी घुटन होगी. जो पिता साथ खड़े होना भी चाहते हैं उनके आगे ‘समाज क्या कहेगा’ की दीवार आ जाती है.

कितनी लड़कियों को पड़ोस की कोई स्त्री बिना जज किये जोर से गले लगा लेती है. कितनी स्त्रियों को उसकी भाभी या भाई की मंगेतर मजबूती से थाम लेती हैं...अमृता खुशकिस्मत है.

भारतीय समाज की स्त्रियाँ अभी इतनी खुशकिस्मत नहीं हैं. सोचती हूँ कि कौन सी स्त्री होगी जो फिल्म देखकर यह नहीं सोचेगी बस इत्ती सी बात पर तलाक ले लिया, हमने तो इससे हजार गुना ज्यादा सहा, रोज सहते हैं...यही फिल्म का केंद्र बिंदु है. यह एहसास कराना.

जिस नीले रंग की दीवारों वाले घर के ख्वाब अमृता देखती है वो नीला रंग उसकी पसंद तो था ही नहीं, लेकिन उसने पति विक्रम की पसंद को इस कदर आत्मसात किया कि उसे लगा ही नहीं कि उसकी पसंद का रंग तो पीला था शायद. वो इस कदर भूल चुकी है कि पापा से कन्फर्म करती है इस बात को. 'मेरा फेवरेट रंग तो पीला था न पापा?' यह एक और बात है कि कितने पिताओं को अपनी बेटी के फेवरेट रंग और उनकी फेवरेट खाने की चीज़ों के बारे में पता है? हालाँकि सारी ही बेटियों को पता है पिता की पसंद की हर चीज़ के बारे में.

यह फिल्म सिर्फ थप्पड़ के बारे में नहीं है, यह रोज-रोज होने वाली उन छोटी उपेक्षाओं के बारे में है जो आत्म सम्मान को तोडती हैं लेकिन जिन्हें इग्नोर करके स्त्रियाँ घर की डोर थामे रहती हैं बिखरने नहीं देतीं.

'फिर से नयी गाड़ी ? ये आखिर करती क्या है?' अपनी सिंगल पड़ोसन की नयी गाड़ी पर ऐसे कमेन्ट देने वाले पति विक्रम को भले ही अमृता ने 'हार्ड वर्क करती है' कहकर हंसते हुए इग्नोर कर दिया हो लेकिन यह समूचे समाज का आईना है. जब अमृता कहती है ‘मैं भी सीख लूं गाड़ी चलाना?’ तो विक्रम कहता है 'तुम पहले आलू के पराठे बनाना सीख लो'. जब लड़कियां घर के काम में खुद को झोंक देती हैं हैं तो थप्पड़ नुमा कमेन्ट मिलता है ‘तुम चूल्हे में ही घुसी रहना, और चूल्हे से बाहर निकली स्त्रियों पर वो फ़िदा होने लगते हैं. जब वो बाहर निकलती हैं, तरक्की करती हैं तो उनका चरित्र चित्रण होने लगता है. उन्हें गाड़ी चलाना सीखने, आलू का पराठा बनाना सीखने, बच्चे पैदा करने, प्रमोशन हासिल करने, सुंदर दिखने, सामान्य दिखने हर बात के लिए थप्पड़ नुमा कमेंट इतने सहज रूप में मिलते रहते हैं कि स्त्रियाँ भी आदी सी हो जाती हैं इनकी.

क्यों स्त्रियों पर बने चुटकुले स्त्रियाँ ही मजे लेकर पढ़ती हैं, सुनती हैं सुनाती हैं. ये वो थप्पड़ है जिसे एक-दूसरे के गाल पर मारने के लिए हमें तैयार किया गया. एक चेतन स्त्री को हमेशा खतरे के तौर पर ही देखा गया है. चेतन स्त्री, घर, परिवार, समाज सबके लिए खतरा है. वो सब परिवार खुशहाल हैं जहाँ स्त्रियों ने कभी सवाल नहीं किये और पुरुषों ने यह बात कभी महसूस भी नहीं की.

अमृता के पिता जो काफी समझदार और संवेदनशील हैं उन्हें यह सुनकर झटका लगता है जब उनकी पत्नी बुढ़ापे में यह कहती है कि ‘सहा तो उसने भी है’. उन्हें लगता है कि वो तो बहुत ख्याल रखते हैं इसलिए उनकी पत्नी ऐसा कैसे कह सकती है. तब वो कहती है ‘मैं गाना चाहती थी लेकिन अगर मैं गाती तो बच्चे कौन पालता. किसी ने नहीं कहा तो भी मुझे पता था मुझे क्या करना है.’ लेकिन अंतिम वाक्य कि 'तुमने तो भी तो कभी नहीं कहा कि मैं अब गाती क्यों नहीं?' प्राण वाक्य है.

अगर खुद की मर्जी से घर की स्त्रियाँ पुरुषों पर, बच्चों पर, परिवार पर अपनी इच्छाओं को कुर्बान कर रही हैं और आपको यह पता भी नहीं तो आपकी यह उपेक्षा भी थप्पड़ है

बस इत्ती-इत्ती सी ही होती हैं बातें जोड़ने की भी और तोड़ने की भी. अस्तित्व फिल्म का वह दृश्य याद आता है जब तब्बू से उसका घर छोड़ने को कहा जाता है. कहने वाले पति और पुत्र दोनों हैं. वह घर जिसे उसने रत्ती रत्ती जोड़ा था अचानक उसका नहीं रहा. उसी एक गलती की वजह से जिसे पति भी शौकिया कई बार करता रहा है और जिसे खुद के लिए गलती माना ही नहीं.

