Tuesday, August 6, 2019

तुमसे प्यार है सोनम, डरो नहीं


'दीदी, आप नहीं जानतीं मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं. बहुत कट्टर होते हैं. इनके साथ यही होना चाहिए. कश्मीर में कितना दंगे करते हैं ये लोग. अब मोदी जी सब ठीक कर देंगे.' सोनम एक सांस में अपनी बात उड़ेल देती है और पूछती है 'आज खाने में क्या बनेगा?' वो पहले भी ऐसी बातें करती रही है. ज्यादा बात नहीं करती लेकिन जब करती है तो मोदी जी की तारीफ ही करती है. गर्व से उसने बताया था कि उसने और उसके परिवार ने भाजपा को वोट दिया. यह कहना बल्कि सोचना भी मुझे बुरा लगता है कि सोनम कौन है किस जाति या धर्म की है, मैंने कभी नहीं पूछा किसी भी अपने सहायक से. लेकिन सोनम को अपनी पहचान छुपानी पड़ी थी. उसने खुद को हिन्दू बताकर घर में खाना बनाना शुरू किया था. हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था लेकिन एक महीने काम करने के बाद पता चला कि वो हिन्दू नहीं है. और यह पता चला मोहल्ले की पढ़ी लिखी आंटी से. उन्होंने मुंह बनाकर बताया 'आपको पता है सोनम मुलसमान है? वो रोजे से होती थी लेकिन छुपाती थी. डरती थी कि कहीं पहचान न खुल जाए.

सोनम हिन्दू नहीं है, मुलसमान है वो. बहुत डरी हुई है वो. हिन्दू घरों में काम करती है और वही बोलती है जो उन्हें सुनना अच्छा लगेगा. यही सोचकर वो मुझसे भी वह सब बोलती है जो काम करने के लिए, जीने के लिए रटकर घर से निकलती है. मैं उसकी तकलीफ समझ सकती हूँ. अभी भी वो मुझ पर पूरा यकीन नहीं कर पायी है हालाँकि उसे एक राहत है कि अब उसे मेरे घर में अपनी पहचान को लेकर झूठ नहीं बोलना पड़ता.

उसने किसे वोट दिया यह उसका अधिकार है, उसका चुनाव लेकिन वो अपना सच बता नहीं सकती. उसे सिर्फ लहर के मुताबिक बात करनी है. मुसलमानों को बुरा भला कहना है और किसी तरह अपनी रोजी रोटी कमानी है. एक रोज उसने कहा, दीदी आपकी बात और है, लेकिन सब लोग यही सुनना चाहते हैं कि मुसलमान ख़राब होते हैं तो हम वही बोलते हैं.

मैं उसके भीतर के डर का सामना नहीं कर पाती. सोनम अकेली नहीं है. बहुत से लोग हैं आसपास. जो चुप हैं. जो इस शोर में, उन्माद में आपके ठहाकों में आपके साथ ही नजर आते हैं लेकिन उनकी आँखों में जो डर है, पीड़ा है उसे देखने की फुर्सत किसी को नहीं. न सरकार को न नागरिकों को. उनके इस डर को अपना बनाना कैसे कहा जा सकता है?

जहाँ धारा 370नहीं है वहां क्या किया है सिवाय नफरत बोने के कि कश्मीर को अपना बनाने का यह तरीका निकाला गया है. इस तरह तो किसी को अपना बनाया नहीं जाता. कश्मीर सिर्फ जमीन नहीं है दिल है वहां के लोगों के उस दिल में क्या इस तरह जगह बना पायेंगे हम? क्या सोनम को अपनी पहचान न छुपानी पड़े यह हमारी चिंता है, हमारे दोस्तों को अपने मन की बात कहते-कहते रुक न जाना पड़े, या उनकी पलकें न भीग उठे, आवाज रुंध न जाए यह हमारी चिंता है. कश्मीर तो हमारा ही था पहले भी, उससे प्यार तब भी था,अब भी है.

अभी-अभी दोस्ती दिवस मनाया है और अब इस बात पर खुश हैं? कितना अच्छा होता कि यह होता लेकिन डर के साए में नहीं मोहब्बत के साए में होता. वो खुद शामिल होते इस फैसले में ख़ुशी से.

#standforpeaceandlove

Monday, July 29, 2019

'कविता कारवां'- गुलज़ार


कुछ खो दिया है पाई के
कुछ पा लिया गँवाई के...