यह फिल्म बहुत कम है, समाज में इससे कहीं ज्यादा थप्पड़ हैं जो रोज तड़ातड पड़ रहे हैं जिनमें से बेआवाज थप्पड़ों की तादाद बहुत ज्यादा है. यह फिल्म रिश्ता और सम्मान में से अगर चुनना हो तो सम्मान बचाने की ओर ले जाती है.

यह फिल्म स्त्रियों के बारे में है लेकिन इसे पुरुषों को जरूर देखना चाहिए. अपने घर की तमाम स्त्रियों के साथ देखना चाहिए. रो लेना चाहिए थोड़ा सा, महसूस कर लेना चाहिए अपनी गलतियों को. उन स्त्रियों के प्रति सम्मान से भर जाना चाहिए जो रोज आपकी उपेक्षाओ के थप्पड़ खाती हैं बिना शिकायत किये.

हर पिता को यह फिल्म देखनी चाहिए और सोचना चाहिए बेटियों के साथ सुंदर रिश्ता बुनने के बारे में.

दुस्वप्न


पीछे कुछ अनजाने लोग थे
उनके हाथों में थे हथियार

वो मुझे नहीं जानते थे
मैं भी उन्हें नहीं जानती थी
वो मुझे मारना चाहते थे
क्यों मारना चाहते थे
ये न वो जानते थे
न मैं जानती थी

यह बात तो कोई और ही जानता था

हथियारों से लैस उस भीड़ से बचकर भागते हुए
अचानक टकरा गई अपने प्रेमी से
सांस में आई राहत की सांस
छलक पड़ीं आँखें
पीड़ा और सुख दोनों से एक साथ
कि उसने कहा था
वो मुझे दुनिया के हर दुःख से बचाएगा
आंच नहीं आने देगा मुझ पर

छुप गयी उसके पीछे जाकर
भीड़ थमी
भीड़ के कुछ चेहरे मुस्कुराये
अचानक मेरा प्रेमी सामने से हटते हुए बोला
'ले जाओ इसे'

उस रोज पहली बार
प्रेमी का धर्म मालूम हुआ
इसके पहले तक प्रेम ही था
हम दोनों का धर्म

कत्ल होने से पहले मैंने महसूस किया
कि अब मुझे भीड़ के हाथों
कत्ल होने का दुःख नहीं
दुःख था प्रेम के धार्मिक हो जाने का

मुझे भीड़ ने नहीं प्रेम ने मारा
और हमारे बीच जो प्रेम था
उस प्रेम को किसने मारा...

Sunday, February 23, 2020

कथन-अमानुषिकता से जूझती दुनिया

कथन का नया अंक है इन दिनों साथ. कथन सजाकर रखने, उलट-पुलटकर देखने और रख देने वाली पत्रिका नहीं है. इसमें डूबना होता है, आप पढकर निकल जाएँ ऐसा इस पत्रिका की सामग्री होने नहीं देती. यह पिछले इतवार की बात है जब कथन की पैकिंग खोली और इत्मिनान वाली धूप में कवितायेँ पढ़ीं. मलखान सिंह की कविताएँ झकझोर देने वाली कवितायें हैं. सभ्य कहे जाने वाले समाज को आईना दिखाती कवितायेँ. लीलाधर मंडलोई,मुस्तफा खान, विमल चन्द्र पांडे, श्रुति कुशवाहा,आत्मा रंजन और विहाग वैभव की कवितायेँ पुनर्पाठ मांगती हैं जैसे हर अच्छी कविता मांगती है. बीते इतवार पढ़ी गयी ये कवितायेँ पूरे सप्ताह जेहन में खदबदाती रहीं. अनुज लुगुन की कविताओं को राजेश जोशी जी की टिप्पणी के साथ पढा. एक कविता के कितने पाठ हो सकते हैं, कितने अर्थ.


आज जब फिर इतवार मिला तो फिर इन कविताओं को पढ़ा. कविताओं के अतिरिक्त अभी दो कहानियां और एक साक्षात्कार पढ़ सकी हूँ. कहानियां सीमा आजाद और प्रियदर्शन जी की. सीमा आज़ाद की कहानी फेसबुक लाइव जहाँ इंटरनेट की दुनिया की हकीकत खंगालती है वहीँ प्रियदर्शन जी की कहानी 'सडक पर औरत' एक रिश्ता बुनती है हर स्त्री का दूसरी स्त्री से. चेतना से उपजा यह रिश्ता संवेदना के तल पर मजबूत होता है.
लाल बहादुर वर्मा जी से संज्ञा की बातचीत संभालकर रखने लायक है. अमानुषिकरण की समस्या पर यह विस्तृत बातचीत है जिसमें जितने मंझे हुए सवाल हैं उतने ही उदार और मुक्त जवाब जिसमें अमानुषीकरण की समस्या के समाधान पर चर्चा तो है लेकिन वर्मा जी पहले समस्या को ठीक से समझने पर जोर देते हैं और कारणों की पड़ताल करते हैं.अभी जो पढ़ना शेष रह गया है उसमें गौहर रजा जी का लेख गांधी के रास्ते पर लौटना ही होगा और राजीव भार्गव का लेख 'ब्रह्मणवाद के विरोध का वास्तविक अर्थ' पहली फुर्सत में पढ़ना है.

बढती अमानुषिकता से जूझती दुनिया इस अंक की थीम है. कथन का यह अंक हम सबके पास होना चाहिए. पढने के लिए दोस्तों को बांटने के लिए और इसमें दी गयी सामग्री पर बातचीत करने के लिए.
मलखान सिंह की एक कविता-

महज इत्तेफाक नहीं है यह
कि सदियों से वे
साढ़े तीन हाथ लम्बी नाक लिए
अवतरित होते हैं
हम पैदा होते हैं नकटे ही
नकटे ही मर जाते हैं.

कि हमारी धोती
घुटने नहीं ढंक पाती हमारे
उनकी धोती अंगूठा चूमती है पैर का
तर्जनी में घूमती है.

कि हल की मूठ भी
पकड़ना नही जानते थे
कहलाते नम्बरदार
हम पूरी उम्र
बैल बन हाँफते हैं
हरामखोर कहलाते हैं.

कि हमारी बस्ती में उगा पौधा
दरख्त होने से पहले ही
सूख जाता है
उनके आंगन का बूढा पेड़ भी
हाथी सा झूमता है.

कि हमारे सर नंगे हैं
हमारे पैर नंगे हैं
वे रोज जूता बदलते हैं
सर पर मुडासा बाँध
चौधराहट पेलते हैं.

कि लम्पट हैं वे
लफंगई करते हैं
हवेलियों में रहते हैं
आँखों के अंधे हम
उम्र भर लददू बने
छत को तरसते हैं.

कि उनकी हर सुबह
सतरंगे पंख लगाये उगती है
हमारी रात है ससुरी
सिमटने का नाम ही नहीं लेती.

तभी तो आज
आज़ादी की आधी सदी बाद
हमारे पेट खाली हैं
हमारे हाथ खाली हैं
हम बिकने जाते हैं चौराहों पर
नहीं बिक पाते जिस रोज
चूल्हा भी नहीं जल पाता है.

Saturday, February 22, 2020

प्यार वाली शाम मारीना के नाम


नरेंद्र सिंह नेगी में उत्तराखंड के लोगों की जान बसती है. उन लोगों में अब मैं भी हूँ. जब मैं उत्तराखंड आई तो मैंने पहला पहाड़ी गीत जो सुना वो था 'ठंडो रे ठंडो, मेरे पहाड़ को पानी ठंडो, हवा ठंडी...' यह गढ़वाली गीत है और मुझे इस समूचे गीत में मेरे पहाड़ का पानी ठंडा है, हवा ठंडी है के सिवा कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था लेकिन यह गीत मुझे झुमा रहा था, न समझ आने वाली गढ़वाली भी मिसरी सी कान में घुल रही थी और एक रिश्ता बन रहा था नए संसार से, संस्कृति से, बोली से, भाषा से. साहित्य संगीत और संस्कृति में अपनेपन की चुम्बकीय शक्ति होती है जोड़ने की. नरेंद्र सिंह नेगी ने इसी शक्ति का प्रयोग लोगों के दिलों में बसने के लिए किया, समाज को दिशा देने के लिए किया.

मेरी खुशकिस्मती है मुझे उनका स्नेह मिला. उनसे जब भी मुलाकात हुई बेहद स्नेहिल, आत्मीय याद रह जाने वाली मुलाकातें हुईं. ऐसी ही एक शाम दो दिन पहले फिर मीठी मुलाकातों वाली गुल्लक में जमा हुई. इस मुलाकात में गिर्दा का जिक्र भी हुआ और शेखर पाठक जी का भी, गणेश देवी का भी. बोली और भाषा के बीच किस तरह लकीरें खींची गयी हैं जबकि कोई लकीर है नहीं जैसी बातों से गुजरते हुए मारीना की यात्रा तक भी पहुंची. उन्हें यह जानकार बहुत अच्छा लगा कि यह मौलिक काम है. उन्होंने कहा, जितना भी रूसी साहित्य हिंदी में उपलब्ध है अनुवाद ही है ज्यादातर, मौलिक काम तो बहुत विशेष हुआ. जल्द वो किताब पढ़ेंगे. लेकिन पढने से पहले उन्हें बहुत कुछ जानना था किताब के बारे में सो खूब बातें हुईं.

इस मीठी मुलाकात वाली शाम का क्रेडिट तो सुभाष को ही जाता है वैसे.

Sunday, February 16, 2020

शिकारा-एक प्रेम पत्र


कश्मीर की वादी से एक प्रेम पत्र आया है. हम सबके नाम. क्या आपने वह प्रेम पत्र पढ़ा? मैं भी कहाँ पढ़ पायी. कबसे रखा था बंद ही. भागते दौड़ते ही देखो न वैलेंटाइन डे भी निकल गया. आज जाकर खत खोला.

शदीद इच्छा थी शिकारा देखने की. देखना चाहती थी कि विधु विनोद चोपड़ा की नजर से खूबसूरत कश्मीर और सुंदर होकर कैसा दीखता है. मैंने कोई फिल्म प्रिव्यू नहीं देखा न कोई रिव्यू पढ़ा. बस कि एक प्रेम कहानी जो कश्मीर के आंगन में जन्म लेती है उसे देखना था. फिल्म टाइप होती चिठ्ठी के साथ खुलती है जो कश्मीर के मसायल के बारे में बात करने के लिए एक युवा अमरीकी प्रेसिडेंट को लिख रहा है. अगले ही फ्रेम में पता चलता है कि 28 साल से करीब 1300 चिठ्ठियां लिख चुके उस युवा को अमरीकी प्रेसिडेंट का बुलावा आ ही गया. शिव नामक यह युवा जो अपना तमाम युवापन चिठ्ठियाँ लिखने में गँवा चुका है प्रेसिडेंट से मिलने अपनी प्यारी पत्नी शांति के साथ निकल पड़ता है. आगरा शहर, ताज होटल, प्रेसिडेंट स्यूट की भव्यता में खुलती है एक प्रेम कहानी 'शिकारा'.