बारिश की चुनरी ओढ़े सावन की कोई शाम गुलज़ार साहब के पहलू में सिमटकर बैठी हो तो दिल के हाल क्या कहें. बिलकुल ऐसा ही दिलफरेब मौसम बना कविता कारवां की देहरादून की बैठक में. जिस्म सौ बार जले फिर वही मिट्टी का ढेला है, रूह देखी है कभी रूह को महसूस किया है...गुलज़ार साहब की नज्म को उन्हीं की आवाज में सुनने से शाम का आगाज़ हुआ और यह आगाज़ उनकी तमाम नज्मों, गीतों, त्रिवेणियों के जरिये परवान चढ़ता गया. बाहर धुला धुला सा मौसम इतना हरा था मानो किसी रेगिस्तान की लड़की की दुआ क़ुबूल हो गयी हो. और गुलज़ार साहब की शोख मखमली आवाज में उनकी ही नज्मों का जादू.

कविताई में डूबी इस पहाड़ी शाम में 'बूढ़े पहाड़ों पर' का जिक्र कैसे न होता भला. विशाल भारद्वाज, सुरेश वाडकर और गुलज़ार साहब की त्रयी 'बूढ़े पहाड़ों पर' को सुनना किस कदर रूमानी था इसे बयान करना मुश्किल है. इसके बाद एक-एक कर 'अबके बरस भेज भैया को बाबुल', 'किताबें करती हैं बातें', 'बारिश आती है तो पानी को भी लग जाते हैं पाँव', 'प्यार कभी इकतरफा नहीं होता', 'अभी न पर्दा उठाओ', 'आँखों को वीजा नहीं लगता', 'यार जुलाहे', 'मुझको इतने से काम पर रख लो', 'मोरा गोरा अंग लई ले' सहित रचनाओं के साथ शाम गुलज़ार हुई.

गुलज़ार साहब से मुलाकातों के किस्से छिडे, उनकी फिल्मों का जिक्र हुआ, उनकी कविता के अलावा उनके प्रोज उनकी कहानियों पर भी बात हुई. बात हुई कि किस तरह बंटवारे की खराशें उनके लिखे में तारी हैं. गुलज़ार पोयट्री के साथ पोलिटिकल जस्टिस और पोलिटिकल बेचैनी को पोयटिक बनाने में माहिर हैं यह उनकी फिल्म आंधी, हू तू तू आदि में अच्छे से दिखता है. शाम थामे नहीं थम रही थी. गुलज़ार यूँ ही तो गुलज़ार नहीं हुए होंगे कि उनका जिक्र होगा तो जिक्र अमृता आपा का भी होगा और मीना कुमारी का भी और किस तरह उनका नाम गुलज़ार पड़ा इसका भी जिक्र होगा ही, सो हुआ. शाम बीत गयी लेकिन हम सब बैठक से गुलज़ारियत लिए लौटे हैं.

18 अगस्त को उनका जन्मदिन है देहरादून में उनके दीवानों ने उनका जन्मदिन एडवांस में मना लिया...मौसम ने इस शाम में खूब रंग भरे...

Sunday, July 28, 2019

मनमर्जियों की बेल लहलहा रही है


कोरी हथेलियों को देखती हूँ तो देखती ही जाती हूँ. कोरी हथेलियों पर मनमर्जियां उगाने का सुख होता है. मनमर्जियां...कितना दिलकश शब्द है लेकिन इस शब्द की यात्रा बहुत लम्बी है. आसानी से नहीं उगता यह जिन्दगी के बगीचे में. इस शब्द की तासीर सबको भाती है लेकिन इसे उगाने का हुनर कमाना आसान नहीं. और यह आसान न होना मनमर्जियो के माथे पर तमाम इलज़ाम धर देता है.

जिसने सीख लिया मनमर्जियां उगाना उसे हर पल सींचना पड़ता है इसे पूरी लगन से, शिद्दत से, सींच रही हूँ जाने कबसे. इन दिनों बारिशें हैं सो थोड़ी राहत है, सींचना नहीं पड़ता खुद-ब खुद-बढ़ रही है मनमर्जियों की बेल. मैं चाहती हूँ यह आसमान तक जा पहुंचे, हर आंगन में उगे. लडकियों के मन के आंगन में तो जरूर उगे.