यह खालिस प्रेम कहानी है. फ्रेम दर फ्रेम मोहब्बत जवां होती है, निखरती है, हालात से जूझती है. कश्मीर की कहानी है तो कश्मीर के मसायल भी होंगे. डल झील के नज़ारे भी होंगे और चिनारों की छाँव भी. शिव और शांति की मोहब्बत प्रेम के उस रूमानी दीवान से शुरू होती है जिसे लिखने वाले शिव खुद हैं और उस दीवान की दीवानी को यह पता नहीं. जब पता चलता है तो वही होता है जो हमेशा से होता आया है. दो दिल एक सम पर धड़कते हुए एक शिकारे पर सवार होकर जिन्दगी के सफर पर निकल पड़ते हैं.

शिव बने आदिल और शांति बनी सादिया अपनी तमाम मासूमियत से इस कदर लुभाते हैं कि कश्मीर की फिजाओं में जज्ब होते जाते हैं. मानो वो कश्मीर की कुदरत के ही किरदार हों जैसे चिनार, जैसे झेलम, जैसे सेब के बागान, जैसे वादियों से उठती कोई कश्मीरी धुन, जैसे फूलों भरे शिकारे पर चांदनी रात में की गयी रूमानी सी सैर, शिव और शांति की इस प्रेम कहानी से रश्क किया जा सकता है जिन्होंने पूरी जिन्दगी एक दूसरे से प्रेम किया और प्रेम की उसी खुराक पर जीते हुए दुनिया की तमाम मुश्किलों का सामना किया.

अपनी ही आँखों के सामने अपने बड़े भाई की हत्या देख चुके शिव की टूटन को शांति जिस कसावट भरे आलिंगन से और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए तरह सहेजती है उसे देख अपने भीतर भी कुछ पिघलता हुआ महसूस होता है. फिल्म में अल्फाज़ की कहन कम है, महसूसने की गढ़न ज्यादा है. प्रेम को असल मायने देती फिल्म एक बड़े से खूबसूरत घर में भी और फिर रिफ्यूजी कैम्प में भी हाथ थामे रहती है.

शांति के ख्वाब को शिव पलकों पर उठाये फिरता है और शिव की इच्छाओं को अपने आगोश में कसकर सहेजती है शांति. उनके ख्वाब ऊंचे हैं लेकिन इंसानियत के आगे, दिल की धडकनों के आगे उन ख्वाबों को बेझिझक कुर्बान करते हैं दोनों बिना कुर्बानी के किसी एहसास के. ऐसा ही तो होता है प्रेम...जो 'मैं' से निकलकर 'हम' में फिर 'हम सब' में तब्दील हो जाता है.

शिव चाहता तो प्रेफेसर बनकर जा सकता था बेहतर जिन्दगी जीने की राह की ओर लेकिन उसने रिफ्यूजी कैम्प में रहकर यहाँ के बच्चों को पढ़ाना चुना.

फिल्म कश्मीर से विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों की कहानी है, लेकिन मुझे यह कश्मीर में मिलजुलकर रहने वाले हिन्दू मुसलमानों के प्रेम की कहानी भी लगी. प्रेम के दुश्मन सियासत करने वालों की भी लगी जो सिर्फ अपने फायदे के लिए सदियों से दो जिस्म एक जान की तरह रह रहे हिन्दू और मुसलमानों के बीच फांक करते हैं. चाहे वो बेनजीर हों, बुश हों या हिन्दुस्तानी लीडरान. किसी को न हिन्दू की पड़ी है न मुसलमानों की सबको अपनी ही पड़ी है. इसी अपनी पड़े से नफरत की आग सुलगा-सुलगा कर राजनीति की जा रही है. वरना लतीफ़ और शिव जिस तरह दो भाइयों की तरह पले-बढे कैसे उनके बीच धर्म आ गया और उन्हें दूर कर गया..

शिव ने और उसके जैसे तमाम लोगों ने अपनों को खोया, अपने ही घर से बेघर हुए, घर होते हुए रिफ्यूजी कैम्प में रहे लेकिन उनके मन में नफरत नहीं पनपी. घर से बिछड़ने का दुःख है लेकिन आक्रोश नहीं. बदला लेने की बात नहीं. मुझे शिव और शांति की इस प्रेम कहानी में समाई विस्थापन की पीड़ा में समस्त स्त्रियों की पीड़ा भी दिखी. अपनी जड़ों से उखड़ना, नयी जगह जाकर बसना और पलट-पलटकर अपनी जड़ों को याद करना. यह हर उस व्यक्ति की पीड़ा है जिसे अनचाहे अपनी जड़ों से उखाड़ दिया जाता है.

यह फिल्म शिव और शांति की प्रेम कहानी के बहाने इंसानियत के प्रति प्रेम की कहानी है. सियासत की उस साजिश को समझने की सिफारिश भी करती है जिसका पेट ही नफरत की आंच पर रोटियां सेंककर भरता है. शिव को किसी से नफरत नहीं, शांति का कोई सपना नहीं सिवाय इसके कि सब प्रेम से रहें और शिव उसके साथ रहे.

रिफ्यूजी कैम्प में छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें न मंदिर की समझ न मस्जिद की किस तरह उनकी मासूमियत में नफरत घोल दी गयी कि उनका खेल ही बन जाता है 'मंदिर वहीं बनायेंगे' जिसे शिव सुभीते से प्रेम में बदलने की कोशिश करता है और साथ मिलकर रहने की बात करता है.

तमाम हिन्दुस्तानी जहाँ कश्मीर में हनीमून मनाने का सपना देखते हैं उनके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि एक कश्मीरी हनीमून के लिए कहाँ जाना चाहता है. यह सुंदर फिल्म है. प्रेम में रची बसी कहानी जिसे प्रेम से बयान किया गया है उस खत में जो कश्मीर की वादियों से भेजा गया है.