अबकी बारिशों में खूब भीगना हो रहा है, लगभग रोज ही. निकलती हूँ घर से तो साथ हो लेती है बारिश...साथ ही चलती जाती है. रात होती है सरगम सी घुलती जाती है इसकी आवाज़ और सुबह चेहरे पर छींटे मिलते है बेहिसाब. रेनकोट बेचारा इग्नोर फील कर रहा है.

एकदम हरी सुरंग से हो रहे हैं रास्ते, बादल आँखों के सामने खेलते रहते हैं. पहाड़ियां मुस्कुरा रही हैं, फूल बारिशों में नहाये हैं, थिरक रहे हैं. चमकती हैं हीरे की कनी से बूंदों पर अटकी बूँदें. ये जिन्दगी कितनी खूबसूरत है. मैं बारिशों को पी जाना चाहती हूँ.

अक्सर पाया है कि जब हम जीवन को कोस रहे थे जीवन बड़ी उम्मीद से हमें देख रहा था.

मेरी मनमर्जियों की बेल कई दोस्तों के कांधो का सहारा लेकर भी बढ़ रही है, उसमें अब बूंदों वाले फूल उग रहे हैं. भीगे-भीगे फूल. राग मालकोश की धुन बज रही है कहीं...

Thursday, July 25, 2019

साढे चार मिनट



कमरे में तीन ही लोग थे। वो मैं और एक हमारी दोस्त...

तीनों ही मौन थे।
मैं वहां सबसे ज्यादा थी या शायद सबसे कम।
वो वहां सबसे कम था या शायद सबसे ज्यादा।
दोस्त पूरी तरह से वहीं थी।
मैं खिड़की से बाहर देख रही थी।

सब खामोश थे। यह खामोशी इतनी सहज थी कि किसी राग सी लग रही थी। मैं खिड़की के बाहर लगे अनार के पेड़ों पर खिलते फूलों को देख रही थी। जिस डाल पर मेरी नजर अटकी थी वो स्थिर थी हालांकि उस पर अटकी पत्तियां बहुत धीरे से हिल रही थीं।

उन पत्तियों का इस तरह हिलना मुझे मेरे भीतर का कंपन लग रहा था। मुझे लगा मैं वो पत्ती हूं और वो...वो स्थिर डाल है। डाल स्थाई है। पत्तियों को झरना है। फिर उगना है। फिर झरना है...फिर उगना है।

'मुझे मां से बात करनी है...' वो बोला।

उसके ये शब्द खामोशी को सलीके से तोड़ने वाले थे।
मैं मुड़ी नही। वहीं अनार की डाल पर अटकी रही।
दोस्त ने कहा, 'अच्छा, कर लीजिए।'
'क्या वो यहीं हैं...?' उसने पूछा।
'हां, वो अंदर ही हैं।' बुलाती हूं।

कुछ देर बाद कमरे में चार लोग थे। मां मैं वो और दोस्त।
मैं अब भी खिड़की के बाहर देख रही थी।
'आप अंकल से बात कर लीजिए...' उसने मां से कहा।
मां चुप रहीं।

'लेकिन...' दोस्त कुछ कहते-कहते रुक गई।
'किसी लेकिन की चिंता आप लोग न करें...मैं सब संभाल लूंगा। सब।'
उसने मां की हथेलियों को अपने हाथों में ले लिया।
दोस्त ने कहा, 'फिर भी।'
'परेशान मत हो। यकीन करो। ' उसने बेहद शांत स्वर में कहा।

कमरे में मौजूद लोगों की तरफ अब तक मेरी आधी पीठ थी। अब मैंने उनकी तरफ पूरी पीठ कर ली ताकि सिर्फ अनार के फूल मेरे बहते हुए आंसू देख सकें।

मां कमरे से चलीं गईं...दोस्त भी।

वो मेरे पीछे आकर खड़ा हुआ। अब वो भी कमरे के बाहर देख रहा था। शायद अनार के फूल...या हिलती हुई पत्तियां। कमरे में कुछ बच्चे खेलते हुए चले आए। उसने बच्चों के सर पर हाथ फिराया...बच्चे कमरे का गोल-गोल चक्कर लगाकर ज्यूंयूयूँ से चले गए।

अब कमरे में वो था और मैं...बाहर वो अनार की डाल...
उसकी तरफ मेरी पीठ थी....उसने कहा, 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा है...'

गहरी सर्द सिसकी भीतर रोकने की कोशिश अब रुकी नहीं।
अनार की डाल मुस्कुरा उठी।
'सिर्फ साढ़े चार मिनट नहीं, साढ़े चौदह साल...' मैंने कहा...

उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया।
हम दोनों अनार की डाल को देखने लगे...
बच्चे फिर से खेलते हुए कमरे में आ गए थे...उसने फिर से उनकी पीठ पर धौल जमाई...

वो आखिरी बार था जब मां की जिंदा हथेलियों को इस तरह किसी ने अपनी हथेलियों में रखा था।
उसी रात मां मर गई।
रोज की तरह चांद गली के मोड़ वाले पकरिया के पेड़ में उलझा रहा।
मां रात को सारे काम निपटाकर सोईं और फिर जगी नहीं।
बरसों से वो उचटी नींदों से परेशान थीं। सुबह उनके चेहरे पर सुकून था। वो सुकून जो उनके जिंदा चेहरे पर कभी नहीं दिखा।

वो आता, थोड़ी देर खामोशी से बैठता, चाय पीता चला जाता।
न वो मेरी खामोशी को तोड़ता न मैं उसकी।
हमारे दरम्यिान अब सवाल नहीं रहे थे। उम्मीद भी नहीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या जरूर कुछ उदास दिखती थी।
मां ने पक्षियों को दाना देकर घर का सदस्य बना लिया था। वो घर जो उन्हें अपना नहीं सका, उस घर को उन्होंने कितनों का अपना बना दिया।

'तो तुमने क्या सोचा?' एक रोज उसने खामोशी को थोड़ा परे सरकाकर पूछा।
मैं चुप रही।
वो चला गया।
मैं भी उसके साथ चली गई थी हालांकि कमरे में मैं बची हुई थी।

दोस्त मेरी हथेलियों को थामती। मुझसे कहीं बाहर जाने को कहती, बात करने को कहती। उसे लग रहा था कि मैं मां के मर जाने से उदास हूं।
असल में मां की इतनी सुंदर मौत से मैं खुश थी। इसके लिए मैं उसकी अहसानमंद थी।
जीवन भर मां को कोई सुख न दे सकी कम से कम सुकून की मौत ही सही।

अनार की डाल पर इस बरस खूब अनार लटके। इतने कि डालें चटखने लगीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या फिर से गुनगुनाने लगी।
मां की तस्वीर पर माला मैंने चढ़ने नहीं दिया।

उस रोज भी कमरे में चार लोग थे।
वो, मैं दोस्त और मां तस्वीर में.
वो जो सबसे कम था लेकिन था
मैं जो थी लेकिन नहीं थी
दोस्त पिछली बार की तरह वहीं थी न कम न ज्यादा
मां कमरे में सबसे ज्यादा थीं, तस्वीर में।

'साथ चलोगी?' उसने पूछा.
'साथ ही चल रही हूं साढे़ चौदह सालों से,' मैंने कहना चाहा लेकिन चुप रही।
'कहां?' दोस्त ने पूछा।
'अमेरिका....' उसने कहा
'लेकिन...' दोस्त ने कुछ कहना चाहा पर रुक गई।
'यहां सबको इस तरह छोड़कर...कैसे...' दोस्त ने अटकते हुए कहा।
शायद उसे उम्मीद थी कि वो पिछली बार की तरह उसे रोक देगा यह कहकर कि, 'लेकिन की चिंता मत करो, मैं संभाल लूंगा। सब। बस यकीन करो।'

उसने कुछ नहीं कहा। मैं मां की तस्वीर को देख रही थी।
'हां, मैं भी वही सोच रहा था।' उसने आखिरी कश के बाद बुझी हुई सिगरेट की सी बुझी आवाज में कहा।
'आपका जाना जरूरी है?' दोस्त राख कुरेद रही थी।

वो खामोश रहा।
चांदनी अनार के पेड़ पर झर रही थी।
'हां,' उसने कहा। दोस्त उठकर कमरे से चली गई। शायद गुस्से में। या उदासी में।
अब कमरे में तीन लोग थे मैं वो और मां।

'तुमने मेरी मां को सुख दिया,' कहते हुए मेरी आवाज भीगने को हो आई।
'तुम्हें भी देना चाहता था...' उसने कहा।
मेरे कानों ने सिर्फ 'था' सुना...

वो बिना ये कहे कमरे से चला गया कि 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा।'
न मैं यह कह पाई कि 'उम्र भर उसे न देख सकने का रियाज कर रही हूं...'