फिल्म के बारे में बात अधूरी रहेगी अगर राहुल पंडिता का जिक्र न हो जो इस फिल्म के लेखक हैं. बात पूरी नहीं होगी अगर रंगराजन रामबरदन की सिनेमोटोग्राफी का जिक्र न हो और जिक्र न हो इरशाद कामिल के गीतों का. इरशाद साहब मानो अल्फाजों की इबादतगाह में सजदा करते हुए कुछ अल्फाज़ उठा लेते हों, उन अल्फाजों को पलकों से छुआते हुए कागज़ पर रख भर देते हों. इन अल्फाजों को संगीत में ढाला ए आर रहमान, क़ुतुब-ए-कृपा, अभय सोपोरी, सन्देश शांडिल्य, रोहित कुलकर्णी ने.

पूरी फिल्म में कश्मीर की ऐसी खुशबू है कि कश्मीर से इश्क़ और गाढ़ा हो जाता है साथ ही यह दुःख भी कि किस तरह धरती के इस खूबसूरत से हिस्से को, यहाँ के प्यार से भरे हुए लोगों को घायल किया है सियासतदानों ने.

जबसे फिल्म देखी है फिल्म का गीत 'कुछ न होने का दुःख जरा सा लगे, तेरे होने से घर भरा सा लगा'...और 'ए वादी शहजादी, बोलो कैसी हो' न लबों से उतर रहे हैं न जेहन से. कश्मीर से आये इस प्रेम पत्र को प्रेम से पढ़िए बिना कोई हिन्दू मुस्लिम एंगल निकलने की कोशिश किये. यकीन मानिए, इश्क बहुत मुबारक शय है...इश्क़ में मुब्तिला रहिये.

http://epaper.subahsavere.news/m5/2556306/SUBAH-SAVERE-BHOPAL/17-feb-2020?fbclid=IwAR3k1642tTlKVQ35nenPXmY7exzluwGK4rhZMoPdfjbJrgGPX9Kt6KFUxx0#issue/5/1

Tuesday, February 4, 2020

ये खूबसूरत लड़कियां


'हल्ला बोल' बोलती
आज़ादी के नारे लगाती
न सिर्फ अपने
बल्कि अपनों के हक़ को भी समझती
उन हकों के लिए जूझती
लड़कियां खूबसूरत लगती हैं

जुल्मो-सितम के आगे घुटने न टेकने वाली
अपनी बात को ठीक से रखने वाली
उनींदी आँखों और उलझे बालों वाली,
खून और पसीने से लथपथ लड़कियों के
सौन्दर्य का नहीं है कोई सानी

सत्ता से टकराती, पुलिसिया मार खाती
जेलों में ठूंस दी जाती
फिर भी हार न मानने वाली लड़कियां
बहुत अच्छी लगती हैं

आज़ादी के तराने गाती
संविधान को सहेजती
अपनी शिक्षा को सही मानी देती
हिंसा के खिलाफ खड़ी होकर
हिंसा का सामना करती लड़कियां
बहुत प्यारी लगती हैं

रुपहले पर्दे से उतरकर
दुनियावी खूबसूरती का ताज उतार
हक़ की लड़ाई में शामिल लोगों के साथ
चुपचाप शामिल होती लड़कियां
बहुत ज्यादा सुन्दर लगती हैं
और ये सुंदर लड़कियां
सत्ता की आँख में किरकिरी सी चुभती हैं
सत्ता की आँख की यह चुभन
उनके सौन्दर्य को निखारती ही जाती है.

इतिहास बनाती लड़कियां 

वो समझती हैं अपनी मर्जी को
जीती हैं उस मर्जी को
न बनती हैं किसी के हाथ का खिलौना
न बाँध सकता है कोई उन्हें खूंटे से गाय की तरह
सर झुकाकर नहीं वो सीना तानकर चलती हैं
पढ़ती हैं इस्मत, कुर्तुलएन और मंटो को
आँख से आँख मिलाकर करती हैं बात
यूँ ही नहीं मानती बात कोई भी, किसी की भी
पूछती हैं सवाल, परखती हैं बात
इतिहास पढ़ती भर नहीं
इतिहास बनाने का भी माद्दा रखती हैं
अटकती नहीं देह के भूगोल में
कि दुनिया के नक्शे में दर्ज करना जानती हैं
अपने पैरों के निशान
नहीं भाता उन्हें
सकुचा-सकुचा के बात करना
बे-बात मुस्कुराना
मोहल्ले गॉसिप में वो शामिल नहीं होतीं
इसलिए उस गॉसिप का सामान बन जाती हैं

दौड़ती-भागती, हांफती लड़कियां
समर्थ होती हैं अपनी हर लड़ाई खुद लड़ने में
उन्हें कन्धों की तलाश नहीं होती
वो उठाना जानती हैं बोझ
अपने दुखों का, 
अपनी हार का भी

वे सभी, सुशील, गृहकार्य में दक्ष वाले वैवाहिक विज्ञापनों पर
रखकर खाती हैं समोसा
मुस्कुरा देती हैं किसी मजदूर के काँधे पर हाथ रखकर
रो लेती हैं जोर से खुली सडक पर
और उतनी तेज़ से हंस भी लेती हैं कहीं भी, कभी भी
नहीं आती किसी की लच्छेदार बातों में
अच्छे-बुरे का भेद बखूबी समझती हैं
आधी रात को सड़कों को पाट देतीं हैं आज़ादी के नारों से
वो अपनी लड़ाई लड़कर चैन से सोती हैं
लेकिन नींदें उड़ा देती हैं समाज के ठेकेदारों की

इनके चेहरे पर अश्लील फब्तियों का तेजाब फेंका जाता है
उन्हीं की देह रौंदकर उन्हें ही
चरित्रहीन करार दिया जाता
फिर भी डरती नहीं ये लड़कियां
लड़ती हैं आखिरी सांस तक
इतिहास उन्हें टुकुर-टुकुर देखता है
चरित्रहीनता के तमाम सर्टिफिकेट
औंधे पड़े हैं इनकी मुस्कुराहटों के आगे.
कि दुनिया को जीने लायक बना रही हैं 
ये चरित्रहीन करार दी गयी लड़कियां.

Monday, February 3, 2020

खेलती हुई लड़कियां...


खेलती हुई लड़कियां
जोर से मारती हैं बल्ले पर आई गेंद को
गेंद निकल जाती है आसमान के पार
लौट कर नहीं आती कोई गेंद वापस वहां से
लेकिन बल्ले से गेंद को मारने वाली लड़कियां
धरती पर खड़े-खड़े ही
जान जाती हैं आसमान के उस पार का राज
कि हौसलों के आसमान के सिवा
कुछ भी नहीं है न इस पार, न उस पार

मुस्कुराती हैं वो
करती हैं अगली गेंद का इंतजार
खेलती हुई लड़कियां फुटबौल को जब मारती हैं पैर से
तो मारती हैं जिन्दगी में आई मुश्किलों को भी
थोड़ा संभल के भी और पूरे जोर से भी
जिन्दगी में घिर आई नफरतों को वो एक ही बार में
कर देना चाहती हैं 'गोल' सिर्फ प्यार बचाना चाहती हैं धरती पर

स्टेडियम गूँज उठता है तालियों से
लडकियों की आँखों में उभरी नमी
प्रेम के पौधे को सींचने का सामान बन उभरती है

शतरंज खेलती लड़कियां ध्यान से देखती हैं
राजा, रानी, हाथी, घोड़े, पैदल
उन्हें शतरंज की बिसात पर बिछा नजर आता है जीवन
शह और मात का खेल
वो बहुत सुभीते से सोच समझकर चलती हैं चाल
खेलती हुई लड़कियां जीत जाती हैं खेल के मैदान में
उन्हें अभी सीखना है जीतना जिन्दगी के मैदान में

Monday, January 20, 2020

मौसी, माँ की किताब...


सुख क्या है? कोई किताब लिखना? प्रकाशित होना? प्रशंसाओं के घेरे में घिरना? नहीं, यह सुख का भ्रम हो सकता है सुख नहीं. सुख है पीड़ा से मुक्ति जो लिखने से पहले या लिखने के दौरान घेरे होती है, न जीने देती है न मरने देती है. लिख चुकने के बाद तनिक सी जो शांति मिलती है, बहुत थोड़ी सी बहुत कम देर को उसे कभी-कभार सुख जैसा महसूस किया है. वही सुख जो झट से उठकर चल देता है निर्मोही प्रेमी की तरह, बिना पीछे पलटकर देखे. हमें हमारे तमाम नए दुःख, पीड़ा, उलझन, बेचैनी के साथ छोड़कर.
यह छूटना बार-बार का है. सच कहूँ तो अब इस छूटने में ही मन रमता है. खुद का उदास चेहरा ज्यादा अपना सा लगता है.

शोर बाहर घटता है, भीतर घटने वाला सुख या दुःख सब बेआवाज घटता है. ऐसा ही बेआवाज सुख इन दिनों पलकें नम किये रहता है. किताब की बाबत कभी ज्यादा सोचा नहीं, काम के बारे में सोचा. सोचा उसे पूरी निष्ठा और प्रेम के साथ करने के बारे में और उनके बारे में जो इस यात्रा में साथ थे.

किताब की सूचना बहुत संकोच के साथ दोस्तों से साझा की और लगभग सारे ही दोस्तों ने पहली प्रति खरीदने की बात पूरे उत्साह से कही. सबको पहली प्रति खरीदनी थी. किसी ने भी मुझसे अभी तक मुफ्त में किताब की मांग नहीं की है. जो लोग खरीद सके हैं उन्होंने खरीद ली है और जो नहीं पहुँच सके हैं खरीदने तक वो अमेजन के लिंक का इंतजार कर रहे हैं.

दोस्तों का यह प्यार सुख है, और भी एक सुख है, कि पहली किताब खरीदने वाली पहली ग्राहक बनी बिटिया ख्वाहिश. पॉकेटमनी के पैसों से उसने पहली किताब खरीदी भी और औटोग्राफ भी लिया. सुख है किसी के सुख की वजह बनना. किताब दूर कहीं रखी है दोस्त सब बहुत करीब आ गए हैं.

सच, मुझसे किसी ने गिफ्ट में नहीं मांगी किताब...

(फोटो में अनि, ख्वाहिश और दीत्या)

Sunday, January 12, 2020

‘छपाक’ के सबक समाज की ‘सर्जरी’ की जरूरत बताते हैं...



-प्रतिभा कटियार

- एक लड़की अपनी दोस्त से इसलिए नाराज हो गयी क्योंकि उसकी दोस्त ने वो सेल्फी इन्स्टा पर पोस्ट कर दी थी जिसमें वो जरा कम अच्छी लग रही थी.

- एक दुल्हन ने रो-रोकर बुरा हाल कर दिया था कि पार्लर वाली ने उसका मेकअप ख़राब कर दिया था.

- उस रोज घर आये मेहमानों के आगे जाने से एक लड़की ने इनकार कर दिया क्योंकि वो सर में तेल चुपड़ के बैठी थी.

- उसका रंग सांवला था, वो चुपके-चुपके बादाम घिस के लगाने से लेकर फेयरनेस क्रीम तक लगाया करती थी और अकेले में रोया करती थी.