Tuesday, June 11, 2019

जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये...



चाँद एकदम ठीक से सज गया है खिड़की में. न कम न ज्यादा, न रत्ती भर दाएं, न रत्ती भर बाएं खिड़की के ठीक सामने। सामने वाले पेड़ के कोने से झांकता. मैं उसे देख सुकून की सांस लेती हूँ. भीतर की सूखी नदी को नमी महसूस होती है. भागते-भागते थक चुके पैरों पर उभर आये छालों को जैसे मरहम मिला हो. तेज़ हवा का झोंका करीब आकर बैठ गया है. बीती हुई शाम की खुशबू मोगरे के फूलों में बसी हुई है. मोगरे जो पास ही कहीं खिले हैं. वो दिख नहीं रहे, महसूस हो रहे हैं. इश्क़ की तरह.

गोमती के किनारे से गुजरते हुए नदी में पांव डालकर बैठने की जिस इच्छा को पाला पोसा था उसे हरिद्वार में गंगा में पांव डालकर घंटों बैठकर पूरा होते देखना सपना नहीं था. सोचती हूँ कि सपना क्या था आखिर. मेरी आँखें छलक उठती हैं कि मेरा कोई सपना नहीं था. न है. बस कि नन्हे नन्हे लम्हों को शिद्द्त से जीने की इच्छा थी. बारिशों को पीने की, समंदर के किनारों पर घंटों पड़े रहनी की इच्छा जो अवचेतन में ही पड़ी रही होगी शायद। कि जब बारिश ने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया तब मुझे अपनी इच्छा का इल्म हुआ, जब समंदर ने किनारे से उठाकर भीतर फेंक दिया तब समझी कि आह यह भी कोई इच्छा थी भीतर.

हमेशा जीकर ही जाना है अपनी इच्छाओं को, जी चुकने के बाद या कभी-कभी जीते हुए भी. जीने से पहले किसी इच्छा को जाना होता तो उसका पीछा किया होता. सपने खूब देखने चाहिए कहते हुए भी खुद के सपनों का पता नहीं लगा सकी.

आज फिर ऐसी ही किसी अनजानी इच्छा के भीतर हूँ. उसके भीतर होते हुए, उसे जीते हुए उसे जीने के लिए जूझते हुए, थकते हुए, निढाल होते हुए यूँ चाँद देखने का सुख मेरा सपना तो नहीं था. फिर क्योंकर मैं ऐसी घर की तलाश में भटक रही थी जिसकी खिड़की से चाँद दिखता हो.

वो सपने जो डरकर हम देखते नहीं वो अपना तिलस्म गढ़ लेते हैं, वो बैकडोर इंट्री लेते हैं. मैं इन दिनों ऐसे ही किसी अनदेखे सपने की जद में हूँ. वो सपना जो मेरा नहीं था लेकिन जिसमें होने का सुख मेरा ही है.

मेंहदी हसन को सुनना इस सपने का उन्वान है. गहरी ख़ामोशी है आसपास, 'जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये... अरसे बाद यह आवाज कानों में घुल रही है. यह चुराया हुआ लम्हा है, या बहुत मेहनत से उगाया हुआ. यह लम्हा बहुत छोटा है लेकिन इसने मुझे थाम लिया है. मुझे अपने खुद के पास वापस लौटने की इच्छा वापस जागती हुई नज़र आ रही है. खुद को छूकर देखती हूँ. कोई सिसकी फूटती है... कितनी दूर निकल गयी हूँ खुद से. कोई नहीं कहता कि 'लौट आओ, मत जाओ... ' फिर मैं दूर जाती ही जाती हूँ किसी रोबोट की तरह.. लेकिन ये चाँद मेरा रास्ता रोके खड़ा है आज. मेरी खिड़की के ठीक सामने टंगा चाँद। मेरे कमरे से नज़र आता चाँद.

मैं बहुत रोना चाहती हूँ. बहुत सोना चाहती हूँ. थोड़ा सा जीना चाहती हूँ बहुत सारा मरना चाहती हूँ. कि मेरी हथेलियों में कोई लकीरें नहीं, मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं बस कि माथे पर चाँद का टीका है...

पांव का दर्द टप टप कर रहा है. यह दर्द दिल के दर्द से कितना कम है. मैं न दुखी हूँ न उदास हूँ बस मैं हूँ... बाद मुदद्त।


(इश्क़ शहर, घर)