मामूली सी नजर आने वाली ये बातें हमारे आसपास की ही हैं. ‘छपाक’ फिल्म देखते हुए महसूस होता है कि कितनी बेमानी हैं ये वजहें. दिखना, सुंदर दिखना क्यों इतना महत्वपूर्ण बना दिया गया है. उसी सुदंरता पर हमला करके एक जिन्दगी को जिन्दगी से बाहर करने की घिनौनी हरकत करता है समाज. स्त्री को उसकी सुन्दरता और यौनिकता भर में इस कदर जकड़ दिया गया है कि समूची कुंठा चाइल्ड अब्यूज, रेप या एसिड अटैक के जरिये निकालने में ही जुटा है सम्पूर्ण हिंसक पितृसत्तात्मक समाज. इसमें हमलावर को बचाते लोग, सिस्टम और कानून हमलावर से कम दोषी नहीं हैं.

छपाक देखते हुए गला सिसकियों से रुंध जाता है. देह में सनसनाहट दौड़ती है. क्योंकि जो परदे पर चल रहा था वो लिखी हुई कहानी नहीं, भोगा हुआ हुआ सच था. अख़बारों की कतरनों में खबर को पढ़ना और उसे जिन्दगी पर गुजरते हुए महसूस करना दो बहुत अलग बाते हैं. छपाक उस दूरी को पाटती है.

कैसे लिखूं फिल्म पर, क्या लिखूं कि फिल्म अच्छी है, विक्रांत और दीपिका की एक्टिंग अच्छी है, निर्देशन कमाल का है और मेकअप वर्क जो कि इस फिल्म की जान है वह भी बहुत अच्छा है. क्या कहूँ कि गुलज़ार का लिखा गीत ‘कोई चेहरा मिटा के, और आँख से हटा के, चंद छींटे उड़ा के जो गया, छपाक से पहचान ले गया...’ दिल को झकझोर देता है.

नहीं...यह सब लिखने का मन नहीं. मेरे जेहन में तो फिल्म के कुछ दृश्य फ्रीज़ हो गए हैं. वो पहला दृश्य जब पीले और गुलाबी सलवार कमीज में सडक पर चलती लड़की अचानक सडक पर गिर पड़ती है, तड़पने लगती है, वो तड़पना अब तक जारी है. उसकी चीखें कानों में अब तक जा रही हैं.

अदालत का वो दृश्य जब राजेश लड़की का वो दोस्त जिस पर इतने बड़े हादसे के बावजूद मालती को भरोसा है कि ‘वो ऐसा क्यों करेगा’ अपने बयान से मुकर जाता है.

वो लड़की जो एसिड अटैक में शामिल है. उसके चेहरे के भाव और आँखों से झांकता कमीनापन भुलाये नहीं भूलता.

एसिड अटैक करने वाले बशीर के घर की औरतें जो मालती को हेय दृष्टि से देखती हैं और बशीर का साथ पूरी निर्लज्जता से देती हैं.

बशीर की शादी का लड्डू मालती के भाई के मुंह में ठूंसने वाली वो औरत.

मालती के भाई का मजाक उड़ाते दोस्त.

वकील जो मालती के खिलाफ केस लड़ रहा है और उसके सवाल.

मालती से बेतुके सवाल पूछते रिपोर्टर.

एक दृश्य जहाँ एसिड अटैक की विक्टिम पिंकी राठौर की मृत्यु हो जाती है और कोने में चुपचाप खड़ी मालती धीरे से कहती है कि ‘मुझे इससे जलन हो रही है.’

इन सबके बीच लक्ष्मी अग्रवाल जिन पर यह फिल्म बनी है एक रियलिटी शो में उनका यह कहना कि ‘जब मैं हिम्मत करके घर से बाहर निकली तो सबसे ज्यादा नकारात्मकता महिलाओं से मिली.’

‘छपाक’ सिर्फ फिल्म नहीं है आईना है जो हम सबके सामने रखा है. स्त्रियों के सामने भी पुरुषों के सामने भी. जो फिल्म का बायकाट कर रहे हैं उनके लिए तो बस एक ही बात मन में आती है कि कितना अच्छा होता कि आप तेजाब की खुलेआम बिक्री को बायकाट करते.

फिल्म के बहाने हम सबके भीतर पल रहे न जाने कितने नासूर बह निकलने को बेताब हैं. कुछ सवाल हैं जो नए नहीं हैं कि सुंदर होना होता क्या है आखिर, सुंदर होने के तथाकथित सामजिक मायने इतना ऊंचा ओहदा कैसे पा गए. कोई चिढ, कोई गुस्सा इतना कैसे बढ़ जाता है कि मानवीयता की सारी हदें पार कर जाता है. और एक अंतिम प्रश्न जो शायद पहला होना चाहिए था कि स्त्रियाँ कब इन साजिशों को समझेंगी. कब वो एक-दूसरे की दोस्त बनेंगी. सुख दुःख की साझीदार बनेंगी. हाँ, जानती हूँ कि स्त्रियों के इस जकड़े हुए व्यवहार के लिए भी वो खुद जिम्मेदार नहीं हैं. यह सब एक बड़ी पितृसत्तात्मक साजिश है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर भी तो हमें इन साजिशों को बेनकाब करने की ओर बढ़ना होगा. कोई भी सत्ता कोई भी बहकावा, कोई भी प्रलोभन हमें मानवीय होने से कैसे रोक सकता है.

किसी एसिड अटैक सर्वाइवर या रेप सर्वाइवर, चाइल्ड अब्यूज विक्टिम को लेकर हम सबको निजी तौर पर अपने रवैये को खंगालने की सख्त जरूरत है.

छपाक तीन बातों की ओर इशारा करती है एक क्राइम के खिलाफ लड़ने की दूसरी क्राइम न हो इसकी मजबूत व्यवस्था करने की और तीसरी हम सबको अपने भीतर झांककर देखने की और ज्यादा मानवीय होने की ओर बढ़ने की.

अगर हम एसिड अटैक विक्टिम या रेप विक्टिम से बात करते हैं उन्हें गले लगाते हैं तो क्यों ख़ास महसूस करते हैं और हमने कुछ ख़ास किया है यह उन्हें भी क्यों महसूस कराते हैं. किसी को नार्मल फील कराने के लिए हमें खुद उनके प्रति नार्मल होना सीखना होगा. एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामना होगा.

याद यह भी रखना होगा कि जो लड़कियां पढ़ रही हैं, बढ़ रही हैं, सपने देख रही हैं, अपनी बात कह रही हैं वो खटक रही हैं. हालाँकि रेप या चाइल्ड अब्यूज के मामले में तो छह महीने की बच्ची भी निशाने पर है. लड़की होना पहले ही गुनाह सा बना रखा था समाज ने अब बोलने वाली, सोचने वाली, सपने देखने वाली लड़कियां कैसे सहन होंगी भला.

महज फिल्म भर नहीं है छपाक. यह समाज की सर्जरी की जरूरत की ओर इशारा करती है. विक्रांत मैसे का फिल्म में और आलोक दीक्षित का लक्ष्मी अग्रवाल के साथ खड़े होना यह भरोसा देता है कि यह सफर सिर्फ स्त्रियों का नहीं है.

बहुत सारे सवालों को उठाती, झकझोरती यह फिल्म सकारात्मक सफर की, हिम्मत की है, हौसले की फिल्म है. मिलकर किसी भी मुश्किल से बाहर निकलने की है, हालात कैसे भी हों जीने की इच्छा से भरे रहने की, जिन्दगी की ओर कदम बढ़ाने की, मोहब्बत पर यकीन करने की फिल्म है.

published in the quint- https://hindi.thequint.com/voices/opinion/chhapaak-deepika-padukaone-acid-attack-victims-society-analysis

Saturday, January 11, 2020

मारीना- विमोचन 5 जनवरी 2020



5 जनवरी 2020 को शाम 3 बजे मारीना की जीवनी का अनौपचारिक विमोचन हुआ. अभी शाम बीती भी नहीं थी कि जेएनयू में हुए बर्बर हमले की खबर आई. मन बुझ गया. कोई तस्वीर, कोई बात साझा करने का मन ही नहीं हुआ.

सोचती हूँ मारीना जीवन भर जैसे राजनैतिक उथल-पुथल से जूझती रही आज इत्ते बरस बाद जब उसकी किताब आई है तब भी हालात कुछ वैसे ही हैं. यह इत्तिफाक ही है शायद. इत्तिफाक यह भी है कि जिस जेएनयू में पढ़ने का मेरा सपना अधूरा रह गया था उसे मारीना ने ही पूरा कराया. मैं वहां पढ़ी नहीं, लेकिन मारीना के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की इच्छा बिना वरयाम जी से मिले, बिना जेएनयू जाए तो पूरी हो ही नहीं सकती थी. फिर उनकी मदद से जेएनयू की रशियन डिपार्टमेंट की लाइब्रेरी में खोज करना, कैंटीन में खाना, गंगा ढाबे पर बैठकर चर्चाएँ करना यह सब संभव हुआ. अधूरा सा इश्क़ था जो मारीना ने पूरा कराया. सोचती हूँ जब कुछ ही दिन जेएनयू में रहकर मैं इस कदर इस जगह से जुड़ी हूँ तो उनका क्या जो यहाँ पढ़े हैं, पढ़ रहे हैं.


जेएनयू के फूल भरे रास्तों पर भागते हुए वरयाम जी से मारीना के किस्से सुनना, वहां की दीवारों पर लिखी इबारतों को देखना महसूस करना कि किस तरह दीवारें दीवारें नहीं रहतीं, इन्कलाब बन जाती हैं इश्क़ बन जाती हैं...

बहुत से दोस्त विमोचन की तस्वीरों की बाबत पूछ रहे हैं. न यह किताब सिर्फ किताब रही न विमोचन. सब प्रेम और स्नेह से रचा गुंथा ही है. दोस्तों ने ही सब सहेजा, दोस्त खुद आये, किताबें खरीदीं, आटोग्राफ लिए, महसूस कराया कि कितनी शिद्दत से वो सब साथ हैं, खुश हैं.

प्रियदर्शन जी ने स्नेहिल टिप्पणी रखी किताब पर, सुभाष मुंह मीठा कराते रहे और बच्चे हाथ थामे रहे. ज्योति और देवयानी अलग कहाँ थीं मुझसे कि मेरी नर्वसनेस वो ही तो संभाल रही थीं.

मेरे लिए यह एक बेहद स्नेहिल शाम थी. दोस्तों की आँखों में जो स्नेह था वो औपचारिक बधाई भर नहीं था वो उससे बहुत ज्यादा था. आलोक, संज्ञा, प्रज्ञा दी, सुजाता, रश्मि रावीजा दी, दिनेश श्रीनेत, अनुपमा जी, रजनी मोरवाल, नील डोगरा, गुनगुन, ऋषभ, शुभंकर, अनीता दुबे, शालिनी, विमल कुमार, अनुराधा बेनीवाल, अबेम, चन्दर, पूजा पुनेठा, प्औेरिका, देवेश,और बहुत सारे लोग...सबने मिलकर एक मामूली व्यक्ति को ख़ास महसूस कराया.

सबसे ख़ास था बिटिया का अपनी पाकेटमनी से पहली किताब खरीदना और किसी का भी किताब मुझसे न माँगना बल्कि खरीदकर मुझसे आटोग्राफ लेना. मैं जानती हूँ यह सिर्फ स्नेह है सबका वरना आटोग्राफ जैसा तो कुछ था नहीं...सबके स्नेह से भीगी हुई हूँ...

Wednesday, January 1, 2020

सब ताज उछाले जाएँगे सब तख़्त गिराए जाएँगे- फैज़


हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो